आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 22
दस होता और वाणी तथा मन का विवाद
ब्राह्मण अपनी पत्नी को उपदेश देता रहता है। वह शरीर के भीतर चलने वाले दस होताओं के यज्ञ का वर्णन करता है: दस इन्द्रियाँ होता हैं, उनके विषय हवि और समिधाएँ हैं और उनके अधिष्ठाता देवता अग्नियाँ हैं। फिर पत्नी पूछती है कि वाणी पहले हुई या मन; उत्तर में वह कथा कहता है कि वाणी और मन भूतात्मा के पास यह निर्णय कराने गए कि कौन श्रेष्ठ है, और दोनों अपने-अपने ढंग से श्रेष्ठ ठहरे।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 1 (14.22.1)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । निबोध दशहोतृणां विधानमिह यादृशम् ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | nibodha daśahotṛṇāṃ vidhānamiha yādṛśam
इसी विषय में यह पुरानी कथा भी कही जाती है। दस होताओं के यज्ञ का विधान जैसा यहाँ है, उसे सुनो।
श्लोक 2 (14.22.2)
श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी जिह्वा नासिका चरणौ करौ । उपस्थं पायुरिति वाग्घोतृणि दश भामिनि ॥
śrotraṃ tvakcakṣuṣī jihvā nāsikā caraṇau karau | upasthaṃ pāyuriti vāgghotṛṇi daśa bhāmini
कान, त्वचा, आँखें, जीभ, नाक, पैर, हाथ, उपस्थ, गुदा और वाणी—हे भामिनि! ये दस होता हैं।
श्लोक 3 (14.22.3)
शब्दस्पर्शौ रूपरसौ गन्धो वाक्यं क्रिया गतिः । रेतोमूत्रपुरीषाणां त्यागो दश हवींषि च ॥
śabdasparśau rūparasau gandho vākyaṃ kriyā gatiḥ | retomūtrapurīṣāṇāṃ tyāgo daśa havīṃṣi ca
शब्द और स्पर्श, रूप और रस, गन्ध, वाणी, क्रिया, गति, तथा वीर्य, मूत्र और मल का त्याग—ये दस हवि हैं।
श्लोक 4 (14.22.4)
दिशो वायू रविश्चन्द्रः पृथ्व्यग्नी विष्णुरेव च । इन्द्रः प्रजापतिर्मित्रमग्नयो दश भामिनि ॥
diśo vāyū raviścandraḥ pṛthvyagnī viṣṇureva ca | indraḥ prajāpatirmitramagnayo daśa bhāmini
दिशाएँ, वायु, सूर्य और चन्द्रमा, पृथ्वी और अग्नि, विष्णु, इन्द्र, प्रजापति और मित्र—हे भामिनि! ये दस अग्नियाँ हैं।
श्लोक 5 (14.22.5)
दशेन्द्रियाणि होतृणि हवींषि दश भामिनि । विषया नाम समिधो हूयन्ते तु दशाग्निषु ॥
daśendriyāṇi hotṛṇi havīṃṣi daśa bhāmini | viṣayā nāma samidho hūyante tu daśāgniṣu
दस इन्द्रियाँ होता हैं और हवि भी दस हैं, हे भामिनि! विषय नाम की समिधाएँ दस अग्नियों में होमी जाती हैं।
श्लोक 6 (14.22.6)
चित्तं स्रुवश्च वित्तं च पवित्रं ज्ञानमुत्तमम् । सुविभक्तमिदं पूर्वं जगदासीदिति श्रुतम् ॥
cittaṃ sruvaśca vittaṃ ca pavitraṃ jñānamuttamam | suvibhaktamidaṃ pūrvaṃ jagadāsīditi śrutam
चित्त स्रुवा है और वित्त भी, और उत्तम ज्ञान पवित्र करने वाला है। सुना गया है कि यह जगत् पहले भली-भाँति विभक्त था।
श्लोक 7 (14.22.7)
ततो विविक्ता वित्तासीत्सा वित्तं पर्यवेक्षते । सर्वमेवात्र विज्ञेयं चित्ते ज्ञानमवेक्षता । रेतः शरीरभृत्काये विज्ञाता तु शरीरभृत् ॥
tato viviktā vittāsītsā vittaṃ paryavekṣate | sarvamevātra vijñeyaṃ citte jñānamavekṣatā | retaḥ śarīrabhṛtkāye vijñātā tu śarīrabhṛt
तब विविक्त (अलग) ज्ञात वस्तु उत्पन्न हुई और वह ज्ञात वस्तु को देखती है। यहाँ सब कुछ उसी को जानना चाहिए जो चित्त में ज्ञान की ओर दृष्टि रखता है: वीर्य देहधारी के शरीर में रहता है, पर जानने वाला स्वयं देहधारी है।
श्लोक 8 (14.22.8)
शरीरभृद्गार्हपत्यस्तस्मादग्निः प्रणीयते । मनश्चाहवनीयस्तु तस्मिन्प्रक्षिप्यते हविः ॥
śarīrabhṛdgārhapatyastasmādagniḥ praṇīyate | manaścāhavanīyastu tasminprakṣipyate haviḥ
देहधारी गार्हपत्य अग्नि है; उसी से दूसरी अग्नि निकाली जाती है, और मन आहवनीय है, जिसमें हवि डाली जाती है।
श्लोक 9 (14.22.9)
ततो वाचस्पतिर्जज्ञे तं मनः पर्यवेक्षते । रूपं भवति वै वक्त्रं तदनुद्रवते मनः ॥
tato vācaspatirjajñe taṃ manaḥ paryavekṣate | rūpaṃ bhavati vai vaktraṃ tadanudravate manaḥ
तब वाचस्पति उत्पन्न हुआ और मन उसे देखता है। रूप बनता है, मुख बनता है, और मन उसके पीछे दौड़ता है।
ब्राह्मण्युवाच
श्लोक 10 (14.22.10)
कस्माद्वागभवत्पूर्वं कस्मात्पश्चान्मनोऽभवत् । मनसा चिन्तितं पूर्वं वाक्यं समभिपद्यते ॥
kasmādvāgabhavatpūrvaṃ kasmātpaścānmano'bhavat | manasā cintitaṃ pūrvaṃ vākyaṃ samabhipadyate
वाणी पहले क्यों हुई और मन बाद में क्यों हुआ? क्योंकि वाक्य पहले मन से सोचा जाता है, तभी प्रकट होता है।
श्लोक 11 (14.22.11)
केन विज्ञानयोगेन मतिश्चित्तं समास्थिता । समुन्नीता नाध्यगच्छत्को वै तां प्रतिबाधते ॥
kena vijñānayogena matiścittaṃ samāsthitā | samunnītā nādhyagacchatko vai tāṃ pratibādhate
किस विज्ञान-योग से बुद्धि चित्त में स्थित हुई? ऊपर उठी हुई वह उसे प्राप्त नहीं हुई; वह कौन है जो उसे रोकता है?
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 12 (14.22.12)
तन्मनस्थः पतिर्भूत्वा तस्मात्प्रेहन्निवायति । तां मतिं मनसः प्राहुर्मनस्तस्मादपेक्षते ॥
tanmanasthaḥ patirbhūtvā tasmātprehannivāyati | tāṃ matiṃ manasaḥ prāhurmanastasmādapekṣate
मन में स्थित और स्वामी होकर वह इसीलिए मानो प्रयत्न करती हुई आती है। उसे वे मन की मति कहते हैं; इसी से मन उसकी अपेक्षा रखता है।
श्लोक 13 (14.22.13)
प्रश्नं तु वाङ्मनसयोर्यस्मात्त्वमनुपृच्छसि । तस्मात्ते वर्तयिष्यामि तयोरेव समाह्वयम् ॥
praśnaṃ tu vāṅmanasayoryasmāttvamanupṛcchasi | tasmātte vartayiṣyāmi tayoreva samāhvayam
क्योंकि तुम मुझसे वाणी और मन के विषय में पूछ रही हो, इसलिए मैं तुम्हें उन दोनों का वही विवाद सुनाता हूँ।
श्लोक 14 (14.22.14)
उभे वाङ्मनसी गत्वा भूतात्मानमपृच्छताम् । आवयोः श्रेष्ठमाचक्ष्व च्छिन्धि नौ संशयं विभो ॥
ubhe vāṅmanasī gatvā bhūtātmānamapṛcchatām | āvayoḥ śreṣṭhamācakṣva cchindhi nau saṃśayaṃ vibho
वाणी और मन दोनों ने जाकर भूतात्मा से पूछा, "बताइए, हम दोनों में कौन श्रेष्ठ है; हे विभो! हमारा संशय दूर कीजिए।"
श्लोक 15 (14.22.15)
मन इत्येव भगवांस्तदा प्राह सरस्वतीम् । अहं वै कामधुक्तुभ्यमिति तं प्राह वागथ ॥
mana ityeva bhagavāṃstadā prāha sarasvatīm | ahaṃ vai kāmadhuktubhyamiti taṃ prāha vāgatha
"मन ही", भगवान् ने तब सरस्वती से कहा। तब वाणी ने उनसे कहा, "मैं तो आपके लिए कामधेनु हूँ।"
श्लोक 16 (14.22.16)
स्थावरं जङ्गमं चैव विद्ध्युभे मनसी मम । स्थावरं मत्सकाशे वै जङ्गमं विषये तव ॥
sthāvaraṃ jaṅgamaṃ caiva viddhyubhe manasī mama | sthāvaraṃ matsakāśe vai jaṅgamaṃ viṣaye tava
"जान लो कि मेरे दो मन हैं—स्थावर और जंगम। स्थावर मेरे समीप है और जंगम तुम्हारे विषय में है।
श्लोक 17 (14.22.17)
यस्तु ते विषये गच्छन्मन्त्रो वर्णः स्वरोऽपि वा । तन्मनो जङ्गमं नाम तस्मादसि गरीयसी ॥
yastu te viṣaye gacchanmantro varṇaḥ svaro'pi vā | tanmano jaṅgamaṃ nāma tasmādasi garīyasī
जो भी मन्त्र, वर्ण या स्वर तुम्हारे विषय में आता है, वही मन जंगम कहलाता है; इसीलिए तुम श्रेष्ठ हो।"
श्लोक 18 (14.22.18)
तस्माद्भवितुमर्हामि स्वयमभ्येत्य शोभने । तस्मादुच्छ्वासमासाद्य प्रवक्ष्यामि सरस्वति ॥
tasmādbhavitumarhāmi svayamabhyetya śobhane | tasmāducchvāsamāsādya pravakṣyāmi sarasvati
इसलिए मैं ऐसा होने के योग्य हूँ, क्योंकि हे शोभने! तुम स्वयं मेरे पास आई हो; इसलिए हे सरस्वति! उच्छ्वास को पाकर मैं बोलूँगा।
श्लोक 19 (14.22.19)
प्राणापानावन्तरे यद्वाग्वै नित्यं स्म तिष्ठति । प्रीयमाणा महाभागे विना प्राणांश्च मामपि । प्रजापतिमुपाधावत्प्रसीद भगवन्निति ॥
prāṇāpānāvantare yadvāgvai nityaṃ sma tiṣṭhati | prīyamāṇā mahābhāge vinā prāṇāṃśca māmapi | prajāpatimupādhāvatprasīda bhagavanniti
प्राण और अपान के बीच वाणी सदा रहती है। हे महाभागे! प्रसन्न होती हुई, प्राणों के बिना और मेरे बिना भी, वह "हे भगवन्, प्रसन्न होइए" कहती हुई प्रजापति की शरण में दौड़ी।
श्लोक 20 (14.22.20)
ततः प्राणः प्रादुरभूद्वाचमाप्याययन्पुनः । तस्मादुच्छ्वासमासाद्य न वाग्वदति कर्हिचित् ॥
tataḥ prāṇaḥ prādurabhūdvācamāpyāyayanpunaḥ | tasmāducchvāsamāsādya na vāgvadati karhicit
तब प्राण प्रकट हुआ और उसने वाणी को फिर पुष्ट किया; इसीलिए उच्छ्वास को पाकर वाणी कभी नहीं बोलती।
श्लोक 21 (14.22.21)
घोषिणी जातनिर्घोषा नित्यमेव प्रवर्तते । तयोरपि च घोषिण्या निर्घोषैव गरीयसी ॥
ghoṣiṇī jātanirghoṣā nityameva pravartate | tayorapi ca ghoṣiṇyā nirghoṣaiva garīyasī
घोषवती वाणी, जिसमें ध्वनि उत्पन्न हो चुकी है, सदा चलती रहती है; फिर भी उन दोनों में निःशब्द वाणी घोष वाली से श्रेष्ठ है।
श्लोक 22 (14.22.22)
गौरिव प्रस्रवत्यर्थान्रसमुत्तमशालिनी । सततं स्यन्दते ह्येषा शाश्वतं ब्रह्मवादिनी ॥
gauriva prasravatyarthānrasamuttamaśālinī | satataṃ syandate hyeṣā śāśvataṃ brahmavādinī
गाय की तरह वह अर्थों को बहाती है, उत्तम रस से सम्पन्न है; वह निरन्तर बहती रहती है, शाश्वत ब्रह्मवादिनी है।
श्लोक 23 (14.22.23)
दिव्यादिव्यप्रभावेन भारती गौः शुचिस्मिते । एतयोरन्तरं पश्य सूक्ष्मयोर्यतमानयोः ॥
divyādivyaprabhāvena bhāratī gauḥ śucismite | etayorantaraṃ paśya sūkṣmayoryatamānayoḥ
हे शुचिस्मिते! दिव्य और अदिव्य प्रभाव से भारती गौ है; प्रयत्न करती हुई इन दोनों सूक्ष्म शक्तियों का अन्तर देखो।
ब्राह्मण्युवाच
श्लोक 24 (14.22.24)
अनुत्पन्नेषु वाक्येषु चोद्यमाना सिसृक्षया । किंन्नु पूर्वं तदा देवी व्याजहार सरस्वती ॥
anutpanneṣu vākyeṣu codyamānā sisṛkṣayā | kiṃnnu pūrvaṃ tadā devī vyājahāra sarasvatī
जब वाक्य अभी उत्पन्न नहीं हुए थे और सृष्टि की इच्छा से वह प्रेरित हो रही थी, तब देवी सरस्वती ने पहले क्या बोला?
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 25 (14.22.25)
प्राणेन या सम्भवते शरीरे । प्राणादपानं प्रतिपद्यते च । उदानभूता च विसृज्य देहं । व्यानेन सर्वं दिवमावृणोति ॥
prāṇena yā sambhavate śarīre | prāṇādapānaṃ pratipadyate ca | udānabhūtā ca visṛjya dehaṃ | vyānena sarvaṃ divamāvṛṇoti
जो प्राण के द्वारा शरीर में उत्पन्न होती है, वह प्राण से अपान को प्राप्त होती है; और उदान बनकर देह को छोड़कर व्यान के द्वारा सारे आकाश को ढक लेती है।
श्लोक 26 (14.22.26)
ततः समाने प्रतितिष्ठतीह । इत्येव पूर्वं प्रजजल्प वागपि । तस्मान्मनः स्थावरत्वाद्विशिष्टं । तथा देवी जङ्गमत्वाद्विशिष्टा ॥
tataḥ samāne pratitiṣṭhatīha | ityeva pūrvaṃ prajajalpa vāgapi | tasmānmanaḥ sthāvaratvādviśiṣṭaṃ | tathā devī jaṅgamatvādviśiṣṭā
"तब वह यहाँ समान में प्रतिष्ठित होती है"—ऐसा वाणी ने पहले कहा था। इसलिए मन स्थावर होने से श्रेष्ठ है और देवी भी जंगम होने से श्रेष्ठ है।