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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 21

ब्राह्मण-दम्पति संवाद: भीतर का सप्तविध यज्ञ

श्रीकृष्ण अर्जुन को एक ब्राह्मण और उसकी पत्नी की पुरानी कथा सुनाते हैं। पत्नी पूछती है कि सब कर्म छोड़कर बैठे पति के साथ उसे कौन-सा लोक मिलेगा। ब्राह्मण उत्तर देता है कि ज्ञान के बिना कर्म केवल मोह में डालता है; वह अदृश्य ब्रह्म, पाँच प्राणों और शरीर के भीतर स्थित वैश्वानर अग्नि का वर्णन करता है, जिसकी सात ज्वालाएँ, सात समिधाएँ और सात ऋत्विज् इन्द्रियाँ, उनके विषय, मन और बुद्धि हैं; इस प्रकार प्रत्येक अनुभव स्वयं एक यज्ञ है।

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वासुदेव उवाच

श्लोक 1 (14.21.1)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । दंपत्योः पार्थ संवादो योऽभवद्भरतर्षभ ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | daṃpatyoḥ pārtha saṃvādo yo'bhavadbharatarṣabha

इसी विषय में लोग यह पुरानी कथा सुनाते हैं—हे पार्थ, हे भरतश्रेष्ठ! एक पति-पत्नी का वह संवाद जो हुआ था।

श्लोक 2 (14.21.2)

ब्राह्मणी ब्राह्मणं कंचिज्ज्ञानविज्ञानपारगम् । दृष्ट्वा विविक्त आसीनं भार्या भर्तारमब्रवीत् ॥

brāhmaṇī brāhmaṇaṃ kaṃcijjñānavijñānapāragam | dṛṣṭvā vivikta āsīnaṃ bhāryā bhartāramabravīt

ज्ञान और विज्ञान के पारगामी एक ब्राह्मण को एकान्त में बैठा देखकर उसकी ब्राह्मणी पत्नी ने अपने पति से कहा,

ब्राह्मण्युवाच

श्लोक 3 (14.21.3)

कं नु लोकं गमिष्यामि त्वामहं पतिमाश्रिता । न्यस्तकर्माणमासीनं कीनाशमविचक्षणम् ॥

kaṃ nu lokaṃ gamiṣyāmi tvāmahaṃ patimāśritā | nyastakarmāṇamāsīnaṃ kīnāśamavicakṣaṇam

आपको पति बनाकर मैं किस लोक को जाऊँगी—आप तो सब कर्म छोड़कर निठल्ले बैठे हैं, कठोर और विवेकहीन हैं?

श्लोक 4 (14.21.4)

भार्याः पतिकृताँल्लोकानाप्नुवन्तीति नः श्रुतम् । त्वामहं पतिमासाद्य कां गमिष्यामि वै गतिम् ॥

bhāryāḥ patikṛtām̐llokānāpnuvantīti naḥ śrutam | tvāmahaṃ patimāsādya kāṃ gamiṣyāmi vai gatim

हमने सुना है कि स्त्रियाँ पति के कमाए हुए लोकों को पाती हैं। आपको पति पाकर मैं कौन-सी गति पाऊँगी?

वासुदेव उवाच

श्लोक 5 (14.21.5)

एवमुक्तः स शान्तात्मा तामुवाच हसन्निव । सुभगे नाभ्यसूयामि वाक्यस्यास्य तवानघे ॥

evamuktaḥ sa śāntātmā tāmuvāca hasanniva | subhage nābhyasūyāmi vākyasyāsya tavānaghe

ऐसा कहे जाने पर उस शान्तचित्त ब्राह्मण ने मानो हँसते हुए उससे कहा: हे सुभगे, हे निष्पापे! तुम्हारी इस बात से मैं रुष्ट नहीं होता।

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 6 (14.21.6)

ग्राह्यं दृश्यं तथा श्राव्यं यदिदं कर्म विद्यते । एतदेव व्यवस्यन्ति कर्म कर्मेति कर्मिणः ॥

grāhyaṃ dṛśyaṃ tathā śrāvyaṃ yadidaṃ karma vidyate | etadeva vyavasyanti karma karmeti karmiṇaḥ

यह जो ग्रहण करने, देखने और सुनने योग्य कर्म है—इसी को कर्म करने वाले "कर्म, कर्म" कहकर निश्चय करते हैं।

श्लोक 7 (14.21.7)

मोहमेव निगच्छन्ति कर्मिणो ज्ञानवर्जिताः । नैष्कर्म्यं न च लोकेऽस्मिन्मौर्तमित्युपलभ्यते ॥

mohameva nigacchanti karmiṇo jñānavarjitāḥ | naiṣkarmyaṃ na ca loke'sminmaurtamityupalabhyate

ज्ञान से रहित कर्म करने वाले मोह को ही प्राप्त होते हैं; और इस संसार में क्षण भर के लिए भी कर्मरहित अवस्था नहीं मिलती।

श्लोक 8 (14.21.8)

कर्मणा मनसा वाचा शुभं वा यदि वाऽशुभम् । जन्मादिमूर्तिभेदानां कर्म भूतेषु वर्तते ॥

karmaṇā manasā vācā śubhaṃ vā yadi vā'śubham | janmādimūrtibhedānāṃ karma bhūteṣu vartate

कर्म से, मन से और वाणी से—चाहे शुभ हो या अशुभ—जन्म आदि से लेकर सब रूपों वाले प्राणियों में कर्म चलता रहता है।

श्लोक 9 (14.21.9)

रक्षोभिर्वध्यमानेषु दृश्यश्राव्येषु कर्मसु । आत्मस्थमात्मना तेन दृष्टमायतनं मया ॥

rakṣobhirvadhyamāneṣu dṛśyaśrāvyeṣu karmasu | ātmasthamātmanā tena dṛṣṭamāyatanaṃ mayā

दृश्य और श्रव्य कर्मों के राक्षसों द्वारा नष्ट किए जाते समय मैंने उसी आत्मा के द्वारा आत्मा में स्थित उस धाम को देखा है,

श्लोक 10 (14.21.10)

यत्र तद्ब्रह्म निर्द्वन्द्वं यत्र सोमः सहाग्निना । व्यवायं कुरुते नित्यं धीरो भूतानि धारयन् ॥

yatra tadbrahma nirdvandvaṃ yatra somaḥ sahāgninā | vyavāyaṃ kurute nityaṃ dhīro bhūtāni dhārayan

जहाँ वह द्वन्द्वरहित ब्रह्म है, जहाँ सोम अग्नि के साथ नित्य संयोग करता है और धीर पुरुष प्राणियों को धारण करता है,

श्लोक 11 (14.21.11)

यत्र ब्रह्मादयो युक्तास्तदक्षरमुपासते । विद्वांसः सुव्रता यत्र शान्तात्मानो जितेन्द्रियाः ॥

yatra brahmādayo yuktāstadakṣaramupāsate | vidvāṃsaḥ suvratā yatra śāntātmāno jitendriyāḥ

जहाँ ब्रह्मा आदि समाहित होकर उस अक्षर की उपासना करते हैं, और जहाँ विद्वान्, उत्तम व्रत वाले, शान्तचित्त और जितेन्द्रिय पुरुष रहते हैं।

श्लोक 12 (14.21.12)

घ्राणेन न तदाघ्रेयं नास्वाद्यं चैव जिह्वया । स्पर्शनेन तदस्पृश्यं मनसा त्ववगम्यते ॥

ghrāṇena na tadāghreyaṃ nāsvādyaṃ caiva jihvayā | sparśanena tadaspṛśyaṃ manasā tvavagamyate

वह नाक से सूँघने योग्य नहीं, जीभ से चखने योग्य नहीं और त्वचा से छूने योग्य नहीं; वह केवल मन से जाना जाता है।

श्लोक 13 (14.21.13)

चक्षुषा न विषह्यं च यत्किञ्चिच्छ्रवणात्परम् । अगन्धमरसस्पर्शमरूपं शब्दवर्जितम् । यतः प्रवर्तते तन्त्रं यत्र चैतत्प्रतिष्ठितम् ॥

cakṣuṣā na viṣahyaṃ ca yatkiñcicchravaṇātparam | agandhamarasasparśamarūpaṃ śabdavarjitam | yataḥ pravartate tantraṃ yatra caitatpratiṣṭhitam

वह आँख से सहन करने (देखने) योग्य नहीं है और श्रवण से परे है; उसमें गन्ध, रस, स्पर्श और रूप नहीं है, वह शब्द से रहित है; उसी से यह सारा तन्त्र प्रवृत्त होता है और उसी में यह प्रतिष्ठित है।

श्लोक 14 (14.21.14)

प्राणोऽपानः समानश्च व्यानश्चोदान एव च । तत एव प्रवर्तन्ते तदेव प्रविशन्ति च ॥

prāṇo'pānaḥ samānaśca vyānaścodāna eva ca | tata eva pravartante tadeva praviśanti ca

प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—ये उसी से प्रकट होते हैं और उसी में प्रवेश करते हैं।

श्लोक 15 (14.21.15)

समानव्यानयोर्मध्ये प्राणापानौ विचेरतुः । तस्मिन्सुप्ते प्रलीयेते समानो व्यान एव च ॥

samānavyānayormadhye prāṇāpānau viceratuḥ | tasminsupte pralīyete samāno vyāna eva ca

समान और व्यान के बीच प्राण और अपान विचरते हैं; उसके सो जाने पर समान और व्यान लीन हो जाते हैं।

श्लोक 16 (14.21.16)

अपानप्राणयोर्मध्ये उदानो व्याप्य तिष्ठति । तस्माच्छयानं पुरुषं प्राणापानौ न मुञ्चतः ॥

apānaprāṇayormadhye udāno vyāpya tiṣṭhati | tasmācchayānaṃ puruṣaṃ prāṇāpānau na muñcataḥ

अपान और प्राण के बीच उदान व्याप्त होकर स्थित है; इसीलिए सोते हुए पुरुष को प्राण और अपान नहीं छोड़ते।

श्लोक 17 (14.21.17)

प्राणेनोपहते यत्तु तमुदानं प्रचक्षते । तस्मात्तपो व्यवस्यन्ति तद्भवं ब्रह्मवादिनः ॥

prāṇenopahate yattu tamudānaṃ pracakṣate | tasmāttapo vyavasyanti tadbhavaṃ brahmavādinaḥ

प्राण के द्वारा जो ऊपर उठाया जाता है, उसे उदान कहते हैं; इसी कारण ब्रह्मवादी उसी से उत्पन्न तप का निश्चय करते हैं।

श्लोक 18 (14.21.18)

तेषामन्योन्यसक्तानां सर्वेषां देहचारिणाम् । अग्निर्वैश्वानरो मध्ये सप्तधा विहितोऽन्तरा ॥

teṣāmanyonyasaktānāṃ sarveṣāṃ dehacāriṇām | agnirvaiśvānaro madhye saptadhā vihito'ntarā

परस्पर आसक्त इन सब देहधारियों के बीच वैश्वानर अग्नि सात प्रकार से भीतर स्थापित है।

श्लोक 19 (14.21.19)

घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक्च श्रोत्रं च पञ्चमम् । मनो बुद्धिश्च सप्तैता जिह्वा वैश्वानरार्चिषः ॥

ghrāṇaṃ jihvā ca cakṣuśca tvakca śrotraṃ ca pañcamam | mano buddhiśca saptaitā jihvā vaiśvānarārciṣaḥ

नाक, जीभ, आँख, त्वचा, पाँचवाँ कान, मन और बुद्धि—ये सात वैश्वानर की ज्वालाओं की जिह्वाएँ हैं।

श्लोक 20 (14.21.20)

घ्रेयं दृश्यं च पेयं च स्पृश्यं श्राव्यं तथैव च । मन्तव्यमवबोद्धव्यं ताः सप्त समिधो मताः ॥

ghreyaṃ dṛśyaṃ ca peyaṃ ca spṛśyaṃ śrāvyaṃ tathaiva ca | mantavyamavaboddhavyaṃ tāḥ sapta samidho matāḥ

सूँघने योग्य, देखने योग्य, पीने (चखने) योग्य, छूने योग्य, सुनने योग्य, मनन करने योग्य और जानने योग्य—ये सात समिधाएँ मानी गई हैं।

श्लोक 21 (14.21.21)

घ्राता भक्षयिता द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता च पञ्चमः । मन्ता बोद्धा च सप्तैते भवन्ति परमर्त्विजः ॥

ghrātā bhakṣayitā draṣṭā spraṣṭā śrotā ca pañcamaḥ | mantā boddhā ca saptaite bhavanti paramartvijaḥ

सूँघने वाला, खाने (चखने) वाला, देखने वाला, छूने वाला, पाँचवाँ सुनने वाला, मनन करने वाला और जानने वाला—ये सात श्रेष्ठ ऋत्विज् होते हैं।

श्लोक 22 (14.21.22)

घ्रेये पेये च दृश्ये च स्पृश्ये श्राव्ये तथैव च । मन्तव्येऽप्यथ बोद्धव्ये सुभगे पश्य सर्वदा ॥

ghreye peye ca dṛśye ca spṛśye śrāvye tathaiva ca | mantavye'pyatha boddhavye subhage paśya sarvadā

सूँघने, पीने, देखने, छूने और सुनने योग्य तथा मनन और ज्ञान के योग्य विषयों में—हे सुभगे! इन्हें सदा देखो।

श्लोक 23 (14.21.23)

हवींष्याग्निषु होतारः सप्तधा सप्तसप्तसु । सम्यक्प्रक्षिप्य विद्वांसो जनयन्ति स्वयोनिषु ॥

havīṃṣyāgniṣu hotāraḥ saptadhā saptasaptasu | samyakprakṣipya vidvāṃso janayanti svayoniṣu

ज्ञानी होता लोग सात-सात के रूप में सात अग्नियों में हवि भली-भाँति डालकर अपनी-अपनी योनियों में उत्पत्ति कराते हैं।

श्लोक 24 (14.21.24)

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । मनो बुद्धिश्च सप्तैता योनिरित्येव शब्दिताः ॥

pṛthivī vāyurākāśamāpo jyotiśca pañcamam | mano buddhiśca saptaitā yonirityeva śabditāḥ

पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ तेज, मन और बुद्धि—ये सात "योनि" कहे गए हैं।

श्लोक 25 (14.21.25)

हविर्भूतगुणाः सर्वे प्रविशन्त्यग्निजं मुखम् । अन्तर्वासमुषित्वा च जायन्ते स्वासु योनिषु ॥

havirbhūtaguṇāḥ sarve praviśantyagnijaṃ mukham | antarvāsamuṣitvā ca jāyante svāsu yoniṣu

सब गुण हविरूप होकर अग्नि से उत्पन्न मुख में प्रवेश करते हैं और भीतर निवास करके अपनी-अपनी योनियों में उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 26 (14.21.26)

तत्रैव च निरुध्यन्ते प्रलये भूतभावने । ततः संजायते गन्धस्ततः संजायते रसः ॥

tatraiva ca nirudhyante pralaye bhūtabhāvane | tataḥ saṃjāyate gandhastataḥ saṃjāyate rasaḥ

और भूतों को उत्पन्न करने वाले प्रलय में वे वहीं रुक जाते हैं। फिर गन्ध उत्पन्न होती है, फिर रस उत्पन्न होता है;

श्लोक 27 (14.21.27)

ततः संजायते रूपं ततः स्पर्शोऽभिजायते । ततः संजायते शब्दः संशयस्तत्र जायते । ततः संजायते निष्ठा जन्मैतत्सप्तधा विदुः ॥

tataḥ saṃjāyate rūpaṃ tataḥ sparśo'bhijāyate | tataḥ saṃjāyate śabdaḥ saṃśayastatra jāyate | tataḥ saṃjāyate niṣṭhā janmaitatsaptadhā viduḥ

उससे रूप उत्पन्न होता है, उससे स्पर्श पैदा होता है, उससे शब्द उत्पन्न होता है; वहाँ संशय उत्पन्न होता है और उससे निश्चय उत्पन्न होता है। इसी को वे सात प्रकार का जन्म जानते हैं।

श्लोक 28 (14.21.28)

अनेनैव प्रकारेण प्रगृहीतं पुरातनैः । पूर्णाहुतिभिरापूर्णास्ते पूर्यन्ते हि तेजसा ॥

anenaiva prakāreṇa pragṛhītaṃ purātanaiḥ | pūrṇāhutibhirāpūrṇāste pūryante hi tejasā

इसी प्रकार प्राचीन लोगों ने इसे समझा है। पूर्ण आहुतियों से पूर्ण हुए वे तेज से परिपूर्ण होते हैं।

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