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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 28

आत्मा का महावन

ब्राह्मण उस भयंकर वन का वर्णन करता है जिसमें वह कामना, शोक और मोह की बाधाएँ पार करके प्रविष्ट हुआ है, और उसकी पत्नी पूछती है कि वह कहाँ है। वह उत्तर देता है कि वह न दूर है न पास, और वहाँ न हर्ष है न शोक; फिर वह उसके सात वृक्ष, फल, अतिथि और आश्रम, ब्रह्म से निकलती नदियाँ और वहाँ रहने वाले सप्तर्षियों का वर्णन करता है। ब्राह्मण इस वन को जानते हैं और क्षेत्रज्ञ के मार्गदर्शन में उसे प्राप्त करते हैं।

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ब्राह्मण उवाच

श्लोक 1 (14.28.1)

संकल्पदंशमशकं शोकहर्षहिमातपम् । मोहान्धकारतिमिरं लोभव्याधिसरीसृपम् ॥

saṃkalpadaṃśamaśakaṃ śokaharṣahimātapam | mohāndhakāratimiraṃ lobhavyādhisarīsṛpam

उसके दंश और मच्छर संकल्प हैं, उसकी सर्दी-गर्मी शोक और हर्ष हैं, उसका अन्धकार और तिमिर मोह है, और उसके सरीसृप लोभ तथा व्याधि हैं।

श्लोक 2 (14.28.2)

विषयैकात्ययाध्वानं कामक्रोधकिरातकम् । तदतीत्य महादुर्गं प्रविष्टोऽस्मि महद्वनम् ॥

viṣayaikātyayādhvānaṃ kāmakrodhakirātakam | tadatītya mahādurgaṃ praviṣṭo'smi mahadvanam

उसका एकमात्र मार्ग विषयों से होकर जाता है और काम-क्रोध उसके किरात हैं। उस महान् दुर्गम स्थान को पार करके मैं उस महावन में प्रविष्ट हुआ हूँ।

ब्राह्मण्युवाच

श्लोक 3 (14.28.3)

क्व तद्वनं महाप्राज्ञ के वृक्षाः सरितश्च काः । कियन्तः पर्वताश्चैव कियत्यध्वनि तद्वनम् ॥

kva tadvanaṃ mahāprājña ke vṛkṣāḥ saritaśca kāḥ | kiyantaḥ parvatāścaiva kiyatyadhvani tadvanam

"हे महाप्राज्ञ, वह वन कहाँ है? वहाँ कौन-से वृक्ष हैं और कौन-सी नदियाँ? कितने पर्वत हैं, और वह वन कितनी दूर के मार्ग पर है?"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 4 (14.28.4)

नैतदस्ति पृथग्भावः किञ्चिदन्यत्ततः सुखम् । नैतदस्त्यपृथग्भावः किञ्चिद्दुःखतरं ततः ॥

naitadasti pṛthagbhāvaḥ kiñcidanyattataḥ sukham | naitadastyapṛthagbhāvaḥ kiñcidduḥkhataraṃ tataḥ

"वह पृथक्ता का विषय नहीं है; उससे बढ़कर कोई और सुखकर नहीं। वह अपृथक्ता का विषय भी नहीं है; उससे बढ़कर कोई दुःखकर नहीं।"

श्लोक 5 (14.28.5)

तस्माद्ध्रस्वतरं नास्ति न ततोऽस्ति महत्तरम् । नास्ति तस्माद्दुःखतरं नास्त्यन्यत्तत्समं सुखम् ॥

tasmāddhrasvataraṃ nāsti na tato'sti mahattaram | nāsti tasmādduḥkhataraṃ nāstyanyattatsamaṃ sukham

"उससे छोटा कुछ नहीं और उससे बड़ा भी कुछ नहीं; उससे अधिक दुःखद कुछ नहीं और उसके समान कोई और सुख नहीं।"

श्लोक 6 (14.28.6)

न तत्राविश्य शोचन्ति न प्रहृष्यन्ति च द्विजाः । न च बिभ्यति केभ्यश्चिन्नैभ्यो बिभ्यति केचन ॥

na tatrāviśya śocanti na prahṛṣyanti ca dvijāḥ | na ca bibhyati kebhyaścinnaibhyo bibhyati kecana

"उसमें प्रवेश करके द्विज न शोक करते हैं और न हर्षित होते हैं; वे किसी से नहीं डरते और कोई उनसे नहीं डरता।"

श्लोक 7 (14.28.7)

तस्मिन्वने सप्त महाद्रुमाश्च । फलानि सप्तातिथयश्च सप्त । सप्ताश्रमाः सप्त समाधयश्च । दीक्षाश्च सप्तैतदरण्यरूपम् ॥

tasminvane sapta mahādrumāśca | phalāni saptātithayaśca sapta | saptāśramāḥ sapta samādhayaśca | dīkṣāśca saptaitadaraṇyarūpam

"उस वन में सात महावृक्ष हैं, सात फल और सात अतिथि, सात आश्रम और सात समाधियाँ, तथा सात दीक्षाएँ — यही उस वन का रूप है।"

श्लोक 8 (14.28.8)

पञ्चवर्णानि दिव्यानि पुष्पाणि च फलानि च । सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद्वनम् ॥

pañcavarṇāni divyāni puṣpāṇi ca phalāni ca | sṛjantaḥ pādapāstatra vyāpya tiṣṭhanti tadvanam

"वहाँ वृक्ष पाँच रंगों के दिव्य फूल और फल उत्पन्न करते हुए उस वन में व्याप्त होकर खड़े हैं।"

श्लोक 9 (14.28.9)

सुवर्णानि द्विवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च । सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद्वनम् ॥

suvarṇāni dvivarṇāni puṣpāṇi ca phalāni ca | sṛjantaḥ pādapāstatra vyāpya tiṣṭhanti tadvanam

"वहाँ वृक्ष सुनहरे और दो रंगों वाले फूल और फल उत्पन्न करते हुए उस वन में व्याप्त होकर खड़े हैं।"

श्लोक 10 (14.28.10)

शङ्कराणि त्रिवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च । सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद्वनम् ॥

śaṅkarāṇi trivarṇāni puṣpāṇi ca phalāni ca | sṛjantaḥ pādapāstatra vyāpya tiṣṭhanti tadvanam

"वहाँ वृक्ष तीन रंगों के मंगलकारी फूल और फल उत्पन्न करते हुए उस वन में व्याप्त होकर खड़े हैं।"

श्लोक 11 (14.28.11)

सुरभीणि द्विवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च । सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद्वनम् ॥

surabhīṇi dvivarṇāni puṣpāṇi ca phalāni ca | sṛjantaḥ pādapāstatra vyāpya tiṣṭhanti tadvanam

"वहाँ वृक्ष दो रंगों के सुगन्धित फूल और फल उत्पन्न करते हुए उस वन में व्याप्त होकर खड़े हैं।"

श्लोक 12 (14.28.12)

सुरभीण्येकवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च । सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद्वनम् ॥

surabhīṇyekavarṇāni puṣpāṇi ca phalāni ca | sṛjantaḥ pādapāstatra vyāpya tiṣṭhanti tadvanam

"वहाँ वृक्ष एक रंग के सुगन्धित फूल और फल उत्पन्न करते हुए उस वन में व्याप्त होकर खड़े हैं।"

श्लोक 13 (14.28.13)

बहून्यव्यक्तवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च । विसृजन्तौ महावृक्षौ तद्वनं व्याप्य तिष्ठतः ॥

bahūnyavyaktavarṇāni puṣpāṇi ca phalāni ca | visṛjantau mahāvṛkṣau tadvanaṃ vyāpya tiṣṭhataḥ

"दो महावृक्ष अव्यक्त रंग के बहुत-से फूल और फल उत्पन्न करते हुए उस वन में व्याप्त होकर खड़े हैं।"

श्लोक 14 (14.28.14)

एको वह्निः सुमना ब्राह्मणोऽत्र । पञ्चेन्द्रियाणि समिधश्चात्र सन्ति । तेभ्यो वृक्षाः सप्त फलन्ति दीक्षा । गुणाः फलान्यतिथयः फलाशाः ॥

eko vahniḥ sumanā brāhmaṇo'tra | pañcendriyāṇi samidhaścātra santi | tebhyo vṛkṣāḥ sapta phalanti dīkṣā | guṇāḥ phalānyatithayaḥ phalāśāḥ

"यहाँ एक अग्नि है, जो सुमन ब्राह्मण है; यहाँ पाँच इन्द्रियाँ समिधाएँ हैं। उनसे सात वृक्ष दीक्षा के रूप में फलते हैं; गुण फल हैं और फल की आशा रखने वाले अतिथि हैं।"

श्लोक 15 (14.28.15)

आतिथ्यं प्रतिगृह्णन्ति तत्र सप्त महर्षयः । अर्चितेषु प्रलीनेषु तेष्वन्यद्रोचते वनम् ॥

ātithyaṃ pratigṛhṇanti tatra sapta maharṣayaḥ | arciteṣu pralīneṣu teṣvanyadrocate vanam

"वहाँ सात महर्षि आतिथ्य स्वीकार करते हैं; उनकी पूजा हो जाने पर और उनके लीन हो जाने पर कोई और ही वन मन को भाता है।"

श्लोक 16 (14.28.16)

प्रज्ञावृक्षं मोक्षफलं शान्तिच्छायासमन्वितम् । ज्ञानाश्रयं तृप्तितोयमन्तःक्षेत्रज्ञभास्करम् ॥

prajñāvṛkṣaṃ mokṣaphalaṃ śānticchāyāsamanvitam | jñānāśrayaṃ tṛptitoyamantaḥkṣetrajñabhāskaram

"वह प्रज्ञा का वृक्ष है जिसका फल मोक्ष है; वह शान्ति की छाया से युक्त है, ज्ञान उसका आश्रय है, तृप्ति उसका जल है और भीतर स्थित क्षेत्रज्ञ उसका सूर्य है।"

श्लोक 17 (14.28.17)

येऽधिगच्छन्ति तत्सन्तस्तेषां नास्ति पुनर्भवः । ऊर्ध्वं चाधश्च तिर्यक्च तस्य नान्तोऽधिगम्यते ॥

ye'dhigacchanti tatsantasteṣāṃ nāsti punarbhavaḥ | ūrdhvaṃ cādhaśca tiryakca tasya nānto'dhigamyate

"जो सज्जन उसे प्राप्त करते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। ऊपर, नीचे और तिरछे — उसका कहीं अन्त नहीं मिलता।"

श्लोक 18 (14.28.18)

सप्त स्त्रियस्तत्र चरन्ति सत्या- । स्त्ववाङ्मुखा भानुमत्यो जनित्र्यः । ऊर्ध्वं रसानाददते प्रजाभ्यः । सर्वान्यथा नित्यमनित्यता च ॥

sapta striyastatra caranti satyā- | stvavāṅmukhā bhānumatyo janitryaḥ | ūrdhvaṃ rasānādadate prajābhyaḥ | sarvānyathā nityamanityatā ca

"वहाँ सात सत्य और तेजस्विनी स्त्रियाँ नीचे की ओर मुख किए विचरती हैं, जो प्राणियों की जननी हैं। वे प्राणियों से सब रसों को ऊपर की ओर खींच लेती हैं, और अनित्यता सदा उनके साथ रहती है।"

श्लोक 19 (14.28.19)

तत्रैव प्रतितिष्ठन्ति पुनस्तत्रोदयन्ति च । सप्त सप्तर्षयः सिद्धा वसिष्ठप्रमुखैः सह ॥

tatraiva pratitiṣṭhanti punastatrodayanti ca | sapta saptarṣayaḥ siddhā vasiṣṭhapramukhaiḥ saha

"वहीं वे प्रतिष्ठित होते हैं और वहीं फिर उदित होते हैं — वसिष्ठ को प्रमुख लेकर सात सप्तर्षि सिद्धगण।"

श्लोक 20 (14.28.20)

यशो वर्चो भगश्चैव विजयः सिद्धतेजसः । एतमेवानुवर्तन्ते सप्त ज्योतींषि भास्करम् ॥

yaśo varco bhagaścaiva vijayaḥ siddhatejasaḥ | etamevānuvartante sapta jyotīṃṣi bhāskaram

"यश, वर्चस्, भग, विजय और सिद्ध तेज वाले — ये सात ज्योतियाँ एकमात्र सूर्य का ही अनुसरण करती हैं।"

श्लोक 21 (14.28.21)

ऋषयः पर्वताश्चैव सन्ति तत्र समासतः । नद्यश्च परितो वारि वहन्त्यो ब्रह्मसम्भवम् ॥

ṛṣayaḥ parvatāścaiva santi tatra samāsataḥ | nadyaśca parito vāri vahantyo brahmasambhavam

"वहाँ संक्षेप में ऋषि और पर्वत हैं, और चारों ओर नदियाँ हैं जो ब्रह्म से उत्पन्न जल बहाती हैं।"

श्लोक 22 (14.28.22)

नदीनां सङ्गमश्चैव वैताने समुपह्वरे । स्वात्मतृप्ता यतो यान्ति साक्षादेव पितामहम् ॥

nadīnāṃ saṅgamaścaiva vaitāne samupahvare | svātmatṛptā yato yānti sākṣādeva pitāmaham

"और वैतान के एकान्त स्थान पर नदियों का संगम है, जहाँ से आत्मतृप्त जन सीधे पितामह के पास जाते हैं।"

श्लोक 23 (14.28.23)

कृशाशाः सुव्रताः शान्तास्तपसा दग्धकिल्बिषाः । आत्मन्यात्मानमावेश्य ब्राह्मणास्तमुपासते ॥

kṛśāśāḥ suvratāḥ śāntāstapasā dagdhakilbiṣāḥ | ātmanyātmānamāveśya brāhmaṇāstamupāsate

"क्षीण कामनाओं वाले, दृढ़ व्रती, शान्त, तप से पाप जला चुके ब्राह्मण आत्मा में आत्मा को स्थापित करके उसकी उपासना करते हैं।"

श्लोक 24 (14.28.24)

शमिमप्यत्र शंसन्ति विद्यारण्यविदो जनाः । तदरण्यमभिप्रेत्य यथातत्वमजायत ॥

śamimapyatra śaṃsanti vidyāraṇyavido janāḥ | tadaraṇyamabhipretya yathātatvamajāyata

"विद्या-रूपी वन को जानने वाले लोग यहाँ शमी की भी चर्चा करते हैं; उसी वन को लक्ष्य करके वह यथार्थ रूप में प्रकट हुआ।"

श्लोक 25 (14.28.25)

एतदेवेदृशं पुण्यमरण्यं ब्राह्मणा विदुः । विदित्वा चानुतिष्ठन्ति क्षेत्रज्ञेनानुदर्शिना ॥

etadevedṛśaṃ puṇyamaraṇyaṃ brāhmaṇā viduḥ | viditvā cānutiṣṭhanti kṣetrajñenānudarśinā

"ब्राह्मण ऐसे ही इस पवित्र वन को जानते हैं; उसे जानकर वे क्षेत्रज्ञ के दिखाए मार्ग से उसका अनुसरण करते हैं।"

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