आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 39
ब्रह्मा द्वारा सत्त्वगुण का वर्णन
ब्रह्मा तीसरे और सर्वोत्तम गुण सत्त्व का वर्णन करते हैं, जो सज्जनों का स्थायी धर्म है और जिसके लक्षणों में आनन्द, प्रसन्नता, क्षमा, अहिंसा, सत्य, दया और अनासक्ति आते हैं। जो लोग सत्त्व के आश्रय से जीते हैं और ब्रह्म में स्थित रहते हैं, वे पाप त्यागकर अजर-अमर हो जाते हैं, स्वर्ग पाते हैं और अपनी इच्छा से रूप धारण करते हैं। अन्त में ब्रह्मा कहते हैं कि जो मनुष्य इन तीनों गुणों को जानता है, वह उन्हें भोगता है पर उनसे बँधता नहीं।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 1 (14.39.1)
अतः परं प्रवक्ष्यामि तृतीयं गुणमुत्तमम् । सर्वभूतहितं लोके सतां धर्ममनिन्दितम् ॥
ataḥ paraṃ pravakṣyāmi tṛtīyaṃ guṇamuttamam | sarvabhūtahitaṃ loke satāṃ dharmamaninditam
इसके बाद मैं तीसरे उत्तम गुण का वर्णन करूँगा, जो लोक में सब प्राणियों का हित करता है और सज्जनों का निर्दोष धर्म है।
श्लोक 2 (14.39.2)
आनन्दः प्रीतिरुद्रेकः प्राकाश्यं सुखमेव च । अकार्पण्यमसंरम्भः संतोषः श्रद्दधानता ॥
ānandaḥ prītirudrekaḥ prākāśyaṃ sukhameva ca | akārpaṇyamasaṃrambhaḥ saṃtoṣaḥ śraddadhānatā
आनन्द, प्रीति, उल्लास, स्पष्टता और सुख; दीनता और उत्तेजना का अभाव, सन्तोष, श्रद्धा;
श्लोक 3 (14.39.3)
क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् । अक्रोधश्चानसूया च शौचं दाक्ष्यं पराक्रमः ॥
kṣamā dhṛtirahiṃsā ca samatā satyamārjavam | akrodhaścānasūyā ca śaucaṃ dākṣyaṃ parākramaḥ
क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, क्रोध और असूया का अभाव, पवित्रता, कुशलता, पराक्रम;
श्लोक 4 (14.39.4)
मुधाज्ञानं मुधावृत्तं मुधासेवा मुधाश्रमः । एवं यो युक्तधर्मः स्यात्सोऽमुत्रात्यन्तमश्नुते ॥
mudhājñānaṃ mudhāvṛttaṃ mudhāsevā mudhāśramaḥ | evaṃ yo yuktadharmaḥ syātso'mutrātyantamaśnute
बिना फल की आशा के ज्ञान, बिना फल की आशा के आचरण, बिना फल की आशा के सेवा, बिना फल की आशा के परिश्रम। जो इस प्रकार धर्म से युक्त होता है, वह परलोक में अनन्त फल पाता है।
श्लोक 5 (14.39.5)
निर्ममो निरहङ्कारो निराशीः सर्वतः समः । अकामहत इत्येव सतां धर्मः सनातनः ॥
nirmamo nirahaṅkāro nirāśīḥ sarvataḥ samaḥ | akāmahata ityeva satāṃ dharmaḥ sanātanaḥ
ममता से रहित, अहंकार से रहित, आशा से रहित, सबके प्रति सम, कामना से अनाहत: यही सज्जनों का सनातन धर्म है।
श्लोक 6 (14.39.6)
विश्रंभो ह्रीस्तितिक्षा च त्यागः शौचमतन्द्रिता । आनृशंस्यमसंमोहो दया भूतेष्वपैशुनम् ॥
viśraṃbho hrīstitikṣā ca tyāgaḥ śaucamatandritā | ānṛśaṃsyamasaṃmoho dayā bhūteṣvapaiśunam
विश्वास, लज्जा, सहनशीलता, त्याग, पवित्रता, आलस्य का अभाव, क्रूरता का अभाव, मोह का अभाव, प्राणियों पर दया, चुगली का अभाव;
श्लोक 7 (14.39.7)
हर्षस्तुष्टिर्विस्मयश्च विनयः साधुवृत्तिता । शान्तिकर्मविशुद्धिश्च भावशुद्धिर्विमोचनम् ॥
harṣastuṣṭirvismayaśca vinayaḥ sādhuvṛttitā | śāntikarmaviśuddhiśca bhāvaśuddhirvimocanam
हर्ष, तुष्टि, विस्मय, विनय, सद्व्यवहार, शान्तिकर्म की शुद्धि, भाव की शुद्धि, विमोचन;
श्लोक 8 (14.39.8)
उपेक्षा ब्रह्मचर्यं च परित्यागश्च सर्वशः । निर्ममत्वमनाशीस्त्वमपरिक्षतधर्मता ॥
upekṣā brahmacaryaṃ ca parityāgaśca sarvaśaḥ | nirmamatvamanāśīstvamaparikṣatadharmatā
उपेक्षा, ब्रह्मचर्य, सब ओर से त्याग, ममता का अभाव, आशीर्वाद की चाह का अभाव और अक्षत धर्म;
श्लोक 9 (14.39.9)
मुधादानं मुधायज्ञो मुधाधीतं मुधाव्रतम् । मुधाप्रतिग्रहश्चैव मुधाधर्मो मुधातपः ॥
mudhādānaṃ mudhāyajño mudhādhītaṃ mudhāvratam | mudhāpratigrahaścaiva mudhādharmo mudhātapaḥ
बिना फल की आशा के दान, बिना फल की आशा के यज्ञ, बिना फल की आशा के अध्ययन, बिना फल की आशा के व्रत, बिना फल की आशा के प्रतिग्रह, बिना फल की आशा के धर्म, बिना फल की आशा के तप।
श्लोक 10 (14.39.10)
एवंवृत्तास्तु ये केचिल्लोकेऽस्मिन्सत्वसंश्रयाः । ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिस्थास्ते धीराः साधुदर्शिनः ॥
evaṃvṛttāstu ye kecilloke'sminsatvasaṃśrayāḥ | brāhmaṇā brahmayonisthāste dhīrāḥ sādhudarśinaḥ
इस लोक में जो कोई इस प्रकार का आचरण करते हैं और सत्त्व का आश्रय लेते हैं, वे ब्रह्मयोनि में स्थित ब्राह्मण धीर हैं और कल्याण को देखने वाले हैं।
श्लोक 11 (14.39.11)
हित्वा सर्वाणि पापानि निःशोका ह्यजरामराः । दिव्यं प्राप्य तु ते धीराः कुर्वते वै ततस्तनूः ॥
hitvā sarvāṇi pāpāni niḥśokā hyajarāmarāḥ | divyaṃ prāpya tu te dhīrāḥ kurvate vai tatastanūḥ
सब पापों को छोड़कर, शोक से रहित, अजर और अमर होकर वे धीर दिव्य लोक पाकर फिर इच्छानुसार शरीर धारण करते हैं।
श्लोक 12 (14.39.12)
ईशित्वं च वशित्वं च लघुत्वं चाणुता तथा । विकुर्वते महात्मानो देवास्त्रिदिवगा इव ॥
īśitvaṃ ca vaśitvaṃ ca laghutvaṃ cāṇutā tathā | vikurvate mahātmāno devāstridivagā iva
ऐश्वर्य, वशित्व, लघुत्व और अणुत्व: ये महात्मा देवताओं की तरह, जो तीनों स्वर्गों में विचरते हैं, इच्छानुसार रूप धारण करते हैं।
श्लोक 13 (14.39.13)
ऊर्ध्वस्रोतस इत्येते देवा वैकारिकाः स्मृताः । विकुर्वन्तः प्रकृत्या वै दिवं प्राप्तास्ततस्ततः ॥
ūrdhvasrotasa ityete devā vaikārikāḥ smṛtāḥ | vikurvantaḥ prakṛtyā vai divaṃ prāptāstatastataḥ
इन्हें ऊर्ध्वस्रोत कहा गया है, जो विकारी देवता माने जाते हैं। ये अपने स्वभाव से रूप बदलते रहते हैं और स्थान-स्थान से स्वर्ग को पहुँचे हैं।
श्लोक 14 (14.39.14)
यद्यदिच्छन्ति तत्सर्वं भजन्ते विभजन्ति च । इत्येतत्सात्विकं वृत्तं कथितं वो द्विजर्षभाः । एतद्विज्ञाय लभते विधिवद्यद्यदिच्छति ॥
yadyadicchanti tatsarvaṃ bhajante vibhajanti ca | ityetatsātvikaṃ vṛttaṃ kathitaṃ vo dvijarṣabhāḥ | etadvijñāya labhate vidhivadyadyadicchati
वे जो-जो चाहते हैं, वह सब भोगते और बाँटते हैं। हे ब्राह्मणश्रेष्ठो, यह सात्त्विक आचरण तुम्हें बता दिया; इसे जानकर मनुष्य विधि के अनुसार जो-जो चाहता है, उसे पाता है।
श्लोक 15 (14.39.15)
प्रकीर्तिताः सत्त्वगुणा विशेषतो । यथावदुक्तं गुणवृत्तमेव च । नरस्तु यो वेद गुणानिमान्सदा । गुणान्स भुङ्क्ते न गुणैः स युज्यते ॥
prakīrtitāḥ sattvaguṇā viśeṣato | yathāvaduktaṃ guṇavṛttameva ca | narastu yo veda guṇānimānsadā | guṇānsa bhuṅkte na guṇaiḥ sa yujyate
सत्त्वगुण विशेष रूप से बताए गए, और गुणों की प्रवृत्ति जैसी है वैसी कह दी गई। जो मनुष्य इन गुणों को सदा जानता है, वह गुणों को भोगता है और गुणों से बँधता नहीं।