आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 27
हृदय में स्थित एक ही गुरु
ब्राह्मण कहता है कि गुरु, बन्धु, श्रोता और विरोधी के रूप में एक ही सत्ता हृदय में स्थित है और वह उसी के निर्देश के अनुसार बोलता है। वह बताता है कि प्रजापति ने देवताओं, सर्पों, असुरों और ऋषियों को एक ही अक्षर 'ॐ' दिया, और सबने उसे अपने स्वभाव के अनुसार समझा। फिर वह सच्चे ब्रह्मचारी का वर्णन करता है, जो ब्रह्मभूत होकर संसार में विचरता है।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 1 (14.27.1)
एकः शास्ता न द्वितीयोऽस्ति शास्ता । यो हृच्छयस्तमहमनु ब्रवीमि । तेनैव युक्तः प्रवणादिवोदकं । यथा नियुक्तोऽस्मि तथा वहामि ॥
ekaḥ śāstā na dvitīyo'sti śāstā | yo hṛcchayastamahamanu bravīmi | tenaiva yuktaḥ pravaṇādivodakaṃ | yathā niyukto'smi tathā vahāmi
शासन करने वाला एक ही है, दूसरा कोई नहीं। जो हृदय में शयन करता है, उसी के पीछे मैं बोलता हूँ। ढलान पर बहते जल की तरह उसी से जुड़ा हुआ मैं जैसे नियुक्त हूँ वैसे ही चलता हूँ।
श्लोक 2 (14.27.2)
एको गुरुर्नास्ति ततो द्वितीयो । यो हृच्छयस्तमहमनु ब्रवीमि । तेनानुशिष्टा गुरुणा सदैव । पुरा हता दानवाः सर्व एव ॥
eko gururnāsti tato dvitīyo | yo hṛcchayastamahamanu bravīmi | tenānuśiṣṭā guruṇā sadaiva | purā hatā dānavāḥ sarva eva
गुरु एक ही है, उसके सिवा दूसरा नहीं — जो हृदय में शयन करता है, उसी के पीछे मैं बोलता हूँ। उसी गुरु से सदा शिक्षित होकर पूर्वकाल में सभी दानव मारे गए।
श्लोक 3 (14.27.3)
एको बन्धुर्नास्ति ततो द्वितीयो । यो हृच्छयस्तमहमनु ब्रवीमि । तेनानुशिष्टा बान्धवा बन्धुमन्तः । सप्तर्षयः पार्थ दिवि प्रभान्ति ॥
eko bandhurnāsti tato dvitīyo | yo hṛcchayastamahamanu bravīmi | tenānuśiṣṭā bāndhavā bandhumantaḥ | saptarṣayaḥ pārtha divi prabhānti
बन्धु एक ही है, उसके सिवा दूसरा नहीं — जो हृदय में शयन करता है, उसी के पीछे मैं बोलता हूँ। हे पार्थ, उसी से शिक्षित होकर बन्धुओं से भरे-पूरे सप्तर्षि आकाश में प्रकाशित होते हैं।
श्लोक 4 (14.27.4)
एकः श्रोता नास्ति ततो द्वितीयो । यो हृच्छयस्तमहमनु ब्रवीमि । तस्मिन्गुरौ गुरुवासं निरुष्य । शक्रो गतः सर्वलोकामरत्वम् ॥
ekaḥ śrotā nāsti tato dvitīyo | yo hṛcchayastamahamanu bravīmi | tasmingurau guruvāsaṃ niruṣya | śakro gataḥ sarvalokāmaratvam
श्रोता एक ही है, उसके सिवा दूसरा नहीं — जो हृदय में शयन करता है, उसी के पीछे मैं बोलता हूँ। उसी गुरु के पास गुरुकुल-वास करके इन्द्र समस्त लोकों में अमरत्व को प्राप्त हुआ।
श्लोक 5 (14.27.5)
एको द्वेष्टा नास्ति ततो द्वितीयो । यो हृच्छयस्तमहमनु ब्रवीमि । तेनानुशिष्टा गुरुणा सदैव । लोके द्विष्टाः पन्नगाः सर्व एव ॥
eko dveṣṭā nāsti tato dvitīyo | yo hṛcchayastamahamanu bravīmi | tenānuśiṣṭā guruṇā sadaiva | loke dviṣṭāḥ pannagāḥ sarva eva
द्वेष करने वाला एक ही है, उसके सिवा दूसरा नहीं — जो हृदय में शयन करता है, उसी के पीछे मैं बोलता हूँ। उसी गुरु से सदा शिक्षित होकर सभी सर्प लोक में द्वेष के पात्र हुए।
श्लोक 6 (14.27.6)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । प्रजापतौ पन्नगानां देवर्षीणां च संविदम् ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | prajāpatau pannagānāṃ devarṣīṇāṃ ca saṃvidam
इस विषय में भी लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं — प्रजापति का सर्पों और देवर्षियों के साथ संवाद।
श्लोक 7 (14.27.7)
देवर्षयश्च नागाश्चाप्यसुराश्च प्रजापतिम् । पर्यपृच्छन्नुपासीनं श्रेयो नः प्रोच्यतामिति ॥
devarṣayaśca nāgāścāpyasurāśca prajāpatim | paryapṛcchannupāsīnaṃ śreyo naḥ procyatāmiti
देवर्षियों, नागों और असुरों ने बैठे हुए प्रजापति से पूछा — "हमारे लिए जो श्रेयस्कर है, वह बताइए।"
श्लोक 8 (14.27.8)
तेषां प्रोवाच भगवाञ्श्रेयः समनुपृच्छताम् । ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ते श्रुत्वा प्राद्रवन्दिशः ॥
teṣāṃ provāca bhagavāñśreyaḥ samanupṛcchatām | omityekākṣaraṃ brahma te śrutvā prādravandiśaḥ
भगवान् ने श्रेय पूछने वालों को उत्तर दिया — एकाक्षर ब्रह्म 'ॐ'। उसे सुनकर वे सब दिशाओं में तितर-बितर हो गए।
श्लोक 9 (14.27.9)
तेषां प्रद्रवमाणानामुपदेशं च शृण्वताम् । सर्पाणां दंशने भावः प्रवृत्तः पूर्वमेव तु ॥
teṣāṃ pradravamāṇānāmupadeśaṃ ca śṛṇvatām | sarpāṇāṃ daṃśane bhāvaḥ pravṛttaḥ pūrvameva tu
उपदेश सुनते हुए जब वे तितर-बितर हो रहे थे, तब सर्पों में सबसे पहले डसने का भाव उत्पन्न हुआ।
श्लोक 10 (14.27.10)
असुराणां प्रवृत्तस्तु दंभभावः स्वभावजः । दानं देवा व्यवसिता दममेव महर्षयः ॥
asurāṇāṃ pravṛttastu daṃbhabhāvaḥ svabhāvajaḥ | dānaṃ devā vyavasitā damameva maharṣayaḥ
असुरों में उनके स्वभाव से उत्पन्न दम्भ का भाव प्रकट हुआ; देवताओं ने दान को और महर्षियों ने दम को अपनाया।
श्लोक 11 (14.27.11)
एकं शास्तारमासाद्य शब्देनैकेन संस्कृताः । नानाव्यवसिताः सर्वे सर्पदेवर्षिदानवाः ॥
ekaṃ śāstāramāsādya śabdenaikena saṃskṛtāḥ | nānāvyavasitāḥ sarve sarpadevarṣidānavāḥ
एक ही गुरु को पाकर और एक ही शब्द से संस्कारित होकर भी सर्प, देवता, ऋषि और दानव सब अलग-अलग रूप में उसे समझकर चल पड़े।
श्लोक 12 (14.27.12)
शृणोत्ययं प्रोच्यमानं गृह्णाति च यथातथम् । पृच्छतस्तदतो भूयो गुरुरन्यो न विद्यते ॥
śṛṇotyayaṃ procyamānaṃ gṛhṇāti ca yathātatham | pṛcchatastadato bhūyo gururanyo na vidyate
मनुष्य कही जाने वाली बात को सुनता है और जैसी है वैसी ग्रहण करता है; और अधिक पूछने पर उसके सिवा कोई दूसरा गुरु नहीं है।
श्लोक 13 (14.27.13)
तस्य चानुमते कर्म ततः पश्चात्प्रवर्तते । गुरुर्बन्धुश्च शास्ता च द्वेष्टा च हृदि संश्रिताः ॥
tasya cānumate karma tataḥ paścātpravartate | gururbandhuśca śāstā ca dveṣṭā ca hṛdi saṃśritāḥ
उसकी अनुमति से ही उसके बाद कर्म प्रवृत्त होता है। गुरु, बन्धु, शास्ता और द्वेष करने वाला — सब हृदय में ही आश्रित हैं।
श्लोक 14 (14.27.14)
पापेन विचरँल्लोके पापचारी भवत्ययम् । शुभेन विचरँल्लोके शुभचारी भवत्युत ॥
pāpena vicaram̐lloke pāpacārī bhavatyayam | śubhena vicaram̐lloke śubhacārī bhavatyuta
पाप के साथ संसार में विचरने वाला पापाचारी हो जाता है, और शुभ के साथ विचरने वाला शुभाचारी हो जाता है।
श्लोक 15 (14.27.15)
कामचारी तु कामेन य इन्द्रियसुखे रतः । ब्रह्मचारी सदैवैष य इन्द्रियजये रतः ॥
kāmacārī tu kāmena ya indriyasukhe rataḥ | brahmacārī sadaivaiṣa ya indriyajaye rataḥ
जो इन्द्रियों के सुख में रमता है, वह कामना के अनुसार चलने वाला है; और जो इन्द्रियों को जीतने में रमता है, वह सदा ब्रह्मचारी है।
श्लोक 16 (14.27.16)
अपेतव्रतकर्मा तु केवलं ब्रह्मणि स्थितः । ब्रह्मभूतश्चरँल्लोके ब्रह्मचारी भवत्ययम् ॥
apetavratakarmā tu kevalaṃ brahmaṇi sthitaḥ | brahmabhūtaścaram̐lloke brahmacārī bhavatyayam
जो व्रत और कर्म छोड़कर केवल ब्रह्म में स्थित है और ब्रह्मभूत होकर संसार में विचरता है, वह ब्रह्मचारी है।
श्लोक 17 (14.27.17)
ब्रह्मैव समिधस्तस्य ब्रह्माग्निर्ब्रह्मसंस्तरः । आपो ब्रह्म गुरुर्ब्रह्म स ब्रह्मणि समाहितः ॥
brahmaiva samidhastasya brahmāgnirbrahmasaṃstaraḥ | āpo brahma gururbrahma sa brahmaṇi samāhitaḥ
उसके लिए ब्रह्म ही समिधा है, ब्रह्म ही अग्नि है, ब्रह्म ही बिछौना है; जल ब्रह्म है, गुरु ब्रह्म है — वह ब्रह्म में ही समाहित है।
श्लोक 18 (14.27.18)
एतदेवेदृशं सूक्ष्मं ब्रह्मचर्यं विदुर्बुधाः । विदित्वा चान्वपद्यन्त क्षेत्रज्ञेनानुदर्शिताः ॥
etadevedṛśaṃ sūkṣmaṃ brahmacaryaṃ vidurbudhāḥ | viditvā cānvapadyanta kṣetrajñenānudarśitāḥ
विद्वान इसी को, जैसा यह है वैसा, सूक्ष्म ब्रह्मचर्य जानते हैं; इसे जानकर वे क्षेत्रज्ञ के दिखाए मार्ग से उसे प्राप्त हुए।