आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 40
ब्रह्मा द्वारा तीन गुणों का निरूपण
ब्रह्मा ऋषियों को बताते हैं कि सत्त्व, रजस् और तमस् को अलग-अलग नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे एक-दूसरे से जुड़े और एक-दूसरे पर आश्रित हैं। वे दिखाते हैं कि भिन्न-भिन्न प्राणियों और वर्णों में कौन-सा गुण प्रबल रहता है, और सूर्य, स्थावर पदार्थों, काल तथा सब कुछ में तीनों गुण कैसे दिखाई देते हैं। जो अव्यक्त और गुणों को तत्त्वतः जान लेता है, वह उन सबसे मुक्त हो जाता है।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 1 (14.40.1)
नैव शक्या गुणा वक्तुं पृथक्त्वेनैव सर्वशः । अविच्छिन्नानि दृश्यन्ते रजः सत्वं तमस्तथा ॥
naiva śakyā guṇā vaktuṃ pṛthaktvenaiva sarvaśaḥ | avicchinnāni dṛśyante rajaḥ satvaṃ tamastathā
इन गुणों का अलग-अलग, सब प्रकार से वर्णन नहीं किया जा सकता। रजस्, सत्त्व और तमस् अविच्छिन्न रूप में, कभी अलग नहीं, दिखाई देते हैं।
श्लोक 2 (14.40.2)
अन्योन्यमनुरज्यन्ते ह्यन्योन्येनानुजीविनः । अन्योन्यापाश्रयाः सर्वे तथाऽन्योन्यानुवर्तिनः ॥
anyonyamanurajyante hyanyonyenānujīvinaḥ | anyonyāpāśrayāḥ sarve tathā'nyonyānuvartinaḥ
ये एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं और एक-दूसरे के सहारे जीते हैं। सब परस्पर आश्रित हैं और परस्पर एक-दूसरे का अनुसरण करते हैं।
श्लोक 3 (14.40.3)
यावत्सत्वं रजस्तावद्वर्तते नात्र संशयः । यावत्तमश्च सत्वं च रजस्तावदिहोच्यते ॥
yāvatsatvaṃ rajastāvadvartate nātra saṃśayaḥ | yāvattamaśca satvaṃ ca rajastāvadihocyate
जहाँ तक सत्त्व है, वहाँ तक रजस् है—इसमें कोई संशय नहीं। और जहाँ तक तमस् और सत्त्व हैं, वहाँ तक रजस् भी यहाँ कहा गया है।
श्लोक 4 (14.40.4)
संहत्य कुर्वते यात्रां सहिताः सङ्घचारिणः । सङ्घातवृत्तयो ह्येते वर्तन्ते हेत्वहेतुभिः ॥
saṃhatya kurvate yātrāṃ sahitāḥ saṅghacāriṇaḥ | saṅghātavṛttayo hyete vartante hetvahetubhiḥ
ये मिलकर, समूह में चलते हुए, अपनी यात्रा पूरी करते हैं। इनकी वृत्ति संयुक्त रहकर कार्य करने की है, और ये कारणों सहित तथा कारणों के बिना भी प्रवृत्त होते हैं।
श्लोक 5 (14.40.5)
उद्रेकव्यतिरिक्तानां तेषामन्योन्यवर्तिनाम् । वक्ष्यते तद्यथाऽन्यूनं व्यतिरिक्तं च सर्वशः ॥
udrekavyatiriktānāṃ teṣāmanyonyavartinām | vakṣyate tadyathā'nyūnaṃ vyatiriktaṃ ca sarvaśaḥ
परस्पर आश्रित रहने वाले और उद्रेक तथा आधिक्य के भेद से भिन्न इन गुणों के विषय में मैं बताऊँगा कि सब स्थितियों में कैसे कोई न्यून नहीं होता और कैसे कोई अधिक होता है।
श्लोक 6 (14.40.6)
व्यतिरिक्तं तमो यत्र तिर्यग्भावगतं भवेत् । अल्पं तत्र रजो ज्ञेयं सत्वमल्पतरं तथा ॥
vyatiriktaṃ tamo yatra tiryagbhāvagataṃ bhavet | alpaṃ tatra rajo jñeyaṃ satvamalpataraṃ tathā
जहाँ तमस् प्रबल होकर तिर्यक् (पशु-पक्षी आदि) योनि का रूप ले लेता है, वहाँ रजस् अल्प और सत्त्व उससे भी अल्प जानना चाहिए।
श्लोक 7 (14.40.7)
उद्रिक्तं च रजो यत्र मध्यस्रोतोगतं भवेत् । अल्पं तत्र तमो ज्ञेयं सत्वमल्पतरं तथा ॥
udriktaṃ ca rajo yatra madhyasrotogataṃ bhavet | alpaṃ tatra tamo jñeyaṃ satvamalpataraṃ tathā
जहाँ रजस् प्रबल होकर मध्य स्रोत में चलता है, वहाँ तमस् अल्प और सत्त्व उससे भी अल्प जानना चाहिए।
श्लोक 8 (14.40.8)
उद्रिक्तं च यदा सत्वमूर्ध्वस्रोतोगतं भवेत् । अल्पं तत्र तमो ज्ञेयं रजश्चाल्पतरं तथा ॥
udriktaṃ ca yadā satvamūrdhvasrotogataṃ bhavet | alpaṃ tatra tamo jñeyaṃ rajaścālpataraṃ tathā
और जब सत्त्व प्रबल होकर ऊर्ध्व स्रोत में चलता है, तब वहाँ तमस् अल्प और रजस् उससे भी अल्प जानना चाहिए।
श्लोक 9 (14.40.9)
सत्वं वैकारिकी योनिरिन्द्रियाणां प्रकाशिका । न हि सत्वात्परो भावः कश्चिदन्यो विधीयते ॥
satvaṃ vaikārikī yonirindriyāṇāṃ prakāśikā | na hi satvātparo bhāvaḥ kaścidanyo vidhīyate
सत्त्व वैकारिक (विकारों) की योनि है और इन्द्रियों को प्रकाशित करने वाला है। सत्त्व से श्रेष्ठ कोई अन्य भाव विहित नहीं है।
श्लोक 10 (14.40.10)
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणसंयुक्ता यान्त्यधस्तामसा जनाः ॥
ūrdhvaṃ gacchanti satvasthā madhye tiṣṭhanti rājasāḥ | jaghanyaguṇasaṃyuktā yāntyadhastāmasā janāḥ
सत्त्व में स्थित लोग ऊपर जाते हैं, राजस मध्य में रहते हैं, और निकृष्टतम गुण से युक्त तामस लोग नीचे जाते हैं।
श्लोक 11 (14.40.11)
तमः शूद्रे रजः क्षत्रे ब्राह्मणे सत्वमुत्तमम् । इत्येवं त्रिषु वर्णेषु विवर्तन्ते गुणास्त्रयः ॥
tamaḥ śūdre rajaḥ kṣatre brāhmaṇe satvamuttamam | ityevaṃ triṣu varṇeṣu vivartante guṇāstrayaḥ
शूद्र में तमस्, क्षत्रिय में रजस् और ब्राह्मण में उत्तम सत्त्व रहता है। इस प्रकार तीनों वर्णों में तीनों गुण घूमते रहते हैं।
श्लोक 12 (14.40.12)
दूरादपि हि दृश्यन्ते सहिताः सङ्घचारिणः । तमः सत्वं रजश्चैव पृथक्त्वेनानुशुश्रुम ॥
dūrādapi hi dṛśyante sahitāḥ saṅghacāriṇaḥ | tamaḥ satvaṃ rajaścaiva pṛthaktvenānuśuśruma
दूर से भी ये साथ-साथ, समूह में चलते दिखाई देते हैं; फिर भी हमने तमस्, सत्त्व और रजस् को अलग-अलग बताया हुआ सुना है।
श्लोक 13 (14.40.13)
दृष्ट्वा त्वादित्यमुद्यन्तं कुचोराणां भयं भवेत् । अध्वगाः परितप्येयुरुष्णतो दुःखभागिनः ॥
dṛṣṭvā tvādityamudyantaṃ kucorāṇāṃ bhayaṃ bhavet | adhvagāḥ paritapyeyuruṣṇato duḥkhabhāginaḥ
उदित होते सूर्य को देखकर दुष्ट चोरों को भय होता है, और पथिक गर्मी से दुःख पाते हुए तपते हैं।
श्लोक 14 (14.40.14)
आदित्यः सत्वमुद्दिष्टः कुचोरास्तु तथा तमः । परितापोऽध्वगानां च रजसो गुण उच्यते ॥
ādityaḥ satvamuddiṣṭaḥ kucorāstu tathā tamaḥ | paritāpo'dhvagānāṃ ca rajaso guṇa ucyate
सूर्य को सत्त्व बताया गया है, दुष्ट चोर तमस् हैं, और पथिकों का ताप रजस् का गुण कहा जाता है।
श्लोक 15 (14.40.15)
प्राकाश्यं सत्वमादित्यः संतापो रजसो गुणः । उपप्लवस्तु विज्ञेयस्तामसस्तस्य पर्वसु ॥
prākāśyaṃ satvamādityaḥ saṃtāpo rajaso guṇaḥ | upaplavastu vijñeyastāmasastasya parvasu
सूर्य में प्रकाश सत्त्व है, संताप रजस् का गुण है, और पर्व-काल में उस पर पड़ने वाला ग्रहण (उपप्लव) तामस जानना चाहिए।
श्लोक 16 (14.40.16)
एवं ज्योतिष्षु सर्वेषु प्रवर्तन्ते गुणास्त्रयः । पर्यायेण च वर्तन्ते तत्रतत्र तथातथा ॥
evaṃ jyotiṣṣu sarveṣu pravartante guṇāstrayaḥ | paryāyeṇa ca vartante tatratatra tathātathā
इसी प्रकार सब ज्योतिर्मय पिण्डों में तीनों गुण प्रवृत्त होते हैं, और जहाँ-तहाँ, जैसे-तैसे बारी-बारी से रहते हैं।
श्लोक 17 (14.40.17)
स्थावरेषु तु भावेषु तिर्यग्भावगतं तमः । राजसास्तु विवर्तन्ते स्नेहभावस्तु सात्विकैः ॥
sthāvareṣu tu bhāveṣu tiryagbhāvagataṃ tamaḥ | rājasāstu vivartante snehabhāvastu sātvikaiḥ
स्थावर पदार्थों में तमस् तिर्यक् भाव को प्राप्त होता है; राजस विकसित और परिवर्तित होते रहते हैं, और स्नेह-भाव (कोमलता, रस) सात्त्विकों में रहता है।
श्लोक 18 (14.40.18)
अहस्त्रिधा तु विज्ञेयं त्रिधा रात्रिर्विधीयते । मासार्धमासवर्षाणि ऋतवः सन्धयस्तथा ॥
ahastridhā tu vijñeyaṃ tridhā rātrirvidhīyate | māsārdhamāsavarṣāṇi ṛtavaḥ sandhayastathā
दिन को तीन प्रकार का जानना चाहिए और रात्रि भी तीन प्रकार की निर्धारित है; मास, अर्धमास (पक्ष), वर्ष, ऋतुएँ और सन्धियाँ भी इसी प्रकार हैं।
श्लोक 19 (14.40.19)
त्रिधा दानानि दीयन्ते त्रिधा यज्ञः प्रवर्तते । त्रिधा लोकास्त्रिधा देवास्त्रिधा विद्यास्त्रिधा गतिः ॥
tridhā dānāni dīyante tridhā yajñaḥ pravartate | tridhā lokāstridhā devāstridhā vidyāstridhā gatiḥ
दान तीन प्रकार से दिए जाते हैं, यज्ञ तीन प्रकार से होता है; लोक तीन, देवता तीन, विद्याएँ तीन और गति भी तीन प्रकार की है।
श्लोक 20 (14.40.20)
भूतं भव्यं भविष्यं च धर्मोऽर्थः काम एव च । प्राणापानावुदानश्चाप्येत एव त्रयो गुणाः ॥
bhūtaṃ bhavyaṃ bhaviṣyaṃ ca dharmo'rthaḥ kāma eva ca | prāṇāpānāvudānaścāpyeta eva trayo guṇāḥ
भूत, भव्य और भविष्य; धर्म, अर्थ और काम; तथा प्राण, अपान और उदान—ये तीनों गुण ही हैं।
श्लोक 21 (14.40.21)
पर्यायेण प्रवर्तन्ते तत्रतत्र तथातथा । यत्किञ्चिदिह लोकेऽस्मिन्सर्वमेते त्रयो गुणाः ॥
paryāyeṇa pravartante tatratatra tathātathā | yatkiñcidiha loke'sminsarvamete trayo guṇāḥ
वे बारी-बारी से जहाँ-तहाँ, जैसे-तैसे प्रवृत्त होते हैं। इस लोक में जो कुछ भी है, वह सब ये ही तीन गुण हैं।
श्लोक 22 (14.40.22)
त्रयो गुणाः प्रवर्तन्ते ह्यव्यक्ता नित्यमेव तु । सत्वं रजस्तमश्चैव गुणसर्गः सनातनः ॥
trayo guṇāḥ pravartante hyavyaktā nityameva tu | satvaṃ rajastamaścaiva guṇasargaḥ sanātanaḥ
तीनों गुण अव्यक्त होते हुए भी सदा प्रवृत्त होते रहते हैं—सत्त्व, रजस् और तमस्। गुणों की यह सृष्टि सनातन है।
श्लोक 23 (14.40.23)
तमोऽव्यक्तं शिवं धाम रजो योनिः सनातनः । प्रकृतिर्विकारः प्रलयः प्रधानं प्रभवाप्ययौ ॥
tamo'vyaktaṃ śivaṃ dhāma rajo yoniḥ sanātanaḥ | prakṛtirvikāraḥ pralayaḥ pradhānaṃ prabhavāpyayau
तमस् अव्यक्त और कल्याणमय धाम है, रजस् सनातन योनि है। इन्हें प्रकृति, विकार, प्रलय, प्रधान तथा उत्पत्ति और लय भी कहा गया है।
श्लोक 24 (14.40.24)
अनुद्रिक्तमनूनं वाऽप्यकम्पमचलं ध्रुवम् । सदसच्चैव तत्सर्वमव्यक्तं त्रिगुणं स्मृतम् । ज्ञेयानि नामधेयानि नरैरध्यात्मचिन्तकैः ॥
anudriktamanūnaṃ vā'pyakampamacalaṃ dhruvam | sadasaccaiva tatsarvamavyaktaṃ triguṇaṃ smṛtam | jñeyāni nāmadheyāni narairadhyātmacintakaiḥ
जो न बढ़ा हुआ है, न घटा हुआ, जो अकम्प, अचल और ध्रुव है; सत् और असत्—यह सब त्रिगुणात्मक अव्यक्त कहा गया है। अध्यात्म का चिन्तन करने वाले मनुष्यों को इसके नाम जान लेने चाहिए।
श्लोक 25 (14.40.25)
अव्यक्तनामानि गुणांश्च तत्त्वतो । यो वेद सर्वाणि गतीश्च केवलाः । विमुक्तदेहः प्रविभागतत्त्ववित् । स मुच्यते सर्वगुणैर्निरामयः ॥
avyaktanāmāni guṇāṃśca tattvato | yo veda sarvāṇi gatīśca kevalāḥ | vimuktadehaḥ pravibhāgatattvavit | sa mucyate sarvaguṇairnirāmayaḥ
जो अव्यक्त के नामों को और गुणों को—सब को—तत्त्वतः जानता है, तथा केवल (विशुद्ध) गतियों को भी जानता है, वह देह से मुक्त, भेदों के तत्त्व का ज्ञाता पुरुष सब गुणों से छूट जाता है और निर्विकार हो जाता है।