आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 33
जनक और ब्राह्मण: ममता का त्याग
ब्राह्मण अपनी पत्नी को राजा जनक और एक अतिथि ब्राह्मण की कथा सुनाता है। जनक को जब अपने राज्य से बाहर रहने की बात कही जाती है, तब वह देखता है कि कहीं भी कुछ उसका अपना नहीं है। वह बताता है कि ममता छोड़ देने के कारण सारा जगत उसके वश में है, क्योंकि वह पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश और मन में से कुछ भी अपने लिए नहीं चाहता। अन्त में अतिथि ब्राह्मण बताता है कि वह परीक्षा लेने आया धर्म है।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 1 (14.33.1)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । ब्राह्मणस्य च संवादं जनकस्य च भामिनि ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | brāhmaṇasya ca saṃvādaṃ janakasya ca bhāmini
ब्राह्मण ने कहा — इस विषय में भी लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं: हे भामिनी, एक ब्राह्मण और जनक का संवाद।
श्लोक 2 (14.33.2)
ब्राह्मणं जनको राजा सन्नं कस्मिंश्चिदागसि । विषये मे न वस्तव्यमिति शिष्ट्यर्थमब्रवीत् ॥
brāhmaṇaṃ janako rājā sannaṃ kasmiṃścidāgasi | viṣaye me na vastavyamiti śiṣṭyarthamabravīt
राजा जनक ने किसी अपराध के कारण खिन्न एक ब्राह्मण से शिक्षा देने के लिए कहा — "तुम मेरे राज्य में नहीं रह सकते।"
श्लोक 3 (14.33.3)
इत्युक्तः प्रत्युवाचाथ ब्राह्मणो राजसत्तमम् । आचक्ष्व विषयं राजन्यावांस्तव वशे स्थितः ॥
ityuktaḥ pratyuvācātha brāhmaṇo rājasattamam | ācakṣva viṣayaṃ rājanyāvāṃstava vaśe sthitaḥ
ऐसा कहे जाने पर ब्राह्मण ने उन राजश्रेष्ठ को उत्तर दिया — "हे राजन्, बताइए कि आपके अधिकार में कितना प्रदेश है।
श्लोक 4 (14.33.4)
सोऽन्यस्य विषये राज्ञो वस्तुमिच्छाम्यहं विभो । वचस्ते कर्तुमिच्छामि यथाशास्त्रं महीपते ॥
so'nyasya viṣaye rājño vastumicchāmyahaṃ vibho | vacaste kartumicchāmi yathāśāstraṃ mahīpate
मैं किसी दूसरे राजा के प्रदेश में रहना चाहता हूँ, हे विभो; हे पृथ्वीपति, मैं शास्त्र के अनुसार आपकी आज्ञा का पालन करना चाहता हूँ।"
श्लोक 5 (14.33.5)
इत्युक्तस्तु तदा राजा ब्राह्मणेन यशस्विना । मुहुरुष्णं विनिःश्वस्य न किञ्चित्प्रत्यभाषत ॥
ityuktastu tadā rājā brāhmaṇena yaśasvinā | muhuruṣṇaṃ viniḥśvasya na kiñcitpratyabhāṣata
यशस्वी ब्राह्मण के ऐसा कहने पर राजा बार-बार गरम साँसें भरता रहा और उसने कोई उत्तर नहीं दिया।
श्लोक 6 (14.33.6)
तमासीनं ध्यायमानं राजानममितौजसम् । कश्मलं सहसाऽगच्छद्भानुमन्तमिव ग्रहः ॥
tamāsīnaṃ dhyāyamānaṃ rājānamamitaujasam | kaśmalaṃ sahasā'gacchadbhānumantamiva grahaḥ
वह अपार तेज वाला राजा बैठा हुआ सोच में डूबा था कि उस पर सहसा मूर्च्छा-सी छा गई, जैसे सूर्य पर ग्रह छा जाता है।
श्लोक 7 (14.33.7)
समाश्वास्य ततो राजा विगते कश्मले तदा । ततो मुहूर्तादिव तं ब्राह्मणं वाक्यमब्रवीत् ॥
samāśvāsya tato rājā vigate kaśmale tadā | tato muhūrtādiva taṃ brāhmaṇaṃ vākyamabravīt
तब राजा ने अपने को सँभाला और मूर्च्छा के दूर हो जाने पर कुछ ही देर बाद ब्राह्मण से यह बात कही।
जनक उवाच
श्लोक 8 (14.33.8)
पितृपैतामहे राज्ये वश्ये जनपदे सति । विषयं नाधिगच्छामि विचिन्वन्पृथिवीमहम् ॥
pitṛpaitāmahe rājye vaśye janapade sati | viṣayaṃ nādhigacchāmi vicinvanpṛthivīmaham
जनक ने कहा — पिता-पितामह का राज्य मेरा है और जनपद मेरे वश में है, फिर भी इस सारी पृथ्वी में खोजते हुए मुझे अपना कोई प्रदेश नहीं मिला।
श्लोक 9 (14.33.9)
नाध्यगच्छं यदा पृथ्व्यां मिथिला मार्गिता मया । नाध्यगच्छं यदा तस्यां स्वप्रजा मार्गिता मया ॥
nādhyagacchaṃ yadā pṛthvyāṃ mithilā mārgitā mayā | nādhyagacchaṃ yadā tasyāṃ svaprajā mārgitā mayā
जब पृथ्वी में नहीं मिला तो मैंने मिथिला में खोजा; जब वहाँ भी नहीं मिला तो अपनी प्रजा में खोजा।
श्लोक 10 (14.33.10)
नाध्यगच्छं यदा तस्यां तदा मे कश्मलोऽभवत् । ततो मे कश्मलस्यान्ते मतिः पुनरुपस्थिता ॥
nādhyagacchaṃ yadā tasyāṃ tadā me kaśmalo'bhavat | tato me kaśmalasyānte matiḥ punarupasthitā
जब उनमें भी नहीं मिला तो मुझ पर मूर्च्छा छा गई; फिर मूर्च्छा के अन्त में मुझे बुद्धि लौट आई।
श्लोक 11 (14.33.11)
तदा न विषयं मन्ये सर्वो वा विषयो मम । आत्माऽपि चायं न मम सर्वा वा पृथिवी मम ॥
tadā na viṣayaṃ manye sarvo vā viṣayo mama | ātmā'pi cāyaṃ na mama sarvā vā pṛthivī mama
तब मैंने सोचा — या तो कोई प्रदेश मेरा नहीं है, या सारा प्रदेश मेरा है। यह आत्मा भी मेरा नहीं है, या फिर सारी पृथ्वी मेरी है।
श्लोक 12 (14.33.12)
यथा मम तथाऽन्येषामिति मन्ये द्विजोत्तम । उष्यतां यावदुत्साहो भुज्यतां यावदिष्यते ॥
yathā mama tathā'nyeṣāmiti manye dvijottama | uṣyatāṃ yāvadutsāho bhujyatāṃ yāvadiṣyate
जैसा मेरे लिए है वैसा ही दूसरों के लिए है, हे द्विजोत्तम, ऐसा मैं मानता हूँ। जब तक आपकी इच्छा हो ठहरिए और जब तक आपकी रुचि हो भोग कीजिए।"
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 13 (14.33.13)
पितृपैतामहे राज्ये वश्ये जनपदे सति । ब्रूहि कां मतिमास्थाय ममत्वं वर्जितं त्वया ॥
pitṛpaitāmahe rājye vaśye janapade sati | brūhi kāṃ matimāsthāya mamatvaṃ varjitaṃ tvayā
ब्राह्मण ने कहा — पिता-पितामह का राज्य आपका है और जनपद आपके वश में है; फिर बताइए, किस बुद्धि का आश्रय लेकर आपने ममता का त्याग किया है?
श्लोक 14 (14.33.14)
कां वै बुद्धिं समाश्रित्य सर्वो वै विषयस्तव । नावैषि विषयं येन सर्वो वा विषयस्तव ॥
kāṃ vai buddhiṃ samāśritya sarvo vai viṣayastava | nāvaiṣi viṣayaṃ yena sarvo vā viṣayastava
किस बुद्धि का आश्रय लेकर सारा प्रदेश आपका है? वह बुद्धि बताइए, जिससे आप किसी प्रदेश को अपना नहीं मानते और फिर भी सारा प्रदेश आपका है।
जनक उवाच
श्लोक 15 (14.33.15)
अन्तवन्त इहारम्भा विदिताः सर्वकर्मसु । नाध्यगच्छमहं तस्मान्ममेदमिति यद्भवेत् ॥
antavanta ihārambhā viditāḥ sarvakarmasu | nādhyagacchamahaṃ tasmānmamedamiti yadbhavet
जनक ने कहा — मैंने जाना है कि सब कर्मों में सभी आरम्भ अन्तवाले हैं; इसलिए मुझे कोई ऐसी वस्तु नहीं मिली जिसे मैं "यह मेरी है" कह सकूँ।
श्लोक 16 (14.33.16)
कस्येदमिति कस्य स्वमिति वेदवचस्तथा । नाध्यगच्छमहं बुद्ध्या ममेदमिति यद्भवेत् ॥
kasyedamiti kasya svamiti vedavacastathā | nādhyagacchamahaṃ buddhyā mamedamiti yadbhavet
"यह किसका है? यह किसकी सम्पत्ति है?" — वेद का वचन भी यही है। अपनी बुद्धि से मैंने ऐसी कोई वस्तु नहीं पाई जिसे "यह मेरी है" कह सकूँ।
श्लोक 17 (14.33.17)
एतां बुद्धिं समाश्रित्य ममत्वं वर्जितं मया । शृणु बुद्धिं च यां ज्ञात्वा सर्वत्र विषयो मम ॥
etāṃ buddhiṃ samāśritya mamatvaṃ varjitaṃ mayā | śṛṇu buddhiṃ ca yāṃ jñātvā sarvatra viṣayo mama
इसी बुद्धि का आश्रय लेकर मैंने ममता को त्याग दिया है। अब वह बुद्धि सुनिए, जिसे जानकर सारा प्रदेश मेरा हो जाता है।
श्लोक 18 (14.33.18)
नाहमात्मार्थमिच्छामि गन्धान्घ्राणगतानपि । तस्मान्मे निर्जिता भूमिर्वशे तिष्ठति नित्यदा ॥
nāhamātmārthamicchāmi gandhānghrāṇagatānapi | tasmānme nirjitā bhūmirvaśe tiṣṭhati nityadā
मैं नाक तक पहुँचे हुए गन्धों को भी अपने लिए नहीं चाहता; इसलिए पृथ्वी मेरे द्वारा जीती हुई है और सदा मेरे वश में रहती है।
श्लोक 19 (14.33.19)
नाहमात्मार्थमिच्छामि रसानास्येऽपि वर्ततः । आपो मे निर्जितास्तस्माद्वशे तिष्ठन्ति नित्यदा ॥
nāhamātmārthamicchāmi rasānāsye'pi vartataḥ | āpo me nirjitāstasmādvaśe tiṣṭhanti nityadā
मैं मुख में स्थित रसों को अपने लिए नहीं चाहता; इसलिए जल मेरे द्वारा जीते हुए हैं और सदा मेरे वश में रहते हैं।
श्लोक 20 (14.33.20)
नाहमात्मार्थमिच्छामि रूपं ज्योतिश्च चक्षुषः । तस्मान्मे निर्जितं ज्योतिर्वशे तिष्ठति नित्यदा ॥
nāhamātmārthamicchāmi rūpaṃ jyotiśca cakṣuṣaḥ | tasmānme nirjitaṃ jyotirvaśe tiṣṭhati nityadā
मैं रूप और नेत्र के प्रकाश को अपने लिए नहीं चाहता; इसलिए तेज मेरे द्वारा जीता हुआ है और सदा मेरे वश में रहता है।
श्लोक 21 (14.33.21)
नाहमात्मार्थमिच्छामि स्पर्शांस्त्वचि गताश्च ये । तस्मान्मे निर्जितो वायुर्वशे तिष्ठति नित्यदा ॥
nāhamātmārthamicchāmi sparśāṃstvaci gatāśca ye | tasmānme nirjito vāyurvaśe tiṣṭhati nityadā
मैं त्वचा में स्थित स्पर्शों को अपने लिए नहीं चाहता; इसलिए वायु मेरे द्वारा जीती हुई है और सदा मेरे वश में रहती है।
श्लोक 22 (14.33.22)
नाहमात्मार्थमिच्छामि शब्दाञ्श्रोत्रगतानपि । आकाशं मे जितं तस्माद्वशे तिष्ठति नित्यदा ॥
nāhamātmārthamicchāmi śabdāñśrotragatānapi | ākāśaṃ me jitaṃ tasmādvaśe tiṣṭhati nityadā
मैं कान तक पहुँचे हुए शब्दों को भी अपने लिए नहीं चाहता; इसलिए आकाश मेरे द्वारा जीता हुआ है और सदा मेरे वश में रहता है।
श्लोक 23 (14.33.23)
नाहमात्मार्थमिच्छामि मनो नित्यं मनोन्तरे । मनो मे निर्जितं तस्माद्वशे तिष्ठति नित्यदा ॥
nāhamātmārthamicchāmi mano nityaṃ manontare | mano me nirjitaṃ tasmādvaśe tiṣṭhati nityadā
मैं भीतर सदा रहने वाले मन को अपने लिए नहीं चाहता; इसलिए मन मेरे द्वारा जीता हुआ है और सदा मेरे वश में रहता है।
श्लोक 24 (14.33.24)
देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च भूतेभ्योऽतिथिभिः सह । इत्यर्थं सर्व एवेति समारम्भा भवन्ति वै ॥
devebhyaśca pitṛbhyaśca bhūtebhyo'tithibhiḥ saha | ityarthaṃ sarva eveti samārambhā bhavanti vai
देवताओं, पितरों, भूतों और अतिथियों के लिए ही ये सब आरम्भ हुआ करते हैं।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 25 (14.33.25)
ततः प्रहस्य जनकं ब्राह्मणः पुनरब्रवीत् । त्वज्जिज्ञासार्थमद्येह विद्धि मां धर्ममागतम् ॥
tataḥ prahasya janakaṃ brāhmaṇaḥ punarabravīt | tvajjijñāsārthamadyeha viddhi māṃ dharmamāgatam
तब ब्राह्मण ने हँसकर जनक से फिर कहा — "जान लो कि मैं तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए यहाँ धर्म के रूप में आया हूँ।
श्लोक 26 (14.33.26)
त्वमस्य ब्रह्मनाभस्य दुर्वारस्यानिवर्तिनः । सत्वनेमिनिरुद्धस्य चक्रस्यैकः प्रवर्तकः ॥
tvamasya brahmanābhasya durvārasyānivartinaḥ | satvaneminiruddhasya cakrasyaikaḥ pravartakaḥ
ब्रह्म जिसकी नाभि है, जिसे रोकना कठिन है, जो कभी पीछे नहीं लौटता और जो सत्त्वरूपी नेमि से बँधा है, इस चक्र को चलाने वाले एकमात्र तुम्हीं हो।"