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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 24

पाँच प्राणों में श्रेष्ठता का विवाद

ब्राह्मण अपनी पत्नी को पाँच प्राणों — प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान — का रहस्य समझाता है, जिनमें से प्रत्येक पिछले से उत्पन्न होता है। वे प्रजापति के पास जाकर पूछते हैं कि उनमें बड़ा और श्रेष्ठ कौन है; बारी-बारी से हर एक स्वयं लीन होता है और शेष सब उसके साथ निश्चल हो जाते हैं। तब प्रजापति कहते हैं कि सब अपने-अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ हैं और सब एक-दूसरे पर निर्भर हैं, और उन्हें मित्रभाव से विदा करते हैं।

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ब्राह्मण उवाच

श्लोक 1 (14.24.1)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । सुभगे पञ्चहोतॄणां विधानमिह यादृशम् ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | subhage pañcahotṝṇāṃ vidhānamiha yādṛśam

हे सौभाग्यवती, इस विषय में भी लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं — यहाँ पाँच होताओं की व्यवस्था कैसी है।

श्लोक 2 (14.24.2)

प्राणापानावुदानश्च समानो व्यान एव च । पञ्चहोतॄंस्तथैतान्वै परं भावं विदुर्बुधाः ॥

prāṇāpānāvudānaśca samāno vyāna eva ca | pañcahotṝṃstathaitānvai paraṃ bhāvaṃ vidurbudhāḥ

प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान — विद्वान इन पाँच होताओं को ही परम भाव जानते हैं।

ब्राह्मण्युवाच

श्लोक 3 (14.24.3)

स्वभावात्सप्तहोतार इति मे पूर्विका मतिः । यथा वै पञ्च होतारः परो भावस्तदुच्यताम् ॥

svabhāvātsaptahotāra iti me pūrvikā matiḥ | yathā vai pañca hotāraḥ paro bhāvastaducyatām

"स्वभाव से होता सात हैं" — यही मेरी पहले की समझ थी। अब बताइए कि पाँच होता परम भाव कैसे हैं।

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 4 (14.24.4)

प्राणेन सम्भृतो वायुरपानो जायते ततः । अपाने सम्भृतो वायुस्ततो व्यानः प्रवर्तते ॥

prāṇena sambhṛto vāyurapāno jāyate tataḥ | apāne sambhṛto vāyustato vyānaḥ pravartate

प्राण से वायु संगृहीत होती है, उससे अपान उत्पन्न होता है। अपान में संगृहीत वायु से व्यान प्रवृत्त होता है।

श्लोक 5 (14.24.5)

व्यानेन सम्भृतो वायुस्ततोदानः प्रवर्तते । उदाने सम्भृतो वायुः समानो नाम जायते ॥

vyānena sambhṛto vāyustatodānaḥ pravartate | udāne sambhṛto vāyuḥ samāno nāma jāyate

व्यान में संगृहीत वायु से उदान प्रवृत्त होता है, और उदान में संगृहीत वायु समान नाम से उत्पन्न होती है।

श्लोक 6 (14.24.6)

तेऽपृच्छन्त पुरो गत्वा पूर्वजातं पितामहम् । यो नः श्रेष्ठस्तमाचक्ष्व स नः श्रेष्ठो भविष्यति ॥

te'pṛcchanta puro gatvā pūrvajātaṃ pitāmaham | yo naḥ śreṣṭhastamācakṣva sa naḥ śreṣṭho bhaviṣyati

वे सबसे पहले उत्पन्न हुए पितामह के सामने जाकर बोले — "बताइए, हममें सबसे बड़ा कौन है; वही हममें श्रेष्ठ होगा।"

ब्रह्मोवाच

श्लोक 7 (14.24.7)

यस्मिन्प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति । सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे । यस्मिन्प्रवृत्ते च पुनश्चरन्ति । स वै श्रेष्ठो गच्छत यत्र कामः ॥

yasminpralīne pralayaṃ vrajanti | sarve prāṇāḥ prāṇabhṛtāṃ śarīre | yasminpravṛtte ca punaścaranti | sa vai śreṣṭho gacchata yatra kāmaḥ

"जिसके लीन होने पर प्राणधारियों के शरीर में सभी प्राण लय को प्राप्त हो जाते हैं और जिसके फिर चलने पर वे भी फिर चलने लगते हैं, वही श्रेष्ठ है। जहाँ इच्छा हो वहाँ जाओ।"

प्राण उवाच

श्लोक 8 (14.24.8)

मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति । सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे । मयि प्रवृत्ते च पुनश्चरन्ति । श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ॥

mayi pralīne pralayaṃ vrajanti | sarve prāṇāḥ prāṇabhṛtāṃ śarīre | mayi pravṛtte ca punaścaranti | śreṣṭho hyahaṃ paśyata māṃ pralīnam

"मेरे लीन होने पर प्राणधारियों के शरीर में सभी प्राण लीन हो जाते हैं और मेरे फिर चलने पर वे भी फिर चलने लगते हैं। इसलिए मैं ही श्रेष्ठ हूँ — मुझे लीन हुआ देख लो।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 9 (14.24.9)

प्राणः प्रालीयत ततः पुनश्च प्रचचार ह । समानश्चाप्युदानश्च वचो ब्रूतां पुनः शुभे ॥

prāṇaḥ prālīyata tataḥ punaśca pracacāra ha | samānaścāpyudānaśca vaco brūtāṃ punaḥ śubhe

हे शुभे, प्राण लीन हुआ और फिर चलने लगा। तब समान और उदान ने ये वचन कहे।

श्लोक 10 (14.24.10)

न त्वं सर्वमिदं व्याप्य तिष्ठसीह यथा वयम् । न त्वं श्रेष्ठो हि नः प्राण अपानो हि वशे तव । प्रचचार पुनः प्राणस्ततोऽपानोऽभ्यभाषत ॥

na tvaṃ sarvamidaṃ vyāpya tiṣṭhasīha yathā vayam | na tvaṃ śreṣṭho hi naḥ prāṇa apāno hi vaśe tava | pracacāra punaḥ prāṇastato'pāno'bhyabhāṣata

"तुम हमारी तरह इस सबमें व्याप्त होकर यहाँ स्थित नहीं हो। हे प्राण, तुम हममें श्रेष्ठ नहीं हो, क्योंकि अपान तुम्हारे वश में है।" प्राण फिर चलने लगा, तब अपान बोला।

अपान उवाच

श्लोक 11 (14.24.11)

मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति । सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे । मयि प्रवृत्ते च पुनश्चरन्ति । श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ॥

mayi pralīne pralayaṃ vrajanti | sarve prāṇāḥ prāṇabhṛtāṃ śarīre | mayi pravṛtte ca punaścaranti | śreṣṭho hyahaṃ paśyata māṃ pralīnam

"मेरे लीन होने पर प्राणधारियों के शरीर में सभी प्राण लीन हो जाते हैं और मेरे फिर चलने पर वे भी फिर चलने लगते हैं। इसलिए मैं ही श्रेष्ठ हूँ — मुझे लीन हुआ देख लो।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 12 (14.24.12)

व्यानश्च तमुदानश्च भाषमाणमथोचतुः । अपान न त्वं श्रेष्ठोऽसि प्राणो हि वशगस्तव ॥

vyānaśca tamudānaśca bhāṣamāṇamathocatuḥ | apāna na tvaṃ śreṣṭho'si prāṇo hi vaśagastava

जब वह यह कह रहा था, तब व्यान और उदान ने उससे कहा — "अपान, तुम श्रेष्ठ नहीं हो, क्योंकि प्राण तुम्हारे वश में है।"

श्लोक 13 (14.24.13)

अपानः प्रचचाराथ व्यानस्तं पुनरब्रवीत् । श्रेष्ठोऽहमस्मि सर्वेषां श्रूयतां येन हेतुना ॥

apānaḥ pracacārātha vyānastaṃ punarabravīt | śreṣṭho'hamasmi sarveṣāṃ śrūyatāṃ yena hetunā

अपान फिर चलने लगा, तब व्यान ने उससे कहा — "मैं सबमें श्रेष्ठ हूँ; जिस कारण से हूँ, वह सुनो।"

व्यान उवाच

श्लोक 14 (14.24.14)

मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति । सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे । मयि प्रवृत्ते च पुनश्चरन्ति । श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ॥

mayi pralīne pralayaṃ vrajanti | sarve prāṇāḥ prāṇabhṛtāṃ śarīre | mayi pravṛtte ca punaścaranti | śreṣṭho hyahaṃ paśyata māṃ pralīnam

"मेरे लीन होने पर प्राणधारियों के शरीर में सभी प्राण लीन हो जाते हैं और मेरे फिर चलने पर वे भी फिर चलने लगते हैं। इसलिए मैं ही श्रेष्ठ हूँ — मुझे लीन हुआ देख लो।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 15 (14.24.15)

प्रालीयत ततो व्यानः पुनश्च प्रचचार ह । प्राणापानावुदानश्च समानश्च तमब्रुवन् ॥

prālīyata tato vyānaḥ punaśca pracacāra ha | prāṇāpānāvudānaśca samānaśca tamabruvan

व्यान लीन हुआ और फिर चलने लगा। प्राण, अपान, उदान और समान ने उससे कहा —

श्लोक 16 (14.24.16)

न त्वं श्रेष्ठोऽसि नो व्यान समानस्तु वशे तव । प्रचचार पुनर्व्यानः समानः पुनरब्रवीत् । श्रेष्ठोऽहमस्मि सर्वेषां श्रूयतां येन हेतुना ॥

na tvaṃ śreṣṭho'si no vyāna samānastu vaśe tava | pracacāra punarvyānaḥ samānaḥ punarabravīt | śreṣṭho'hamasmi sarveṣāṃ śrūyatāṃ yena hetunā

"व्यान, तुम हममें श्रेष्ठ नहीं हो, क्योंकि समान तुम्हारे वश में है।" व्यान फिर चलने लगा, तब समान ने फिर कहा — "मैं सबमें श्रेष्ठ हूँ; जिस कारण से हूँ, वह सुनो।"

समान उवाच

श्लोक 17 (14.24.17)

मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति । सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे । मयि प्रवृत्ते च पुनश्चरन्ति । श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ॥

mayi pralīne pralayaṃ vrajanti | sarve prāṇāḥ prāṇabhṛtāṃ śarīre | mayi pravṛtte ca punaścaranti | śreṣṭho hyahaṃ paśyata māṃ pralīnam

"मेरे लीन होने पर प्राणधारियों के शरीर में सभी प्राण लीन हो जाते हैं और मेरे फिर चलने पर वे भी फिर चलने लगते हैं। इसलिए मैं ही श्रेष्ठ हूँ — मुझे लीन हुआ देख लो।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 18 (14.24.18)

ततः समानः प्रालिल्ये पुनश्च प्रचचार ह । प्राणापानावुदानश्च व्यानश्चैव तमब्रवीत् । न त्वं समान श्रेष्ठोऽसि व्यान एव वशे तव ॥

tataḥ samānaḥ prālilye punaśca pracacāra ha | prāṇāpānāvudānaśca vyānaścaiva tamabravīt | na tvaṃ samāna śreṣṭho'si vyāna eva vaśe tava

तब समान लीन हुआ और फिर चलने लगा। प्राण, अपान, उदान और व्यान ने उससे कहा — "समान, तुम श्रेष्ठ नहीं हो; केवल व्यान तुम्हारे वश में है।"

श्लोक 19 (14.24.19)

समानः प्रचचाराथ उदानस्तमुवाच ह । श्रेष्ठोऽहमस्मि सर्वेषां श्रूयतां येन हेतुना ॥

samānaḥ pracacārātha udānastamuvāca ha | śreṣṭho'hamasmi sarveṣāṃ śrūyatāṃ yena hetunā

समान फिर चलने लगा, तब उदान ने उससे कहा — "मैं सबमें श्रेष्ठ हूँ; जिस कारण से हूँ, वह सुनो।"

उदान उवाच

श्लोक 20 (14.24.20)

मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति । सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे । मयि प्रवृत्ते च पुनश्चरन्ति । श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ॥

mayi pralīne pralayaṃ vrajanti | sarve prāṇāḥ prāṇabhṛtāṃ śarīre | mayi pravṛtte ca punaścaranti | śreṣṭho hyahaṃ paśyata māṃ pralīnam

"मेरे लीन होने पर प्राणधारियों के शरीर में सभी प्राण लीन हो जाते हैं और मेरे फिर चलने पर वे भी फिर चलने लगते हैं। इसलिए मैं ही श्रेष्ठ हूँ — मुझे लीन हुआ देख लो।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 21 (14.24.21)

ततः प्रालीयतोदानः पुनश्च प्रचचार ह । प्राणापानौ समानश्च व्यानश्चैव तमब्रुवन् । उदान न त्वं श्रेष्ठोऽसि व्यान एव वशे तव ॥

tataḥ prālīyatodānaḥ punaśca pracacāra ha | prāṇāpānau samānaśca vyānaścaiva tamabruvan | udāna na tvaṃ śreṣṭho'si vyāna eva vaśe tava

तब उदान लीन हुआ और फिर चलने लगा। प्राण, अपान, समान और व्यान ने उससे कहा — "उदान, तुम श्रेष्ठ नहीं हो; केवल व्यान तुम्हारे वश में है।"

श्लोक 22 (14.24.22)

ततस्तानब्रवीत्सर्वान्स्मयमानः प्रजापतिः । सर्वे श्रेष्ठा न च श्रेष्ठाः सर्वे चान्योन्यकाङ्क्षिणः ॥

tatastānabravītsarvānsmayamānaḥ prajāpatiḥ | sarve śreṣṭhā na ca śreṣṭhāḥ sarve cānyonyakāṅkṣiṇaḥ

तब मुस्कराते हुए प्रजापति ने उन सबसे कहा — "सभी श्रेष्ठ हैं और फिर भी कोई श्रेष्ठ नहीं है; सभी एक-दूसरे की अपेक्षा रखते हैं।"

श्लोक 23 (14.24.23)

सर्वे स्वविषये श्रेष्ठाः सर्वे चान्योन्यधर्मिणः । इति तानब्रवीत्सर्वान्समवेतान्प्रजापतिः ॥

sarve svaviṣaye śreṣṭhāḥ sarve cānyonyadharmiṇaḥ | iti tānabravītsarvānsamavetānprajāpatiḥ

"सभी अपने-अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ हैं और सभी एक-दूसरे के धर्म में सहभागी हैं।" इस प्रकार प्रजापति ने एकत्र हुए उन सबसे कहा।

ब्रह्मोवाच

श्लोक 24 (14.24.24)

एकः स्थिरश्चराश्चान्ये विशेषात्पञ्च वायवः । एक एव च सर्वात्मा बहुधाऽप्युपचीयते ॥

ekaḥ sthiraścarāścānye viśeṣātpañca vāyavaḥ | eka eva ca sarvātmā bahudhā'pyupacīyate

"उनमें एक स्थिर है और दूसरे चलने वाले हैं; विशेष कार्यों के कारण वायु पाँच हैं। फिर भी सबकी आत्मा एक ही है, जो अनेक रूपों में बढ़ती है।"

श्लोक 25 (14.24.25)

परस्परस्य सुहृदो भावयन्तः परस्परम् । स्वस्ति व्रजत भद्रं वो धारयध्वं परस्परम् ॥

parasparasya suhṛdo bhāvayantaḥ parasparam | svasti vrajata bhadraṃ vo dhārayadhvaṃ parasparam

"तुम सब एक-दूसरे के मित्र बनो और परस्पर एक-दूसरे का पोषण करो। कल्याण हो, सुखपूर्वक जाओ और एक-दूसरे को सँभाले रखो।"

अध्याय 23अध्याय-सूचीअध्याय 25