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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 23

सात होता: इन्द्रियाँ और मन

ब्राह्मण-दम्पति के संवाद को आगे बढ़ाते हुए ब्राह्मण भीतरी यज्ञ के सात 'होताओं' को समझाता है — घ्राण, नेत्र, जिह्वा, त्वचा, कान, मन और बुद्धि, जिनमें से प्रत्येक केवल अपने ही विषय को ग्रहण करता है। फिर वह मन और इन्द्रियों के विवाद की पुरानी कथा सुनाता है, जिसमें दोनों पक्ष कहते हैं कि दूसरा उसके बिना काम नहीं कर सकता।

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ब्राह्मण उवाच

श्लोक 1 (14.23.1)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । सुभगे सप्तहोतॄणां विधानमिह यादृशम् ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | subhage saptahotṝṇāṃ vidhānamiha yādṛśam

हे सौभाग्यवती, इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं — यहाँ सात होताओं की व्यवस्था कैसी है।

श्लोक 2 (14.23.2)

घ्राणश्चक्षुश्च जिह्वा च त्वक् श्रोत्रं चैव पञ्चमम् । मनो बुद्धिश्च सप्तैते होतारः पृथगाश्रिताः ॥

ghrāṇaścakṣuśca jihvā ca tvak śrotraṃ caiva pañcamam | mano buddhiśca saptaite hotāraḥ pṛthagāśritāḥ

नासिका, नेत्र, जिह्वा, त्वचा और पाँचवाँ कान, तथा मन और बुद्धि — ये सात होता हैं, जो अलग-अलग अपने आश्रय में स्थित हैं।

श्लोक 3 (14.23.3)

सूक्ष्माकाशे समं प्राप्ते न पश्यन्तीतरेतरम् । एतद्वै सप्तहोतृत्वं स्वभावाद्विद्धि शोभने ॥

sūkṣmākāśe samaṃ prāpte na paśyantītaretaram | etadvai saptahotṛtvaṃ svabhāvādviddhi śobhane

सूक्ष्म आकाश को समान रूप से प्राप्त होने पर भी वे एक-दूसरे को नहीं देखते। हे शोभने, स्वभाव से ही यह सात होताओं का स्वरूप है, ऐसा जानो।

ब्राह्मण्युवाच

श्लोक 4 (14.23.4)

सूक्ष्मे त्वाकाशे सम्प्राप्ते कथं नान्योन्यदर्शिनः । कथं स्वभावाद्भगवन्नेतदाचक्ष्व मे प्रभो ॥

sūkṣme tvākāśe samprāpte kathaṃ nānyonyadarśinaḥ | kathaṃ svabhāvādbhagavannetadācakṣva me prabho

सूक्ष्म आकाश को प्राप्त होने पर भी वे एक-दूसरे को क्यों नहीं देखते? हे भगवन्, यह स्वभाव से कैसे है? हे प्रभो, मुझे यह समझाइए।

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 5 (14.23.5)

गुणज्ञानेषु विज्ञानं गुणज्ञानामभिज्ञता । परस्परं गुणानेते नाभिजानन्ति कर्हिचित् ॥

guṇajñāneṣu vijñānaṃ guṇajñānāmabhijñatā | parasparaṃ guṇānete nābhijānanti karhicit

गुणों के ज्ञान में ही विशेष बोध है और गुणों के जानने वालों में ही निपुणता; किन्तु ये एक-दूसरे के गुणों को कभी नहीं पहचानते।

श्लोक 6 (14.23.6)

जिह्वा चक्षुस्तथा श्रोत्रं त्वङ्मनो बुद्धिरेव च । न गन्धानधिगच्छन्ति घ्राणस्तानधिगच्छति ॥

jihvā cakṣustathā śrotraṃ tvaṅmano buddhireva ca | na gandhānadhigacchanti ghrāṇastānadhigacchati

जिह्वा, नेत्र, कान, त्वचा, मन और बुद्धि गन्धों को नहीं पाते; उन्हें घ्राण ही पाता है।

श्लोक 7 (14.23.7)

घ्राणं चक्षुस्तथा श्रोत्रं त्वङ्मनो बुद्धिरेव च । न रसानधिगच्छन्ति जिह्वा तानधिगच्छति ॥

ghrāṇaṃ cakṣustathā śrotraṃ tvaṅmano buddhireva ca | na rasānadhigacchanti jihvā tānadhigacchati

घ्राण, नेत्र, कान, त्वचा, मन और बुद्धि रसों को नहीं पाते; उन्हें जिह्वा ही पाती है।

श्लोक 8 (14.23.8)

घ्राणं जिह्वा तथा श्रोत्रं त्वङ्मनो बुद्धिरेव च । न रूपाण्यधिगच्छन्ति चक्षुस्तान्यधिगच्छति ॥

ghrāṇaṃ jihvā tathā śrotraṃ tvaṅmano buddhireva ca | na rūpāṇyadhigacchanti cakṣustānyadhigacchati

घ्राण, जिह्वा, कान, त्वचा, मन और बुद्धि रूपों को नहीं पाते; उन्हें नेत्र ही पाता है।

श्लोक 9 (14.23.9)

घ्राणं जिह्वा ततश्चक्षुः श्रोत्रं बुद्धिर्मनस्तथा । न स्पर्शानधिगच्छन्ति त्वक्च तानधिगच्छति ॥

ghrāṇaṃ jihvā tataścakṣuḥ śrotraṃ buddhirmanastathā | na sparśānadhigacchanti tvakca tānadhigacchati

घ्राण, जिह्वा, नेत्र, कान, बुद्धि और मन स्पर्शों को नहीं पाते; उन्हें त्वचा ही पाती है।

श्लोक 10 (14.23.10)

घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वङ्मनो बुद्धिरेव च । न शब्दानधिगच्छन्ति श्रोत्रं तानधिगच्छति ॥

ghrāṇaṃ jihvā ca cakṣuśca tvaṅmano buddhireva ca | na śabdānadhigacchanti śrotraṃ tānadhigacchati

घ्राण, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, मन और बुद्धि शब्दों को नहीं पाते; उन्हें कान ही पाता है।

श्लोक 11 (14.23.11)

घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक् श्रोत्रं बुद्धिरेव च । सङ्कल्पान्नाधिगच्छन्ति मनस्तानधिगच्छति ॥

ghrāṇaṃ jihvā ca cakṣuśca tvak śrotraṃ buddhireva ca | saṅkalpānnādhigacchanti manastānadhigacchati

घ्राण, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कान और बुद्धि संकल्पों को नहीं पाते; उन्हें मन ही पाता है।

श्लोक 12 (14.23.12)

घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक् श्रोत्रं मन एव च । न निष्ठामधिगच्छन्ति बुद्धिस्तामधिगच्छति ॥

ghrāṇaṃ jihvā ca cakṣuśca tvak śrotraṃ mana eva ca | na niṣṭhāmadhigacchanti buddhistāmadhigacchati

घ्राण, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कान और मन निश्चय तक नहीं पहुँचते; उस तक बुद्धि ही पहुँचती है।

श्लोक 13 (14.23.13)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । इन्द्रियाणां च संवादं मनसश्चैव भामिनि ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | indriyāṇāṃ ca saṃvādaṃ manasaścaiva bhāmini

हे भामिनी, इस विषय में भी लोग यह प्राचीन इतिहास सुनाते हैं — इन्द्रियों और मन का संवाद।

मन उवाच

श्लोक 14 (14.23.14)

नाघ्राति मामृते घ्राणं रसं जिह्वा न वेत्ति च । रूपं चक्षुर्न गृह्णाति त्वक् स्पर्शं नावबुध्यते ॥

nāghrāti māmṛte ghrāṇaṃ rasaṃ jihvā na vetti ca | rūpaṃ cakṣurna gṛhṇāti tvak sparśaṃ nāvabudhyate

मेरे बिना नासिका सूँघती नहीं, जिह्वा रस नहीं जानती, नेत्र रूप ग्रहण नहीं करता और त्वचा स्पर्श का बोध नहीं करती।

श्लोक 15 (14.23.15)

न श्रोत्रं बुध्यते शब्दं मया हीनं कथञ्चन । प्रवरं सर्वभूतानामहमस्मि सनातनम् ॥

na śrotraṃ budhyate śabdaṃ mayā hīnaṃ kathañcana | pravaraṃ sarvabhūtānāmahamasmi sanātanam

मुझसे रहित होकर कान किसी भी प्रकार शब्द को नहीं जानता। मैं समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ और सनातन हूँ।

श्लोक 16 (14.23.16)

अगाराणीव शून्यानि शान्तार्चिष इवाग्नयः । इन्द्रियाणि न भासन्ते मया हीनानि नित्यशः ॥

agārāṇīva śūnyāni śāntārciṣa ivāgnayaḥ | indriyāṇi na bhāsante mayā hīnāni nityaśaḥ

मेरे बिना इन्द्रियाँ कभी नहीं चमकतीं — सूने घरों की तरह, या उन अग्नियों की तरह जिनकी लपटें शान्त हो गई हों।

श्लोक 17 (14.23.17)

काष्ठानीवार्द्रशुष्काणि यतमानैरपीन्द्रियैः । गुणार्थान्नाधिगच्छन्ति मामृते सर्वजन्तवः ॥

kāṣṭhānīvārdraśuṣkāṇi yatamānairapīndriyaiḥ | guṇārthānnādhigacchanti māmṛte sarvajantavaḥ

गीली या सूखी लकड़ियों की तरह, इन्द्रियों के प्रयत्न करने पर भी सब प्राणी मेरे बिना विषयों को नहीं पा सकते।

इन्द्रियाण्यूचुः

श्लोक 18 (14.23.18)

एवमेतद्भवेत्सत्यं यथैतन्मन्यते भवान् । ऋतेऽस्मानस्मदर्थांस्त्वं भोगान्भुङ्क्ते भवान्यदि ॥

evametadbhavetsatyaṃ yathaitanmanyate bhavān | ṛte'smānasmadarthāṃstvaṃ bhogānbhuṅkte bhavānyadi

जैसा आप मानते हैं, यह तब सच हो सकता है यदि आप हमारे बिना और हमारे विषयों के बिना भोग भोगते हों।

मन उवाच

श्लोक 19 (14.23.19)

यद्यस्मासु प्रलीनेषु तर्पणं प्राणधारणम् । भोगान्भुङ्क्ते भवान्सत्यं यथैतन्मन्यते तथा ॥

yadyasmāsu pralīneṣu tarpaṇaṃ prāṇadhāraṇam | bhogānbhuṅkte bhavānsatyaṃ yathaitanmanyate tathā

यदि हमारे लीन हो जाने पर भी आप प्राण को धारण करने वाले, तृप्ति देने वाले भोग भोगते हों, तो वह सच है, जैसा आप मानते हैं।

श्लोक 20 (14.23.20)

अथवाऽस्मासु लीनेषु तिष्ठत्सु विषयेषु च । यदि सङ्कल्पमात्रेण भुङ्क्ते भोगान्यथार्थवत् ॥

athavā'smāsu līneṣu tiṣṭhatsu viṣayeṣu ca | yadi saṅkalpamātreṇa bhuṅkte bhogānyathārthavat

अथवा यदि हमारे लीन रहने पर और विषयों के बने रहने पर आप केवल संकल्प मात्र से यथार्थ के समान भोग भोगते हों,

श्लोक 21 (14.23.21)

अथ चेन्मन्यसे सिद्धिमस्मदर्थेषु नित्यदा । घ्राणेन रूपमादत्स्व रसमादत्स्व चक्षुषा ॥

atha cenmanyase siddhimasmadartheṣu nityadā | ghrāṇena rūpamādatsva rasamādatsva cakṣuṣā

या यदि आप समझते हैं कि हमारे विषयों में आप सदा सफल होते हैं, तो नासिका से रूप ग्रहण कीजिए और नेत्र से रस ग्रहण कीजिए।

श्लोक 22 (14.23.22)

श्रोत्रेण गन्धानादत्स्व स्पर्शानादत्स्व जिह्वया । त्वचा च शब्दमादत्स्व बुद्ध्या स्पर्शमथापि च ॥

śrotreṇa gandhānādatsva sparśānādatsva jihvayā | tvacā ca śabdamādatsva buddhyā sparśamathāpi ca

कान से गन्ध ग्रहण कीजिए, जिह्वा से स्पर्श ग्रहण कीजिए, त्वचा से शब्द ग्रहण कीजिए और बुद्धि से भी स्पर्श ग्रहण कीजिए।

श्लोक 23 (14.23.23)

बलवन्तो ह्यनियमा नियमा दुर्बलीयसाम् । भोगानपूर्वानादत्स्व नोच्छिष्टं भोक्तुमर्हति ॥

balavanto hyaniyamā niyamā durbalīyasām | bhogānapūrvānādatsva nocchiṣṭaṃ bhoktumarhati

बलवानों के लिए नियम नहीं होते, नियम तो दुर्बलों के लिए हैं। ऐसे भोग ग्रहण कीजिए जो पहले कभी न भोगे हों; जूठे को भोगना उचित नहीं।

श्लोक 24 (14.23.24)

यथा हि शिष्यः शास्तारं श्रुत्यर्थमभिधावति । ततः श्रुतमुपादाय श्रुतार्थमुपतिष्ठति ॥

yathā hi śiṣyaḥ śāstāraṃ śrutyarthamabhidhāvati | tataḥ śrutamupādāya śrutārthamupatiṣṭhati

जैसे शिष्य सुने जाने वाले अर्थ के लिए गुरु के पास दौड़ता है और फिर जो सुना उसे ग्रहण करके उसके अर्थ में लगता है,

श्लोक 25 (14.23.25)

विषयानेवमस्माभिर्दर्शितानभिमन्यसे । अनुभूतानतीतांश्च स्वप्ने जागरणे तथा ॥

viṣayānevamasmābhirdarśitānabhimanyase | anubhūtānatītāṃśca svapne jāgaraṇe tathā

वैसे ही आप हमारे दिखाए हुए विषयों को, चाहे वे अनुभव किए हुए हों या बीत चुके हों, स्वप्न में और जाग्रत में, अपना मानते हैं।

श्लोक 26 (14.23.26)

वैमनस्यं गतानां च जन्तूनामल्पचेतसाम् । अस्मदर्थे कृते दृश्यते प्राणधारणम् ॥

vaimanasyaṃ gatānāṃ ca jantūnāmalpacetasām | asmadarthe kṛte dṛśyate prāṇadhāraṇam

जब अल्प बुद्धि वाले प्राणी उदासी में पड़ जाते हैं, तब भी उनका प्राण धारण करना हमारे विषयों के किए जाने पर ही दिखाई देता है।

श्लोक 27 (14.23.27)

बहूनपि हि सङ्कल्पान्मत्वा स्वप्नानुपास्य च । बुभुक्षया पीड्यमानो विषयानेव धावति ॥

bahūnapi hi saṅkalpānmatvā svapnānupāsya ca | bubhukṣayā pīḍyamāno viṣayāneva dhāvati

अनेक संकल्पों की कल्पना करके और स्वप्नों का सहारा लेकर भी, भूख से पीड़ित होने पर मनुष्य विषयों के पीछे ही दौड़ता है।

श्लोक 28 (14.23.28)

अगारमद्वारमिव प्रविश्य । सङ्कल्पभोगान्विषयानविन्दन् । प्राणक्षये शान्तिमुपैति नित्यं । दारुक्षयेऽग्निर्ज्वलितो यथैव ॥

agāramadvāramiva praviśya | saṅkalpabhogānviṣayānavindan | prāṇakṣaye śāntimupaiti nityaṃ | dārukṣaye'gnirjvalito yathaiva

मानो बिना द्वार के घर में प्रवेश करके, केवल संकल्प से भोगे जाने वाले विषयों को पाकर, प्राणों के क्षय होने पर वह सदा के लिए शान्ति को पाता है, जैसे लकड़ी के समाप्त होने पर प्रज्वलित अग्नि शान्त हो जाती है।

श्लोक 29 (14.23.29)

कामं तु नष्टेषु गुणेषु सङ्गः । कामं च नान्योन्यगुणोपलब्धिः । अस्मान्विना नास्ति तपोपलब्धि- । स्तामप्यृते त्वां न भजेत्प्रहर्षः ॥

kāmaṃ tu naṣṭeṣu guṇeṣu saṅgaḥ | kāmaṃ ca nānyonyaguṇopalabdhiḥ | asmānvinā nāsti tapopalabdhi- | stāmapyṛte tvāṃ na bhajetpraharṣaḥ

माना कि गुणों के नष्ट होने पर भी आसक्ति रहती है और यह भी कि कोई एक-दूसरे के गुणों को नहीं जानता। किन्तु हमारे बिना तप की प्राप्ति नहीं होती, और आपके बिना उसमें भी आनन्द न मिले।

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