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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 25

नारद और देवमत: प्राणों का रहस्य

ब्राह्मण ऋषि नारद और देवमत का संवाद सुनाता है कि प्राणी के गर्भ में आते समय पाँच प्राणों में कौन पहले प्रवृत्त होता है। नारद प्राण और अपान को शुक्र-शोणित से, तथा समान और व्यान को उनके साझे द्रव्य से जोड़ते हैं, फिर प्राणों को भीतरी यज्ञ की आहुतियाँ बताते हैं, जिसमें उदान दिन-रात, सत्य-असत्य और शुभ-अशुभ जैसे युग्मों के बीच की अग्नि है।

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ब्राह्मण उवाच

श्लोक 1 (14.25.1)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । नारदस्य च संवादमृषेर्देवमतस्य च ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | nāradasya ca saṃvādamṛṣerdevamatasya ca

इस विषय में भी लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं — नारद और ऋषि देवमत का संवाद।

देवमत उवाच

श्लोक 2 (14.25.2)

जन्तोः संजायमानस्य किंनु पूर्वं प्रवर्तते । प्राणोऽपानः समानो वा व्यानो वोदान एव च ॥

jantoḥ saṃjāyamānasya kiṃnu pūrvaṃ pravartate | prāṇo'pānaḥ samāno vā vyāno vodāna eva ca

"जब कोई प्राणी उत्पन्न हो रहा होता है, तब इनमें पहले कौन प्रवृत्त होता है — प्राण, अपान, समान, व्यान या उदान?"

नारद उवाच

श्लोक 3 (14.25.3)

येनायं सृज्यते जन्तुस्ततोऽन्यः पूर्वमेति तम् । प्राणद्वन्द्वं हि विज्ञेयं तिर्यगूर्ध्वमधश्च यत् ॥

yenāyaṃ sṛjyate jantustato'nyaḥ pūrvameti tam | prāṇadvandvaṃ hi vijñeyaṃ tiryagūrdhvamadhaśca yat

"यह प्राणी जिससे उत्पन्न किया जाता है, उससे अन्य कोई उससे पहले आता है। प्राणों के उन युग्मों को जानना चाहिए जो तिरछे, ऊपर और नीचे की ओर चलते हैं।"

देवमत उवाच

श्लोक 4 (14.25.4)

केनायं सृज्यते जन्तुः कश्चान्यः पूर्वमेति तम् । प्राणद्वन्द्वं च मे ब्रूहि तिर्यगूर्ध्वमधश्च यत् ॥

kenāyaṃ sṛjyate jantuḥ kaścānyaḥ pūrvameti tam | prāṇadvandvaṃ ca me brūhi tiryagūrdhvamadhaśca yat

"यह प्राणी किससे उत्पन्न किया जाता है, और उससे पहले दूसरा कौन आता है? तिरछे, ऊपर और नीचे चलने वाले प्राणों के युग्म भी मुझे बताइए।"

नारद उवाच

श्लोक 5 (14.25.5)

सङ्कल्पाज्जायते हर्षः शब्दादपि च जायते । रसात्संजायते चापि रूपादपि च जायते ॥

saṅkalpājjāyate harṣaḥ śabdādapi ca jāyate | rasātsaṃjāyate cāpi rūpādapi ca jāyate

"हर्ष संकल्प से उत्पन्न होता है, शब्द से भी उत्पन्न होता है; रस से भी उत्पन्न होता है और रूप से भी उत्पन्न होता है।"

श्लोक 6 (14.25.6)

स्पर्शात्संजायते चापि गन्धादपि च जायते । शुक्राच्छोणितसंसृष्टात्पूर्वं प्राणः प्रवर्तते । प्राणेन विकृते शुक्रे ततोऽपानः प्रवर्तते ॥

sparśātsaṃjāyate cāpi gandhādapi ca jāyate | śukrācchoṇitasaṃsṛṣṭātpūrvaṃ prāṇaḥ pravartate | prāṇena vikṛte śukre tato'pānaḥ pravartate

"यह स्पर्श से उत्पन्न होता है और गन्ध से भी उत्पन्न होता है। रक्त से मिले हुए शुक्र से पहले प्राण प्रवृत्त होता है; प्राण से शुक्र के विकृत होने पर फिर अपान प्रवृत्त होता है।"

श्लोक 7 (14.25.7)

शुक्रात्संजायते चापि रसादपि च जायते । एतद्रूपमुदानस्य हर्षो मिथुनमन्तरा ॥

śukrātsaṃjāyate cāpi rasādapi ca jāyate | etadrūpamudānasya harṣo mithunamantarā

"यह शुक्र से भी उत्पन्न होता है और रस से भी उत्पन्न होता है। यही उदान का रूप है — युगल के बीच उत्पन्न होने वाला हर्ष।"

श्लोक 8 (14.25.8)

कामात्संजायते शुक्रं शुक्रात्संजायते रजः । समानव्यानजनिते सामान्ये शुक्रशोणिते ॥

kāmātsaṃjāyate śukraṃ śukrātsaṃjāyate rajaḥ | samānavyānajanite sāmānye śukraśoṇite

"काम से शुक्र उत्पन्न होता है और शुक्र से रज उत्पन्न होता है। शुक्र और शोणित साझे द्रव्य हैं, जो समान और व्यान से उत्पन्न होते हैं।"

श्लोक 9 (14.25.9)

प्राणापानाविदं द्वन्द्वमवाक् चोर्ध्वं च गच्छतः । व्यानः समानश्चैवोभौ तिर्यग्द्वन्द्वत्वमुच्यते ॥

prāṇāpānāvidaṃ dvandvamavāk cordhvaṃ ca gacchataḥ | vyānaḥ samānaścaivobhau tiryagdvandvatvamucyate

"प्राण और अपान यह एक जोड़ा हैं; वे नीचे और ऊपर की ओर जाते हैं। व्यान और समान दोनों मिलकर तिरछी गति वाला जोड़ा कहे जाते हैं।"

श्लोक 10 (14.25.10)

अग्निर्वै देवताः सर्वा इति देवस्य शासनात् । संजायते हि प्राणेषु ज्ञानं बुद्धिसमन्वितम् ॥

agnirvai devatāḥ sarvā iti devasya śāsanāt | saṃjāyate hi prāṇeṣu jñānaṃ buddhisamanvitam

"सभी देवता अग्नि ही हैं — देव का ऐसा ही शासन है। प्राणों में बुद्धि से युक्त ज्ञान उत्पन्न होता है।"

श्लोक 11 (14.25.11)

तस्य धूमस्तमोरूपं रजो भस्म सुतेजसः । सर्वं संजायते तस्य यत्र प्रक्षिप्यते हविः ॥

tasya dhūmastamorūpaṃ rajo bhasma sutejasaḥ | sarvaṃ saṃjāyate tasya yatra prakṣipyate haviḥ

"उसका धुआँ तमोरूप है और उस तेजस्वी की भस्म रजोगुण है। जिसमें हवि डाली जाती है, उसमें सब कुछ उत्पन्न होता है।"

श्लोक 12 (14.25.12)

हविः समानो व्यानश्च इति यज्ञविदो विदुः । प्राणापानावाज्यभागौ तयोर्मध्ये हुताशनः ॥

haviḥ samāno vyānaśca iti yajñavido viduḥ | prāṇāpānāvājyabhāgau tayormadhye hutāśanaḥ

"समान और व्यान हवि हैं — ऐसा यज्ञ जानने वाले कहते हैं; प्राण और अपान दो आज्यभाग हैं, और उन दोनों के बीच हविर्भोजी अग्नि है।"

श्लोक 13 (14.25.13)

एतद्रूपमुदानस्य परमं ब्राह्मणा विदुः । निर्द्वन्द्वमिति यत्त्वेतत्तन्मे निगदतः शृणु ॥

etadrūpamudānasya paramaṃ brāhmaṇā viduḥ | nirdvandvamiti yattvetattanme nigadataḥ śṛṇu

"इसे ब्राह्मण उदान का परम रूप जानते हैं। और जो 'निर्द्वन्द्व' कहा जाता है, उसे मैं बताता हूँ, सुनो।"

श्लोक 14 (14.25.14)

अहोरात्रमिदं द्वन्द्वं तयोर्मध्ये हुताशनः । एतद्रूपमुदानस्य परमं ब्राह्मणा विदुः ॥

ahorātramidaṃ dvandvaṃ tayormadhye hutāśanaḥ | etadrūpamudānasya paramaṃ brāhmaṇā viduḥ

"दिन और रात एक जोड़ा हैं और उनके बीच हविर्भोजी अग्नि है। इसे ब्राह्मण उदान का परम रूप जानते हैं।"

श्लोक 15 (14.25.15)

उभे सत्यानृते द्वन्द्वं तयोर्मध्ये हुताशनः । एतद्रूपमुदानस्य परमं ब्राह्मणा विदुः ॥

ubhe satyānṛte dvandvaṃ tayormadhye hutāśanaḥ | etadrūpamudānasya paramaṃ brāhmaṇā viduḥ

"सत्य और असत्य एक जोड़ा हैं और उनके बीच हविर्भोजी अग्नि है। इसे ब्राह्मण उदान का परम रूप जानते हैं।"

श्लोक 16 (14.25.16)

सच्चासच्चैव तद्द्वन्द्वं तयोर्मध्ये हुताशनः । एतद्रूपमुदानस्य परमं ब्राह्मणा विदुः ॥

saccāsaccaiva taddvandvaṃ tayormadhye hutāśanaḥ | etadrūpamudānasya paramaṃ brāhmaṇā viduḥ

"सत् और असत् वह जोड़ा हैं और उनके बीच हविर्भोजी अग्नि है। इसे ब्राह्मण उदान का परम रूप जानते हैं।"

श्लोक 17 (14.25.17)

उभे शुभाशुभे द्वन्द्वं तयोर्मध्ये हुताशनः । एतद्रूपमुदानस्य परमं ब्राह्मणा विदुः ॥

ubhe śubhāśubhe dvandvaṃ tayormadhye hutāśanaḥ | etadrūpamudānasya paramaṃ brāhmaṇā viduḥ

"शुभ और अशुभ एक जोड़ा हैं और उनके बीच हविर्भोजी अग्नि है। इसे ब्राह्मण उदान का परम रूप जानते हैं।"

श्लोक 18 (14.25.18)

ऊर्ध्वं समानो व्यानश्च व्यस्यते कर्म तेन तत् । द्वितीयं तु समानेन पुनरेव व्यवस्यते ॥

ūrdhvaṃ samāno vyānaśca vyasyate karma tena tat | dvitīyaṃ tu samānena punareva vyavasyate

"ऊपर समान और व्यान हैं; उनसे वह कर्म फैलाया जाता है, और दूसरा फिर समान से निश्चित होता है।"

श्लोक 19 (14.25.19)

शान्त्यर्थं वामदेव्यं च शान्तिर्ब्रह्म सनातनम् । एतद्रूपमुदानस्य परमं ब्राह्मणा विदुः ॥

śāntyarthaṃ vāmadevyaṃ ca śāntirbrahma sanātanam | etadrūpamudānasya paramaṃ brāhmaṇā viduḥ

"शान्ति के लिए वामदेव्य साम है, और शान्ति ही सनातन ब्रह्म है। इसे ब्राह्मण उदान का परम रूप जानते हैं।"

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