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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 38

ब्रह्मा द्वारा रजोगुण का वर्णन

ब्रह्मा तमोगुण के बाद रजोगुण के लक्षण गिनाते हैं: परिश्रम, गर्व, कलह, क्रय-विक्रय, स्तुति और निन्दा, अपने लाभ के लिए किए गए यज्ञ और दान, आसक्ति, द्यूत, तथा नृत्य-गीत में रुचि। रजोगुण से घिरे मनुष्य धर्म, अर्थ और काम के पीछे चलते हैं, इस लोक में प्रसन्न रहते हैं, बार-बार जन्म लेते हैं और इस लोक तथा परलोक दोनों में अपना हित खोजते हैं। जो इन गुणों को जान लेता है, वह इनसे छूट जाता है।

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ब्रह्मोवाच

श्लोक 1 (14.38.1)

रजोऽहं वः प्रवक्ष्यामि याथातथ्येन सत्तमाः । निबोधत महाभागा गुणवृत्तं च राजसम् ॥

rajo'haṃ vaḥ pravakṣyāmi yāthātathyena sattamāḥ | nibodhata mahābhāgā guṇavṛttaṃ ca rājasam

हे श्रेष्ठ जनो, अब मैं तुम्हें रजोगुण के विषय में यथार्थ रूप से बताऊँगा। हे महाभाग लोगो, राजस गुण के स्वभाव और उसकी प्रवृत्ति को सुनो।

श्लोक 2 (14.38.2)

संतापो रूपमायासः सुखदुःखे हिमातपौ । ऐश्वर्यं विग्रहः सिद्धिर्हेतुवादोऽरतिः क्षमा ॥

saṃtāpo rūpamāyāsaḥ sukhaduḥkhe himātapau | aiśvaryaṃ vigrahaḥ siddhirhetuvādo'ratiḥ kṣamā

संताप, रूप, परिश्रम, सुख और दुःख, शीत और ताप, ऐश्वर्य, कलह, सिद्धि, तर्कवाद, अरुचि, क्षमा,

श्लोक 3 (14.38.3)

बलं शौर्यं मदो रोषो व्यायामकलहावपि । ईर्ष्येप्सा पैशुनं युद्धं ममत्वं परिपालनम् ॥

balaṃ śauryaṃ mado roṣo vyāyāmakalahāvapi | īrṣyepsā paiśunaṃ yuddhaṃ mamatvaṃ paripālanam

बल, शौर्य, मद, रोष, उद्यम और झगड़ा, ईर्ष्या और पाने की चाह, चुगली, युद्ध, ममत्व, परिपालन,

श्लोक 4 (14.38.4)

वधबन्धपरिक्लेशाः क्रयो विक्रय एव च । निकृन्त च्छिन्धि भिन्धीति परवर्मावकर्तनम् ॥

vadhabandhaparikleśāḥ krayo vikraya eva ca | nikṛnta cchindhi bhindhīti paravarmāvakartanam

वध, बन्धन, पीड़ा, क्रय और विक्रय, और "काटो! चीरो! तोड़ो!" ऐसी पुकारें तथा दूसरे के कवच को काट डालना,

श्लोक 5 (14.38.5)

उग्रं दारुणमाक्रोशः परवित्तानुरागिता । लोकचिन्ताऽनुचिन्ता च मत्सरः परिभाषणम् ॥

ugraṃ dāruṇamākrośaḥ paravittānurāgitā | lokacintā'nucintā ca matsaraḥ paribhāṣaṇam

उग्रता, क्रूरता, गाली-गलौज, दूसरों के धन की लालसा, लोक की चिन्ता और अन्तहीन सोच-विचार, मत्सर और डाँटना,

श्लोक 6 (14.38.6)

वृथाशास्त्रं मृषावादो विकल्पपरिभाषणम् । निन्दा स्तुतिः प्रशंसा च प्रतापः परिधर्षणम् ॥

vṛthāśāstraṃ mṛṣāvādo vikalpaparibhāṣaṇam | nindā stutiḥ praśaṃsā ca pratāpaḥ paridharṣaṇam

व्यर्थ के शास्त्र, झूठ बोलना, डगमगाती बातें, निन्दा, स्तुति और प्रशंसा, प्रताप दिखाना और अपमान करना,

श्लोक 7 (14.38.7)

परिचर्या च शुश्रूषा सेवा तृष्णा व्यपाश्रयः । व्यूहो नयः प्रमादश्च परिवादः परिग्रहः ॥

paricaryā ca śuśrūṣā sevā tṛṣṇā vyapāśrayaḥ | vyūho nayaḥ pramādaśca parivādaḥ parigrahaḥ

सेवा-टहल, शुश्रूषा, चाकरी, तृष्णा, परावलम्बन, व्यूह-रचना, नीति, प्रमाद, परिवाद और संग्रह,

श्लोक 8 (14.38.8)

संस्कारा ये च लोकेषु प्रवर्तन्ते पृथक्पृथक् । नृषु नारीषु भूतेषु द्रव्येषु शरणेषु च ॥

saṃskārā ye ca lokeṣu pravartante pṛthakpṛthak | nṛṣu nārīṣu bhūteṣu dravyeṣu śaraṇeṣu ca

और वे संस्कार जो इस लोक में अलग-अलग पुरुषों, स्त्रियों, प्राणियों, वस्तुओं और आश्रयों के विषय में चलते हैं,

श्लोक 9 (14.38.9)

संतापोऽप्रत्ययश्चैव व्रतानि नियमाश्च ये । प्रधानमाशीर्युक्तं च सततं मे भवत्विति ॥

saṃtāpo'pratyayaścaiva vratāni niyamāśca ye | pradhānamāśīryuktaṃ ca satataṃ me bhavatviti

संताप, अविश्वास, व्रत और नियम, और आशीर्वाद सहित प्रधान कार्य: "यह सदा मेरा हो" यह भाव।

श्लोक 10 (14.38.10)

स्वाहाकारो नमस्कारः स्वधाकारो वषट्क्रिया । याजनाध्यापने चोभे यजनाध्ययने अपि ॥

svāhākāro namaskāraḥ svadhākāro vaṣaṭkriyā | yājanādhyāpane cobhe yajanādhyayane api

स्वाहा, नमः, स्वधा और वषट् के उच्चारण; यज्ञ कराना और पढ़ाना, दोनों; यज्ञ करना और पढ़ना भी;

श्लोक 11 (14.38.11)

दानं प्रतिग्रहश्चैव प्रायश्चित्तानि मङ्गलम् । इदं मे स्यादिदं मे स्यात्स्नेहो गुणसमुद्भवः ॥

dānaṃ pratigrahaścaiva prāyaścittāni maṅgalam | idaṃ me syādidaṃ me syātsneho guṇasamudbhavaḥ

देना और लेना, प्रायश्चित्त, मंगल कर्म; "यह मेरा हो, वह मेरा हो": गुणों से उत्पन्न स्नेह;

श्लोक 12 (14.38.12)

अभिद्रोहस्तथा माया निकृतिर्मान एव च । स्तैन्यं हिंसा जुगुप्सा च परितापः प्रजागरः ॥

abhidrohastathā māyā nikṛtirmāna eva ca | stainyaṃ hiṃsā jugupsā ca paritāpaḥ prajāgaraḥ

द्रोह, माया, छल और मान, चोरी, हिंसा, घृणा, संताप, रात्रि-जागरण,

श्लोक 13 (14.38.13)

दम्भो दर्पोऽथ रागश्च भक्तिः प्रीतिः प्रमोदनम् । द्यूतं च जनवादश्च सम्बन्धाः स्त्रीकृताश्च ये ॥

dambho darpo'tha rāgaśca bhaktiḥ prītiḥ pramodanam | dyūtaṃ ca janavādaśca sambandhāḥ strīkṛtāśca ye

पाखण्ड, दर्प, राग, भक्ति, प्रीति, आनन्द, जुआ, लोकापवाद और स्त्रियों के कारण बने सम्बन्ध,

श्लोक 14 (14.38.14)

नृत्यवादित्रगीतानां प्रसङ्गा ये च केचन । सर्व एते गुणा विप्रा राजसाः सम्प्रकीर्तिताः ॥

nṛtyavāditragītānāṃ prasaṅgā ye ca kecana | sarva ete guṇā viprā rājasāḥ samprakīrtitāḥ

और नृत्य, वाद्य तथा गीत में जो भी आसक्तियाँ हैं: हे विप्रो, ये सब गुण राजस कहे गए हैं।

श्लोक 15 (14.38.15)

भूतभव्यभविष्याणां भावानां भुवि भावनाः । त्रिवर्गनिरता नित्यं धर्मोऽर्थः काम इत्यपि ॥

bhūtabhavyabhaviṣyāṇāṃ bhāvānāṃ bhuvi bhāvanāḥ | trivarganiratā nityaṃ dharmo'rthaḥ kāma ityapi

जो लोक में भूत, भविष्य और वर्तमान के भावों का चिन्तन करते हैं, और सदा धर्म, अर्थ तथा काम इन तीन पुरुषार्थों में लगे रहते हैं,

श्लोक 16 (14.38.16)

कामवृत्ताः प्रमोदन्ते सर्वकामसमृद्धिभिः । अर्वाक्स्रोतस इत्येते मनुष्या रजसा वृताः ॥

kāmavṛttāḥ pramodante sarvakāmasamṛddhibhiḥ | arvāksrotasa ityete manuṣyā rajasā vṛtāḥ

कामना के अनुसार जीते हैं और सब कामनाओं की पूर्ति से प्रसन्न होते हैं। रजोगुण से घिरे ये मनुष्य नीचे की ओर बहने वाले कहलाते हैं।

श्लोक 17 (14.38.17)

अस्मिँल्लोके प्रमोदन्ते जायमानाः पुनःपुनः । प्रेत्यभाविकमीहन्ते इहलौकिकमेव च । ददति प्रतिगृह्णन्ति तर्पयन्त्यथ जुह्वति ॥

asmim̐lloke pramodante jāyamānāḥ punaḥpunaḥ | pretyabhāvikamīhante ihalaukikameva ca | dadati pratigṛhṇanti tarpayantyatha juhvati

वे इस लोक में बार-बार जन्म लेते हुए आनन्द मनाते हैं। वे परलोक का और इस लोक का भी हित चाहते हैं। वे दान देते हैं, दान लेते हैं, तर्पण करते हैं और आहुति देते हैं।

श्लोक 18 (14.38.18)

रजोगुणा वो बहुधानुकीर्तिता । यथावदुक्तं गुणवृत्तमेव च । नरोऽपि यो वेद गुणानिमान्सदा । स राजसैः सर्वगुणैर्विमुच्यते ॥

rajoguṇā vo bahudhānukīrtitā | yathāvaduktaṃ guṇavṛttameva ca | naro'pi yo veda guṇānimānsadā | sa rājasaiḥ sarvaguṇairvimucyate

रजोगुण के अनेक रूप तुम्हें बता दिए गए, और गुणों की प्रवृत्ति जैसी है वैसी कह दी गई। जो मनुष्य इन गुणों को सदा जानता है, वह सब राजस गुणों से छूट जाता है।

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