आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 37
ब्रह्मा द्वारा तमोगुण का वर्णन
ब्रह्मा ऋषियों को अपना उपदेश जारी रखते हुए नौ द्वारों वाले नगर और उसमें चलने वाले तीन परस्पर गुँथे गुणों, तम, रज और सत्त्व का वर्णन करते हैं। वे तमोगुण के लक्षण गिनाते हैं, जैसे मोह, भय, लोभ और द्वेष, और उन पशु-पक्षी आदि निम्न योनियों को बताते हैं जिनमें तामसी लोग गिरते हैं। फिर वे उनकी बात कहते हैं जो उचित कर्म और संस्कारों से ऊपर उठते हैं, और अन्त में उन मोहों का वर्णन करते हैं जो देवताओं, ऋषियों और मनुष्यों को बाँधते हैं; जो इन गुणों को जान लेता है वह तमोगुण से छूट जाता है।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 1 (14.37.1)
तदव्यक्तमनुद्रिक्तं सर्वव्यापि ध्रुवं स्थिरम् । नवद्वारं पुरं विद्यात्त्रिगुणं पञ्चधातुकम् ॥
tadavyaktamanudriktaṃ sarvavyāpi dhruvaṃ sthiram | navadvāraṃ puraṃ vidyāttriguṇaṃ pañcadhātukam
उस अव्यक्त, अनुद्रिक्त, सर्वव्यापी, ध्रुव और स्थिर तत्त्व को नौ द्वारों वाला नगर जानो, जो तीन गुणों वाला और पाँच धातुओं से बना है।
श्लोक 2 (14.37.2)
एकादशपरिक्षेपं मनोव्याकरणात्मकम् । बुद्धिस्वामिकमित्येतत्परमेकादशं भवेत् ॥
ekādaśaparikṣepaṃ manovyākaraṇātmakam | buddhisvāmikamityetatparamekādaśaṃ bhavet
इसके ग्यारह घेरे हैं, इसका स्वभाव मन की विवेचना है और बुद्धि इसकी स्वामिनी है; इस प्रकार यह परम तत्त्व ग्यारहवाँ है।
श्लोक 3 (14.37.3)
त्रीणि स्रोतांसि यान्यस्मिन्नाप्यायन्ते पुनःपुनः । प्रणाड्यस्तिस्र एवैताः प्रवर्तन्ते गुणात्मिकाः ॥
trīṇi srotāṃsi yānyasminnāpyāyante punaḥpunaḥ | praṇāḍyastisra evaitāḥ pravartante guṇātmikāḥ
इसमें जो तीन धाराएँ बार-बार भरती रहती हैं, वे गुणों के स्वभाव वाली तीन नाड़ियाँ हैं, जो बहती रहती हैं।
श्लोक 4 (14.37.4)
तमो रजस्तथा सत्वं गुणानेतान्प्रचक्षते । अन्योन्यमिथुनाः सर्वे तथाऽन्योन्यानुजीविनः ॥
tamo rajastathā satvaṃ guṇānetānpracakṣate | anyonyamithunāḥ sarve tathā'nyonyānujīvinaḥ
तम, रज और सत्त्व: इन्हें गुण कहते हैं। ये सब एक-दूसरे के जोड़ीदार हैं, एक-दूसरे के सहारे जीते हैं,
श्लोक 5 (14.37.5)
अन्योन्यापाश्रयाश्चापि तथाऽन्योन्यानुवर्तिनः । अन्योन्यव्यतिषक्ताश्च त्रिगुणाः पञ्चधातवः ॥
anyonyāpāśrayāścāpi tathā'nyonyānuvartinaḥ | anyonyavyatiṣaktāśca triguṇāḥ pañcadhātavaḥ
एक-दूसरे का आश्रय लेते हैं, एक-दूसरे के पीछे चलते हैं और एक-दूसरे में गुँथे हुए हैं; पाँचों धातुएँ तीन गुणों वाली हैं।
श्लोक 6 (14.37.6)
तमसो मिथुनं सत्वं सत्वस्य मिथुनं रजः । रजसश्चापि सत्वं स्यात्सत्वस्य मिथुनं तमः ॥
tamaso mithunaṃ satvaṃ satvasya mithunaṃ rajaḥ | rajasaścāpi satvaṃ syātsatvasya mithunaṃ tamaḥ
तम का जोड़ीदार सत्त्व है, सत्त्व का जोड़ीदार रज है; रज का भी जोड़ीदार सत्त्व है, और सत्त्व का जोड़ीदार तम है।
श्लोक 7 (14.37.7)
नियम्यते तमो यत्र रजस्तत्र निवर्तते । नियम्यते रजो यत्र सत्वं तत्र प्रवर्तते ॥
niyamyate tamo yatra rajastatra nivartate | niyamyate rajo yatra satvaṃ tatra pravartate
जहाँ तम को रोका जाता है, वहाँ रज प्रवृत्त होता है; जहाँ रज को रोका जाता है, वहाँ सत्त्व प्रवृत्त होता है।
श्लोक 8 (14.37.8)
नैशात्मकं तमो विद्यात्त्रिगुणं मोहसंज्ञितम् । अधर्मलक्षणं चैव नियतं पापकर्मसु । तामसं रूपमेतत्तु दृश्यते चापि सङ्गतम् ॥
naiśātmakaṃ tamo vidyāttriguṇaṃ mohasaṃjñitam | adharmalakṣaṇaṃ caiva niyataṃ pāpakarmasu | tāmasaṃ rūpametattu dṛśyate cāpi saṅgatam
तम को रात्रि के स्वभाव वाला, त्रिगुणात्मक और मोह नाम वाला जानो; अधर्म उसका लक्षण है और वह पापकर्मों में स्थित रहता है। यही तामस रूप है, और यह दूसरों के साथ मिला हुआ भी दिखता है।
श्लोक 9 (14.37.9)
प्रकृत्यात्मकमेवाहू रजः पर्यायकारकम् । सत्त्वे तु सर्वभूतेषु दृश्यमुत्पत्तिलक्षणम् ॥
prakṛtyātmakamevāhū rajaḥ paryāyakārakam | sattve tu sarvabhūteṣu dṛśyamutpattilakṣaṇam
कहते हैं कि रज प्रकृति के स्वभाव वाला है और क्रम से परिवर्तन कराने वाला है; और सत्त्व में, सब प्राणियों में, उत्पत्ति का लक्षण दिखाई देता है।
श्लोक 10 (14.37.10)
प्रकाशं सर्वभूतेषु लाघवं श्रद्धधानता । सात्विकं रूपमेवं तु लाघवं साधुसंमितम् ॥
prakāśaṃ sarvabhūteṣu lāghavaṃ śraddhadhānatā | sātvikaṃ rūpamevaṃ tu lāghavaṃ sādhusaṃmitam
सब प्राणियों में प्रकाश, लघुता और श्रद्धा: यह सात्त्विक रूप है; और लघुता सज्जनों को मान्य है।
श्लोक 11 (14.37.11)
एतेषां गुणतत्त्वानि वक्ष्यन्ते तत्त्वहेतुभिः । समासव्यासयुक्तानि तत्त्वतस्तानि बोधत ॥
eteṣāṃ guṇatattvāni vakṣyante tattvahetubhiḥ | samāsavyāsayuktāni tattvatastāni bodhata
इन गुणों के तत्त्व कारणों सहित बताए जाएँगे; उन्हें संक्षेप और विस्तार दोनों रूपों में यथार्थ रूप से समझो।
श्लोक 12 (14.37.12)
सम्मोहोऽज्ञानमत्यागः कर्मणामविनिर्णयः । स्वप्नः स्तंभो भयं लोभः शोकः सुकृतदूषणम् ॥
sammoho'jñānamatyāgaḥ karmaṇāmavinirṇayaḥ | svapnaḥ staṃbho bhayaṃ lobhaḥ śokaḥ sukṛtadūṣaṇam
मोह, अज्ञान, अत्याग, कर्मों के विषय में अनिश्चय, निद्रा, जड़ता, भय, लोभ, शोक, सुकृत को दूषित करना,
श्लोक 13 (14.37.13)
अस्मृतिश्चाविपाकश्च नास्तिक्यं भिन्नवृत्तिता । निर्विशेषत्वमन्धत्वं जघन्यगुणवृत्तिता ॥
asmṛtiścāvipākaśca nāstikyaṃ bhinnavṛttitā | nirviśeṣatvamandhatvaṃ jaghanyaguṇavṛttitā
स्मृति का अभाव, कर्मों का फलहीन रहना, नास्तिकता, चंचल आचरण, भेद-विवेक का अभाव, अन्धापन, निकृष्ट गुणों के अनुसार चलना,
श्लोक 14 (14.37.14)
अकृते कृतमानित्वमज्ञाने ज्ञानमानिता । अमैत्री विकृतो भावो ह्यश्रद्धा मूढभावना ॥
akṛte kṛtamānitvamajñāne jñānamānitā | amaitrī vikṛto bhāvo hyaśraddhā mūḍhabhāvanā
जो काम किया नहीं उसका अभिमान, अज्ञान में ज्ञान का अभिमान, अमित्रता, विकृत भाव, अश्रद्धा, मूढ़ भावना,
श्लोक 15 (14.37.15)
अनार्जवमसंज्ञत्वं कर्म पापमचेतना । गुरुत्वं सन्नभावत्वमवशित्वमवाग्गतिः ॥
anārjavamasaṃjñatvaṃ karma pāpamacetanā | gurutvaṃ sannabhāvatvamavaśitvamavāggatiḥ
कुटिलता, बोध का अभाव, पापकर्म, चेतना का अभाव, भारीपन, अवसाद, असंयम, अधोगति:
श्लोक 16 (14.37.16)
सर्व एते गुणा वृत्तास्तामसाः सम्प्रकीर्तिताः । ये चान्ये विहिता भावा लोकेऽस्मिन्भावसंज्ञिताः ॥
sarva ete guṇā vṛttāstāmasāḥ samprakīrtitāḥ | ye cānye vihitā bhāvā loke'sminbhāvasaṃjñitāḥ
ये सब गुण, प्रवृत्त होने पर, तामस कहे गए हैं; और इस लोक में जो अन्य भाव भाव-नाम से कहे जाते हैं,
श्लोक 17 (14.37.17)
तत्रतत्र नियम्यन्ते सर्वे ते तामसा गुणाः । परिवादकथा नित्यं देवब्राह्मणवैरिता ॥
tatratatra niyamyante sarve te tāmasā guṇāḥ | parivādakathā nityaṃ devabrāhmaṇavairitā
वे सब तामस गुण जहाँ-जहाँ होते हैं, वहीं रोके जाते हैं। निरन्तर निन्दा की बातें, और देवताओं तथा ब्राह्मणों से वैर,
श्लोक 18 (14.37.18)
अत्यागश्चातिमानश्च मोहो मन्युस्तथाऽक्षमा । मत्सरश्चैव भूतेषु तामसं वृत्तमिष्यते ॥
atyāgaścātimānaśca moho manyustathā'kṣamā | matsaraścaiva bhūteṣu tāmasaṃ vṛttamiṣyate
दान न करना, अति अभिमान, मोह, क्रोध, असहनशीलता और प्राणियों के प्रति ईर्ष्या: यह तामस आचरण माना जाता है।
श्लोक 19 (14.37.19)
वृथारम्भा हि ये केचिद्वृथा दानानि यानि च । वृथाभक्षणमित्येतत्तामसं वृत्तमिष्यते ॥
vṛthārambhā hi ye kecidvṛthā dānāni yāni ca | vṛthābhakṣaṇamityetattāmasaṃ vṛttamiṣyate
व्यर्थ आरम्भ किए हुए कार्य, व्यर्थ दिए हुए दान और व्यर्थ भोजन: यह तामस आचरण माना जाता है।
श्लोक 20 (14.37.20)
अतिवादोऽतितिक्षा च मात्सर्यमभिमानिता । अश्रद्दधानता चैव तामसं वृत्तमिष्यते ॥
ativādo'titikṣā ca mātsaryamabhimānitā | aśraddadhānatā caiva tāmasaṃ vṛttamiṣyate
अत्यधिक बोलना, अत्यधिक सहन करना, मात्सर्य, अभिमान और अश्रद्धा: यह भी तामस आचरण माना जाता है।
श्लोक 21 (14.37.21)
एवंविधाश्च ये केचिल्लोकेऽस्मिन्पापकर्मिणः । मनुष्या भिन्नमर्यादास्ते सर्वे तामसाः स्मृताः ॥
evaṃvidhāśca ye kecilloke'sminpāpakarmiṇaḥ | manuṣyā bhinnamaryādāste sarve tāmasāḥ smṛtāḥ
इस लोक में जो भी ऐसे पापकर्मी हैं, जिन्होंने सब मर्यादाएँ तोड़ दी हैं, वे सब तामस माने गए हैं।
श्लोक 22 (14.37.22)
तेषां योनीः प्रवक्ष्यामि नियताः पापकर्मिणाम् । अवाङ्निरयभावा ये तिर्यङ्निरयगामिनः ॥
teṣāṃ yonīḥ pravakṣyāmi niyatāḥ pāpakarmiṇām | avāṅnirayabhāvā ye tiryaṅnirayagāminaḥ
उन पापकर्मियों के लिए निश्चित योनियाँ मैं बताऊँगा: जिनकी स्थिति अधोमुख नरक की है और जो तिर्यक् नरक को जाते हैं:
श्लोक 23 (14.37.23)
स्थावराणि च भूतानि पशवो वाहनानि च । क्रव्यादा दंदशूकाश्च कृमिकीटविहङ्गमाः ॥
sthāvarāṇi ca bhūtāni paśavo vāhanāni ca | kravyādā daṃdaśūkāśca kṛmikīṭavihaṅgamāḥ
स्थावर प्राणी, पशु, वाहन बनने वाले जीव, मांसभक्षी, डसने वाले, कृमि, कीट और पक्षी,
श्लोक 24 (14.37.24)
अब्जाता जन्तवश्चैव सर्वे चापि चतुष्पदाः । उन्मत्ता बधिरा मूका ये चान्ये पापरोगिणः ॥
abjātā jantavaścaiva sarve cāpi catuṣpadāḥ | unmattā badhirā mūkā ye cānye pāparogiṇaḥ
जल में उत्पन्न होने वाले जीव और सभी चौपाए; पागल, बहरे, गूँगे और पाप-रोगों से पीड़ित अन्य लोग:
श्लोक 25 (14.37.25)
मग्नास्तमसि दुर्वृत्ताः स्वकर्मकृतलक्षणाः । अवाक्स्रोतस इत्येते मग्नास्तमसि तामसाः ॥
magnāstamasi durvṛttāḥ svakarmakṛtalakṣaṇāḥ | avāksrotasa ityete magnāstamasi tāmasāḥ
अंधकार में डूबे, दुराचारी, अपने कर्मों से बने चिह्नों को धारण करने वाले: ये अधोगामी धारा वाले हैं, अंधकार में डूबे हुए तामस जीव।
श्लोक 26 (14.37.26)
तेषामुत्कर्षमुद्रेकं वक्ष्याम्यहमतः परम् । यथा ते सुकृतां लोकाँल्लभन्ते पुण्यकर्मिणः ॥
teṣāmutkarṣamudrekaṃ vakṣyāmyahamataḥ param | yathā te sukṛtāṃ lokām̐llabhante puṇyakarmiṇaḥ
अब मैं उनके उत्थान और उत्कर्ष की बात कहूँगा: पुण्यकर्म करने वाले जिस प्रकार सुकृतियों के लोक पाते हैं।
श्लोक 27 (14.37.27)
अन्यथा प्रतिपन्नास्तु विवृद्धा ये च कर्मसु । स्वकर्मनिरतानां च ब्राह्मणानां शुभैषिणाम् ॥
anyathā pratipannāstu vivṛddhā ye ca karmasu | svakarmaniratānāṃ ca brāhmaṇānāṃ śubhaiṣiṇām
जो दूसरे मार्ग पर चले हैं और अपने कर्मों में बढ़े हैं, तथा जो ब्राह्मण अपने कर्म में लगे रहते हैं और सबका भला चाहते हैं,
श्लोक 28 (14.37.28)
संस्कारेणोर्ध्वमायान्ति यतमानाः सलोकताम् । स्वर्गे गच्छन्ति देवानामित्येषा वैदिकी श्रुतिः ॥
saṃskāreṇordhvamāyānti yatamānāḥ salokatām | svarge gacchanti devānāmityeṣā vaidikī śrutiḥ
संस्कारों के द्वारा ऊपर उठते हैं, और देवताओं के समान लोक की प्राप्ति का प्रयत्न करते हुए देवताओं के स्वर्ग में जाते हैं। ऐसी वैदिक श्रुति है।
श्लोक 29 (14.37.29)
अन्यथा प्रतिपन्नास्ते विबुद्धाः स्वेषु कर्मसु । पुनरावृत्तिधर्माणस्ते भवन्तीह मानुषाः ॥
anyathā pratipannāste vibuddhāḥ sveṣu karmasu | punarāvṛttidharmāṇaste bhavantīha mānuṣāḥ
किन्तु जो दूसरे मार्ग पर चले हैं और अपने कर्मों में जाग उठे हैं, वे यहाँ मनुष्य बनते हैं, जो फिर लौटने के धर्म वाले हैं।
श्लोक 30 (14.37.30)
पापयोनिं समापन्नाश्चण्डाला मूकचूचुकाः । वर्णान्पर्यायशश्चापि प्राप्नुवन्त्युत्तरोत्तरम् ॥
pāpayoniṃ samāpannāścaṇḍālā mūkacūcukāḥ | varṇānparyāyaśaścāpi prāpnuvantyuttarottaram
जो पापयोनि में पहुँचे हैं, चाण्डाल, गूँगे और हकलाने वाले, वे क्रम से एक के बाद एक ऊँचे वर्णों को पाते हैं।
श्लोक 31 (14.37.31)
शूद्रयोनिमतिक्रम्य ये चान्ये तामसा गुणाः । स्रोतोमध्ये समागम्य वर्तन्ते तामसे गुणे ॥
śūdrayonimatikramya ye cānye tāmasā guṇāḥ | srotomadhye samāgamya vartante tāmase guṇe
जो अन्य तामस गुण वाले शूद्रयोनि को पार करके धारा के बीच में आते हैं, वे तामस गुण में ही बने रहते हैं।
श्लोक 32 (14.37.32)
अभिष्वङ्गस्तु कामेषु महामोह इति स्मृतः । ऋषयो मुनयो देवा मुह्यन्त्यत्र सुखेप्सवः ॥
abhiṣvaṅgastu kāmeṣu mahāmoha iti smṛtaḥ | ṛṣayo munayo devā muhyantyatra sukhepsavaḥ
कामनाओं में आसक्ति को महामोह कहा गया है। सुख की इच्छा रखने वाले ऋषि, मुनि और देवता भी यहाँ इससे मोहित हो जाते हैं।
श्लोक 33 (14.37.33)
तमोमोहो महामोहस्तामिस्रो ह्यन्धसंज्ञितः । मरणं त्वन्धतामिस्रस्तामिस्रः क्रोध उच्यते ॥
tamomoho mahāmohastāmisro hyandhasaṃjñitaḥ | maraṇaṃ tvandhatāmisrastāmisraḥ krodha ucyate
तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्ध नाम वाला; मृत्यु अन्धतामिस्र है, और क्रोध तामिस्र कहा जाता है।
श्लोक 34 (14.37.34)
वर्णतो गुणतश्चैव योनितश्चैव तत्त्वतः । सर्वमेततमो विप्राः कीर्तितं वो यथाविधि ॥
varṇato guṇataścaiva yonitaścaiva tattvataḥ | sarvametatamo viprāḥ kīrtitaṃ vo yathāvidhi
स्थिति से, गुण से, योनि से और तत्त्व से यह सब तम है, हे ब्राह्मणो; मैंने इसे विधिपूर्वक तुम्हें बता दिया।
श्लोक 35 (14.37.35)
को न्वेतद्बुध्यते साधु को न्वेतत्साधु पश्यति । अतत्त्वे तत्त्वदर्शी यस्तमसस्तच्च लक्षणम् ॥
ko nvetadbudhyate sādhu ko nvetatsādhu paśyati | atattve tattvadarśī yastamasastacca lakṣaṇam
कौन इसे ठीक समझता है? कौन इसे ठीक देखता है? जो अतत्त्व में तत्त्व को देखता है, वही तमोगुण का लक्षण है।
श्लोक 36 (14.37.36)
तमोगुणा बहुविधाः प्रकीर्तिता । यथावदुक्तं च तमः परावरम् । नरो हि यो वेद गुणानिमान्सदा । स तामसैः सर्वगुणैः प्रमुच्यते ॥
tamoguṇā bahuvidhāḥ prakīrtitā | yathāvaduktaṃ ca tamaḥ parāvaram | naro hi yo veda guṇānimānsadā | sa tāmasaiḥ sarvaguṇaiḥ pramucyate
तमोगुण के अनेक रूप बताए गए, और ऊँचा-नीचा तम जैसा है वैसा कहा गया। जो मनुष्य इन गुणों को सदा जानता है, वह सब तामस गुणों से छूट जाता है।