आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 30
कार्तवीर्य अर्जुन और परशुराम
ब्राह्मण सहस्रबाहु राजा कार्तवीर्य अर्जुन की कथा सुनाता है, जो समुद्र पर बाण बरसाता है और समुद्र के कहने पर जमदग्नि-पुत्र राम के पास जाता है। राम उसे काट डालते हैं; उसके बन्धु जमदग्नि को मार देते हैं, तब राम इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार करते हैं। एक दिव्य वाणी और फिर ऋचीक आदि पितामह उन्हें इस संहार से लौट आने को कहते हैं।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 1 (14.30.1)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । कार्तवीर्यस्य संवादं समुद्रस्य च भामिनि ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | kārtavīryasya saṃvādaṃ samudrasya ca bhāmini
ब्राह्मण ने कहा — इस विषय में भी लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं: हे भामिनी, कार्तवीर्य और समुद्र का संवाद।
श्लोक 2 (14.30.2)
कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रवान् । येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही ॥
kārtavīryārjuno nāma rājā bāhusahasravān | yena sāgaraparyantā dhanuṣā nirjitā mahī
कार्तवीर्य अर्जुन नाम का एक सहस्रबाहु राजा था, जिसने अपने धनुष से समुद्र-पर्यन्त सारी पृथ्वी जीत ली थी।
श्लोक 3 (14.30.3)
स कदाचित्समुद्रान्ते विचरन्बलदर्पितः । अवाकिरच्छरशतैः समुद्रमिति नः श्रुतम् ॥
sa kadācitsamudrānte vicaranbaladarpitaḥ | avākiraccharaśataiḥ samudramiti naḥ śrutam
एक बार समुद्र के तट पर घूमते हुए, अपने बल के घमण्ड में उसने समुद्र पर सैकड़ों बाण बरसाए, ऐसा हमने सुना है।
श्लोक 4 (14.30.4)
तं समुद्रो नमस्कृत्य कृताञ्जलिरुवाच ह । मा मुञ्च वीर नाराचान्ब्रूहि किं करवाणि ते ॥
taṃ samudro namaskṛtya kṛtāñjaliruvāca ha | mā muñca vīra nārācānbrūhi kiṃ karavāṇi te
समुद्र ने उसे प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा — "हे वीर, बाण मत छोड़ो। बताओ, मैं तुम्हारा क्या करूँ?
समुद्र उवाच
श्लोक 5 (14.30.5)
मदाश्रयाणि भूतानि त्वद्विसृष्टैर्महेषुभिः । वध्यन्ते राजशार्दूल तेभ्यो देह्यभयं विभो ॥
madāśrayāṇi bhūtāni tvadvisṛṣṭairmaheṣubhiḥ | vadhyante rājaśārdūla tebhyo dehyabhayaṃ vibho
हे राजाओं में व्याघ्र, तुम्हारे छोड़े हुए महाबाणों से मेरे आश्रित प्राणी मारे जा रहे हैं; हे विभो, उन्हें अभय दो।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 6 (14.30.6)
मत्समो यदि संग्रामे शरासनधरः क्वचित् । विद्यते तं समाचक्ष्व यः समो मे महामृधे ॥
matsamo yadi saṃgrāme śarāsanadharaḥ kvacit | vidyate taṃ samācakṣva yaḥ samo me mahāmṛdhe
अर्जुन ने कहा — यदि कहीं युद्ध में मेरे समान धनुर्धर हो, तो मुझे उसका नाम बताओ, जो महासंग्राम में मेरी बराबरी कर सके।
समुद्र उवाच
श्लोक 7 (14.30.7)
महर्षिर्जमदग्निस्ते यदि राजन्पुरा श्रुतः । तस्य पुत्रस्तवातिथ्यं यथावत्कर्तुमर्हति ॥
maharṣirjamadagniste yadi rājanpurā śrutaḥ | tasya putrastavātithyaṃ yathāvatkartumarhati
समुद्र ने कहा — हे राजन्, यदि तुमने महर्षि जमदग्नि का नाम सुना है, तो उनका पुत्र तुम्हारा यथोचित आतिथ्य करने में समर्थ है।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 8 (14.30.8)
ततः स राजा प्रययौ क्रोधेन महता वृतः । स तमाश्रममागम्य राममेवान्वपद्यत ॥
tataḥ sa rājā prayayau krodhena mahatā vṛtaḥ | sa tamāśramamāgamya rāmamevānvapadyata
तब वह राजा बड़े क्रोध से भरकर चल पड़ा, उस आश्रम में पहुँचा और राम के ही पास गया।
श्लोक 9 (14.30.9)
स रामप्रतिकूलानि चकार सह बन्धुभिः । आयासं जनयामास रामस्य च महात्मनः ॥
sa rāmapratikūlāni cakāra saha bandhubhiḥ | āyāsaṃ janayāmāsa rāmasya ca mahātmanaḥ
उसने अपने बन्धुओं के साथ राम के प्रतिकूल सब कार्य किए और महात्मा राम को कष्ट पहुँचाया।
श्लोक 10 (14.30.10)
ततस्तेजः प्रजज्वाल रामस्यामिततेजसः । प्रदहन्रिपुसैन्यानि तदा कमललोचने ॥
tatastejaḥ prajajvāla rāmasyāmitatejasaḥ | pradahanripusainyāni tadā kamalalocane
तब अपार तेज वाले राम का तेज प्रज्वलित हो उठा और शत्रु की सेनाओं को जलाने लगा, हे कमलनयने।
श्लोक 11 (14.30.11)
ततः परशुमादाय स तं बाहुसहस्रिणम् । चिच्छेद सहसा रामो बहुशाखमिव द्रुमम् ॥
tataḥ paraśumādāya sa taṃ bāhusahasriṇam | ciccheda sahasā rāmo bahuśākhamiva drumam
तब परशु उठाकर राम ने उस सहस्रबाहु राजा को सहसा काट डाला, जैसे बहुत शाखाओं वाले वृक्ष को काटा जाता है।
श्लोक 12 (14.30.12)
तं हतं पतितं दृष्ट्वा समेताः सर्वबान्धवाः । असीनादाय शक्तीश्च भार्गवं पर्यवारयन् ॥
taṃ hataṃ patitaṃ dṛṣṭvā sametāḥ sarvabāndhavāḥ | asīnādāya śaktīśca bhārgavaṃ paryavārayan
उसे मरा हुआ और गिरा हुआ देखकर उसके सब बन्धु एकत्र हुए और तलवारें तथा शक्तियाँ लेकर भार्गव को घेरने लगे।
श्लोक 13 (14.30.13)
रामोऽपि धनुरादाय रथमारुह्य सत्वरः । विसृजञ्शरवर्षाणि व्यधमत्पार्थिवं बलम् ॥
rāmo'pi dhanurādāya rathamāruhya satvaraḥ | visṛjañśaravarṣāṇi vyadhamatpārthivaṃ balam
राम ने भी धनुष उठाया और शीघ्रता से रथ पर चढ़कर बाणों की वर्षा करते हुए राजा की सेना को नष्ट कर दिया।
श्लोक 14 (14.30.14)
ततस्तु क्षत्रियाः केचिज्जमदग्निं निहत्य च । विविशुर्गिरिदुर्गाणि मृगाः सिंहार्दिता इव ॥
tatastu kṣatriyāḥ kecijjamadagniṃ nihatya ca | viviśurgiridurgāṇi mṛgāḥ siṃhārditā iva
तब कुछ क्षत्रिय जमदग्नि को मारकर सिंहों से पीड़ित मृगों की भाँति पर्वतों के दुर्गम स्थानों में जा छिपे।
श्लोक 15 (14.30.15)
तेषां स्वविहितं कर्म तद्भयान्नानुतिष्ठताम् । प्रजा वृषलतां प्राप्ता ब्राह्मणानामदर्शनात् ॥
teṣāṃ svavihitaṃ karma tadbhayānnānutiṣṭhatām | prajā vṛṣalatāṃ prāptā brāhmaṇānāmadarśanāt
उसके भय से वे अपने विहित कर्म नहीं करते रहे, और ब्राह्मणों का दर्शन न होने से प्रजा वृषलता (शूद्रत्व) को प्राप्त हो गई।
श्लोक 16 (14.30.16)
एवं ते द्रविडाऽभीराः पुण्ड्राश्च शबरैः सह । वृषलत्वं परिगता व्युत्थानात्क्षत्रधर्मतः ॥
evaṃ te draviḍā'bhīrāḥ puṇḍrāśca śabaraiḥ saha | vṛṣalatvaṃ parigatā vyutthānātkṣatradharmataḥ
इस प्रकार द्रविड, आभीर और पुण्ड्र शबरों के साथ क्षत्रिय-धर्म से विचलित होने के कारण वृषलत्व को प्राप्त हुए।
श्लोक 17 (14.30.17)
ततश्च हतवीरासु क्षत्रियासु पुनः पुनः । द्विजैरुत्पादितं क्षत्रं जामदग्न्यो न्यकृन्तत ॥
tataśca hatavīrāsu kṣatriyāsu punaḥ punaḥ | dvijairutpāditaṃ kṣatraṃ jāmadagnyo nyakṛntata
फिर जब क्षत्राणियाँ बार-बार वीरों से हीन होती गईं, तब ब्राह्मणों द्वारा उत्पन्न किए गए क्षत्रियों को भी जमदग्नि-पुत्र ने काट डाला।
श्लोक 18 (14.30.18)
एकविंशतिमे याते रामं वागशरीरिणी । दिव्या प्रोवाच मधुरा सर्वलोकपरिश्रुता ॥
ekaviṃśatime yāte rāmaṃ vāgaśarīriṇī | divyā provāca madhurā sarvalokapariśrutā
जब इक्कीसवीं बार बीत गई, तब सब लोकों में प्रसिद्ध एक दिव्य, मधुर अशरीरी वाणी ने राम से कहा —
वागशरीरिण्युवाच
श्लोक 19 (14.30.19)
रामराम निवर्तस्व कं गुणं तात पश्यसि । क्षत्रबन्धूनिमान्प्राणैर्विप्रयोज्य पुनः पुनः ॥
rāmarāma nivartasva kaṃ guṇaṃ tāta paśyasi | kṣatrabandhūnimānprāṇairviprayojya punaḥ punaḥ
"राम, राम, लौट आओ! हे तात, इन क्षत्रिय-बन्धुओं को बार-बार प्राणों से वियुक्त करके तुम कौन-सा लाभ देखते हो?"
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 20 (14.30.20)
तथैव तं महात्मानमृचीकप्रमुखास्तदा । पितामहा महाभाग निवर्तस्वेत्यथाब्रुवन् ॥
tathaiva taṃ mahātmānamṛcīkapramukhāstadā | pitāmahā mahābhāga nivartasvetyathābruvan
इसी प्रकार ऋचीक आदि पितामहों ने उन महात्मा से कहा — "हे महाभाग, लौट आओ।"
श्लोक 21 (14.30.21)
पितुर्वधममृष्यंस्तु रामः प्रोवाच तानृषीन् । नार्हन्तीह भवन्तो मां निवारयितुमित्युत ॥
piturvadhamamṛṣyaṃstu rāmaḥ provāca tānṛṣīn | nārhantīha bhavanto māṃ nivārayitumityuta
पिता के वध को सहन न कर सकने वाले राम ने उन ऋषियों से कहा — "आप लोगों को इस विषय में मुझे रोकना उचित नहीं है।"
पितर ऊचुः
श्लोक 22 (14.30.22)
नार्हसे क्षत्रबन्धूंस्त्वं निहन्तुं जयतांवर । नेह युक्तं त्वया हन्तुं ब्राह्मणेन सता नृपान् ॥
nārhase kṣatrabandhūṃstvaṃ nihantuṃ jayatāṃvara | neha yuktaṃ tvayā hantuṃ brāhmaṇena satā nṛpān
पितरों ने कहा — हे विजेताओं में श्रेष्ठ, तुम्हें क्षत्रिय-बन्धुओं का वध नहीं करना चाहिए। तुम सज्जन ब्राह्मण हो, तुम्हारे लिए यहाँ राजाओं को मारना उचित नहीं है।