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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 36

गुरु का शिष्य को उपदेश: ऋषियों को ब्रह्मा की शिक्षा

अर्जुन के कहने पर श्रीकृष्ण गुरु और शिष्य का एक पुराना संवाद सुनाते हैं। शिष्य प्राणियों की उत्पत्ति, सत्य, तप और मोक्ष के मार्गों के विषय में पूछता है, और गुरु बताता है कि ऋषियों ने यही प्रश्न एक बार ब्रह्मा से पूछे थे। ब्रह्मा कहते हैं कि सब प्राणी सत्य से उत्पन्न हैं और तप से जीते हैं; वे चार आश्रमों को सज्जनों द्वारा अपनाए गए मार्ग बताते हैं और चौबीस तत्त्वों को गिनाते हैं, जिनकी उत्पत्ति और लय को जानने वाला ज्ञानी मोह में नहीं पड़ता।

अध्याय 35अध्याय-सूचीअध्याय 37

अर्जुन उवाच

श्लोक 1 (14.36.1)

ब्रह्म यत्परमं ज्ञेयं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि । भवतो हि प्रसादेन सूक्ष्मे मे रमते मतिः ॥

brahma yatparamaṃ jñeyaṃ tanme vyākhyātumarhasi | bhavato hi prasādena sūkṣme me ramate matiḥ

जो ब्रह्म सबसे परम जानने योग्य है, उसे आप मुझे समझाइए; क्योंकि आपकी कृपा से मेरा मन सूक्ष्म तत्त्व में रमता है।

वासुदेव उवाच

श्लोक 2 (14.36.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । संवादं मोक्षसंयुक्तं शिष्यस्य गुरुणा सह ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | saṃvādaṃ mokṣasaṃyuktaṃ śiṣyasya guruṇā saha

इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं, जो मोक्ष से जुड़ा हुआ एक शिष्य और गुरु का संवाद है।

श्लोक 3 (14.36.3)

कश्चिद्ब्राह्मणमासीनमाचार्यं संशितव्रतम् । शिष्यः पप्रच्छ मेधावी किंस्विच्छ्रेयः परंतप ॥

kaścidbrāhmaṇamāsīnamācāryaṃ saṃśitavratam | śiṣyaḥ papraccha medhāvī kiṃsvicchreyaḥ paraṃtapa

हे परंतप, एक बार एक बुद्धिमान शिष्य ने कठोर व्रत वाले, बैठे हुए ब्राह्मण आचार्य से पूछा कि परम कल्याण क्या है।

शिष्य उवाच

श्लोक 4 (14.36.4)

भगवन्तं प्रपन्नोऽहं निःश्रेयसपरायणः । याचे त्वां शिरसा विप्र यद्ब्रूयां ब्रूहि तन्मम ॥

bhagavantaṃ prapanno'haṃ niḥśreyasaparāyaṇaḥ | yāce tvāṃ śirasā vipra yadbrūyāṃ brūhi tanmama

"भगवन्, मैं परम कल्याण में लगा हुआ आपकी शरण आया हूँ। हे विप्र, सिर झुकाकर आपसे प्रार्थना करता हूँ; मुझे जो कहा जाना चाहिए, वह बताइए।"

वासुदेव उवाच

श्लोक 5 (14.36.5)

तमेवंवादिनं पार्थ शिष्यं गुरुरुवाच ह । कथयस्व प्रवक्ष्यामि यत्र ते संशयो द्विज ॥

tamevaṃvādinaṃ pārtha śiṣyaṃ gururuvāca ha | kathayasva pravakṣyāmi yatra te saṃśayo dvija

हे पार्थ, ऐसा कहने वाले उस शिष्य से गुरु ने कहा, "कहो, हे द्विज, तुम्हें जिस विषय में संशय है, मैं उसका उत्तर दूँगा।"

श्लोक 6 (14.36.6)

इत्युक्तः स कुरुश्रेष्ठ गुरुणा गुरुवत्सलः । प्राञ्जलिः परिपप्रच्छ यत्तच्छृणु महामते ॥

ityuktaḥ sa kuruśreṣṭha guruṇā guruvatsalaḥ | prāñjaliḥ paripapraccha yattacchṛṇu mahāmate

हे कुरुश्रेष्ठ, गुरु के ऐसा कहने पर गुरु-भक्त शिष्य ने हाथ जोड़कर जो पूछा, उसे सुनो, हे महामते।

शिष्य उवाच

श्लोक 7 (14.36.7)

कुतश्चाहं कुतश्च त्वं तत्सत्यं ब्रूहि यत्परम् । कुतो जातानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ॥

kutaścāhaṃ kutaśca tvaṃ tatsatyaṃ brūhi yatparam | kuto jātāni bhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca

मैं कहाँ से हूँ और आप कहाँ से हैं? वह परम सत्य मुझे बताइए। चर और अचर प्राणी कहाँ से उत्पन्न हुए?

श्लोक 8 (14.36.8)

केन जीवन्ति भूतानि तेषामायुश्च किं परम् । किं सत्यं किं तपो विप्र के गुणाः सद्भिरीरिताः ॥

kena jīvanti bhūtāni teṣāmāyuśca kiṃ param | kiṃ satyaṃ kiṃ tapo vipra ke guṇāḥ sadbhirīritāḥ

प्राणी किससे जीवित रहते हैं और उनकी परम आयु क्या है? सत्य क्या है, तप क्या है, हे विप्र, और सज्जनों ने कौन-से गुण बताए हैं?

श्लोक 9 (14.36.9)

के पन्थानः शिवाश्च स्युः किं सुखं किं च दुष्कृतम् । एतान्मे भगवन्प्रश्नान्याथातथ्येन सुव्रत ॥

ke panthānaḥ śivāśca syuḥ kiṃ sukhaṃ kiṃ ca duṣkṛtam | etānme bhagavanpraśnānyāthātathyena suvrata

कौन-से मार्ग कल्याणकारी हैं, सुख क्या है और दुष्कृत क्या है? हे भगवन्, हे सुव्रत, ये प्रश्न आप मुझे यथार्थ रूप में बताइए,

श्लोक 10 (14.36.10)

वक्तुमर्हसि विप्रर्षे यथावदिह तत्त्वतः । त्वदन्यः कश्च न प्रश्नानेतान्वक्तुमिहार्हति ॥

vaktumarhasi viprarṣe yathāvadiha tattvataḥ | tvadanyaḥ kaśca na praśnānetānvaktumihārhati

हे विप्रर्षि, यथावत् और तत्त्वतः। आपके सिवा और कौन यहाँ इन प्रश्नों का उत्तर देने योग्य है?

श्लोक 11 (14.36.11)

ब्रूहि धर्मविदां श्रेष्ठ परं कौतूहलं मम । मोक्षधर्मार्थकुशलो भवाँल्लोकेषु गीयते ॥

brūhi dharmavidāṃ śreṣṭha paraṃ kautūhalaṃ mama | mokṣadharmārthakuśalo bhavām̐llokeṣu gīyate

हे धर्मज्ञों में श्रेष्ठ, बताइए; मेरी जिज्ञासा बहुत बड़ी है। लोकों में आप मोक्ष-धर्म और उसके प्रयोजन में कुशल माने जाते हैं।

श्लोक 12 (14.36.12)

सर्वसंशयसंच्छेत्ता त्वदन्यो न च विद्यते । संसारभीरवश्चैव मोक्षकामास्तथा वयम् ॥

sarvasaṃśayasaṃcchettā tvadanyo na ca vidyate | saṃsārabhīravaścaiva mokṣakāmāstathā vayam

सब संशयों को काटने वाला आपके सिवा कोई नहीं है। हम भी संसार से डरे हुए हैं और मोक्ष की कामना करते हैं।

वासुदेव उवाच

श्लोक 13 (14.36.13)

तस्मै सम्प्रतिपन्नाय यथावत्परिपृच्छते । शिष्याय गुणयुक्ताय शान्ताय गुरुवर्तिने ॥

tasmai sampratipannāya yathāvatparipṛcchate | śiṣyāya guṇayuktāya śāntāya guruvartine

उस शिष्य के लिए, जो शरण में आया था, विधिपूर्वक पूछ रहा था, गुणवान, शान्त और गुरु की सेवा में रहने वाला था,

श्लोक 14 (14.36.14)

छायाभूताय दान्ताय यतते ब्रह्मचारिणे । तान्प्रश्नानब्रवीत्पार्थ मेधावी स धृतव्रतः । गुरुः कुरुकुलश्रेष्ठ सम्यक्सर्वानरिंदम ॥

chāyābhūtāya dāntāya yatate brahmacāriṇe | tānpraśnānabravītpārtha medhāvī sa dhṛtavrataḥ | guruḥ kurukulaśreṣṭha samyaksarvānariṃdama

जो गुरु की छाया की तरह साथ रहता था, संयमी था, प्रयत्नशील था और ब्रह्मचारी था, उस शिष्य के उन सब प्रश्नों का बुद्धिमान और दृढ़ व्रत वाले गुरु ने, हे कुरुकुल में श्रेष्ठ, हे अरिंदम पार्थ, भली-भाँति उत्तर दिया।

गुरुरुवाच

श्लोक 15 (14.36.15)

ब्रह्मणोक्तमिदं धर्ममृषिप्रवरसेवितम् । वेदविद्यासमावाप्तं तत्त्वभूतार्थभावनम् ॥

brahmaṇoktamidaṃ dharmamṛṣipravarasevitam | vedavidyāsamāvāptaṃ tattvabhūtārthabhāvanam

यह धर्म ब्रह्मा का कहा हुआ है, श्रेष्ठ ऋषियों द्वारा सेवित है, वेदविद्या से प्राप्त होता है और वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप का चिन्तन कराता है।

श्लोक 16 (14.36.16)

ज्ञानं त्वेव परं विद्यः संन्यासं तप उत्तमम् । यस्तु वेद निराबाधं ज्ञानतत्त्वं विनिश्चयात् । सर्वभूतस्थमात्मानं स सर्वगतिरिष्यते ॥

jñānaṃ tveva paraṃ vidyaḥ saṃnyāsaṃ tapa uttamam | yastu veda nirābādhaṃ jñānatattvaṃ viniścayāt | sarvabhūtasthamātmānaṃ sa sarvagatiriṣyate

हम ज्ञान को ही परम मानते हैं और संन्यास को सर्वोत्तम तप। जो दृढ़ निश्चय से बिना बाधा के ज्ञान के तत्त्व को और सब प्राणियों में स्थित आत्मा को जानता है, वह सब गतियों को पाने वाला कहा जाता है।

श्लोक 17 (14.36.17)

यो विद्वान्सहसंवासं विवासं चैव पश्यति । तथैवैकत्वनानात्वे स दुःखात्परिमुच्यते ॥

yo vidvānsahasaṃvāsaṃ vivāsaṃ caiva paśyati | tathaivaikatvanānātve sa duḥkhātparimucyate

जो ज्ञानी साथ रहने और अलग रहने को, तथा एकत्व और अनेकत्व को देखता है, वह दुःख से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 18 (14.36.18)

यो न कामयते किञ्चिन्न किञ्चिदभिमन्यते । इह लोकस्थ एवैष ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

yo na kāmayate kiñcinna kiñcidabhimanyate | iha lokastha evaiṣa brahmabhūyāya kalpate

जो कुछ भी नहीं चाहता और कुछ भी अपना नहीं मानता, वह इसी लोक में रहते हुए ब्रह्मभाव को पाने योग्य हो जाता है।

श्लोक 19 (14.36.19)

प्रधानगुणतत्त्वज्ञः सर्वभूतविधानवित् । निर्ममो निरहङ्कारो मुच्यते नात्र संशयः ॥

pradhānaguṇatattvajñaḥ sarvabhūtavidhānavit | nirmamo nirahaṅkāro mucyate nātra saṃśayaḥ

जो प्रधान और गुणों के तत्त्व को जानता है, सब प्राणियों की व्यवस्था को समझता है, ममता और अहंकार से रहित है, वह मुक्त हो जाता है; इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 20 (14.36.20)

अव्यक्तबीजप्रभवो बुद्धिस्कन्धमयो महान् । महाहङ्कारविटप इन्द्रियाङ्कुरकोटरः ॥

avyaktabījaprabhavo buddhiskandhamayo mahān | mahāhaṅkāraviṭapa indriyāṅkurakoṭaraḥ

अव्यक्त उसका बीज है, बुद्धि उसका तना है और वह महान् है; महान् अहंकार उसकी शाखाओं का समूह है, इन्द्रियाँ उसके अंकुर और कोटर हैं,

श्लोक 21 (14.36.21)

महाभूतविशेषश्च विशेषप्रतिशाखवान् । सदापर्णः सदापुष्पः शुभाशुभफलोदयः ॥

mahābhūtaviśeṣaśca viśeṣapratiśākhavān | sadāparṇaḥ sadāpuṣpaḥ śubhāśubhaphalodayaḥ

महाभूत और उनके विशेष उसकी बड़ी और छोटी शाखाएँ हैं। वह सदा पत्तों वाला, सदा फूलों वाला है, और सदा शुभ-अशुभ फल देता है।

श्लोक 22 (14.36.22)

आजीवः सर्वभूतानां ब्रह्मबीजः सनातनः । एतज्ज्ञात्वा च तत्त्वानि ज्ञानेन परमासिना । छित्त्वा चामरतां प्राप्य जहाति मृत्युजन्मनी ॥

ājīvaḥ sarvabhūtānāṃ brahmabījaḥ sanātanaḥ | etajjñātvā ca tattvāni jñānena paramāsinā | chittvā cāmaratāṃ prāpya jahāti mṛtyujanmanī

यह सब प्राणियों की जीविका है, ब्रह्म इसका बीज है, और यह सनातन है। इन तत्त्वों को जानकर और ज्ञान की परम तलवार से इसे काटकर मनुष्य अमरता पाता है और मृत्यु तथा जन्म को छोड़ देता है।

श्लोक 23 (14.36.23)

भूतभव्यभविष्यादिधर्मकामार्थनिश्चयम् । सिद्धसङ्घपरिज्ञातं पुराकल्पं सनातनम् ॥

bhūtabhavyabhaviṣyādidharmakāmārthaniścayam | siddhasaṅghaparijñātaṃ purākalpaṃ sanātanam

यह भूत, भविष्य और आगे आने वाले के विषय में तथा धर्म, काम और अर्थ के विषय में निश्चय कराने वाला है; सिद्धों के समुदाय ने इसे जाना है, यह प्राचीन और सनातन है।

श्लोक 24 (14.36.24)

प्रवक्ष्येऽहं महाप्राज्ञ पदमुत्तममद्य ते । बुद्ध्वा यदिह संसिद्धा भवन्तीह मनीषिणः ॥

pravakṣye'haṃ mahāprājña padamuttamamadya te | buddhvā yadiha saṃsiddhā bhavantīha manīṣiṇaḥ

हे महाप्राज्ञ, अब मैं तुम्हें वह परम पद बताऊँगा, जिसे जानकर यहाँ के मनीषी सिद्ध हो जाते हैं।

श्लोक 25 (14.36.25)

उपगम्यर्षयः पूर्वं जिज्ञासन्तः परस्परम् । प्रजापतिभरद्वाजौ गौतमो भार्गवस्तथा ॥

upagamyarṣayaḥ pūrvaṃ jijñāsantaḥ parasparam | prajāpatibharadvājau gautamo bhārgavastathā

पूर्वकाल में ऋषि एक-दूसरे से जानने की इच्छा से प्रजापति, भरद्वाज, गौतम और भार्गव के पास गए,

श्लोक 26 (14.36.26)

वसिष्ठः कश्यपश्चैव विश्वामित्रोऽत्रिरेव च । मार्गान्सर्वान्परिक्रम्य परिश्रान्तः स्वकर्मभिः ॥

vasiṣṭhaḥ kaśyapaścaiva viśvāmitro'trireva ca | mārgānsarvānparikramya pariśrāntaḥ svakarmabhiḥ

और वसिष्ठ, कश्यप, विश्वामित्र और अत्रि भी। सब मार्गों पर घूम चुकने के बाद वे अपने कर्मों से थक गए थे।

श्लोक 27 (14.36.27)

ऋषिमाङ्गिरसं वृद्धं पुरस्कृत्य तु ते द्विजाः । ददृशुर्ब्रह्मभवने ब्रह्माणं वीतकल्मषम् ॥

ṛṣimāṅgirasaṃ vṛddhaṃ puraskṛtya tu te dvijāḥ | dadṛśurbrahmabhavane brahmāṇaṃ vītakalmaṣam

उन ब्राह्मणों ने अंगिरा के वंश के वृद्ध ऋषि को आगे करके ब्रह्मलोक के भवन में निष्पाप ब्रह्मा को देखा।

श्लोक 28 (14.36.28)

तं प्रणम्य महात्मानं सुखासीनं महर्षयः । पप्रच्छुर्विनयोपेता नैःश्रेयसमिदं परम् ॥

taṃ praṇamya mahātmānaṃ sukhāsīnaṃ maharṣayaḥ | papracchurvinayopetā naiḥśreyasamidaṃ param

सुख से बैठे उन महात्मा को प्रणाम करके महर्षियों ने विनयपूर्वक यह परम कल्याण-विषयक प्रश्न पूछा।

ऋषय ऊचुः

श्लोक 29 (14.36.29)

कथं कर्म कृतं साधु कथं मुच्येत किल्बिषात् । के नो मार्गाः शिवाश्च स्युः किं सत्यं किं च दुष्कृतं ॥

kathaṃ karma kṛtaṃ sādhu kathaṃ mucyeta kilbiṣāt | ke no mārgāḥ śivāśca syuḥ kiṃ satyaṃ kiṃ ca duṣkṛtaṃ

"कर्म कैसे उत्तम रीति से किया जाए? मनुष्य पाप से कैसे छूटे? हमारे लिए कौन-से मार्ग कल्याणकारी हैं, सत्य क्या है और दुष्कृत क्या है?

श्लोक 30 (14.36.30)

कौ चोभौ कर्मणां मार्गौ प्राप्नुयुर्दक्षिणोत्तरौ । निरयं चापवर्गं च भूतानां प्रभवाप्ययौ ॥

kau cobhau karmaṇāṃ mārgau prāpnuyurdakṣiṇottarau | nirayaṃ cāpavargaṃ ca bhūtānāṃ prabhavāpyayau

कर्मों के वे दो मार्ग कौन-से हैं, दक्षिण और उत्तर? कौन नरक की ओर ले जाते हैं और कौन मोक्ष की ओर, तथा प्राणियों की उत्पत्ति और लय क्या हैं?"

गुरुरुवाच

श्लोक 31 (14.36.31)

इत्युक्तः स मुनिश्रेष्ठैर्यदाह प्रपितामहः । तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणु शिष्य यथागमम् ॥

ityuktaḥ sa muniśreṣṭhairyadāha prapitāmahaḥ | tatte'haṃ sampravakṣyāmi śṛṇu śiṣya yathāgamam

श्रेष्ठ मुनियों के ऐसा पूछने पर प्रपितामह ब्रह्मा ने जो कहा, वही मैं तुम्हें परम्परा के अनुसार बताऊँगा, हे शिष्य, सुनो।

ब्रह्मोवाच

श्लोक 32 (14.36.32)

सत्याद्भूतानि जातानि स्थावराणि चराणि च । तपसा तानि जीवन्ति जीवितं तद्धि सुव्रतम् । स्वां योनिं पुनरागम्य वर्तते स्वेन कर्मणा ॥

satyādbhūtāni jātāni sthāvarāṇi carāṇi ca | tapasā tāni jīvanti jīvitaṃ taddhi suvratam | svāṃ yoniṃ punarāgamya vartate svena karmaṇā

सत्य से चर और अचर प्राणी उत्पन्न हुए; हे सुव्रत, तप से वे जीते हैं, क्योंकि वही जीवन है। अपने उद्गम में लौटकर वे अपने कर्म के अनुसार चलते रहते हैं।

श्लोक 33 (14.36.33)

सत्यं हि गुणसंयुक्तं नियतं पञ्चलक्षणम् ॥

satyaṃ hi guṇasaṃyuktaṃ niyataṃ pañcalakṣaṇam

सत्य गुणों से युक्त है, स्थिर है और पाँच लक्षणों वाला है।

श्लोक 34 (14.36.34)

ब्रह्म सत्यं तपः सत्यं सत्यं चैव प्रजापतिः । सत्याद्भूतानि जातानि सत्यं भूतमयं जगत् ॥

brahma satyaṃ tapaḥ satyaṃ satyaṃ caiva prajāpatiḥ | satyādbhūtāni jātāni satyaṃ bhūtamayaṃ jagat

ब्रह्म सत्य है, तप सत्य है, प्रजापति भी सत्य है। सत्य से प्राणी उत्पन्न हुए हैं, और प्राणियों से बना जगत् भी सत्य है।

श्लोक 35 (14.36.35)

तस्मात्सत्याश्रया विप्रा नित्यं योगपरायणाः । अतीक्रोधसंतापा नियता धर्मसेतवः ॥

tasmātsatyāśrayā viprā nityaṃ yogaparāyaṇāḥ | atīkrodhasaṃtāpā niyatā dharmasetavaḥ

इसलिए सत्य का आश्रय लेने वाले, सदा योग में लगे, क्रोध और संताप से रहित, संयमी ब्राह्मण धर्म के सेतु हैं।

श्लोक 36 (14.36.36)

अन्योन्यनियतान्वैद्यान्धर्मसेतुप्रवर्तकान् । तानहं सम्प्रवक्ष्यामि शाश्वताँल्लोकभावनान् ॥

anyonyaniyatānvaidyāndharmasetupravartakān | tānahaṃ sampravakṣyāmi śāśvatām̐llokabhāvanān

जो विद्वान् परस्पर बँधे हुए हैं, धर्म के सेतुओं को चलाने वाले हैं, शाश्वत हैं और लोकों को धारण करने वाले हैं, उनके विषय में मैं अब कहूँगा।

श्लोक 37 (14.36.37)

चातुर्विद्यं तथा वर्णांश्चातुराश्रमिकान्पृथक् । धर्ममेकं चतुष्पादं नित्यमाहुर्मनीषिणः ॥

cāturvidyaṃ tathā varṇāṃścāturāśramikānpṛthak | dharmamekaṃ catuṣpādaṃ nityamāhurmanīṣiṇaḥ

चार विद्याएँ, चार वर्ण और चार आश्रम अलग-अलग हैं; मनीषी कहते हैं कि धर्म एक ही है, चार चरणों वाला और नित्य।

श्लोक 38 (14.36.38)

पन्थानं वः प्रवक्ष्यामि शिवं क्षेमकरं द्विजाः । नियतं ब्रह्मभावाय यातं पूर्वं मनीषिभिः ॥

panthānaṃ vaḥ pravakṣyāmi śivaṃ kṣemakaraṃ dvijāḥ | niyataṃ brahmabhāvāya yātaṃ pūrvaṃ manīṣibhiḥ

हे ब्राह्मणो, मैं तुम्हें वह मार्ग बताऊँगा जो कल्याणकारी और क्षेमकारी है, ब्रह्मभाव की प्राप्ति के लिए निश्चित है और जिस पर पूर्वकाल में मनीषी चले हैं।

श्लोक 39 (14.36.39)

गदन्तस्तु ममाद्येह पन्थानं दुर्विदं परैः । निबोधत महाभागा निखिलेन परं पदम् ॥

gadantastu mamādyeha panthānaṃ durvidaṃ paraiḥ | nibodhata mahābhāgā nikhilena paraṃ padam

आज मैं यहाँ वह मार्ग बता रहा हूँ जिसे दूसरे कठिनाई से जानते हैं; हे महाभाग लोगो, उस परम पद को पूरी तरह सुनो।

श्लोक 40 (14.36.40)

ब्रह्मचर्यमिहैवाहुराश्रमं प्रथमं पदम् । गार्हस्थ्यं तु द्वितीयं स्याद्वानप्रस्थमतः परम् । ततः परं तु विज्ञेयमध्यात्मं परमं पदम् ॥

brahmacaryamihaivāhurāśramaṃ prathamaṃ padam | gārhasthyaṃ tu dvitīyaṃ syādvānaprasthamataḥ param | tataḥ paraṃ tu vijñeyamadhyātmaṃ paramaṃ padam

वे ब्रह्मचर्य को पहला आश्रम और पहला पद कहते हैं, गृहस्थ दूसरा है, उसके बाद वानप्रस्थ। उसके भी आगे अध्यात्म को परम पद जानना चाहिए।

श्लोक 41 (14.36.41)

ज्योतिराकाशमादित्यो वायुरिन्द्रः प्रजापतिः । नोपैति यावदध्यात्मं तावदेतान्न पश्यति ॥

jyotirākāśamādityo vāyurindraḥ prajāpatiḥ | nopaiti yāvadadhyātmaṃ tāvadetānna paśyati

ज्योति, आकाश, सूर्य, वायु, इन्द्र और प्रजापति: जब तक मनुष्य अध्यात्म तक नहीं पहुँचता, तब तक इन्हें नहीं देखता।

श्लोक 42 (14.36.42)

तस्योपायं प्रवक्ष्यामि पुरस्तात्तं निबोधत । फलमूलानिलभुजां मुनीनां वसतां वने ॥

tasyopāyaṃ pravakṣyāmi purastāttaṃ nibodhata | phalamūlānilabhujāṃ munīnāṃ vasatāṃ vane

उसका उपाय मैं पहले बताऊँगा, उसे सुनो। जो मुनि वन में रहते हैं और फल, मूल और वायु पर जीते हैं,

श्लोक 43 (14.36.43)

वानप्रस्थं द्विजातीनां त्रयाणामुपदिश्यते । सर्वेषामेव वर्णानां गृहस्थोऽयं विशिष्यते ॥

vānaprasthaṃ dvijātīnāṃ trayāṇāmupadiśyate | sarveṣāmeva varṇānāṃ gṛhastho'yaṃ viśiṣyate

उनके लिए तीनों द्विजातियों में वानप्रस्थ बताया जाता है। सब वर्णों के लिए यह गृहस्थ-आश्रम सबसे विशिष्ट है।

श्लोक 44 (14.36.44)

श्रद्धालक्षणमित्येकं धर्मं धीराः प्रचक्षते । नैष्ठिकोऽथ यतिर्वाऽपि विरक्तो ब्रह्मदर्शनः ॥

śraddhālakṣaṇamityekaṃ dharmaṃ dhīrāḥ pracakṣate | naiṣṭhiko'tha yatirvā'pi virakto brahmadarśanaḥ

धीर लोग कहते हैं कि यह एक धर्म श्रद्धा को लक्षण वाला है। नैष्ठिक ब्रह्मचारी हो या यति, वह विरक्त और ब्रह्म को देखने वाला होता है।

श्लोक 45 (14.36.45)

इत्येवं देवयाना वः पन्थानः परिकीर्तिताः । सद्भिरध्यासिता धीरैः कर्मभिर्धर्मसेतवः ॥

ityevaṃ devayānā vaḥ panthānaḥ parikīrtitāḥ | sadbhiradhyāsitā dhīraiḥ karmabhirdharmasetavaḥ

इस प्रकार देवयान के मार्ग तुम्हें बताए गए, जिन पर धीर सज्जन अपने कर्मों से चलते हैं और जो धर्म के सेतु हैं।

श्लोक 46 (14.36.46)

एतेषां पृथगध्यास्ते यो धर्मं संशितव्रतः । कालात्पश्यति भूतानां सदैव प्रभवाप्ययौ ॥

eteṣāṃ pṛthagadhyāste yo dharmaṃ saṃśitavrataḥ | kālātpaśyati bhūtānāṃ sadaiva prabhavāpyayau

जो दृढ़ व्रत वाला इनमें से प्रत्येक के धर्म का अलग-अलग पालन करता है, वह समय आने पर प्राणियों की उत्पत्ति और लय को सदा देखता है।

श्लोक 47 (14.36.47)

अतस्तत्त्वानि वक्ष्यामि याथातथ्येन हेतुना । विषयस्थानि सर्वाणि वर्तमानानि भागशः ॥

atastattvāni vakṣyāmi yāthātathyena hetunā | viṣayasthāni sarvāṇi vartamānāni bhāgaśaḥ

अब मैं तुम्हें तत्त्व यथार्थ रूप में और कारण सहित बताऊँगा, जो सब विषयों में स्थित हैं और अपने-अपने भाग में विद्यमान हैं।

श्लोक 48 (14.36.48)

महानात्मा तथाऽव्यक्तमहंकारस्तथैव च । इन्द्रियाणि दशैकं च महाभूतानि पञ्च च ॥

mahānātmā tathā'vyaktamahaṃkārastathaiva ca | indriyāṇi daśaikaṃ ca mahābhūtāni pañca ca

महान् आत्मा, अव्यक्त और अहंकार; दस इन्द्रियाँ और एक (मन); और पाँच महाभूत।

श्लोक 49 (14.36.49)

विशेषाः पञ्चभूतानामित्येषा वैदिकी श्रुतिः । चतुर्विंशतिरेषा वस्तत्वानां परिकीर्तिता ॥

viśeṣāḥ pañcabhūtānāmityeṣā vaidikī śrutiḥ | caturviṃśatireṣā vastatvānāṃ parikīrtitā

और पाँच भूतों के विशेष: ऐसी वैदिक श्रुति है। इस प्रकार तुम्हें चौबीस तत्त्व बताए गए हैं।

श्लोक 50 (14.36.50)

तत्वानामथ यो वेद सर्वेषां प्रभवाप्ययौ । स धीरः सर्वभूतेषु न मोहमधिगच्छति ॥

tatvānāmatha yo veda sarveṣāṃ prabhavāpyayau | sa dhīraḥ sarvabhūteṣu na mohamadhigacchati

जो धीर पुरुष सब तत्त्वों की उत्पत्ति और लय को जानता है, वह किसी भी प्राणी के विषय में मोह को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 51 (14.36.51)

तत्त्वानि यो वेदयते यथातथं । गुणांश्च सर्वानखिलाश्च देवताः । विधूतपाप्मा प्रविमुच्य बन्धनं । स सर्वलोकानमलान्समश्नुते ॥

tattvāni yo vedayate yathātathaṃ | guṇāṃśca sarvānakhilāśca devatāḥ | vidhūtapāpmā pravimucya bandhanaṃ | sa sarvalokānamalānsamaśnute

जो तत्त्वों को, सब गुणों को और सब देवताओं को यथार्थ रूप में जानता है, वह पाप को झाड़कर और बन्धन से छूटकर सब निर्मल लोकों को पाता है।

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