आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 32
नौ शत्रु और लोभ पर अम्बरीष की गाथाएँ
ब्राह्मण प्रकृति के तीनों गुणों के अनुसार संसार के नौ शत्रु गिनाता है और कहता है कि धैर्यवान, शान्त पुरुष बाण-समूहों से उन्हें काट डालता है। फिर वह राजा अम्बरीष की गाथाएँ सुनाता है, जिन्होंने सब दोषों को जीत लिया, केवल लोभ बचा था। लोभ से तृष्णा और चिन्ता उपजती है और मनुष्य बार-बार जन्म-मृत्यु में बँधता है। जो उसे रोक लेता है, उसे आत्मा में ही सच्चा राज्य मिलता है।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 1 (14.32.1)
त्रयो वै रिपवो लोके नवधा गुणतः स्मृताः । हर्षः स्तंभोऽतिमानश्च त्रयस्ते सात्विका गुणाः ॥
trayo vai ripavo loke navadhā guṇataḥ smṛtāḥ | harṣaḥ staṃbho'timānaśca trayaste sātvikā guṇāḥ
ब्राह्मण ने कहा — संसार में तीन शत्रु हैं, जो गुणों के अनुसार नौ माने गए हैं। हर्ष, स्तम्भ (जड़ता) और अतिमान: ये तीन सात्त्विक गुण हैं।
श्लोक 2 (14.32.2)
शोकः क्रोधाभिसंरम्भो राजसास्ते गुणाः स्मृताः । स्वप्नस्तन्द्रा च मोहश्च त्रयस्ते तामसा गुणाः ॥
śokaḥ krodhābhisaṃrambho rājasāste guṇāḥ smṛtāḥ | svapnastandrā ca mohaśca trayaste tāmasā guṇāḥ
शोक, क्रोध और तीव्र उद्वेग: ये राजस गुण कहे गए हैं। निद्रा, तन्द्रा और मोह: ये तीन तामस गुण हैं।
श्लोक 3 (14.32.3)
एतान्निकृत्य धृतिमान्बाणसङ्घैरतन्द्रितः । जेतुं परानुत्सहते प्रशान्तात्मा जितेन्द्रियः ॥
etānnikṛtya dhṛtimānbāṇasaṅghairatandritaḥ | jetuṃ parānutsahate praśāntātmā jitendriyaḥ
धैर्यवान, आलस्यरहित, शान्तचित्त और जितेन्द्रिय पुरुष बाणों के समूहों से इन्हें काटकर दूसरों को जीतने का उत्साह कर सकता है।
श्लोक 4 (14.32.4)
अत्र गाथाः कीर्तयन्ति पुराकल्पविदो जनाः । अम्बरीषेण या गीता राज्ञा राज्यं प्रशासता ॥
atra gāthāḥ kīrtayanti purākalpavido janāḥ | ambarīṣeṇa yā gītā rājñā rājyaṃ praśāsatā
इस विषय में पुराने कल्पों को जानने वाले लोग वे गाथाएँ गाते हैं जो राजा अम्बरीष ने राज्य करते हुए गाई थीं।
श्लोक 5 (14.32.5)
समुदीर्णेषु दोषेषु बाध्यमानेषु साधुषु । जग्राह तरसा राज्यमम्बरीष इति श्रुतिः ॥
samudīrṇeṣu doṣeṣu bādhyamāneṣu sādhuṣu | jagrāha tarasā rājyamambarīṣa iti śrutiḥ
जब दोष बहुत बढ़ गए और सज्जन पीड़ित होने लगे, तब अम्बरीष ने बलपूर्वक राज्य ग्रहण किया, ऐसा सुना जाता है।
श्लोक 6 (14.32.6)
स निगृह्यात्मनो दोषान्साधून्समभिपूज्य च । जगाम महतीं सिद्धिं गाथाश्चेमा जगाद ह ॥
sa nigṛhyātmano doṣānsādhūnsamabhipūjya ca | jagāma mahatīṃ siddhiṃ gāthāścemā jagāda ha
अपने भीतर के दोषों को वश में करके और सज्जनों का आदर करके वह महान सिद्धि को प्राप्त हुआ और उसने ये गाथाएँ गाईं —
अम्बरीष उवाच
श्लोक 7 (14.32.7)
भूयिष्ठं विजिता दोषा निहताः सर्वशत्रवः । एको दोषो वरिष्ठश्च वध्यः स न हतो मया ॥
bhūyiṣṭhaṃ vijitā doṣā nihatāḥ sarvaśatravaḥ | eko doṣo variṣṭhaśca vadhyaḥ sa na hato mayā
"अधिकांश दोष मैंने जीत लिए हैं और सब शत्रु मार डाले हैं। एक दोष, जो सबसे प्रबल है और जिसका वध होना चाहिए, शेष है; उसे मैंने नहीं मारा है।
श्लोक 8 (14.32.8)
यत्प्रयुक्तो जन्तुरयं वैतृष्ण्यं नाधिगच्छति । तृष्णार्त इव निम्नानि धावमानो न बुध्यते ॥
yatprayukto janturayaṃ vaitṛṣṇyaṃ nādhigacchati | tṛṣṇārta iva nimnāni dhāvamāno na budhyate
जिससे प्रेरित होकर यह प्राणी कभी तृष्णा से छुटकारा नहीं पाता; प्यास से व्याकुल मनुष्य की तरह नीची जगहों की ओर दौड़ता हुआ वह समझ नहीं पाता।
श्लोक 9 (14.32.9)
अकार्यमपि येनेह प्रयुक्तः सेवते नरः । तं लोभमसिभिस्तीक्ष्णैर्निकृत्य सुखमेधते ॥
akāryamapi yeneha prayuktaḥ sevate naraḥ | taṃ lobhamasibhistīkṣṇairnikṛtya sukhamedhate
जिससे प्रेरित होकर मनुष्य न करने योग्य कर्म भी कर बैठता है, उस लोभ को तीखी तलवारों से काटकर मनुष्य सुखपूर्वक उन्नति करता है।
श्लोक 10 (14.32.10)
लोभाद्धि जायते तृष्णा ततश्चिन्ता प्रवर्तते । स लिप्समानो लभते भूयिष्ठं राजसान्गुणान् । तदवाप्तौ तु लभते भूयिष्ठं तामसान्गुणान् ॥
lobhāddhi jāyate tṛṣṇā tataścintā pravartate | sa lipsamāno labhate bhūyiṣṭhaṃ rājasānguṇān | tadavāptau tu labhate bhūyiṣṭhaṃ tāmasānguṇān
लोभ से तृष्णा उत्पन्न होती है और तृष्णा से चिन्ता बढ़ती है। पाने की इच्छा करने वाला प्रचुर राजस गुणों को पाता है, और उनके मिल जाने पर प्रचुर तामस गुणों को पाता है।
श्लोक 11 (14.32.11)
स तैर्गुणैः संहतदेहबन्धनः । पुनःपुनर्जायति कर्म चेहते । जन्मक्षये भिन्नविकीर्णदेहो । मृत्युं पुनर्गच्छति जन्मनैव ॥
sa tairguṇaiḥ saṃhatadehabandhanaḥ | punaḥpunarjāyati karma cehate | janmakṣaye bhinnavikīrṇadeho | mṛtyuṃ punargacchati janmanaiva
इन गुणों से देह के सघन बन्धन में बँधा हुआ वह बार-बार जन्म लेता है और कर्म करता है। जन्म के क्षय पर उसका शरीर टूटकर बिखर जाता है और वह फिर जन्म के द्वारा ही मृत्यु को प्राप्त होता है।
श्लोक 12 (14.32.12)
तस्मादेतं सम्यगवेक्ष्य लोभं । निगृह्य धृत्याऽऽत्मनि राज्यमिच्छेत् । एतद्राज्यं नान्यदस्तीह राज्य- । मात्मैव राजा विदितो यथावत् ॥
tasmādetaṃ samyagavekṣya lobhaṃ | nigṛhya dhṛtyā''tmani rājyamicchet | etadrājyaṃ nānyadastīha rājya- | mātmaiva rājā vidito yathāvat
इसलिए इस लोभ को भली-भाँति देखकर और धैर्य से रोककर मनुष्य को अपने भीतर ही राज्य की इच्छा करनी चाहिए। यही राज्य है, यहाँ दूसरा कोई राज्य नहीं; ठीक-ठीक जाना हुआ आत्मा ही राजा है।"
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 13 (14.32.13)
इति राज्ञाऽम्बरीषेण गाथा गीता यशस्विना । आधिराज्यं पुरस्कृत्य लोभमेकं निकृन्तता ॥
iti rājñā'mbarīṣeṇa gāthā gītā yaśasvinā | ādhirājyaṃ puraskṛtya lobhamekaṃ nikṛntatā
इस प्रकार यशस्वी राजा अम्बरीष ने आत्म-राज्य को सर्वोपरि मानकर और एकमात्र लोभ को काटते हुए ये गाथाएँ गाईं।