आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 26
भीतरी यज्ञ के चार होता
ब्राह्मण शरीर के भीतर होने वाले चतुर्होत्र का वर्णन करता है: करण, कर्म, कर्ता और मोक्ष चार होता हैं, और इन्द्रियाँ, उनके विषय तथा जानने वाला आत्मा इनके सात-सात कारण हैं। वह चेतावनी देता है कि ममत्व खाने वाले का नाश करता है, फिर अपने योगयज्ञ का वर्णन करता है जिसमें ज्ञान ही हवि है, और अन्त में सर्वात्मा नारायण की ओर संकेत करता है।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 1 (14.26.1)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । चातुर्होत्रविधानस्य विधानमिह यादृशम् ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | cāturhotravidhānasya vidhānamiha yādṛśam
इस विषय में भी लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं — चार होताओं वाले विधान की व्यवस्था कैसी है।
श्लोक 2 (14.26.2)
तस्य सर्वस्य विधिवद्विधानमुपदेक्ष्यते । शृणु मे गदतो भद्रे रहस्यमिदमद्भुतम् ॥
tasya sarvasya vidhivadvidhānamupadekṣyate | śṛṇu me gadato bhadre rahasyamidamadbhutam
उस सबका विधिपूर्वक वर्णन किया जाएगा। हे भद्रे, मैं कहता हूँ, यह अद्भुत रहस्य सुनो।
श्लोक 3 (14.26.3)
करणं कर्म कर्ता च मोक्ष इत्येव भामिनि । चत्वार एते होतारो यैरिदं जगदावृतम् ॥
karaṇaṃ karma kartā ca mokṣa ityeva bhāmini | catvāra ete hotāro yairidaṃ jagadāvṛtam
हे भामिनी, करण, कर्म, कर्ता और मोक्ष — ये चार होता हैं, जिनसे यह सारा जगत् ढका हुआ है।
श्लोक 4 (14.26.4)
होतॄणां साधनं चैव शृणु सर्वमशेषतः । घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक्च श्रोत्रं च पञ्चमम् । मनो बुद्धिश्च सप्तैते ज्ञेयाः कारणहेतवः ॥
hotṝṇāṃ sādhanaṃ caiva śṛṇu sarvamaśeṣataḥ | ghrāṇaṃ jihvā ca cakṣuśca tvakca śrotraṃ ca pañcamam | mano buddhiśca saptaite jñeyāḥ kāraṇahetavaḥ
अब होताओं के साधन भी पूरे और बिना कुछ छोड़े सुनो — घ्राण, जिह्वा, नेत्र, त्वचा और पाँचवाँ कान, तथा मन और बुद्धि। ये सातों करण के कारण जानने चाहिए।
श्लोक 5 (14.26.5)
गन्धो रसश्च रूपं च शब्दः स्पर्शश्च पञ्चमः । मन्तव्यमवबोद्धव्यं सप्तैते कर्महेतवः ॥
gandho rasaśca rūpaṃ ca śabdaḥ sparśaśca pañcamaḥ | mantavyamavaboddhavyaṃ saptaite karmahetavaḥ
गन्ध, रस, रूप, शब्द और पाँचवाँ स्पर्श, तथा मनन करने योग्य और जानने योग्य — ये सात कर्म के कारण हैं।
श्लोक 6 (14.26.6)
घ्राता भक्षयिता द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता च पञ्चमः । मन्ता बोद्धा च सप्तैते विज्ञेयाः कर्तृहेतवः ॥
ghrātā bhakṣayitā draṣṭā spraṣṭā śrotā ca pañcamaḥ | mantā boddhā ca saptaite vijñeyāḥ kartṛhetavaḥ
सूँघने वाला, चखने वाला, देखने वाला, छूने वाला और पाँचवाँ सुनने वाला, तथा मनन करने वाला और जानने वाला — ये सात कर्ता के कारण जानने चाहिए।
श्लोक 7 (14.26.7)
स्वगुणान्भक्षयन्त्येते गुणवन्तः शुभाशुभान् । असन्तो निर्गुणाश्चैते सप्तैते मोक्षहेतवः ॥
svaguṇānbhakṣayantyete guṇavantaḥ śubhāśubhān | asanto nirguṇāścaite saptaite mokṣahetavaḥ
गुणवान् होकर ये अपने ही शुभ-अशुभ गुणों को भोगते हैं; पर वे ही सातों जब असत् और निर्गुण हो जाते हैं, तब मोक्ष के कारण बनते हैं।
श्लोक 8 (14.26.8)
विदुषां बुध्यमानानां स्वंस्वं स्थानं यथाविधि । गुणास्ते देवता भूत्वा सततं भुञ्जते हविः ॥
viduṣāṃ budhyamānānāṃ svaṃsvaṃ sthānaṃ yathāvidhi | guṇāste devatā bhūtvā satataṃ bhuñjate haviḥ
समझने वाले ज्ञानियों के लिए ये गुण अपने-अपने स्थान में विधिपूर्वक देवता बनकर निरन्तर हवि ग्रहण करते हैं।
श्लोक 9 (14.26.9)
अदन्हवींषि चान्नानि ममत्वेन विहन्यते । आत्मार्थे पाचयन्नन्नं ममत्वेनोपहन्यते ॥
adanhavīṃṣi cānnāni mamatvena vihanyate | ātmārthe pācayannannaṃ mamatvenopahanyate
हवि और अन्न खाने वाला मनुष्य 'मेरा' के भाव से नष्ट होता है; अपने लिए अन्न पकाने वाला 'मेरा' के भाव से मारा जाता है।
श्लोक 10 (14.26.10)
अभक्ष्यभक्षणं चैव मद्यपानं च हन्ति तम् । स चान्नं हन्ति तं चान्नं स हत्वा हन्यते पुनः ॥
abhakṣyabhakṣaṇaṃ caiva madyapānaṃ ca hanti tam | sa cānnaṃ hanti taṃ cānnaṃ sa hatvā hanyate punaḥ
न खाने योग्य को खाना और मद्य पीना उसे मार डालता है। वह अन्न को मारता है और अन्न उसे मारता है; अन्न को मारकर वह फिर स्वयं मारा जाता है।
श्लोक 11 (14.26.11)
हन्ता ह्यन्नमिदं विद्वान्पुनर्जनयतीश्वरः । न चान्नाज्जायते तस्मिन्सूक्ष्मो नाम व्यतिक्रमः ॥
hantā hyannamidaṃ vidvānpunarjanayatīśvaraḥ | na cānnājjāyate tasminsūkṣmo nāma vyatikramaḥ
जो ज्ञानी इस अन्न का भोक्ता है, वह स्वामी इसे फिर उत्पन्न कर देता है; और उसमें अन्न से कोई सूक्ष्म दोष भी नहीं उत्पन्न होता।
श्लोक 12 (14.26.12)
मनसा मन्यते यच्च यच्च वाचा निगद्यते । श्रोत्रेण श्रूयते यच्च चक्षुषा यच्च दृश्यते ॥
manasā manyate yacca yacca vācā nigadyate | śrotreṇa śrūyate yacca cakṣuṣā yacca dṛśyate
जो मन से सोचा जाता है, जो वाणी से कहा जाता है, जो कान से सुना जाता है, जो नेत्र से देखा जाता है,
श्लोक 13 (14.26.13)
स्पर्शेन स्पृश्यते यच्च घ्राणेन घ्रायते च यत् । मनस्येतानि संयम्य हवींष्येतानि सर्वशः ॥
sparśena spṛśyate yacca ghrāṇena ghrāyate ca yat | manasyetāni saṃyamya havīṃṣyetāni sarvaśaḥ
जो स्पर्श से छुआ जाता है, जो नासिका से सूँघा जाता है — इन सबको मन में संयमित करके, ये सब आहुतियाँ हैं।
श्लोक 14 (14.26.14)
गुणवत्पावको मह्यं दीप्यतेऽन्तःशरीरगः । योगयज्ञः प्रवृत्तो मे ज्ञानं ब्रह्ममयो हविः । प्राणस्तोत्रोऽपानशस्त्रः सर्वत्यागसुदक्षिणः ॥
guṇavatpāvako mahyaṃ dīpyate'ntaḥśarīragaḥ | yogayajñaḥ pravṛtto me jñānaṃ brahmamayo haviḥ | prāṇastotro'pānaśastraḥ sarvatyāgasudakṣiṇaḥ
मेरे लिए गुणों से युक्त अग्नि शरीर के भीतर प्रज्वलित होती है। मुझमें योगयज्ञ आरम्भ हुआ है, जिसमें ब्रह्ममय ज्ञान ही हवि है। प्राण उसका स्तोत्र है, अपान उसका शस्त्र है, और सबका त्याग उसकी उत्तम दक्षिणा है।
श्लोक 15 (14.26.15)
कर्ताऽनुमन्ता ब्रह्मात्मा होताऽध्वर्युः कृतस्तुतिः । ऋतं प्रशास्ता तच्छस्त्रमपवर्गोऽस्य दक्षिणा ॥
kartā'numantā brahmātmā hotā'dhvaryuḥ kṛtastutiḥ | ṛtaṃ praśāstā tacchastramapavargo'sya dakṣiṇā
कर्ता और अनुमोदन करने वाला, ब्रह्मस्वरूप आत्मा, होता और अध्वर्यु, जिसकी स्तुति की जा चुकी है; ऋत उसका प्रशास्ता है, वही उसका शस्त्र है, और अपवर्ग (मोक्ष) उसकी दक्षिणा है।
श्लोक 16 (14.26.16)
ऋचश्चाप्यत्र शंसन्ति नारायणविदो जनाः । नारायणाय देवाय यदविन्दन्पशून्पुरा ॥
ṛcaścāpyatra śaṃsanti nārāyaṇavido janāḥ | nārāyaṇāya devāya yadavindanpaśūnpurā
यहाँ नारायण को जानने वाले लोग ऋचाओं का पाठ करते हैं — "पूर्वकाल में देव नारायण के लिए उन्होंने यज्ञ-पशु प्राप्त किए।"
श्लोक 17 (14.26.17)
तत्र सामानि गायन्ति तत्र चाहुर्निदर्शनम् । देवं नारायणं भीरु सर्वात्मानं निबोध तम् ॥
tatra sāmāni gāyanti tatra cāhurnidarśanam | devaṃ nārāyaṇaṃ bhīru sarvātmānaṃ nibodha tam
वहाँ सामगान किया जाता है और वहीं उदाहरण भी दिया जाता है। हे भीरु, देव नारायण को सबका आत्मा जानो।