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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 31

अलर्क के इन्द्रियों पर बाण

पितर राम को समझाने के लिए राजर्षि अलर्क की कथा कहते हैं। पृथ्वी जीतने के बाद अलर्क मन और फिर एक-एक इन्द्रिय पर बाण चलाने का संकल्प करता है, पर हर इन्द्रिय कहती है कि बाण उसी को घायल करेंगे। तप में उसे कोई साधन नहीं मिलता, तब वह योग का आश्रय लेता है, एक ही बाण से इन्द्रियों को जीत लेता है और सिद्धि पाकर कहता है कि योग से बढ़कर कोई सुख नहीं। पितर राम से क्षत्रियों का वध छोड़ने को कहते हैं और राम घोर तप में लग जाते हैं।

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पितर ऊचुः

श्लोक 1 (14.31.1)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । श्रुत्वा च तत्तथा कार्यं भवता द्विजसत्तम ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | śrutvā ca tattathā kāryaṃ bhavatā dvijasattama

पितरों ने कहा — इस विषय में भी लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं; हे द्विजश्रेष्ठ, उसे सुनकर तुम्हें वैसा ही करना चाहिए।

श्लोक 2 (14.31.2)

अलर्को नाम राजर्षिरभवत्सुमहातपाः । धर्मज्ञः सत्यवादी च महात्मा सुदृढव्रतः ॥

alarko nāma rājarṣirabhavatsumahātapāḥ | dharmajñaḥ satyavādī ca mahātmā sudṛḍhavrataḥ

अलर्क नाम का एक राजर्षि था, महान तपस्वी, धर्म को जानने वाला, सत्यवादी, महात्मा और दृढ़ व्रत वाला।

श्लोक 3 (14.31.3)

स सागरान्तां धनुषा विनिर्जित्य महीमिमाम् । कृत्वा सुदुष्करं कर्म मनः सूक्ष्मे समादधे ॥

sa sāgarāntāṃ dhanuṣā vinirjitya mahīmimām | kṛtvā suduṣkaraṃ karma manaḥ sūkṣme samādadhe

उसने अपने धनुष से समुद्र तक की इस सारी पृथ्वी को जीतकर, अत्यन्त कठिन कार्य करके, अपना मन सूक्ष्म तत्त्व में लगा दिया।

श्लोक 4 (14.31.4)

स्थितस्य वृक्षमूलेऽथ तस्य चिन्ता बभूव ह । उत्सृज्य सुमहद्राज्यं सूक्ष्मं प्रति महामते ॥

sthitasya vṛkṣamūle'tha tasya cintā babhūva ha | utsṛjya sumahadrājyaṃ sūkṣmaṃ prati mahāmate

वृक्ष के नीचे खड़े हुए उसके मन में विचार उठा; हे महामते, अपने विशाल राज्य को छोड़कर वह सूक्ष्म तत्त्व की ओर प्रवृत्त हुआ।

अलर्क उवाच

श्लोक 5 (14.31.5)

मनसो मे बलं जातं मनो जित्वा ध्रुवो जयः । अन्यत्र बाणानस्यामि शत्रुभिः परिवारितः ॥

manaso me balaṃ jātaṃ mano jitvā dhruvo jayaḥ | anyatra bāṇānasyāmi śatrubhiḥ parivāritaḥ

अलर्क ने कहा — मुझे बल मन से मिला है; मन को जीत लेने पर विजय निश्चित है। बाण मैं कहीं और चलाऊँगा, जब शत्रु मुझे घेर लेंगे।

श्लोक 6 (14.31.6)

यदिदं चापलात्कर्म सर्वान्मर्त्यांश्चिकीर्षति । मनः प्रति सुतीक्ष्णाग्रानहं मोक्ष्यामि सायकान् ॥

yadidaṃ cāpalātkarma sarvānmartyāṃścikīrṣati | manaḥ prati sutīkṣṇāgrānahaṃ mokṣyāmi sāyakān

यह चंचलता के कारण सब मनुष्यों से कर्म कराना चाहता है, यह मन; इसी मन पर मैं अत्यन्त तीखी नोक वाले बाण छोड़ूँगा।

मन उवाच

श्लोक 7 (14.31.7)

नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथञ्चन । तवैव मर्म भेत्स्यन्ति भिन्नमर्मा मरिष्यसि ॥

neme bāṇāstariṣyanti māmalarka kathañcana | tavaiva marma bhetsyanti bhinnamarmā mariṣyasi

मन ने कहा — ये बाण मुझे कभी पार नहीं कर पाएँगे, अलर्क; वे तुम्हारे ही मर्मस्थान को भेदेंगे, और मर्म कट जाने पर तुम मर जाओगे।

श्लोक 8 (14.31.8)

अन्यान्बाणान्समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदयिष्यसि । तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमब्रवीत् ॥

anyānbāṇānsamīkṣasva yaistvaṃ māṃ sūdayiṣyasi | tacchrutvā sa vicintyātha tato vacanamabravīt

दूसरे बाण खोजो, जिनसे तुम मुझे मार सको। यह सुनकर उसने विचार किया और फिर ये वचन कहे —

अलर्क उवाच

श्लोक 9 (14.31.9)

आघ्राय सुबहून्गन्धांस्तानेव प्रतिगृध्यति । तस्माद्ध्राणं प्रति शरान्प्रतिमोक्ष्याम्यहं शितान् ॥

āghrāya subahūngandhāṃstāneva pratigṛdhyati | tasmāddhrāṇaṃ prati śarānpratimokṣyāmyahaṃ śitān

अलर्क ने कहा — बहुत-से गन्धों को सूँघकर यह उन्हीं की ओर बार-बार लालायित होती है; इसलिए मैं नाक पर तीखे बाण छोड़ूँगा।

घ्राण उवाच

श्लोक 10 (14.31.10)

नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथञ्चन । तवैव मर्म भेत्स्यन्ति भिन्नमर्मा मरिष्यसि ॥

neme bāṇāstariṣyanti māmalarka kathañcana | tavaiva marma bhetsyanti bhinnamarmā mariṣyasi

घ्राण ने कहा — ये बाण मुझे कभी पार नहीं कर पाएँगे, अलर्क; वे तुम्हारे ही मर्मस्थान को भेदेंगे, और मर्म कट जाने पर तुम मर जाओगे।

श्लोक 11 (14.31.11)

अन्यान्बाणान्समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदयिष्यसि । तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमब्रवीत् ॥

anyānbāṇānsamīkṣasva yaistvaṃ māṃ sūdayiṣyasi | tacchrutvā sa vicintyātha tato vacanamabravīt

दूसरे बाण खोजो, जिनसे तुम मुझे मार सको। यह सुनकर उसने विचार किया और फिर ये वचन कहे —

अलर्क उवाच

श्लोक 12 (14.31.12)

इयं स्वादून्रसान्भुक्त्वा तानेव प्रति गृध्यति । तस्माज्जिह्वां प्रति शरान्प्रतिमोक्ष्याम्यहं शितान् ॥

iyaṃ svādūnrasānbhuktvā tāneva prati gṛdhyati | tasmājjihvāṃ prati śarānpratimokṣyāmyahaṃ śitān

अलर्क ने कहा — मीठे रसों का स्वाद लेकर यह उन्हीं की ओर बार-बार लालायित होती है; इसलिए मैं जीभ पर तीखे बाण छोड़ूँगा।

जिह्वोवाच

श्लोक 13 (14.31.13)

नेमे वाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथञ्चन । तवैव मर्म भेत्स्यन्ति ततो हास्यसि जीवितम् ॥

neme vāṇāstariṣyanti māmalarka kathañcana | tavaiva marma bhetsyanti tato hāsyasi jīvitam

जिह्वा ने कहा — ये बाण मुझे कभी पार नहीं कर पाएँगे, अलर्क; वे तुम्हारे ही मर्मस्थान को भेदेंगे, और तब तुम प्राण खो बैठोगे।

श्लोक 14 (14.31.14)

अन्यान्वाणान्समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदयिष्यसि । तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमब्रवीत् ॥

anyānvāṇānsamīkṣasva yaistvaṃ māṃ sūdayiṣyasi | tacchrutvā sa vicintyātha tato vacanamabravīt

दूसरे बाण खोजो, जिनसे तुम मुझे मार सको। यह सुनकर उसने विचार किया और फिर ये वचन कहे —

अलर्क उवाच

श्लोक 15 (14.31.15)

स्पृष्ट्वा त्वग्विविधान्स्पर्शांस्तानेव प्रतिगृध्यति । तस्मात्त्वचं पाटयिष्ये विविधैः कङ्कपत्रिभिः ॥

spṛṣṭvā tvagvividhānsparśāṃstāneva pratigṛdhyati | tasmāttvacaṃ pāṭayiṣye vividhaiḥ kaṅkapatribhiḥ

अलर्क ने कहा — अनेक प्रकार के स्पर्शों को छूकर त्वचा उन्हीं की ओर बार-बार लालायित होती है; इसलिए मैं कंक पक्षी के पंखों वाले अनेक बाणों से त्वचा को चीर डालूँगा।

त्वगुवाच

श्लोक 16 (14.31.16)

नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथञ्चन । तवैव मर्म भेत्स्यन्ति भिन्नमर्मा मरिष्यसि ॥

neme bāṇāstariṣyanti māmalarka kathañcana | tavaiva marma bhetsyanti bhinnamarmā mariṣyasi

त्वचा ने कहा — ये बाण मुझे कभी पार नहीं कर पाएँगे, अलर्क; वे तुम्हारे ही मर्मस्थान को भेदेंगे, और मर्म कट जाने पर तुम मर जाओगे।

श्लोक 17 (14.31.17)

अन्यान्बाणान्समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदयिष्यसि । तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमब्रवीत् ॥

anyānbāṇānsamīkṣasva yaistvaṃ māṃ sūdayiṣyasi | tacchrutvā sa vicintyātha tato vacanamabravīt

दूसरे बाण खोजो, जिनसे तुम मुझे मार सको। यह सुनकर उसने विचार किया और फिर ये वचन कहे —

अलर्क उवाच

श्लोक 18 (14.31.18)

श्रुत्वा तु विविधाञ्शब्दांस्तानेव प्रतिगृध्यति । तस्माच्छ्रोत्रं प्रति शरान्प्रति मुञ्चाम्यहं शितान् ॥

śrutvā tu vividhāñśabdāṃstāneva pratigṛdhyati | tasmācchrotraṃ prati śarānprati muñcāmyahaṃ śitān

अलर्क ने कहा — अनेक प्रकार के शब्दों को सुनकर यह उन्हीं की ओर बार-बार लालायित होता है; इसलिए मैं कान पर तीखे बाण छोड़ूँगा।

श्रोत्रमुवाच

श्लोक 19 (14.31.19)

नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथञ्चन । तवैव मर्म भेत्स्यन्ति ततो हास्यसि जीवितम् ॥

neme bāṇāstariṣyanti māmalarka kathañcana | tavaiva marma bhetsyanti tato hāsyasi jīvitam

श्रोत्र ने कहा — ये बाण मुझे कभी पार नहीं कर पाएँगे, अलर्क; वे तुम्हारे ही मर्मस्थान को भेदेंगे, और तब तुम प्राण खो बैठोगे।

श्लोक 20 (14.31.20)

अन्यान्बाणान्समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदयिष्यसि । तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमब्रवीत् ॥

anyānbāṇānsamīkṣasva yaistvaṃ māṃ sūdayiṣyasi | tacchrutvā sa vicintyātha tato vacanamabravīt

दूसरे बाण खोजो, जिनसे तुम मुझे मार सको। यह सुनकर उसने विचार किया और फिर ये वचन कहे —

अलर्क उवाच

श्लोक 21 (14.31.21)

दृष्ट्वा रूपाणि बहुशस्तान्येव प्रतिगृध्यति । तस्माच्चक्षुर्हनिष्यामि निशितैः सायकैरहम् ॥

dṛṣṭvā rūpāṇi bahuśastānyeva pratigṛdhyati | tasmāccakṣurhaniṣyāmi niśitaiḥ sāyakairaham

अलर्क ने कहा — रूपों को बार-बार देखकर यह उन्हीं की ओर लालायित होती है; इसलिए मैं तेज बाणों से आँख को मारूँगा।

चक्षुरुवाच

श्लोक 22 (14.31.22)

नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथञ्चन । तवैव मर्म भेत्स्यन्ति भिन्नमर्मा मरिष्यसि ॥

neme bāṇāstariṣyanti māmalarka kathañcana | tavaiva marma bhetsyanti bhinnamarmā mariṣyasi

चक्षु ने कहा — ये बाण मुझे कभी पार नहीं कर पाएँगे, अलर्क; वे तुम्हारे ही मर्मस्थान को भेदेंगे, और मर्म कट जाने पर तुम मर जाओगे।

श्लोक 23 (14.31.23)

अन्यान्बाणान्समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदयिष्यसि । तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमब्रवीत् ॥

anyānbāṇānsamīkṣasva yaistvaṃ māṃ sūdayiṣyasi | tacchrutvā sa vicintyātha tato vacanamabravīt

दूसरे बाण खोजो, जिनसे तुम मुझे मार सको। यह सुनकर उसने विचार किया और फिर ये वचन कहे —

अलर्क उवाच

श्लोक 24 (14.31.24)

इयं निष्ठा बहुविधा प्रज्ञया त्वध्यवस्यति । तस्माद्बुद्धिं प्रति शरान्प्रतिमोक्ष्याम्यहं शितान् ॥

iyaṃ niṣṭhā bahuvidhā prajñayā tvadhyavasyati | tasmādbuddhiṃ prati śarānpratimokṣyāmyahaṃ śitān

अलर्क ने कहा — यह अनेक प्रकार का निश्चय प्रज्ञा से ही स्थिर होता है; इसलिए मैं बुद्धि पर तीखे बाण छोड़ूँगा।

बुद्धिरुवाच

श्लोक 25 (14.31.25)

नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथञ्चन । तवैव मर्म भेत्स्यन्ति भिन्नमर्मा मरिष्यसि । अन्यान्बाणान्समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदयिष्यसि ॥

neme bāṇāstariṣyanti māmalarka kathañcana | tavaiva marma bhetsyanti bhinnamarmā mariṣyasi | anyānbāṇānsamīkṣasva yaistvaṃ māṃ sūdayiṣyasi

बुद्धि ने कहा — ये बाण मुझे कभी पार नहीं कर पाएँगे, अलर्क; वे तुम्हारे ही मर्मस्थान को भेदेंगे, और मर्म कट जाने पर तुम मर जाओगे। दूसरे बाण खोजो, जिनसे तुम मुझे मार सको।

पितर ऊचुः

श्लोक 26 (14.31.26)

ततोऽलर्कस्तपो घोरं तत्रैवास्थाय दुष्करम् । नाध्यगच्छत्परं शक्त्या बाणमेतेषु सप्तसु ॥

tato'larkastapo ghoraṃ tatraivāsthāya duṣkaram | nādhyagacchatparaṃ śaktyā bāṇameteṣu saptasu

पितरों ने कहा — तब अलर्क ने वहीं घोर और अत्यन्त कठिन तप किया, किन्तु उस सामर्थ्य से इन सातों के विरुद्ध कोई श्रेष्ठ बाण नहीं पाया।

श्लोक 27 (14.31.27)

सुसमाहितचेतास्तु स ततोऽचिन्तयत्प्रभुः । स विचिन्त्य चिरं कालमलर्को द्विजसत्तम । नाध्यगच्छत्परं श्रेयो योगान्मतिमतांवरः ॥

susamāhitacetāstu sa tato'cintayatprabhuḥ | sa vicintya ciraṃ kālamalarko dvijasattama | nādhyagacchatparaṃ śreyo yogānmatimatāṃvaraḥ

एकाग्र चित्त होकर उस प्रभु ने फिर विचार किया। हे द्विजश्रेष्ठ, बहुत समय तक सोचने पर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ अलर्क ने योग से बढ़कर कोई श्रेष्ठ उपाय नहीं पाया।

श्लोक 28 (14.31.28)

स एकाग्रं मनः कृत्वा निश्चलो योगमास्थितः । इन्द्रियाणि जघानाशु बाणेनैकेन वीर्यवान् ॥

sa ekāgraṃ manaḥ kṛtvā niścalo yogamāsthitaḥ | indriyāṇi jaghānāśu bāṇenaikena vīryavān

मन को एकाग्र करके और निश्चल होकर वह योग में स्थित हुआ, और उस बलवान ने एक ही बाण से शीघ्र इन्द्रियों को मार डाला।

श्लोक 29 (14.31.29)

योगेनात्मानमाविश्य सिद्धिं परमां गतः । विस्मितश्चापि राजर्षिरिमां गाथां जगाद ह ॥

yogenātmānamāviśya siddhiṃ paramāṃ gataḥ | vismitaścāpi rājarṣirimāṃ gāthāṃ jagāda ha

योग के द्वारा आत्मा में प्रवेश करके वह परम सिद्धि को प्राप्त हुआ; और विस्मित राजर्षि ने यह गाथा गाई —

अलर्क उवाच

श्लोक 30 (14.31.30)

अहो कष्टं यदस्माभिः सर्वं बाह्यमनुष्ठितम् । भोगतृष्णासमायुक्तैः पूर्वं राज्यमुपासितम् । इति पश्चान्मया ज्ञातं योगान्नास्ति परं सुखम् ॥

aho kaṣṭaṃ yadasmābhiḥ sarvaṃ bāhyamanuṣṭhitam | bhogatṛṣṇāsamāyuktaiḥ pūrvaṃ rājyamupāsitam | iti paścānmayā jñātaṃ yogānnāsti paraṃ sukham

"हाय, कितने कष्ट की बात है कि भोग की तृष्णा से भरे हुए हमने पहले बाहर के ही सब कर्म करते हुए राज्य का सेवन किया! अब मैंने जाना है कि योग से बढ़कर कोई सुख नहीं।"

पितर ऊचुः

श्लोक 31 (14.31.31)

इति त्वमनुजानीहि राम मा क्षत्रियान्वधीः । तपो घोरमुपातिष्ठ ततः श्रेयोऽभिपत्स्यसे ॥

iti tvamanujānīhi rāma mā kṣatriyānvadhīḥ | tapo ghoramupātiṣṭha tataḥ śreyo'bhipatsyase

पितरों ने कहा — हे राम, इसे ऐसा ही समझो और क्षत्रियों का वध मत करो। घोर तप में लगो, तब तुम परम कल्याण पाओगे।

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 32 (14.31.32)

इत्युक्तः पितृभिः सोऽथ तपो घोरं समास्थितः । जामदग्न्यो महाभागे सिद्धिं च परमां गतः ॥

ityuktaḥ pitṛbhiḥ so'tha tapo ghoraṃ samāsthitaḥ | jāmadagnyo mahābhāge siddhiṃ ca paramāṃ gataḥ

ब्राह्मण ने कहा — पितरों के ऐसा कहने पर जमदग्नि-पुत्र राम घोर तप में स्थित हुए और, हे महाभागे, उन्होंने परम सिद्धि प्राप्त की।

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