आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 43
ब्रह्मा द्वारा प्रत्येक वर्ग के श्रेष्ठ का वर्णन और इन्द्रियों के लक्षण
ब्रह्मा ऋषियों को बताते हैं कि वृक्षों, पर्वतों और नदियों से लेकर देवताओं तक प्रत्येक वर्ग में कौन श्रेष्ठ है, और विष्णु को परम स्वामी घोषित करते हैं। वे राजाओं को द्विजों की रक्षा के लिए प्रेरित करते हैं, फिर धर्म तथा प्रत्येक तत्त्व और इन्द्रिय के लक्षण गिनाते हैं। अन्त में वे बताते हैं कि इन्द्रियाँ अपने गुणों को कैसे ग्रहण करती हैं और सब गुणों से रहित क्षेत्रज्ञ उनसे परे कैसे स्थित है।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 1 (14.43.1)
मनुष्याणां तु राजन्यः क्षत्रियो मध्यमो गुणः । कुञ्जरो वाहनानां च सिंहश्चारण्यवासिनाम् ॥
manuṣyāṇāṃ tu rājanyaḥ kṣatriyo madhyamo guṇaḥ | kuñjaro vāhanānāṃ ca siṃhaścāraṇyavāsinām
मनुष्यों में राजा अर्थात् क्षत्रिय मध्यम गुण है; वाहनों में हाथी श्रेष्ठ है और वन में रहने वालों में सिंह।
श्लोक 2 (14.43.2)
अविः पशूनां सर्वेषामहिस्तु बिलवासिनाम् । गवां गोवृषभश्चैव स्त्रीणां पुरुष एव च ॥
aviḥ paśūnāṃ sarveṣāmahistu bilavāsinām | gavāṃ govṛṣabhaścaiva strīṇāṃ puruṣa eva ca
समस्त पशुओं में भेड़, बिलों में रहने वालों में सर्प, गौओं में साँड़ और स्त्रियों में पुरुष श्रेष्ठ है।
श्लोक 3 (14.43.3)
न्यग्रोधो जम्बुवृक्षश्च पिप्पलः शाल्मलिस्तथा । शिंशपा मेषशृङ्गश्च तथा कीचकवेणवः ॥
nyagrodho jambuvṛkṣaśca pippalaḥ śālmalistathā | śiṃśapā meṣaśṛṅgaśca tathā kīcakaveṇavaḥ
बरगद, जामुन, पीपल और सेमल, शीशम, मेषशृंग तथा कीचक और बाँस—
श्लोक 4 (14.43.4)
एते द्रुमाणां राजानो गणानां मरुतस्तथा । हिमवान्पारियात्रश्च सह्यो विन्ध्यस्त्रिकूटवान् ॥
ete drumāṇāṃ rājāno gaṇānāṃ marutastathā | himavānpāriyātraśca sahyo vindhyastrikūṭavān
ये वृक्षों के राजा हैं, जैसे गणों में मरुत् हैं। पर्वतों में हिमवान्, पारियात्र, सह्य, विन्ध्य और त्रिकूटवान्,
श्लोक 5 (14.43.5)
श्वेतो नीलश्च भासश्च राष्ट्रवांश्चैव पर्वतः । भृशस्कन्धो महेन्द्रश्च माल्यवान्पर्वतस्तथा ॥
śveto nīlaśca bhāsaśca rāṣṭravāṃścaiva parvataḥ | bhṛśaskandho mahendraśca mālyavānparvatastathā
श्वेत, नील, भास और राष्ट्रवान् पर्वत, भृशस्कन्ध, महेन्द्र तथा माल्यवान् पर्वत—
श्लोक 6 (14.43.6)
एते पर्वतराजानो गणानां मरुतस्तथा । सूर्यो ग्रहाणामधिपो नक्षत्राणां च चन्द्रमाः ॥
ete parvatarājāno gaṇānāṃ marutastathā | sūryo grahāṇāmadhipo nakṣatrāṇāṃ ca candramāḥ
ये पर्वतों के राजा हैं, जैसे गणों में मरुत् हैं। ग्रहों का स्वामी सूर्य है और नक्षत्रों का चन्द्रमा।
श्लोक 7 (14.43.7)
यमः पितॄणामधिपः सरितामथ सागरः । अंभसां वरुणो राजा मरुतामिन्द्र उच्यते ॥
yamaḥ pitṝṇāmadhipaḥ saritāmatha sāgaraḥ | aṃbhasāṃ varuṇo rājā marutāmindra ucyate
पितरों का स्वामी यम है और नदियों का समुद्र; जलों का राजा वरुण है और मरुतों का अधिपति इन्द्र कहा जाता है।
श्लोक 8 (14.43.8)
अर्कोऽधिपतिरुष्णानां ज्योतिषामिन्दुरुच्यते । अग्निर्भूतपतिर्नित्यं ब्राह्मणानां बृहस्पतिः ॥
arko'dhipatiruṣṇānāṃ jyotiṣāmindurucyate | agnirbhūtapatirnityaṃ brāhmaṇānāṃ bṛhaspatiḥ
उष्ण वस्तुओं का अधिपति सूर्य है और ज्योतियों का अधिपति चन्द्रमा कहा जाता है; प्राणियों का सदा के लिए स्वामी अग्नि है और ब्राह्मणों का बृहस्पति।
श्लोक 9 (14.43.9)
ओषधीनां पतिः सोमो विष्णुर्बलवतां वरः । त्वष्टाधिराजो रूपाणां पशूनामीश्वरः शिवः ॥
oṣadhīnāṃ patiḥ somo viṣṇurbalavatāṃ varaḥ | tvaṣṭādhirājo rūpāṇāṃ paśūnāmīśvaraḥ śivaḥ
ओषधियों का स्वामी सोम है और बलवानों में श्रेष्ठ विष्णु हैं; रूपों का अधिराज त्वष्टा है और जीवों के स्वामी शिव हैं।
श्लोक 10 (14.43.10)
दक्षिणानां तथा यज्ञो वेदानामृच एव च । दिशामुदीची विप्राणां सोमो राजा प्रतापवान् ॥
dakṣiṇānāṃ tathā yajño vedānāmṛca eva ca | diśāmudīcī viprāṇāṃ somo rājā pratāpavān
दक्षिणाओं में यज्ञ प्रधान है और वेदों में ऋक्; दिशाओं में उत्तर दिशा प्रधान है और प्रतापी सोम ब्राह्मणों का राजा है।
श्लोक 11 (14.43.11)
कुबेरः सर्वरत्नानां देवतानां पुरंदरः । एष भूताधिपः सर्गः प्रजानां च प्रजापतिः ॥
kuberaḥ sarvaratnānāṃ devatānāṃ puraṃdaraḥ | eṣa bhūtādhipaḥ sargaḥ prajānāṃ ca prajāpatiḥ
सब रत्नों का स्वामी कुबेर है और देवताओं का पुरन्दर; यही प्राणियों का अधिपति, सृष्टिरूप और प्रजाओं का प्रजापति है।
श्लोक 12 (14.43.12)
सर्वेषामेव भूतानामहं ब्रह्ममयो महान् । भूतं परतरं मत्तो विष्णोर्वाऽपि न विद्यते ॥
sarveṣāmeva bhūtānāmahaṃ brahmamayo mahān | bhūtaṃ parataraṃ matto viṣṇorvā'pi na vidyate
समस्त प्राणियों में मैं ब्रह्ममय महान् हूँ; मुझसे या विष्णु से बढ़कर कोई प्राणी नहीं है।
श्लोक 13 (14.43.13)
राजाधिराजः सर्वेषां विष्णुर्ब्रह्ममयो महान् । ईश्वरं तं विजानीमः स विभुः स प्रजापतिः ॥
rājādhirājaḥ sarveṣāṃ viṣṇurbrahmamayo mahān | īśvaraṃ taṃ vijānīmaḥ sa vibhuḥ sa prajāpatiḥ
ब्रह्ममय महान् विष्णु सबके राजाधिराज हैं; हम उन्हें ईश्वर जानते हैं। वे सर्वव्यापी हैं, वे ही प्रजापति हैं।
श्लोक 14 (14.43.14)
नरकिन्नरयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् । देवदानवनागानां सर्वेषामीश्वरो हि सः ॥
narakinnarayakṣāṇāṃ gandharvoragarakṣasām | devadānavanāgānāṃ sarveṣāmīśvaro hi saḥ
वे मनुष्यों, किन्नरों और यक्षों के, गन्धर्वों, उरगों और राक्षसों के तथा देवों, दानवों और नागों के—इन सबके ईश्वर हैं।
श्लोक 15 (14.43.15)
भगदेवानुयातानां सर्वासां वामलोचना । माहेश्वरी महादेवी प्रोच्यते पार्वती हि सा ॥
bhagadevānuyātānāṃ sarvāsāṃ vāmalocanā | māheśvarī mahādevī procyate pārvatī hi sā
भग और देवताओं से अनुगत सब स्त्रियों में सुन्दर नेत्रों वाली, महेश्वर की पत्नी महादेवी पार्वती कही जाती हैं।
श्लोक 16 (14.43.16)
उमां देवीं विजानीध्वं नारीणामुत्तमां शुभाम् । रतीनां वसुमत्यस्तु स्त्रीणामप्सरसस्तथा ॥
umāṃ devīṃ vijānīdhvaṃ nārīṇāmuttamāṃ śubhām | ratīnāṃ vasumatyastu strīṇāmapsarasastathā
देवी उमा को स्त्रियों में सर्वश्रेष्ठ और परम मंगलमयी जानो; सुखों में धनवानों के सुख और स्त्रियों में अप्सराएँ श्रेष्ठ हैं।
श्लोक 17 (14.43.17)
धर्मिकामाश्च राजानो ब्राह्मणा धर्मसेतवः । तस्माद्राजा द्विजातीनां प्रयतेतेह रक्षणे ॥
dharmikāmāśca rājāno brāhmaṇā dharmasetavaḥ | tasmādrājā dvijātīnāṃ prayateteha rakṣaṇe
राजा धर्म की कामना करने वाले होते हैं और ब्राह्मण धर्म के सेतु हैं; इसलिए राजा को इस लोक में द्विजातियों की रक्षा के लिए प्रयत्न करना चाहिए।
श्लोक 18 (14.43.18)
राज्ञां हि विषये येषामवसीदन्ति साधवः । हीनास्ते स्वगुणैः सर्वैः प्रेत्यावाङ्मार्गगामिनः ॥
rājñāṃ hi viṣaye yeṣāmavasīdanti sādhavaḥ | hīnāste svaguṇaiḥ sarvaiḥ pretyāvāṅmārgagāminaḥ
जिन राजाओं के राज्य में सज्जन दुःख पाते हैं, वे अपने सब गुणों से हीन हो जाते हैं और मरने के बाद नीचे ले जाने वाले मार्ग पर जाते हैं।
श्लोक 19 (14.43.19)
राज्ञां हि विषये येषां साधवः परिरक्षिताः । तेऽस्मिँल्लोके प्रमोदन्ते प्रेत्य चानन्दमेव च ॥
rājñāṃ hi viṣaye yeṣāṃ sādhavaḥ parirakṣitāḥ | te'smim̐lloke pramodante pretya cānandameva ca
किन्तु जिनके राज्य में सज्जन भली-भाँति सुरक्षित रहते हैं, वे इस लोक में आनन्द करते हैं और मरने के बाद भी आनन्द ही पाते हैं।
श्लोक 20 (14.43.20)
प्राप्नुवन्ति महात्मान इति वित्त द्विजर्षभाः । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि नियतं धर्मलक्षणम् ॥
prāpnuvanti mahātmāna iti vitta dvijarṣabhāḥ | ata ūrdhvaṃ pravakṣyāmi niyataṃ dharmalakṣaṇam
महात्मा लोग इसे पाते हैं, हे द्विजश्रेष्ठो—ऐसा जानो। अब से मैं धर्म के निश्चित लक्षण कहूँगा।
श्लोक 21 (14.43.21)
अहिंसालक्षणो धर्मो हिंसा चाधर्मलक्षणा । प्रकाशलक्षणा देवा मनुष्याः कर्मलक्षणाः ॥
ahiṃsālakṣaṇo dharmo hiṃsā cādharmalakṣaṇā | prakāśalakṣaṇā devā manuṣyāḥ karmalakṣaṇāḥ
धर्म का लक्षण अहिंसा है और हिंसा अधर्म का लक्षण है। देवता प्रकाश से पहचाने जाते हैं और मनुष्य कर्म से।
श्लोक 22 (14.43.22)
शब्दलक्षणमाकाशं वायुस्तु स्पर्शलक्षणः । ज्योतिषां लक्षणं रूपमापश्च रसलक्षणाः ॥
śabdalakṣaṇamākāśaṃ vāyustu sparśalakṣaṇaḥ | jyotiṣāṃ lakṣaṇaṃ rūpamāpaśca rasalakṣaṇāḥ
आकाश का लक्षण शब्द है और वायु का स्पर्श; तेज का लक्षण रूप है और जल का लक्षण रस।
श्लोक 23 (14.43.23)
धारिणी सर्वभूतानां पृथिवी गन्धलक्षणा । स्वरव्यञ्जनसंस्कारा भारती शब्दलक्षणा ॥
dhāriṇī sarvabhūtānāṃ pṛthivī gandhalakṣaṇā | svaravyañjanasaṃskārā bhāratī śabdalakṣaṇā
समस्त प्राणियों को धारण करने वाली पृथ्वी का लक्षण गन्ध है; और स्वर-व्यञ्जनों से संस्कारित वाणी का लक्षण शब्द है।
श्लोक 24 (14.43.24)
मनसो लक्षणं चिन्ता तथोक्ता बुद्धिरन्वयात् । मनसा चिन्तितानर्थान्बुद्ध्या चेह व्यवस्यति ॥
manaso lakṣaṇaṃ cintā tathoktā buddhiranvayāt | manasā cintitānarthānbuddhyā ceha vyavasyati
मन का लक्षण चिन्ता है और बुद्धि उसके अनुसार कही गई है। मन से मनुष्य बातों का विचार करता है और बुद्धि से यहाँ उनका निश्चय करता है।
श्लोक 25 (14.43.25)
बुद्धिर्हि व्यवसायेन लक्ष्यते नात्र संशयः । लक्षणं मनसो ध्यानमव्यक्तं साधुलक्षणम् ॥
buddhirhi vyavasāyena lakṣyate nātra saṃśayaḥ | lakṣaṇaṃ manaso dhyānamavyaktaṃ sādhulakṣaṇam
बुद्धि निश्चय से पहचानी जाती है, इसमें संशय नहीं। मन का लक्षण ध्यान है और अव्यक्त साधु का लक्षण है।
श्लोक 26 (14.43.26)
प्रवृत्तिलक्षणो योगो ज्ञानं संन्यासलक्षणम् । तस्माज्ज्ञानं पुरस्कृत्य संन्यसेदिह बुद्धिमान् ॥
pravṛttilakṣaṇo yogo jñānaṃ saṃnyāsalakṣaṇam | tasmājjñānaṃ puraskṛtya saṃnyasediha buddhimān
योग का लक्षण प्रवृत्ति है और ज्ञान का लक्षण संन्यास। इसलिए बुद्धिमान को ज्ञान को आगे रखकर यहाँ संन्यास लेना चाहिए।
श्लोक 27 (14.43.27)
संन्यासी ज्ञानसंयुक्तः प्राप्नोति परमां गतिम् । अतीतोऽद्वन्द्वमभ्येति तमोमृत्युजरातिगः ॥
saṃnyāsī jñānasaṃyuktaḥ prāpnoti paramāṃ gatim | atīto'dvandvamabhyeti tamomṛtyujarātigaḥ
ज्ञान से युक्त संन्यासी परम गति पाता है। वह पार होकर द्वन्द्वों से रहित अवस्था को प्राप्त होता है और अन्धकार, मृत्यु तथा जरा से परे चला जाता है।
श्लोक 28 (14.43.28)
धर्मलक्षणसंयुक्तमुक्तं वो विधिवन्मया । गुणानां ग्रहणं सम्यग्वक्ष्याम्यहमतः परम् ॥
dharmalakṣaṇasaṃyuktamuktaṃ vo vidhivanmayā | guṇānāṃ grahaṇaṃ samyagvakṣyāmyahamataḥ param
धर्म के लक्षणों से युक्त जो बातें थीं, वे मैंने तुमसे विधिपूर्वक कह दीं; अब मैं गुणों के ग्रहण का ठीक-ठीक वर्णन करूँगा।
श्लोक 29 (14.43.29)
पार्थिवो यस्तु गन्धो वै घ्राणेन हि स गृह्यते । घ्राणस्थश्च तथा वायुर्गन्धज्ञाने विधीयते ॥
pārthivo yastu gandho vai ghrāṇena hi sa gṛhyate | ghrāṇasthaśca tathā vāyurgandhajñāne vidhīyate
पृथ्वी का जो गुण गन्ध है, वह नाक से ग्रहण किया जाता है; और नासिका में स्थित वायु गन्ध के ज्ञान के लिए नियुक्त है।
श्लोक 30 (14.43.30)
अपां धातुरसो नित्यं जिह्वया स तु गृह्यते । जिह्वास्थश्च तथा सोमो रसज्ञाने विधीयते ॥
apāṃ dhāturaso nityaṃ jihvayā sa tu gṛhyate | jihvāsthaśca tathā somo rasajñāne vidhīyate
जल का धातु रस सदा जीभ से ग्रहण किया जाता है; और जीभ में स्थित सोम रस के ज्ञान के लिए नियुक्त है।
श्लोक 31 (14.43.31)
तेजसस्तु गुणो रूपं चक्षुषा तच्च गृह्यते । चक्षुःस्थश्च तथादित्यो रूपज्ञाने विधीयते ॥
tejasastu guṇo rūpaṃ cakṣuṣā tacca gṛhyate | cakṣuḥsthaśca tathādityo rūpajñāne vidhīyate
तेज का गुण रूप है और वह नेत्र से ग्रहण किया जाता है; और नेत्र में स्थित आदित्य रूप के ज्ञान के लिए नियुक्त है।
श्लोक 32 (14.43.32)
वायव्यस्तु सदा स्पर्शस्त्वचा प्रज्ञायते च सः । त्वक्स्थश्चैव सदा वायुः स्पर्शने स विधीयते ॥
vāyavyastu sadā sparśastvacā prajñāyate ca saḥ | tvaksthaścaiva sadā vāyuḥ sparśane sa vidhīyate
वायु का गुण स्पर्श त्वचा से जाना जाता है; और त्वचा में स्थित वायु स्पर्श के ज्ञान के लिए नियुक्त है।
श्लोक 33 (14.43.33)
आकाशस्य गुणो घोषः श्रोत्रेण च स गृह्यते । श्रोत्रस्थाश्च दिशः सर्वाः शब्दज्ञाने प्रकीर्तिताः ॥
ākāśasya guṇo ghoṣaḥ śrotreṇa ca sa gṛhyate | śrotrasthāśca diśaḥ sarvāḥ śabdajñāne prakīrtitāḥ
आकाश का गुण घोष है और वह कान से ग्रहण किया जाता है; और कान में स्थित सब दिशाएँ शब्द के ज्ञान में कारण बताई गई हैं।
श्लोक 34 (14.43.34)
मनसश्च गुणश्चिन्ता प्रज्ञया स तु गृह्यते । हृदिस्थश्चेतनो धातुर्मनोज्ञाने विधीयते ॥
manasaśca guṇaścintā prajñayā sa tu gṛhyate | hṛdisthaścetano dhāturmanojñāne vidhīyate
मन का गुण चिन्ता है और वह प्रज्ञा से ग्रहण की जाती है; और हृदय में स्थित चेतन तत्त्व मन के ज्ञान के लिए नियुक्त है।
श्लोक 35 (14.43.35)
बुद्धिरध्यवसायेन ध्यानेन च महांस्तथा । निश्चित्य ग्रहणाद्व्यक्तमव्यक्तं नात्र संशयः ॥
buddhiradhyavasāyena dhyānena ca mahāṃstathā | niścitya grahaṇādvyaktamavyaktaṃ nātra saṃśayaḥ
बुद्धि निश्चय से जानी जाती है और महत्तत्त्व ध्यान से। निश्चय करके ग्रहण करने के कारण वह व्यक्त होती है, फिर भी अव्यक्त है—इसमें संशय नहीं।
श्लोक 36 (14.43.36)
अलिङ्गग्रहणो नित्यः क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मकः । तस्मादलिङ्गः क्षेत्रज्ञः केवलं ज्ञानलक्षणः ॥
aliṅgagrahaṇo nityaḥ kṣetrajño nirguṇātmakaḥ | tasmādaliṅgaḥ kṣetrajñaḥ kevalaṃ jñānalakṣaṇaḥ
क्षेत्रज्ञ नित्य है, किसी चिह्न से ग्रहण नहीं होता और गुणों से रहित है। इसलिए क्षेत्रज्ञ चिह्नरहित है; उसका लक्षण केवल ज्ञान है।
श्लोक 37 (14.43.37)
अव्यक्तं क्षेत्रमुद्दिष्टं गुणानां प्रभवाप्ययम् । सदा पश्याम्यहं लीनं विजानामि शृणोमि च ॥
avyaktaṃ kṣetramuddiṣṭaṃ guṇānāṃ prabhavāpyayam | sadā paśyāmyahaṃ līnaṃ vijānāmi śṛṇomi ca
अव्यक्त को क्षेत्र कहा गया है; वह गुणों की उत्पत्ति और लय का स्थान है। मैं उसे सदा लीन देखता हूँ और उसे जानता तथा सुनता हूँ।
श्लोक 38 (14.43.38)
पुरुषस्तद्विजानीते तस्मात्क्षेत्रज्ञ उच्यते । गुणवृत्तं तथा कृत्स्नं क्षेत्रज्ञः परिपश्यति ॥
puruṣastadvijānīte tasmātkṣetrajña ucyate | guṇavṛttaṃ tathā kṛtsnaṃ kṣetrajñaḥ paripaśyati
पुरुष उसे जानता है, इसीलिए वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है। क्षेत्रज्ञ गुणों की सारी गति को देखता है।
श्लोक 39 (14.43.39)
आदिमध्यावसानं तत्सृज्यमानमचेतनम् । न गुणा विदुरात्मानं सृज्यमानाः पुनःपुनः ॥
ādimadhyāvasānaṃ tatsṛjyamānamacetanam | na guṇā vidurātmānaṃ sṛjyamānāḥ punaḥpunaḥ
जिसका आदि, मध्य और अन्त है, वह रची जाती हुई वस्तु जड़ है; बार-बार उत्पन्न होने वाले गुण आत्मा को नहीं जानते।
श्लोक 40 (14.43.40)
न सत्यं वेद वै कश्चित्क्षेत्रज्ञस्त्वेव विन्दति । गुणानां गुणभूतानां यत्परं परतो महत् ॥
na satyaṃ veda vai kaścitkṣetrajñastveva vindati | guṇānāṃ guṇabhūtānāṃ yatparaṃ parato mahat
सत्य को कोई नहीं जानता, केवल क्षेत्रज्ञ ही उसे पाता है—जो गुणभूत गुणों से परे है, परे से भी परे महान् है।
श्लोक 41 (14.43.41)
तस्माद्गुणांश्च तत्वं च परित्यज्येह तत्ववित् । क्षीणदोषो गुणान्हित्वा क्षेत्रज्ञं प्रविशत्यथ ॥
tasmādguṇāṃśca tatvaṃ ca parityajyeha tatvavit | kṣīṇadoṣo guṇānhitvā kṣetrajñaṃ praviśatyatha
इसलिए तत्त्व को जानने वाला यहाँ गुणों और तत्त्व को छोड़कर, दोषों के क्षीण हो जाने पर और गुणों को त्यागकर क्षेत्रज्ञ में प्रवेश करता है।
श्लोक 42 (14.43.42)
निर्द्वन्द्वो निर्नमस्कारो निःस्वधाकार एव च । अचलश्चानिकेतश्च क्षेत्रज्ञः स परो विधिः ॥
nirdvandvo nirnamaskāro niḥsvadhākāra eva ca | acalaścāniketaśca kṣetrajñaḥ sa paro vidhiḥ
द्वन्द्वों से रहित, नमस्कार से रहित, स्वधाकार से रहित, अचल और बिना घर का—क्षेत्रज्ञ वह परम विधि है।