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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 34

ब्राह्मण का आत्मस्वरूप-कथन

ब्राह्मण अपनी पत्नी से कहता है कि वह वैसा नहीं है जैसा उसकी आँखें और तर्क उसे समझते हैं: वह उस आत्मा का रूप है जो सारे जगत में व्याप्त है और सब प्राणियों का अन्त करता है, जैसे अग्नि लकड़ी का। उसके लिए बुद्धि ही धन है। सभी ब्राह्मणों के लिए, हर आश्रम में, एक ही मार्ग है जो बुद्धि से तय होता है, शरीर से नहीं; शरीर तो कर्म का बन्धन है। इसलिए पत्नी को परलोक का भय नहीं करना चाहिए, और उस भाव में लगी रहकर वह उसी के आत्मस्वरूप को पाएगी।

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ब्राह्मण उवाच

श्लोक 1 (14.34.1)

नाहं तथा भीरु चरामि लोके । यथा त्वं मां तर्कयसे स्वबुद्ध्या । विप्रोऽस्मि मुक्तोऽस्मि वनेचरोऽस्मि । गृहस्थधर्मा व्रतवांस्तथाऽस्मि ॥

nāhaṃ tathā bhīru carāmi loke | yathā tvaṃ māṃ tarkayase svabuddhyā | vipro'smi mukto'smi vanecaro'smi | gṛhasthadharmā vratavāṃstathā'smi

ब्राह्मण ने कहा — हे भीरु, मैं संसार में वैसा नहीं विचरता जैसा तुम अपनी बुद्धि से मेरे बारे में अनुमान करती हो। मैं विप्र हूँ, मुक्त हूँ, वनचारी हूँ; और गृहस्थधर्म का पालन करने वाला तथा व्रतधारी भी हूँ।

श्लोक 2 (14.34.2)

नाहमस्मि यथा मां त्वं पश्यसे चक्षुषा शुभे । मया व्याप्तमिदं सर्वं यत्किञ्चिज्जगतीगतम् ॥

nāhamasmi yathā māṃ tvaṃ paśyase cakṣuṣā śubhe | mayā vyāptamidaṃ sarvaṃ yatkiñcijjagatīgatam

हे शुभे, मैं वैसा नहीं हूँ जैसा तुम मुझे आँखों से देखती हो। जो कुछ भी पृथ्वी पर है, यह सारा जगत मुझसे व्याप्त है।

श्लोक 3 (14.34.3)

ये केचिज्जन्तवो लोके जङ्गमाः स्थावराश्च ह । तेषां मामन्तकं विद्धि दारूणामिव पावकम् ॥

ye kecijjantavo loke jaṅgamāḥ sthāvarāśca ha | teṣāṃ māmantakaṃ viddhi dārūṇāmiva pāvakam

संसार में जो कोई भी चर और अचर प्राणी हैं, उन सबका अन्त करने वाला मुझे जानो, जैसे अग्नि काठ का अन्त करती है।

श्लोक 4 (14.34.4)

राज्ये पृथिव्यां सर्वस्यामथवापि त्रिविष्टपे । तथा बुद्धिरियं वेत्ति बुद्धिरेव धनं मम ॥

rājye pṛthivyāṃ sarvasyāmathavāpi triviṣṭape | tathā buddhiriyaṃ vetti buddhireva dhanaṃ mama

चाहे समस्त पृथ्वी का राज्य हो या स्वर्ग का भी, मेरी यह बुद्धि ऐसा ही जानती है: बुद्धि ही मेरा धन है।

श्लोक 5 (14.34.5)

एकः पन्था ब्राह्मणानां येन गच्छन्ति तद्विदः । गृहेषु वनवासेषु गुरुवासेषु भिक्षुषु ॥

ekaḥ panthā brāhmaṇānāṃ yena gacchanti tadvidaḥ | gṛheṣu vanavāseṣu guruvāseṣu bhikṣuṣu

ब्राह्मणों के लिए एक ही मार्ग है, जिससे उसे जानने वाले जाते हैं, चाहे वे गृहस्थों में हों, वनवासों में, गुरुकुलों में या भिक्षुओं में।

श्लोक 6 (14.34.6)

लिङ्गैर्बहुभिरव्यग्रैरेका बुद्धिरुपास्यते । नानालिङ्गाश्रमस्थानां येषां बुद्धिः शमात्मिका ॥

liṅgairbahubhiravyagrairekā buddhirupāsyate | nānāliṅgāśramasthānāṃ yeṣāṃ buddhiḥ śamātmikā

बहुत-से बाहरी चिह्नों के होते हुए भी, बिना विचलित हुए, एक ही बुद्धि की उपासना की जाती है। जो अनेक चिह्नों और आश्रमों में स्थित हैं और जिनकी बुद्धि शान्तिस्वरूप है,

श्लोक 7 (14.34.7)

ते भावमेकमायान्ति सरितः सागरं यथा । बुद्ध्याऽयं गम्यते मार्गः शरीरेण न गम्यते । आद्यन्तवन्ति कर्माणि शरीरं कर्मबन्धनम् ॥

te bhāvamekamāyānti saritaḥ sāgaraṃ yathā | buddhyā'yaṃ gamyate mārgaḥ śarīreṇa na gamyate | ādyantavanti karmāṇi śarīraṃ karmabandhanam

वे एक ही भाव को प्राप्त होते हैं, जैसे नदियाँ समुद्र को। यह मार्ग बुद्धि से तय किया जाता है, शरीर से नहीं; कर्मों का आदि और अन्त होता है, और शरीर कर्म का बन्धन है।

श्लोक 8 (14.34.8)

तस्मान्मे सुभगे नास्ति परलोककृतं भयम् । तद्भावभावनिरता ममैवात्मानमेष्यसि ॥

tasmānme subhage nāsti paralokakṛtaṃ bhayam | tadbhāvabhāvaniratā mamaivātmānameṣyasi

इसलिए, हे सुभगे, मेरे लिए परलोक से उत्पन्न कोई भय नहीं है। उस भाव की भावना में लगी रहकर तुम मेरे ही आत्मस्वरूप को प्राप्त होगी।

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