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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 42

भूत, इन्द्रियाँ और उनके अधिष्ठाता देवता

ब्रह्मा ऋषियों को अपना उपदेश जारी रखते हैं। अहंकार से पाँच भूत और ग्यारह इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं; वे चार प्रकार के जन्म और प्रत्येक इन्द्रिय के अध्यात्म, अधिभूत तथा अधिदैवत का वर्णन करते हैं। फिर वे इन्द्रिय-निरोध, काम-क्रोध की नदी को पार करने और सब प्राणियों में आत्मा को देखने का उपदेश देते हैं, जिसकी स्तुति देवता, भूतगण और महर्षि करते हैं।

अध्याय 41अध्याय-सूचीअध्याय 43

ब्रह्मोवाच

श्लोक 1 (14.42.1)

अहङ्कारात्प्रसूतानि महाभूतानि पञ्च वै । पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ॥

ahaṅkārātprasūtāni mahābhūtāni pañca vai | pṛthivī vāyurākāśamāpo jyotiśca pañcamam

अहंकार से पाँच महाभूत उत्पन्न हुए—पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ तेज।

श्लोक 2 (14.42.2)

तेषु भूतानि मुह्यन्ति महाभूतेषु पञ्चसु । शब्दस्पर्शनरूपेषु रसगन्धक्रियासु च ॥

teṣu bhūtāni muhyanti mahābhūteṣu pañcasu | śabdasparśanarūpeṣu rasagandhakriyāsu ca

इन पाँचों महाभूतों में प्राणी मोहित होते हैं—शब्द, स्पर्श और रूप में, तथा रस, गन्ध और क्रिया में।

श्लोक 3 (14.42.3)

महाभूतविकारान्ते प्रलये प्रत्युपस्थिते । सर्वप्राणभृतां धीरा महदुत्पद्यते भयम् ॥

mahābhūtavikārānte pralaye pratyupasthite | sarvaprāṇabhṛtāṃ dhīrā mahadutpadyate bhayam

महाभूतों के विकारों के अन्त में, प्रलय के आ पहुँचने पर, हे धीर पुरुषो, सब प्राणधारियों में महान् भय उत्पन्न होता है।

श्लोक 4 (14.42.4)

यद्यस्माज्जायते भूतं तत्र तत्प्रविलीयते । लीयन्ते प्रतिलोमानि जायन्ते चोत्तरोत्तरम् ॥

yadyasmājjāyate bhūtaṃ tatra tatpravilīyate | līyante pratilomāni jāyante cottarottaram

जिससे जो भूत उत्पन्न होता है, उसी में वह फिर लीन हो जाता है। वे उलटे क्रम से लीन होते हैं और आगे-आगे क्रम से उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 5 (14.42.5)

ततः प्रलीने सर्वस्मिन्भूते स्थावरजङ्गमे । स्मृतिमन्तस्तदा धीरा न लीयन्ते कदाचन ॥

tataḥ pralīne sarvasminbhūte sthāvarajaṅgame | smṛtimantastadā dhīrā na līyante kadācana

तब जब स्थावर और जंगम सब भूत लीन हो जाते हैं, तब स्मृति बनाए रखने वाले धीर पुरुष कभी लीन नहीं होते।

श्लोक 6 (14.42.6)

शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः । क्रियाः करणयुक्ताः स्युरनित्या मोहसंज्ञिताः ॥

śabdaḥ sparśastathā rūpaṃ raso gandhaśca pañcamaḥ | kriyāḥ karaṇayuktāḥ syuranityā mohasaṃjñitāḥ

शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध—ये क्रिया तथा उसके साधनों के साथ अनित्य हैं और मोह नाम से जाने जाते हैं।

श्लोक 7 (14.42.7)

लोभप्रजनसम्भूता निर्विशेषा ह्यकिञ्चनाः । मांसशोणितसङ्घाता अन्योन्यस्योपजीविनः ॥

lobhaprajanasambhūtā nirviśeṣā hyakiñcanāḥ | māṃsaśoṇitasaṅghātā anyonyasyopajīvinaḥ

ये लोभ और प्रजनन से उत्पन्न होते हैं, भेदरहित और अकिञ्चन हैं, मांस और रक्त के पिण्ड मात्र हैं और एक-दूसरे के सहारे जीते हैं।

श्लोक 8 (14.42.8)

बहिरात्मान इत्येते दीनाः कृपणजीविनः । प्राणापानावुदानश्च समानो व्यान एव च ॥

bahirātmāna ityete dīnāḥ kṛpaṇajīvinaḥ | prāṇāpānāvudānaśca samāno vyāna eva ca

ये बहिरात्मा कहे जाते हैं, दीन और दयनीय जीवन वाले। प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान—

श्लोक 9 (14.42.9)

अन्तरात्मनि चाप्येते नियताः पञ्च वायवः । वाङ्मनोबुद्धिरित्येभिः सार्धमष्टात्मकं जगत् ॥

antarātmani cāpyete niyatāḥ pañca vāyavaḥ | vāṅmanobuddhirityebhiḥ sārdhamaṣṭātmakaṃ jagat

ये पाँच वायु अन्तरात्मा में संयत रहते हैं; वाणी, मन और बुद्धि के साथ मिलकर ये जगत् को आठ अंगों वाला बनाते हैं।

श्लोक 10 (14.42.10)

त्वग्घ्राणश्रोत्रचक्षूंषि रसना वाक्च संयताः । विशुद्धं च मनो यस्य बुद्धिश्चाव्यभिचारिणी ॥

tvagghrāṇaśrotracakṣūṃṣi rasanā vākca saṃyatāḥ | viśuddhaṃ ca mano yasya buddhiścāvyabhicāriṇī

जिसकी त्वचा, नासिका, कान, आँखें, जिह्वा और वाणी संयत हैं, जिसका मन शुद्ध है और बुद्धि अविचल है—

श्लोक 11 (14.42.11)

अष्टौ यस्याग्नयो ह्येते दहन्तेऽहङ्क्रियाः सदा । स तद्ब्रह्म शुभं याति तस्माद्भूयो न विद्यते ॥

aṣṭau yasyāgnayo hyete dahante'haṅkriyāḥ sadā | sa tadbrahma śubhaṃ yāti tasmādbhūyo na vidyate

उसके ये आठों अग्नि अहंकार से उत्पन्न क्रियाओं को सदा जलाते रहते हैं। वह उस शुभ ब्रह्म को प्राप्त होता है, जिससे आगे कुछ भी नहीं है।

श्लोक 12 (14.42.12)

एकादश च यान्याहुरिन्द्रियाणि विशेषतः । अहङ्कारात्प्रसूतानि तानि वक्ष्यामि नामतः ॥

ekādaśa ca yānyāhurindriyāṇi viśeṣataḥ | ahaṅkārātprasūtāni tāni vakṣyāmi nāmataḥ

अब जिन ग्यारह इन्द्रियों को विशेष रूप से बताया जाता है, जो अहंकार से उत्पन्न हैं, उन्हें मैं नाम लेकर बताऊँगा।

श्लोक 13 (14.42.13)

श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी । पादौ पायुरुपस्थश्च हस्तौ वाग्दशमी भवेत् ॥

śrotraṃ tvak cakṣuṣī jihvā nāsikā caiva pañcamī | pādau pāyurupasthaśca hastau vāgdaśamī bhavet

कान, त्वचा, दोनों आँखें, जिह्वा और पाँचवीं नासिका; दोनों पैर, गुदा, उपस्थ, दोनों हाथ और दसवीं वाणी।

श्लोक 14 (14.42.14)

इन्द्रियग्राम इत्येष मन एकादशं भवेत् । एतं ग्रामं जयेत्पूर्वं ततो ब्रह्म प्रकाशते ॥

indriyagrāma ityeṣa mana ekādaśaṃ bhavet | etaṃ grāmaṃ jayetpūrvaṃ tato brahma prakāśate

यह इन्द्रियों का ग्राम है; मन ग्यारहवाँ होता है। पहले इस ग्राम को जीतना चाहिए; तब ब्रह्म प्रकाशित होता है।

श्लोक 15 (14.42.15)

बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चाहुः पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च । श्रोत्रादीन्यपि पञ्चाहुर्बुद्धियुक्तानि तत्त्वतः ॥

buddhīndriyāṇi pañcāhuḥ pañca karmendriyāṇi ca | śrotrādīnyapi pañcāhurbuddhiyuktāni tattvataḥ

पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ कही गई हैं और पाँच कर्मेन्द्रियाँ। श्रोत्र आदि पाँच तत्त्वतः बुद्धि से युक्त कही जाती हैं।

श्लोक 16 (14.42.16)

अविशेषाणि चान्यानि कर्मयुक्तानि यानि तु । उभयत्र मनो ज्ञेयं बुद्धिस्तु द्वादशी भवेत् ॥

aviśeṣāṇi cānyāni karmayuktāni yāni tu | ubhayatra mano jñeyaṃ buddhistu dvādaśī bhavet

दूसरी जो कर्म से युक्त हैं, वे विशेषता से रहित हैं। दोनों में मन को जानना चाहिए, और बुद्धि बारहवीं होती है।

श्लोक 17 (14.42.17)

इत्युक्तानीन्द्रियाण्येतान्येकादश यथाक्रमम् । मन्यन्ते कृतमित्येवं विदित्वा तानि पण्डिताः ॥

ityuktānīndriyāṇyetānyekādaśa yathākramam | manyante kṛtamityevaṃ viditvā tāni paṇḍitāḥ

इस प्रकार मैंने ये ग्यारह इन्द्रियाँ क्रम से बता दीं। इन्हें जानकर विद्वान् अपना कार्य पूरा हुआ मानते हैं।

श्लोक 18 (14.42.18)

त्रीणि स्थानानि भूतानां चतुर्थं नोपपद्यते । स्थलमापस्तथाकाशं जन्म चापि चतुर्विधम् ॥

trīṇi sthānāni bhūtānāṃ caturthaṃ nopapadyate | sthalamāpastathākāśaṃ janma cāpi caturvidham

प्राणियों के तीन ही स्थान हैं, चौथा नहीं मिलता—स्थल, जल और आकाश। और जन्म चार प्रकार का है।

श्लोक 19 (14.42.19)

अण्डजोद्भिज्जसंस्वेदजरायुजमथापि च । चतुर्धा जन्म इत्येतद्भूतग्रामस्य लक्ष्यते ॥

aṇḍajodbhijjasaṃsvedajarāyujamathāpi ca | caturdhā janma ityetadbhūtagrāmasya lakṣyate

अण्डज, उद्भिज्ज, स्वेदज और जरायुज—इस प्रकार प्राणि-समुदाय का जन्म चार प्रकार का बताया जाता है।

श्लोक 20 (14.42.20)

अपराण्यथ भूतानि खेचराणि तथैव च । अण्डजानि विजानीयात्सर्वांश्चैव सरीसृपान् ॥

aparāṇyatha bhūtāni khecarāṇi tathaiva ca | aṇḍajāni vijānīyātsarvāṃścaiva sarīsṛpān

आकाश में विचरने वाले अन्य प्राणियों को अण्डज जानना चाहिए, और इसी प्रकार सब रेंगने वाले जीवों को भी।

श्लोक 21 (14.42.21)

स्वेदजाः कृमयः प्रोक्ता जन्तवश्च यथाक्रमम् । जन्मद्वितीयमित्येतज्जघन्यतरमुच्यते ॥

svedajāḥ kṛmayaḥ proktā jantavaśca yathākramam | janmadvitīyamityetajjaghanyataramucyate

कृमि स्वेदज कहे गए हैं, और क्रम से उसी प्रकार के जन्तु भी। यह दूसरा जन्म अपेक्षाकृत निम्न कहा जाता है।

श्लोक 22 (14.42.22)

भित्त्वा तु पृथिवीं यानि जायन्ते कालपर्ययात् । उद्भिज्जानि च तान्याहुर्भूतानि द्विजसत्तमाः ॥

bhittvā tu pṛthivīṃ yāni jāyante kālaparyayāt | udbhijjāni ca tānyāhurbhūtāni dvijasattamāḥ

जो समय आने पर पृथ्वी को भेदकर उत्पन्न होते हैं, हे द्विजश्रेष्ठो, उन भूतों को उद्भिज्ज कहते हैं।

श्लोक 23 (14.42.23)

द्विपादबहुपादानि तिर्यग्गतिमतीनि च । जरायुजानि भूतानि विकृतान्यपि सत्तमाः ॥

dvipādabahupādāni tiryaggatimatīni ca | jarāyujāni bhūtāni vikṛtānyapi sattamāḥ

दो पैर वाले, बहुत पैर वाले और तिरछी गति वाले भूत जरायुज हैं, विकृत रूप वाले भी, हे श्रेष्ठजनो।

श्लोक 24 (14.42.24)

द्विविधा खलु विज्ञेया ब्रह्मयोनिः सनातना । तपः कर्म च यत्पुण्यमित्येष विदुषां नयः ॥

dvividhā khalu vijñeyā brahmayoniḥ sanātanā | tapaḥ karma ca yatpuṇyamityeṣa viduṣāṃ nayaḥ

यहाँ ब्रह्म की सनातन योनि दो प्रकार की जाननी चाहिए—तप और पुण्य कर्म। यह विद्वानों का मत है।

श्लोक 25 (14.42.25)

विविधं कर्म विज्ञेयमिज्या दानं च तन्मखे । वेदस्याध्ययनं पुण्यमिति वृद्धानुशासनम् ॥

vividhaṃ karma vijñeyamijyā dānaṃ ca tanmakhe | vedasyādhyayanaṃ puṇyamiti vṛddhānuśāsanam

कर्म अनेक प्रकार का जानना चाहिए—यज्ञ में पूजन और दान; और वेद का अध्ययन पुण्य है। ऐसा वृद्धजनों का उपदेश है।

श्लोक 26 (14.42.26)

एतद्यो वेत्ति विधिवत्स मुक्तः स्याद्द्विजर्षभाः । विमुक्तः सर्वपापेभ्य इति चैव निबोधत ॥

etadyo vetti vidhivatsa muktaḥ syāddvijarṣabhāḥ | vimuktaḥ sarvapāpebhya iti caiva nibodhata

हे द्विजश्रेष्ठो, जो इसे विधिपूर्वक जानता है, वह मुक्त हो जाता है। यह भी सुनो—वह सब पापों से छूट जाता है।

श्लोक 27 (14.42.27)

अतः परं प्रवक्ष्यामि सर्वं विविधमिन्द्रियम् ॥

ataḥ paraṃ pravakṣyāmi sarvaṃ vividhamindriyam

इसके आगे मैं सब प्रकार की इन्द्रियों का विवेचन करूँगा।

श्लोक 28 (14.42.28)

आकाशं प्रथमं भूतं श्रोत्रमध्यात्ममुच्यते । अधिभूतं तथा शब्दो दिशश्चात्राधिदैवतम् ॥

ākāśaṃ prathamaṃ bhūtaṃ śrotramadhyātmamucyate | adhibhūtaṃ tathā śabdo diśaścātrādhidaivatam

आकाश पहला भूत है; श्रोत्र उसका अध्यात्म कहा जाता है; शब्द उसका अधिभूत है; और दिशाएँ उसकी अधिदैवत हैं।

श्लोक 29 (14.42.29)

द्वितीयं मारुतं भूतं त्वगध्यात्मं च विश्रुतम् । स्प्रष्टव्यमधिभूतं तु विद्युत्तत्राधिदैवतम् ॥

dvitīyaṃ mārutaṃ bhūtaṃ tvagadhyātmaṃ ca viśrutam | spraṣṭavyamadhibhūtaṃ tu vidyuttatrādhidaivatam

वायु दूसरा भूत है; त्वचा उसका प्रसिद्ध अध्यात्म है; स्पर्श-योग्य वस्तु अधिभूत है; और विद्युत् उसकी अधिदैवत है।

श्लोक 30 (14.42.30)

तृतीयं ज्योतिरित्याहुश्चक्षुरध्यात्ममिष्यते । अधिभूतं ततो रूपं सूर्यस्तत्राधिदैवतम् ॥

tṛtīyaṃ jyotirityāhuścakṣuradhyātmamiṣyate | adhibhūtaṃ tato rūpaṃ sūryastatrādhidaivatam

तेज को तीसरा भूत कहते हैं; चक्षु उसका अध्यात्म कहा जाता है; रूप अधिभूत है; और सूर्य उसका अधिदैवत है।

श्लोक 31 (14.42.31)

चतुर्थमापो विज्ञेयं जिह्वा चाध्यात्ममिष्यते । अधिभूतं रसश्चात्र सोमस्तत्राधिदैवतम् ॥

caturthamāpo vijñeyaṃ jihvā cādhyātmamiṣyate | adhibhūtaṃ rasaścātra somastatrādhidaivatam

जल को चौथा भूत जानना चाहिए; जिह्वा उसका अध्यात्म मानी जाती है; रस अधिभूत है; और सोम उसका अधिदैवत है।

श्लोक 32 (14.42.32)

पृथिवी पञ्चमं भूतं घ्राणश्चाध्यात्ममुच्यते । अधिभूतं तथा गन्धो वायुस्तत्राधिदैवतम् ॥

pṛthivī pañcamaṃ bhūtaṃ ghrāṇaścādhyātmamucyate | adhibhūtaṃ tathā gandho vāyustatrādhidaivatam

पृथ्वी पाँचवाँ भूत है; घ्राण उसका अध्यात्म कहा जाता है; गन्ध अधिभूत है; और वायु उसका अधिदैवत है।

श्लोक 33 (14.42.33)

एषु पञ्चसु भूतेषु चतुष्टयविधिः स्मृतः । अतः परं प्रवक्ष्यामि सर्वं त्रिविधमिन्द्रियम् ॥

eṣu pañcasu bhūteṣu catuṣṭayavidhiḥ smṛtaḥ | ataḥ paraṃ pravakṣyāmi sarvaṃ trividhamindriyam

इस प्रकार पाँच भूतों में चतुष्टय की व्यवस्था बताई गई है। इसके आगे मैं इन्द्रियों को उनके त्रिविध रूप में समझाऊँगा।

श्लोक 34 (14.42.34)

पादावध्यात्ममित्याहुर्ब्राह्मणास्तत्वदर्शिनः । अधिभूतं तु गन्तव्यं विष्णुस्तत्राधिदैवतम् ॥

pādāvadhyātmamityāhurbrāhmaṇāstatvadarśinaḥ | adhibhūtaṃ tu gantavyaṃ viṣṇustatrādhidaivatam

तत्त्वदर्शी ब्राह्मण कहते हैं कि दोनों पैर अध्यात्म हैं; जहाँ जाना है वह अधिभूत है; और विष्णु वहाँ अधिदैवत हैं।

श्लोक 35 (14.42.35)

अवाग्गतिरपानश्च पायुरध्यात्ममिष्यते । अधिभूतं विसर्गश्च मित्रस्तत्राधिदैवतम् ॥

avāggatirapānaśca pāyuradhyātmamiṣyate | adhibhūtaṃ visargaśca mitrastatrādhidaivatam

नीचे की ओर जाने वाला अपान वायु और गुदा अध्यात्म माने जाते हैं; मलत्याग अधिभूत है; और मित्र वहाँ अधिदैवत हैं।

श्लोक 36 (14.42.36)

प्रजनः सर्वभूतानामुपस्थोऽध्यात्ममुच्यते । अधिभूतं तथा शुक्रं दैवतं च प्रजापतिः ॥

prajanaḥ sarvabhūtānāmupastho'dhyātmamucyate | adhibhūtaṃ tathā śukraṃ daivataṃ ca prajāpatiḥ

सब प्राणियों का प्रजनन-अंग उपस्थ अध्यात्म कहा जाता है; वीर्य अधिभूत है; और देवता प्रजापति हैं।

श्लोक 37 (14.42.37)

हस्तावध्यात्ममित्याहुरध्यात्मविदुषो जनाः । अधिभूतं च कर्माणि शक्रस्तत्राधिदैवतम् ॥

hastāvadhyātmamityāhuradhyātmaviduṣo janāḥ | adhibhūtaṃ ca karmāṇi śakrastatrādhidaivatam

अध्यात्म को जानने वाले लोग कहते हैं कि दोनों हाथ अध्यात्म हैं; कर्म अधिभूत हैं; और शक्र वहाँ अधिदैवत हैं।

श्लोक 38 (14.42.38)

वैश्वदेवी मनःपूर्वा वागध्यात्ममिहोच्यते । वक्तव्यमधिभूतं च वह्निस्तत्राधिदैवतम् ॥

vaiśvadevī manaḥpūrvā vāgadhyātmamihocyate | vaktavyamadhibhūtaṃ ca vahnistatrādhidaivatam

मन से पहले चलने वाली वैश्वदेवी वाणी यहाँ अध्यात्म कही जाती है; वक्तव्य अधिभूत है; और अग्नि वहाँ अधिदैवत है।

श्लोक 39 (14.42.39)

अध्यात्मं मन इत्याहुः पञ्चभूतात्मचारकम् । अधिभूतं च सङ्कल्पश्चन्द्रमाश्चाधिदैवतम् ॥

adhyātmaṃ mana ityāhuḥ pañcabhūtātmacārakam | adhibhūtaṃ ca saṅkalpaścandramāścādhidaivatam

मन को अध्यात्म कहते हैं, जो पाँचों भूतों में विचरता है; संकल्प अधिभूत है; और चन्द्रमा अधिदैवत है।

श्लोक 40 (14.42.40)

अहङ्कारस्तथाऽध्यात्मं सर्वसंसारकारणम् । अभिमानोऽधिभूतं च रुद्रस्तत्राधिदैवतम् ॥

ahaṅkārastathā'dhyātmaṃ sarvasaṃsārakāraṇam | abhimāno'dhibhūtaṃ ca rudrastatrādhidaivatam

इसी प्रकार अहंकार भी अध्यात्म है, जो समस्त संसार का कारण है; अभिमान अधिभूत है, और रुद्र वहाँ अधिदैवत हैं।

श्लोक 41 (14.42.41)

अध्यात्मं बुद्धिरित्याहुः षडिन्द्रियविचारिणी । अधिभूतं तु विज्ञेयमहत्तत्राधिदैवतम् ॥

adhyātmaṃ buddhirityāhuḥ ṣaḍindriyavicāriṇī | adhibhūtaṃ tu vijñeyamahattatrādhidaivatam

बुद्धि को अध्यात्म कहते हैं, जो छहों इन्द्रियों में विचरती है; जानने योग्य वस्तु अधिभूत है; और महत् वहाँ अधिदैवत है।

श्लोक 42 (14.42.42)

यथावदध्यात्मविधिरेष वः कीर्तितो मया । ज्ञानमस्य हि धर्मज्ञाः प्राप्तं ज्ञानवतामिह ॥

yathāvadadhyātmavidhireṣa vaḥ kīrtito mayā | jñānamasya hi dharmajñāḥ prāptaṃ jñānavatāmiha

इस प्रकार अध्यात्म की यह विधि मैंने तुम्हें ठीक-ठीक बता दी। हे धर्मज्ञो, इसका ज्ञान यहाँ ज्ञानवानों को प्राप्त होता है।

श्लोक 43 (14.42.43)

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च महाभूतानि पञ्च च । सर्वाण्येतानि संधाय मनसा सम्प्रधारयेत् ॥

indriyāṇīndriyārthāśca mahābhūtāni pañca ca | sarvāṇyetāni saṃdhāya manasā sampradhārayet

इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के विषय और पाँच महाभूत—इन सबको एक साथ मिलाकर मन से विचार करना चाहिए।

श्लोक 44 (14.42.44)

क्षीणे मनसि सर्वस्मिन्न जन्मसुखमिष्यते । ज्ञानसम्पन्नसत्त्वानां तत्सुखं विदुषां मतम् ॥

kṣīṇe manasi sarvasminna janmasukhamiṣyate | jñānasampannasattvānāṃ tatsukhaṃ viduṣāṃ matam

जब समस्त मन क्षीण हो जाता है, तब जन्म के सुख की इच्छा नहीं रहती। ज्ञान से सम्पन्न सत्त्व वालों का वही सुख विद्वानों को मान्य है।

श्लोक 45 (14.42.45)

अतः परं प्रवक्ष्यामि सूक्ष्मभावकरीं शिवाम् । निवृत्तिं सर्वभूतेषु मृदुना दारुणेन वा ॥

ataḥ paraṃ pravakṣyāmi sūkṣmabhāvakarīṃ śivām | nivṛttiṃ sarvabhūteṣu mṛdunā dāruṇena vā

अब मैं सूक्ष्म भावों को उत्पन्न करने वाली कल्याणकारी निवृत्ति का वर्णन करूँगा—सब प्राणियों के प्रति, चाहे मृदु उपाय से हो या कठोर उपाय से।

श्लोक 46 (14.42.46)

गुणागुणमनासङ्गमेकचर्यमनन्तरम् । एतद्ब्राह्मणजं वृत्तमाहुरेकपदं सुखम् ॥

guṇāguṇamanāsaṅgamekacaryamanantaram | etadbrāhmaṇajaṃ vṛttamāhurekapadaṃ sukham

गुण और अगुण में आसक्ति न रखना, अकेले विचरना, निरन्तर—इसे ब्राह्मण का आचरण कहते हैं, जो एक ही पग में सुख देने वाला है।

श्लोक 47 (14.42.47)

विद्वान्कूर्म इवाङ्गानि कामान्संहृत्य सर्वशः । विरजाः सर्वतो मुक्तो यो नरः स सुखी सदा ॥

vidvānkūrma ivāṅgāni kāmānsaṃhṛtya sarvaśaḥ | virajāḥ sarvato mukto yo naraḥ sa sukhī sadā

जो विद्वान् कछुए के अंगों की तरह सब ओर से कामनाओं को समेट लेता है, रजोगुण से रहित और सब ओर से मुक्त रहता है, वह मनुष्य सदा सुखी रहता है।

श्लोक 48 (14.42.48)

कामानात्मनि संयम्य क्षीणतृष्णः समाहितः । सर्वभूतसुहृन्मैत्रो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

kāmānātmani saṃyamya kṣīṇatṛṣṇaḥ samāhitaḥ | sarvabhūtasuhṛnmaitro brahmabhūyāya kalpate

कामनाओं को अपने भीतर संयम में रखकर, तृष्णा क्षीण करके, समाहित चित्त होकर, सब प्राणियों का मित्र और हितैषी बनकर वह ब्रह्मभाव के योग्य हो जाता है।

श्लोक 49 (14.42.49)

इन्द्रियाणां निरोधेन सर्वेषां विषयैषिणाम् । मुनेर्जनपदत्यागादध्यात्माग्निः समिध्यते ॥

indriyāṇāṃ nirodhena sarveṣāṃ viṣayaiṣiṇām | munerjanapadatyāgādadhyātmāgniḥ samidhyate

विषयों की खोज करने वाली सब इन्द्रियों के निरोध से और मुनि के जनपद छोड़ देने से अध्यात्म की अग्नि प्रज्वलित होती है।

श्लोक 50 (14.42.50)

यथाऽग्निरिन्धनैरिद्धो महाज्योतिः प्रकाशते । तथेन्द्रियनिरोधेन महानात्मा प्रकाशते ॥

yathā'gnirindhanairiddho mahājyotiḥ prakāśate | tathendriyanirodhena mahānātmā prakāśate

जैसे ईंधन से प्रज्वलित अग्नि महान् ज्योति से चमकती है, वैसे ही इन्द्रियों के निरोध से महान् आत्मा प्रकाशित होता है।

श्लोक 51 (14.42.51)

यदा पश्यति भूतानि प्रसन्नात्माऽत्मनो हृदि । स्वयंज्योतिस्तदासूक्ष्मात्सूक्ष्मं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥

yadā paśyati bhūtāni prasannātmā'tmano hṛdi | svayaṃjyotistadāsūkṣmātsūkṣmaṃ prāpnotyanuttamam

जब प्रसन्न चित्त पुरुष अपने हृदय में भूतों को देखता है, तब वह स्वयं-प्रकाश होकर सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, अनुपम तत्त्व को प्राप्त होता है।

श्लोक 52 (14.42.52)

अग्नी रूपं रसं स्रोतो वायुः स्पर्शनमेव च । मही गन्धधरा घ्राणमाकाशः श्रवणं तथा । दृश्यमादित्यमेवाहुरध्यात्मविदुषो जनाः ॥

agnī rūpaṃ rasaṃ sroto vāyuḥ sparśanameva ca | mahī gandhadharā ghrāṇamākāśaḥ śravaṇaṃ tathā | dṛśyamādityamevāhuradhyātmaviduṣo janāḥ

अग्नि रूप है, स्रोत रस है, वायु स्पर्श है; पृथ्वी गन्ध धारण करने वाली है, वही घ्राण है; आकाश श्रवण है। और दृश्य को, अध्यात्मवेत्ता लोग कहते हैं, आदित्य ही है।

श्लोक 53 (14.42.53)

रोगशोकसमाविष्टं पञ्चस्रोतःसमावृतम् । पञ्चभूतसमायुक्तं नवद्वारं द्विदैवतम् ॥

rogaśokasamāviṣṭaṃ pañcasrotaḥsamāvṛtam | pañcabhūtasamāyuktaṃ navadvāraṃ dvidaivatam

रोग और शोक से घिरा हुआ, पाँच स्रोतों से आवृत, पाँच भूतों से युक्त, नौ द्वारों और दो देवताओं वाला,—

श्लोक 54 (14.42.54)

रजस्वलमथादृश्यं त्रिगुणं सप्तधातुकम् । संसर्गाभिरतं मूढं शरीरमिति धारणा ॥

rajasvalamathādṛśyaṃ triguṇaṃ saptadhātukam | saṃsargābhirataṃ mūḍhaṃ śarīramiti dhāraṇā

रजोगुण से भरा, अदृश्य, त्रिगुणमय, सात धातुओं वाला, आसक्तियों में रमने वाला और मूढ़—यही शरीर की धारणा है।

श्लोक 55 (14.42.55)

दुश्चरं जीवलोकेऽस्मिन्सत्वं प्रति समाश्रितम् । एतदेव हि लोकेऽस्मिन्कालचक्रं प्रवर्तते ॥

duścaraṃ jīvaloke'sminsatvaṃ prati samāśritam | etadeva hi loke'sminkālacakraṃ pravartate

इस जीव-लोक में सत्त्व के आश्रित होकर चलना कठिन है। इसी प्रकार इस लोक में कालचक्र घूमता रहता है।

श्लोक 56 (14.42.56)

एतन्महार्णवं घोरमगाधं मोहसंज्ञितम् । विसृजन्संक्षिपेच्चैव मोहयन्स्वापयञ्जगत् ॥

etanmahārṇavaṃ ghoramagādhaṃ mohasaṃjñitam | visṛjansaṃkṣipeccaiva mohayansvāpayañjagat

यह भयंकर, अथाह महासागर है, जिसे मोह कहा गया है; यह जगत् को छोड़ता और समेटता है, उसे मोहित करता और सुलाता है।

श्लोक 57 (14.42.57)

कामं क्रोधं भयं लोभमभिद्रोहमथानृतम् । इन्द्रियाणां निरोधेन स तांस्त्यजति दुस्त्यजान् ॥

kāmaṃ krodhaṃ bhayaṃ lobhamabhidrohamathānṛtam | indriyāṇāṃ nirodhena sa tāṃstyajati dustyajān

काम, क्रोध, भय, लोभ, द्रोह और असत्य—इन्द्रियों के निरोध से वह इन कठिनता से छूटने वाली वस्तुओं को छोड़ देता है।

श्लोक 58 (14.42.58)

यस्यैते निर्जिता लोके त्रिगुणाः पञ्चधातवः । व्योम्नि तस्य परं स्थानमानन्तमथ लक्ष्यते ॥

yasyaite nirjitā loke triguṇāḥ pañcadhātavaḥ | vyomni tasya paraṃ sthānamānantamatha lakṣyate

जिसने इस लोक में तीन गुणों और पाँच धातुओं को जीत लिया है, उसका परम स्थान, अनन्त, आकाश में दिखाई देता है।

श्लोक 59 (14.42.59)

पञ्चेन्द्रियमहाकूलां मनःस्रोतोभयावहाम् । नदीं मोहह्रदां तीर्त्वा कामक्रोधावुभौ जयेत् ॥

pañcendriyamahākūlāṃ manaḥsrotobhayāvahām | nadīṃ mohahradāṃ tīrtvā kāmakrodhāvubhau jayet

पाँच इन्द्रियाँ जिसके बड़े किनारे हैं, मन जिसका प्रवाह है, जो भय देने वाली है और मोह जिसके गहरे कुण्ड हैं, उस नदी को पार करके काम और क्रोध दोनों को जीत लेना चाहिए।

श्लोक 60 (14.42.60)

स सर्वदोषनिर्मुक्तस्ततः पश्यति तत्परम् । मनो मनसि सन्धाय पश्यन्नात्मानमात्मनि ॥

sa sarvadoṣanirmuktastataḥ paśyati tatparam | mano manasi sandhāya paśyannātmānamātmani

सब दोषों से मुक्त होकर वह तब उस परम तत्त्व को देखता है, मन को मन में स्थिर करके आत्मा को आत्मा में देखता हुआ।

श्लोक 61 (14.42.61)

सर्ववित्सर्वभूतेषु द्रक्ष्यत्यात्मानमात्मनि । एकधा बहुधा चैव विकुर्वाणस्ततस्ततः ॥

sarvavitsarvabhūteṣu drakṣyatyātmānamātmani | ekadhā bahudhā caiva vikurvāṇastatastataḥ

सर्वज्ञ पुरुष सब प्राणियों में आत्मा को आत्मा के भीतर देखेगा, जो यहाँ-वहाँ एक रूप में और अनेक रूपों में प्रकट होता है।

श्लोक 62 (14.42.62)

ध्रुवं पश्यति रूपाणि दीपाद्दीपशतं यथा । स वै विष्णुश्च मित्रश्च वरुणोऽग्निः प्रजापतिः ॥

dhruvaṃ paśyati rūpāṇi dīpāddīpaśataṃ yathā | sa vai viṣṇuśca mitraśca varuṇo'gniḥ prajāpatiḥ

वह निश्चय ही रूपों को देखता है, जैसे एक दीपक से सौ दीपक जल उठते हैं। वही विष्णु, मित्र, वरुण, अग्नि और प्रजापति है।

श्लोक 63 (14.42.63)

स हि धाता विधाता च स प्रभुः सर्वतोमुखः । हृदयं सर्वभूतानां महानात्मा प्रकाशते ॥

sa hi dhātā vidhātā ca sa prabhuḥ sarvatomukhaḥ | hṛdayaṃ sarvabhūtānāṃ mahānātmā prakāśate

वही धाता और विधाता है, सब ओर मुख वाला प्रभु है; महान् आत्मा के रूप में वह सब प्राणियों के हृदय में प्रकाशित होता है।

श्लोक 64 (14.42.64)

तं विप्रसङ्घाश्च सुरासुराश्च । यक्षाः पिशाचाः पितरो वयांसि । रक्षोगणा भूतगणाश्च सर्वे । महर्षयश्चैव सदा स्तुवन्ति ॥

taṃ viprasaṅghāśca surāsurāśca | yakṣāḥ piśācāḥ pitaro vayāṃsi | rakṣogaṇā bhūtagaṇāśca sarve | maharṣayaścaiva sadā stuvanti

ब्राह्मणों के समूह, देवता और असुर, यक्ष, पिशाच, पितर, पक्षी, राक्षसों के गण, भूतों के गण और महर्षि—ये सब सदा उसकी स्तुति करते हैं।

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