आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 35
ब्राह्मणी का प्रश्न: आत्मा कैसे जाना जाए
ब्राह्मणी कहती है कि यह तत्त्व छोटी या असंस्कृत बुद्धि से नहीं जाना जा सकता, और वह उसे पाने का उपाय पूछती है। ब्राह्मण बताता है कि अरणी ब्राह्मणी है, ऊपर की अरणी गुरु है और उनके मथने से ज्ञान की अग्नि उत्पन्न होती है; क्षेत्रज्ञ का न कोई लिङ्ग है न गुण, और उसे जानने का उपाय क्या है। अन्त में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वह ब्राह्मण उनका मन है, ब्राह्मणी उनकी बुद्धि है, और जिसे क्षेत्रज्ञ कहा गया वह स्वयं वही हैं।
ब्राह्मण्युवाच
श्लोक 1 (14.35.1)
नेदमल्पात्मना शक्यं वेदितुं वाऽकृतात्मना । बहु चाल्पं च संक्षिप्तं विस्तृतं च मतं मम ॥
nedamalpātmanā śakyaṃ vedituṃ vā'kṛtātmanā | bahu cālpaṃ ca saṃkṣiptaṃ vistṛtaṃ ca mataṃ mama
इसे छोटे मन वाला या असंस्कृत आत्मा वाला व्यक्ति नहीं जान सकता। मुझे तो यह एक साथ बहुत भी लगता है और थोड़ा भी, संक्षिप्त भी और विस्तृत भी।
श्लोक 2 (14.35.2)
उपायं तं मम ब्रूहि येनैषा लभ्यते मतिः । तन्मन्ये कारणं कर्म यत एषा प्रवर्तते ॥
upāyaṃ taṃ mama brūhi yenaiṣā labhyate matiḥ | tanmanye kāraṇaṃ karma yata eṣā pravartate
मुझे वह उपाय बताइए जिससे यह बुद्धि प्राप्त होती है। मैं मानती हूँ कि जिस कर्म से यह उत्पन्न होती है, वही इसका कारण है।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 3 (14.35.3)
अरणीं ब्राह्मणीं विद्धि गुरुरस्योत्तरारणिः । तपःश्रुतेभिमथिनी ज्ञानाग्निर्जायते ततः ॥
araṇīṃ brāhmaṇīṃ viddhi gururasyottarāraṇiḥ | tapaḥśrutebhimathinī jñānāgnirjāyate tataḥ
नीचे की अरणी को ब्राह्मणी जानो और ऊपर की अरणी को उसका गुरु। तप और शास्त्र-ज्ञान ही मथना है; उसी से ज्ञान की अग्नि उत्पन्न होती है।
ब्राह्मण्युवाच
श्लोक 4 (14.35.4)
यदिदं ब्रह्मणो लिङ्गं क्षेत्रज्ञ इति संज्ञितम् । ग्रहीतुं येन यच्छक्यं लक्षणं तस्य तद्वद ॥
yadidaṃ brahmaṇo liṅgaṃ kṣetrajña iti saṃjñitam | grahītuṃ yena yacchakyaṃ lakṣaṇaṃ tasya tadvada
ब्रह्म का जो यह चिह्न 'क्षेत्रज्ञ' कहलाता है, उसे जिस लक्षण से ग्रहण किया जा सके, वह लक्षण बताइए।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 5 (14.35.5)
अलिङ्गो निर्गुणश्चैव कारणं नास्य विग्रहे । उपायमेव वक्ष्यामि येन गृह्येत भावना ॥
aliṅgo nirguṇaścaiva kāraṇaṃ nāsya vigrahe | upāyameva vakṣyāmi yena gṛhyeta bhāvanā
उसका कोई चिह्न नहीं, कोई गुण नहीं, और शरीर में उसका कोई कारण भी नहीं। मैं केवल वह उपाय बताऊँगा जिससे उसकी भावना ग्रहण की जा सके।
श्लोक 6 (14.35.6)
सम्यगप्युपदिष्टस्य ह्यमृतस्येव तृप्यसे । कर्मबुद्धिरबुद्धित्वाज्ज्ञानलिङ्गान्निपातितः ॥
samyagapyupadiṣṭasya hyamṛtasyeva tṛpyase | karmabuddhirabuddhitvājjñānaliṅgānnipātitaḥ
भली-भाँति उपदेश पाकर भी तुम मानो अमृत से तृप्त-सी हो जाती हो; समझ की कमी के कारण कर्म में लगी बुद्धि ज्ञान के चिह्न से गिरा दी गई है।
श्लोक 7 (14.35.7)
इदं कार्यमिदं नेति न मोक्षेषूपदिश्यते । पश्यतः शृण्वतो बुद्धिरात्मनैवोपजायते ॥
idaṃ kāryamidaṃ neti na mokṣeṣūpadiśyate | paśyataḥ śṛṇvato buddhirātmanaivopajāyate
'यह करना है, यह नहीं' — मोक्ष-सम्बन्धी उपदेशों में ऐसा विधान नहीं किया जाता। देखने और सुनने वाले को बुद्धि अपने आप ही उत्पन्न होती है।
श्लोक 8 (14.35.8)
यावन्त इह शक्येरंस्तावतोंऽसान्प्रकल्पयेत् । अव्यक्तान्व्यक्तरूपांश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥
yāvanta iha śakyeraṃstāvatoṃ'sānprakalpayet | avyaktānvyaktarūpāṃśca śataśo'tha sahasraśaḥ
जितने अंशों की यहाँ कल्पना की जा सके, उतने अंशों की कल्पना करे, चाहे वे अव्यक्त हों या व्यक्त रूप वाले, सैकड़ों और हज़ारों।
श्लोक 9 (14.35.9)
सर्वानुमानयुक्तांश्च सर्वान्प्रत्यक्षहेतुकान् । यतः परं न विद्येत ततोऽभ्यासे भविष्यति ॥
sarvānumānayuktāṃśca sarvānpratyakṣahetukān | yataḥ paraṃ na vidyeta tato'bhyāse bhaviṣyati
वे सब अनुमान से जुड़े हैं और सब प्रत्यक्ष को हेतु बनाकर चलते हैं। इनसे परे कुछ और जानने को नहीं रहता, इसलिए उसी से अभ्यास सिद्ध होगा।
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 10 (14.35.10)
ततस्तु तस्या ब्राह्मण्या मतिः क्षेत्रज्ञसंशये । क्षेत्रज्ञानेन परतः क्षेत्रज्ञोऽन्यः प्रवर्तते ॥
tatastu tasyā brāhmaṇyā matiḥ kṣetrajñasaṃśaye | kṣetrajñānena parataḥ kṣetrajño'nyaḥ pravartate
तब उस ब्राह्मणी की बुद्धि क्षेत्रज्ञ के विषय में संशय होने पर इस निश्चय पर पहुँची कि क्षेत्र के ज्ञान से परे एक और क्षेत्रज्ञ कार्य करता है।
अर्जुन उवाच
श्लोक 11 (14.35.11)
क्व नु सा ब्राह्मणि कृष्ण क्व चासौ ब्राह्मणर्षभः । याभ्यां सिद्धिरियं प्राप्ता तावुभौ वद मेऽच्युत ॥
kva nu sā brāhmaṇi kṛṣṇa kva cāsau brāhmaṇarṣabhaḥ | yābhyāṃ siddhiriyaṃ prāptā tāvubhau vada me'cyuta
हे कृष्ण, वह ब्राह्मणी अब कहाँ है और वह श्रेष्ठ ब्राह्मण कहाँ है, जिन्होंने यह सिद्धि पाई? हे अच्युत, मुझे उन दोनों के विषय में बताइए।
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 12 (14.35.12)
मनो मे ब्राह्मणं विद्धि बुद्धिं मे विद्धि ब्राह्मणीम् । क्षेत्रज्ञ इति यश्चोक्तः सोऽहमेव धनंजय ॥
mano me brāhmaṇaṃ viddhi buddhiṃ me viddhi brāhmaṇīm | kṣetrajña iti yaścoktaḥ so'hameva dhanaṃjaya
मेरे मन को ब्राह्मण जानो और मेरी बुद्धि को ब्राह्मणी। और जिसे क्षेत्रज्ञ कहा गया, वह मैं ही हूँ, धनंजय।