आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 41
महान् आत्मा और अहंकार
ब्रह्मा अव्यक्त से उत्पन्न प्रथम सृष्टि महान् आत्मा (महत्) के नाम बताते हैं और कहते हैं कि उसे जानने वाला मोह को प्राप्त नहीं होता। फिर वे अहंकार को दूसरी सृष्टि बताते हैं, जो देवताओं, मन और तीनों लोकों का मूल है। इस वर्णन के बीच में पाँच महाभूतों के तीन श्लोक अपने स्थान से हटकर छपे हैं।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 1 (14.41.1)
अव्यक्तात्पूर्वमुत्पन्नो महानात्मा महामतिः । आदिर्गुणानां सर्वेषां प्रथमः सर्ग उच्यते ॥
avyaktātpūrvamutpanno mahānātmā mahāmatiḥ | ādirguṇānāṃ sarveṣāṃ prathamaḥ sarga ucyate
पहले अव्यक्त से महान् आत्मा उत्पन्न हुआ, जो महान् बुद्धि वाला है। वह सब गुणों का आदि है और प्रथम सृष्टि कहलाता है।
श्लोक 2 (14.41.2)
महानात्मा मतिर्विष्णुर्जिष्णुः शंभुश्च वीर्यवान् । बुद्धिः प्रज्ञोपलब्धिश्च तथा ख्यातिर्धृतिःस्मृतिः ॥
mahānātmā matirviṣṇurjiṣṇuḥ śaṃbhuśca vīryavān | buddhiḥ prajñopalabdhiśca tathā khyātirdhṛtiḥsmṛtiḥ
महान् आत्मा, मति, विष्णु, जिष्णु और पराक्रमी शम्भु; बुद्धि, प्रज्ञा, उपलब्धि, तथा इसी प्रकार ख्याति, धृति और स्मृति।
श्लोक 3 (14.41.3)
पर्यायवाचकैः शब्दैर्महानात्मा विभाव्यते । तं जानन्ब्राह्मणो विद्वान्प्रमोहं नाधिगच्छति ॥
paryāyavācakaiḥ śabdairmahānātmā vibhāvyate | taṃ jānanbrāhmaṇo vidvānpramohaṃ nādhigacchati
इन पर्यायवाची शब्दों से महान् आत्मा का वर्णन किया जाता है। उसे जानने वाला विद्वान् ब्राह्मण मोह को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 4 (14.41.4)
सर्वतःपाणिपादं च सर्वतोक्षिशिरोमुखम् । सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वं व्याप्यवतिष्ठति ॥
sarvataḥpāṇipādaṃ ca sarvatokṣiśiromukham | sarvataḥśrutimalloke sarvaṃ vyāpyavatiṣṭhati
जिसके हाथ-पैर सब ओर हैं, जिसकी आँखें, सिर और मुख सब ओर हैं, जिसके कान सब ओर हैं, वह लोक में सबको व्याप्त करके स्थित है।
श्लोक 5 (14.41.5)
महाप्रभावः पुरुषः सर्वस्य हृदि निष्ठितः । अणिमा लघिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिरव्ययः ॥
mahāprabhāvaḥ puruṣaḥ sarvasya hṛdi niṣṭhitaḥ | aṇimā laghimā prāptirīśāno jyotiravyayaḥ
वह महाप्रभावशाली पुरुष सबके हृदय में स्थित है; वही अणिमा, लघिमा और प्राप्ति है, वही ईशान और अविनाशी ज्योति है।
श्लोक 6 (14.41.6)
तत्र बुद्धिमतां लोके सद्भावनिरताश्च ये । ध्यानिनो नित्ययोगाश्च सत्यसन्धा जितेन्द्रियाः ॥
tatra buddhimatāṃ loke sadbhāvaniratāśca ye | dhyānino nityayogāśca satyasandhā jitendriyāḥ
वहाँ लोक के बुद्धिमानों में वे हैं जो सद्भाव में लगे रहते हैं, ध्यान करने वाले हैं, नित्य योग में स्थित रहते हैं, सत्य-प्रतिज्ञ हैं और जितेन्द्रिय हैं,—
श्लोक 7 (14.41.7)
ज्ञानवन्तश्च ये केचिदलुब्धा जितमन्यवः । प्रसन्नमनसो धीरा निर्ममा निरहंक्रियाः ॥
jñānavantaśca ye kecidalubdhā jitamanyavaḥ | prasannamanaso dhīrā nirmamā nirahaṃkriyāḥ
जो ज्ञानवान् हैं, लोभरहित और क्रोध को जीते हुए हैं, प्रसन्नचित्त और धीर हैं, ममता तथा अहंकार से रहित हैं।
श्लोक 8 (14.41.8)
विमुक्ताः सर्व एवैते महत्त्वमुपयान्त्युत । आत्मनो महतो वेद यः पुण्यां गतिमुत्तमाम् ॥
vimuktāḥ sarva evaite mahattvamupayāntyuta | ātmano mahato veda yaḥ puṇyāṃ gatimuttamām
ये सब मुक्त होकर महत्त्व को प्राप्त होते हैं। जो महान् आत्मा की पुण्यमयी, परम गति को जानता है—
श्लोक 9 (14.41.9)
अहङ्कारात्प्रसूतानि महाभूतानि पञ्च वै । पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ॥
ahaṅkārātprasūtāni mahābhūtāni pañca vai | pṛthivī vāyurākāśamāpo jyotiśca pañcamam
अहंकार से पाँच महाभूत उत्पन्न हुए—पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ तेज।
श्लोक 10 (14.41.10)
तेषु भूतानि युज्यन्ते महाभूतेषु पञ्चसु । ते शब्दस्पर्शरूपेषु रसगन्धक्रियासु च ॥
teṣu bhūtāni yujyante mahābhūteṣu pañcasu | te śabdasparśarūpeṣu rasagandhakriyāsu ca
इन पाँचों महाभूतों में प्राणी लगे रहते हैं; वे शब्द, स्पर्श और रूप में, तथा रस, गन्ध और क्रिया में लगे रहते हैं।
श्लोक 11 (14.41.11)
महाभूतविनाशान्ते प्रलये प्रत्युपस्थिते । सर्वप्राणभृतां धीरा महदुत्पद्यते भयम् ॥
mahābhūtavināśānte pralaye pratyupasthite | sarvaprāṇabhṛtāṃ dhīrā mahadutpadyate bhayam
महाभूतों के विनाश के अन्त में, प्रलय के आ पहुँचने पर, हे धीर पुरुषो, सब प्राणियों में महान् भय उत्पन्न होता है।
श्लोक 12 (14.41.12)
स धीरः सर्वलोकेषु न मोहमधिगच्छति । विष्णुरेवादिसर्गेषु स्वयंभूर्भवति प्रभुः ॥
sa dhīraḥ sarvalokeṣu na mohamadhigacchati | viṣṇurevādisargeṣu svayaṃbhūrbhavati prabhuḥ
वह धीर पुरुष किसी भी लोक में मोह को प्राप्त नहीं होता; आदि सृष्टियों में विष्णु ही स्वयम्भू प्रभु होते हैं।
श्लोक 13 (14.41.13)
एवं हि यो वेद गुहाशयं प्रभुं । परं पुराणं पुरुषं विश्वरूपम् । हिरण्मयं बुद्धिमतां परां गतिं । स बुद्धिमान्बुद्धिमतीत्य तिष्ठति ॥
evaṃ hi yo veda guhāśayaṃ prabhuṃ | paraṃ purāṇaṃ puruṣaṃ viśvarūpam | hiraṇmayaṃ buddhimatāṃ parāṃ gatiṃ | sa buddhimānbuddhimatītya tiṣṭhati
जो इस प्रकार गुहा में निवास करने वाले प्रभु को जानता है—उस पुरातन, विश्वरूप, हिरण्मय पुरुष को, जो बुद्धिमानों की परम गति है—वह बुद्धिमान् बुद्धि को पार करके स्थित होता है।
श्लोक 14 (14.41.14)
य उत्पन्नो महान्पूर्वमहङ्कारः स उच्यते । अहमित्येव सम्भूतो द्वितीयः सर्ग उच्यते ॥
ya utpanno mahānpūrvamahaṅkāraḥ sa ucyate | ahamityeva sambhūto dvitīyaḥ sarga ucyate
जो महान् पहले उत्पन्न हुआ, उसी को अहंकार कहा जाता है। “मैं हूँ”—इस रूप में उत्पन्न होने के कारण यह दूसरी सृष्टि कहलाता है।
श्लोक 15 (14.41.15)
अहङ्कारश्च भूतादिर्वैकारिक इति स्मृतः । तेजसश्चेतना धातुः प्रजासर्गः प्रजापतिः ॥
ahaṅkāraśca bhūtādirvaikārika iti smṛtaḥ | tejasaścetanā dhātuḥ prajāsargaḥ prajāpatiḥ
अहंकार भूतादि और वैकारिक भी कहा गया है। वही तेजस्, चेतना, धाता, प्रजासृष्टि और प्रजापति है।
श्लोक 16 (14.41.16)
देवानां प्रभवो देवो मनसश्च त्रिलोककृत् । अहमित्येव तत्सर्वमभिमानः स उच्यते ॥
devānāṃ prabhavo devo manasaśca trilokakṛt | ahamityeva tatsarvamabhimānaḥ sa ucyate
वह देवताओं का उद्गम है, स्वयं भी देव है, और मन से तीनों लोकों की रचना करने वाला है; वह सब “मैं हूँ”—यही है, और उसे अभिमान कहा जाता है।
श्लोक 17 (14.41.17)
अध्यात्मज्ञानतृप्तानां मुनीनां भावितात्मनाम् । स्वाध्यायक्रतुसिद्धानामेष लोकः सनातनः ॥
adhyātmajñānatṛptānāṃ munīnāṃ bhāvitātmanām | svādhyāyakratusiddhānāmeṣa lokaḥ sanātanaḥ
जिनके आत्मा शुद्ध हो चुके हैं, जो अध्यात्मज्ञान से तृप्त हैं और स्वाध्याय तथा यज्ञ से सिद्ध हैं, उन मुनियों के लिए यही सनातन लोक है।
श्लोक 18 (14.41.18)
अहङ्कारेणाहरतो गुणानिमान् । भूतादिरेवं सृजते स भूतकृत् । वैकारिकः सर्वमिदं विचेष्टते । स्वतेजसा रञ्जयते जगत्तथा ॥
ahaṅkāreṇāharato guṇānimān | bhūtādirevaṃ sṛjate sa bhūtakṛt | vaikārikaḥ sarvamidaṃ viceṣṭate | svatejasā rañjayate jagattathā
अहंकार के द्वारा गुणों को खींचता हुआ भूतादि इस प्रकार सृष्टि करता है; वही भूतों का कर्ता है। वैकारिक यह सब कुछ चेष्टा में लाता है, और अपने तेज से जगत् को रँग देता है।