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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 29

अध्वर्यु और यति का संवाद

ब्राह्मण अपनी पत्नी से कहता है कि आत्मा गन्ध, रस, रूप और स्पर्श को ग्रहण न करते हुए भी प्रकृति के व्यापारों से कमल के पत्ते पर जल की बूँद की तरह लिप्त नहीं होती। फिर वह एक प्राचीन संवाद सुनाता है: यज्ञ में बकरे के वध की निन्दा करने वाले यति और अध्वर्यु पुरोहित का। पुरोहित यज्ञकर्म का समर्थन करता है, यति बताता है कि वास्तविक आत्मा क्षर और अक्षर दोनों भावों से परे है, और समझ जाने पर पुरोहित मोहमुक्त होकर यज्ञ करता रहता है।

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ब्राह्मण उवाच

श्लोक 1 (14.29.1)

गन्धान्न जिघ्रामि रसान्न वेद्मि । रूपं न पश्यामि न च स्पृशामि । न चापि शब्दान्विविधाञ्शृणोमि । न चापि सङ्कल्पमुपैमि कञ्चित् ॥

gandhānna jighrāmi rasānna vedmi | rūpaṃ na paśyāmi na ca spṛśāmi | na cāpi śabdānvividhāñśṛṇomi | na cāpi saṅkalpamupaimi kañcit

ब्राह्मण ने कहा — मैं गन्धों को नहीं सूँघता, रसों को नहीं जानता; रूप को नहीं देखता और स्पर्श नहीं करता; नाना प्रकार के शब्दों को भी नहीं सुनता और कोई संकल्प भी नहीं करता।

श्लोक 2 (14.29.2)

अर्थानिष्टान्कामयते स्वभावः । सर्वान्द्वेष्यान्प्रद्विषते स्वभावः । कामद्वेषावुद्भवतः स्वभावा- । त्प्राणापानौ जन्तुदेहान्निवेश्य ॥

arthāniṣṭānkāmayate svabhāvaḥ | sarvāndveṣyānpradviṣate svabhāvaḥ | kāmadveṣāvudbhavataḥ svabhāvā- | tprāṇāpānau jantudehānniveśya

प्रकृति (स्वभाव) ही मनचाहे विषयों की कामना करती है और प्रकृति ही सब अप्रिय विषयों से द्वेष करती है। प्राण और अपान को प्राणियों के शरीरों में स्थापित करके प्रकृति से ही काम और द्वेष उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 3 (14.29.3)

तेभ्यश्चान्यांस्तेषु नित्यांश्च भावा- । न्भूतात्मानं अक्षयेऽहं शरीरे । तस्मिंस्तिष्ठन्नास्मि सक्तः कथंचि- । त्कामक्रोधाभ्यां जरया मृत्युना च ॥

tebhyaścānyāṃsteṣu nityāṃśca bhāvā- | nbhūtātmānaṃ akṣaye'haṃ śarīre | tasmiṃstiṣṭhannāsmi saktaḥ kathaṃci- | tkāmakrodhābhyāṃ jarayā mṛtyunā ca

इस अक्षय शरीर में मैं इनसे भिन्न भावों को, उनमें जो स्थायी हैं उन्हें, और प्राणियों के आत्मा को देखता हूँ। उसी में स्थित रहकर मैं काम, क्रोध, जरा और मृत्यु में किसी प्रकार आसक्त नहीं होता।

श्लोक 4 (14.29.4)

अकामयानस्य च सर्वकामा- । अविद्विषाणस्य च सर्वदोषान् । न मे स्वभावेषु भवन्ति लेपा- । स्तोयस्य बिन्दोरिव पुष्करेषु ॥

akāmayānasya ca sarvakāmā- | avidviṣāṇasya ca sarvadoṣān | na me svabhāveṣu bhavanti lepā- | stoyasya bindoriva puṣkareṣu

मैं न किसी कामना की इच्छा करता हूँ, न किसी दोष से द्वेष; इसलिए स्वभावजन्य भाव मुझे लिप्त नहीं करते, जैसे कमल के पत्तों पर जल की बूँद नहीं ठहरती।

श्लोक 5 (14.29.5)

नित्यस्य चैतस्य भवन्ति नित्या । निरीक्ष्यमाणस्य बहून्स्वभावान् । न सज्जते कर्मसु भोगजालं । दिवीव सूर्यस्य मयूखजालम् ॥

nityasya caitasya bhavanti nityā | nirīkṣyamāṇasya bahūnsvabhāvān | na sajjate karmasu bhogajālaṃ | divīva sūryasya mayūkhajālam

इस नित्य आत्मा के लिए, जो अनेक स्वभावों को देखता रहता है, वे भाव स्थायी बने रहते हैं; फिर भी भोगों का जाल उसके कर्मों में नहीं चिपकता, जैसे आकाश में सूर्य की किरणों का जाल किसी से नहीं चिपकता।

श्लोक 6 (14.29.6)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । अध्वर्युयतिसंवादं तं निबोध यशस्विनि ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | adhvaryuyatisaṃvādaṃ taṃ nibodha yaśasvini

इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं: अध्वर्यु पुरोहित और यति का संवाद। हे यशस्विनी, उसे सुनो।

श्लोक 7 (14.29.7)

प्रोक्ष्यमाणं पशुं दृष्ट्वा यज्ञकर्मण्यथाब्रवीत् । यतिरध्वर्युमासीनो हिंसोऽयमिति कुत्सयन् ॥

prokṣyamāṇaṃ paśuṃ dṛṣṭvā yajñakarmaṇyathābravīt | yatiradhvaryumāsīno hiṃso'yamiti kutsayan

एक यज्ञकर्म में बलि-पशु को जल से सींचा जाता देखकर वहाँ बैठे हुए यति ने निन्दा करते हुए अध्वर्यु से कहा — "यह तो हिंसा है।"

श्लोक 8 (14.29.8)

तमध्वर्युः प्रत्युवाच नायं छागो विनश्यति । श्रेयसा योक्ष्यते जन्तुर्यज्ञाच्छ्रुतिरियं तथा ॥

tamadhvaryuḥ pratyuvāca nāyaṃ chāgo vinaśyati | śreyasā yokṣyate janturyajñācchrutiriyaṃ tathā

अध्वर्यु ने उसे उत्तर दिया — "यह बकरा नष्ट नहीं होता। यज्ञ के द्वारा यह प्राणी श्रेष्ठ गति से युक्त होगा; श्रुति का यही वचन है।

अध्वर्युरुवाच

श्लोक 9 (14.29.9)

यो ह्यस्य पार्थिवो भागः पृथिवीं स गमिष्यति । यदस्य वारिजं किञ्चिदपस्तत्सम्प्रवेक्ष्यति ॥

yo hyasya pārthivo bhāgaḥ pṛthivīṃ sa gamiṣyati | yadasya vārijaṃ kiñcidapastatsampravekṣyati

इसका जो पार्थिव अंश है वह पृथ्वी में जाएगा, और इसका जो जल से उत्पन्न अंश है वह जलों में प्रवेश करेगा।

श्लोक 10 (14.29.10)

सूर्यं चक्षुर्दिशः श्रोत्रे प्राणोऽस्य दिवमेव च । आगमे वर्तमानस्य न मे दोषोऽस्ति कश्चन ॥

sūryaṃ cakṣurdiśaḥ śrotre prāṇo'sya divameva ca | āgame vartamānasya na me doṣo'sti kaścana

इसकी आँख सूर्य को, श्रोत्र दिशाओं को और प्राण आकाश को जाएगा। जब तक मैं शास्त्र के अनुसार कर्म करता हूँ, मुझमें कोई दोष नहीं है।"

यतिरुवाच

श्लोक 11 (14.29.11)

प्राणैर्वियोगे च्छागस्य यदि श्रेयः प्रपश्यसि । छागार्थे वर्तते यज्ञो भवतः किं प्रयोजनम् ॥

prāṇairviyoge cchāgasya yadi śreyaḥ prapaśyasi | chāgārthe vartate yajño bhavataḥ kiṃ prayojanam

यति ने कहा — यदि तुम प्राणों से वियोग होने में बकरे का कल्याण देखते हो, तो यज्ञ तो बकरे के लिए ही हो रहा है; फिर तुम्हारा इसमें क्या प्रयोजन?

श्लोक 12 (14.29.12)

अनु त्वां मन्यते माता अनु त्वां मन्यते पिता । मन्त्रविज्ञानमुन्नीय परिवर्ते विशेषतः ॥

anu tvāṃ manyate mātā anu tvāṃ manyate pitā | mantravijñānamunnīya parivarte viśeṣataḥ

तुम्हारी माता तुम्हें अनुमति देती है, और पिता भी तुम्हें अनुमति देता है। मन्त्र के ज्ञान को उभारकर मैं इस विषय पर विशेष रूप से विचार करूँगा।

श्लोक 13 (14.29.13)

एवमेवानुमन्येरंस्तान्भवान्द्रष्टुमर्हति । तेषामनुमतिं श्रुत्वा शक्या कर्तुं विचारणा ॥

evamevānumanyeraṃstānbhavāndraṣṭumarhati | teṣāmanumatiṃ śrutvā śakyā kartuṃ vicāraṇā

जो इसी प्रकार अनुमति दे सकें, उनसे तुम्हें पूछना चाहिए। उनकी अनुमति सुन लेने पर इस विषय का विचार किया जा सकता है।

अध्वर्युरुवाच

श्लोक 14 (14.29.14)

प्राणा अप्यस्य च्छागस्य प्रापितास्ते स्वयोनिषु । शरीरं केवलं शिष्टं निश्चेष्टमिति मे मतिः ॥

prāṇā apyasya cchāgasya prāpitāste svayoniṣu | śarīraṃ kevalaṃ śiṣṭaṃ niśceṣṭamiti me matiḥ

अध्वर्यु ने कहा — इस बकरे के प्राण अपने-अपने मूल स्थानों को पहुँचा दिए गए हैं; केवल निश्चेष्ट शरीर शेष है, ऐसा मेरा मत है।

श्लोक 15 (14.29.15)

इन्धनस्य तु तुल्येन शरीरेण विचेतसा । हिंसा हि यष्टुकामानामिन्धनं पशुसंज्ञितम् ॥

indhanasya tu tulyena śarīreṇa vicetasā | hiṃsā hi yaṣṭukāmānāmindhanaṃ paśusaṃjñitam

चेतना से रहित शरीर अब ईंधन के समान है; यज्ञ करने की इच्छा रखने वालों के लिए हिंसा तो केवल वह ईंधन है जिसे पशु कहा जाता है।

श्लोक 16 (14.29.16)

अहिंसा सर्वधर्माणामिति वृद्धानुशासनम् । यदहिंस्रं भवेत्कर्म तत्कार्यमिति विद्महे ॥

ahiṃsā sarvadharmāṇāmiti vṛddhānuśāsanam | yadahiṃsraṃ bhavetkarma tatkāryamiti vidmahe

अहिंसा सब धर्मों में श्रेष्ठ है, ऐसा वृद्धों का उपदेश है। जो कर्म हिंसा से रहित हो वही करने योग्य है, ऐसा हम मानते हैं।

श्लोक 17 (14.29.17)

अहिंसेति प्रतिज्ञेयं यदि वक्ष्याम्यतः परम् । शक्यं बहुविधं वक्तुं भवता कार्यदूषणम् ॥

ahiṃseti pratijñeyaṃ yadi vakṣyāmyataḥ param | śakyaṃ bahuvidhaṃ vaktuṃ bhavatā kāryadūṣaṇam

यदि मैं आगे कुछ कहूँ तो "अहिंसा" ही हमारी प्रतिज्ञा के रूप में कहनी होगी; और आप इस कर्म में अनेक प्रकार के दोष बता सकते हैं।

श्लोक 18 (14.29.18)

अहिंसा सर्वभूतानां नित्यमस्मासु रोचते । प्रत्यक्षतः साधयामो न परोक्षमुपास्महे ॥

ahiṃsā sarvabhūtānāṃ nityamasmāsu rocate | pratyakṣataḥ sādhayāmo na parokṣamupāsmahe

सब प्राणियों के प्रति अहिंसा हमें सदा प्रिय है। हम उसे प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध करते हैं; अप्रत्यक्ष का सहारा नहीं लेते।

श्लोक 19 (14.29.19)

भूमेर्गन्धगुणान्भुङ्क्षे पिबस्यापोमयान्रसान् । ज्योतिषां पश्यसे रूपं स्पृशस्यनिलजान्गुणान् ॥

bhūmergandhaguṇānbhuṅkṣe pibasyāpomayānrasān | jyotiṣāṃ paśyase rūpaṃ spṛśasyanilajānguṇān

अध्वर्यु ने कहा — तुम पृथ्वी के गुण गन्धों का भोग करते हो, जलमय रसों का पान करते हो, तेज के रूप को देखते हो और वायु से उत्पन्न गुणों का स्पर्श करते हो।

श्लोक 20 (14.29.20)

शृणोष्याकाशजाञ्शब्दान्मनसा मन्यसे मतिम् । सर्वाण्येतानि भूतानि प्राणा इति च मन्यसे ॥

śṛṇoṣyākāśajāñśabdānmanasā manyase matim | sarvāṇyetāni bhūtāni prāṇā iti ca manyase

तुम आकाश से उत्पन्न शब्दों को सुनते हो और मन से अपना विचार बनाते हो। ये सभी भूत हैं, और इन्हें तुम प्राण मानते हो।

श्लोक 21 (14.29.21)

प्राणादाने निवृत्तोऽसि हिंसायां वर्तते भवान् । नास्ति चेष्टा विना हिंसां किं वा त्वं मन्यसे द्विज ॥

prāṇādāne nivṛtto'si hiṃsāyāṃ vartate bhavān | nāsti ceṣṭā vinā hiṃsāṃ kiṃ vā tvaṃ manyase dvija

तुम प्राण लेने से निवृत्त होने की बात कहते हो, फिर भी तुम हिंसा में ही लगे हो; हिंसा के बिना कोई चेष्टा होती ही नहीं। हे द्विज, तब तुम वास्तव में क्या मानते हो?

यतिरुवाच

श्लोक 22 (14.29.22)

अक्षरं च क्षरं चैव द्वैधीभावोऽयमात्मनः । अक्षरं तत्र सद्भावः स्वभावः क्षर उच्यते ॥

akṣaraṃ ca kṣaraṃ caiva dvaidhībhāvo'yamātmanaḥ | akṣaraṃ tatra sadbhāvaḥ svabhāvaḥ kṣara ucyate

यति ने कहा — अक्षर और क्षर, ये आत्मा के दो भाव हैं। इनमें अक्षर सद्भाव (यथार्थ सत्ता) है और क्षर स्वभाव कहलाता है।

श्लोक 23 (14.29.23)

प्राणो जिह्वा मनः सत्त्वं सद्भावो रजसा सह । भावैरेतैर्विमुक्तस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः ॥

prāṇo jihvā manaḥ sattvaṃ sadbhāvo rajasā saha | bhāvairetairvimuktasya nirdvandvasya nirāśiṣaḥ

प्राण, जिह्वा, मन, सत्त्व, और रजोगुण के साथ सद्भाव, इन भावों से मुक्त, द्वन्द्वों से रहित और आशाओं से रहित पुरुष के लिए,

श्लोक 24 (14.29.24)

समस्य सर्वभूतेषु निर्ममस्य जितात्मनः । समन्तात्परिमुक्तस्य न भयं विद्यते क्वचित् ॥

samasya sarvabhūteṣu nirmamasya jitātmanaḥ | samantātparimuktasya na bhayaṃ vidyate kvacit

जो सब प्राणियों में सम है, ममता से रहित है, आत्मजयी है और सब ओर से पूर्णतः मुक्त है, उसे कहीं भी भय नहीं होता।

अध्वर्युरुवाच

श्लोक 25 (14.29.25)

सद्भिरेवेह संवादः कार्यो मतिमतांवर । भवतो हि मतं श्रुत्वा प्रतिभाति मतिर्मम ॥

sadbhireveha saṃvādaḥ kāryo matimatāṃvara | bhavato hi mataṃ śrutvā pratibhāti matirmama

अध्वर्यु ने कहा — हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, संवाद सज्जनों के साथ ही करना चाहिए; आपका मत सुनकर मेरी बुद्धि जाग उठी है।

श्लोक 26 (14.29.26)

भगवन्भगवद्बुद्ध्या प्रतिबुद्धो ब्रवीम्यहम् । व्रतं मन्त्रकृतं कर्तुर्नापराधोऽस्ति मे द्विज ॥

bhagavanbhagavadbuddhyā pratibuddho bravīmyaham | vrataṃ mantrakṛtaṃ karturnāparādho'sti me dvija

भगवन्, आपकी पूज्य बुद्धि से प्रबुद्ध होकर मैं कहता हूँ — हे द्विज, मन्त्रों द्वारा विहित कर्म करने वाले मुझमें कोई अपराध नहीं है।

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 27 (14.29.27)

उपपत्त्या यतिस्तूष्णीं वर्तमानस्ततः परम् । अध्वर्युरपि निर्मोहः प्रचचार महामखे ॥

upapattyā yatistūṣṇīṃ vartamānastataḥ param | adhvaryurapi nirmohaḥ pracacāra mahāmakhe

ब्राह्मण ने कहा — उस युक्ति से सन्तुष्ट होकर यति फिर मौन रहा, और अध्वर्यु भी मोह से मुक्त होकर उस महायज्ञ में लगा रहा।

श्लोक 28 (14.29.28)

एवमेतादृशं मोक्षं सुसूक्ष्मं ब्राह्मणा विदुः । विदित्वा चानुतिष्ठन्ति क्षेत्रज्ञेनार्थदर्शिना ॥

evametādṛśaṃ mokṣaṃ susūkṣmaṃ brāhmaṇā viduḥ | viditvā cānutiṣṭhanti kṣetrajñenārthadarśinā

इस प्रकार ब्राह्मण ऐसे अत्यन्त सूक्ष्म मोक्ष को जानते हैं; और उसे जानकर वे परमार्थ को देखने वाले क्षेत्रज्ञ के साथ उसका आचरण करते हैं।

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30