आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 20
ब्राह्मण द्वारा आत्मदर्शन के योग का उपदेश
स्वर्ग से आया ब्राह्मण श्रीकृष्ण को मुक्त पुरुष के लक्षण बताता रहता है और फिर वह योग समझाता है जिससे शरीर के भीतर आत्मा का दर्शन होता है; मूँज से सींक निकालने का दृष्टान्त भी देता है। वह बताता है कि उसके शिष्य ने पाचन, प्राण-वायु और मन के विषय में प्रश्न किए और उसने शिष्य को मन को शरीर के भीतर एकाग्र करने का उपदेश देकर उत्तर दिया। अन्त में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि यह देवताओं का रहस्य है, जिसे स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र भी अपना सकते हैं, और निरन्तर लगे रहने वाले को छह महीने में योग सिद्ध हो जाता है।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 1 (14.20.1)
यः स्यादेकान्त आसीनस्तूष्णीं किञ्चिदचिन्तयन् । पूर्वंपूर्वं परित्यज्य स निरारम्भको भवेत् ॥
yaḥ syādekānta āsīnastūṣṇīṃ kiñcidacintayan | pūrvaṃpūrvaṃ parityajya sa nirārambhako bhavet
जो एकान्त में बैठा हुआ चुपचाप कुछ भी चिन्तन नहीं करता और एक-एक करके पहले की सब वस्तुओं को छोड़ता चला जाता है, वह सब आरम्भों से रहित हो जाता है।
श्लोक 2 (14.20.2)
सर्वमित्रः सर्वसहः शमे रक्तो जितेन्द्रियः । व्यपेतभयमन्युश्च कामहा मुच्यते नरः ॥
sarvamitraḥ sarvasahaḥ śame rakto jitendriyaḥ | vyapetabhayamanyuśca kāmahā mucyate naraḥ
जो सबका मित्र है, सब कुछ सहने वाला है, शान्ति में रमा हुआ और जितेन्द्रिय है, भय और क्रोध से रहित है तथा कामना का नाश कर चुका है, वह मनुष्य मुक्त हो जाता है।
श्लोक 3 (14.20.3)
आत्मवत्सर्वभूतेषु यश्चरेन्नियतः शुचिः । नित्यमेव यथान्यायं यश्चरेन्नियतेन्द्रियः । अमानी निरभीमानः सर्वतो मुक्त एव सः ॥
ātmavatsarvabhūteṣu yaścarenniyataḥ śuciḥ | nityameva yathānyāyaṃ yaścarenniyatendriyaḥ | amānī nirabhīmānaḥ sarvato mukta eva saḥ
जो संयमी और पवित्र होकर सब प्राणियों के साथ अपने समान व्यवहार करता है, जो सदा यथोचित रीति से और इन्द्रियों को वश में रखकर चलता है तथा मान और अभिमान से रहित है, वह सब ओर से मुक्त ही है।
श्लोक 4 (14.20.4)
जीवितं मरणं चोभे सुखदुःखे तथैव च । लाभालाभे प्रियद्वेष्ये यः समः स च मुच्यते ॥
jīvitaṃ maraṇaṃ cobhe sukhaduḥkhe tathaiva ca | lābhālābhe priyadveṣye yaḥ samaḥ sa ca mucyate
जीवन और मरण, सुख और दुःख, लाभ और हानि, प्रिय और अप्रिय—इन सबमें जो समभाव रखता है, वह मुक्त हो जाता है।
श्लोक 5 (14.20.5)
न कस्यचित्स्पृहयते नावजानाति किञ्चन । निर्द्वन्द्वो वीतरागात्मा सर्वथा मुक्त एव सः ॥
na kasyacitspṛhayate nāvajānāti kiñcana | nirdvandvo vītarāgātmā sarvathā mukta eva saḥ
जो किसी वस्तु की स्पृहा नहीं करता और किसी की भी अवज्ञा नहीं करता, जो द्वन्द्वों से परे और राग से रहित है, वह सर्वथा मुक्त ही है।
श्लोक 6 (14.20.6)
अनमित्रश्च निर्बन्धुरनपत्यश्च यः क्वचित् । त्यक्तधर्मार्थकामश्च निराकाङ्क्षी च मुच्यते ॥
anamitraśca nirbandhuranapatyaśca yaḥ kvacit | tyaktadharmārthakāmaśca nirākāṅkṣī ca mucyate
जिसका कोई शत्रु नहीं, कोई बन्धु नहीं और कहीं कोई सन्तान नहीं, जिसने धर्म, अर्थ और काम को त्याग दिया है और जो किसी आकांक्षा से रहित है, वह मुक्त हो जाता है।
श्लोक 7 (14.20.7)
नैव धर्मी न चाधर्मी पूर्वोपचितहा च यः । क्षीणधातुः प्रशान्तात्मा निर्द्वंद्वः स विमुच्यते ॥
naiva dharmī na cādharmī pūrvopacitahā ca yaḥ | kṣīṇadhātuḥ praśāntātmā nirdvaṃdvaḥ sa vimucyate
जो न धर्मी है न अधर्मी, जिसने पहले के संचित कर्मों का नाश कर दिया है, जिसकी धातुएँ क्षीण हो चुकी हैं और जिसका मन शान्त है, वह द्वन्द्वों से रहित पुरुष पूर्णतः मुक्त हो जाता है।
श्लोक 8 (14.20.8)
अकर्मा चाविकाङ्क्षश्च पश्येज्जगदशाश्वतम् । अस्वस्थमवशं नित्यं जन्ममृत्युजरायुतम् ॥
akarmā cāvikāṅkṣaśca paśyejjagadaśāśvatam | asvasthamavaśaṃ nityaṃ janmamṛtyujarāyutam
वह कर्म से रहित और आकांक्षा से रहित होकर जगत् को अनित्य देखे—अस्थिर, पराधीन और सदा जन्म, मृत्यु तथा जरा से घिरा हुआ।
श्लोक 9 (14.20.9)
वैराग्यबुद्धिः सततं तावद्दोषव्यपेक्षकः । आत्मबन्धविनिर्मोक्षं स करोत्यचिरादिव ॥
vairāgyabuddhiḥ satataṃ tāvaddoṣavyapekṣakaḥ | ātmabandhavinirmokṣaṃ sa karotyacirādiva
जिसकी बुद्धि निरन्तर वैराग्य में लगी है और जो संसार के दोषों पर दृष्टि रखता है, वह शीघ्र ही आत्मा के बन्धन से छुटकारा पा लेता है।
श्लोक 10 (14.20.10)
अगन्धमरसस्पर्शमशब्दमपरिग्रहम् । अरूपमनभिज्ञेयं दृष्ट्वाऽऽत्मानं विमुच्यते ॥
agandhamarasasparśamaśabdamaparigraham | arūpamanabhijñeyaṃ dṛṣṭvā''tmānaṃ vimucyate
जो आत्मा गन्ध, रस, स्पर्श और शब्द से रहित है, किसी परिग्रह से रहित है, रूपहीन है और साधारण ज्ञान से नहीं जाना जा सकता, उसे देखकर मनुष्य मुक्त हो जाता है।
श्लोक 11 (14.20.11)
पञ्चभूतगुणैर्हीनममूर्तिमदलेपकम् । अगुणं गुणभोक्तारं यः पश्यति स मुच्यते ॥
pañcabhūtaguṇairhīnamamūrtimadalepakam | aguṇaṃ guṇabhoktāraṃ yaḥ paśyati sa mucyate
जो पाँच भूतों के गुणों से रहित, निराकार, निर्लेप, निर्गुण होते हुए भी गुणों के भोक्ता उस आत्मा को देखता है, वह मुक्त हो जाता है।
श्लोक 12 (14.20.12)
विहाय सर्वसङ्कल्पान्बुद्ध्या शारीरमानसान् । शनैर्निर्वाणमाप्नोति निरिन्धन इवानलः ॥
vihāya sarvasaṅkalpānbuddhyā śārīramānasān | śanairnirvāṇamāpnoti nirindhana ivānalaḥ
बुद्धि से शरीर और मन के सब संकल्पों को त्यागकर वह धीरे-धीरे निर्वाण को प्राप्त होता है, जैसे ईंधन के बिना अग्नि शान्त हो जाती है।
श्लोक 13 (14.20.13)
सर्वसंस्कारनिर्मुक्तो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः । तपसा इन्द्रियग्रामं यश्चरेन्मुक्त एव सः ॥
sarvasaṃskāranirmukto nirdvandvo niṣparigrahaḥ | tapasā indriyagrāmaṃ yaścarenmukta eva saḥ
जो सब संस्कारों से मुक्त, द्वन्द्वों से रहित और अपरिग्रही है, तथा तप से इन्द्रिय-समूह को साधकर चलता है, वह मुक्त ही है।
श्लोक 14 (14.20.14)
विमुक्तः सर्वसंस्कारैस्ततो ब्रह्म सनातनम् । परमाप्नोति संशान्तमचलं नित्यमक्षरम् ॥
vimuktaḥ sarvasaṃskāraistato brahma sanātanam | paramāpnoti saṃśāntamacalaṃ nityamakṣaram
सब संस्कारों से छूटकर वह फिर सनातन ब्रह्म को प्राप्त होता है, जो परम, अत्यन्त शान्त, अचल, नित्य और अविनाशी है।
श्लोक 15 (14.20.15)
अतः परं प्रवक्ष्यामि योगशास्त्रमनुत्तमम् । यज्ज्ञात्वा सिद्धमात्मानं लोके पश्यन्ति योगिनः ॥
ataḥ paraṃ pravakṣyāmi yogaśāstramanuttamam | yajjñātvā siddhamātmānaṃ loke paśyanti yoginaḥ
अब मैं योगशास्त्र का वह सर्वोत्तम उपदेश कहूँगा, जिसे जानकर योगीजन इस लोक में सिद्ध आत्मा का दर्शन करते हैं।
श्लोक 16 (14.20.16)
तस्योपदेशं वक्ष्यामि यथावत्तन्निबोध मे । यैर्योगैर्भावयन्नित्यं पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥
tasyopadeśaṃ vakṣyāmi yathāvattannibodha me | yairyogairbhāvayannityaṃ paśyatyātmānamātmani
मैं उसका उपदेश कहूँगा; उसे मुझसे यथावत् समझ लो—जिन योग-साधनों से निरन्तर अभ्यास करता हुआ मनुष्य आत्मा में आत्मा को देखता है।
श्लोक 17 (14.20.17)
इन्द्रियाणि तु संहृत्य मन आत्मनि धारयेत् । तीव्रं तप्त्वा तपः पूर्वं मोक्षयोगं समाचरेत् ॥
indriyāṇi tu saṃhṛtya mana ātmani dhārayet | tīvraṃ taptvā tapaḥ pūrvaṃ mokṣayogaṃ samācaret
इन्द्रियों को समेटकर मन को आत्मा में स्थिर करे; पहले तीव्र तप करके फिर मोक्षयोग का आचरण करे।
श्लोक 18 (14.20.18)
तपस्वी नित्यसङ्कल्पो दम्भाहङ्कारवर्जितः । मनीषी मनसा विप्रः पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥
tapasvī nityasaṅkalpo dambhāhaṅkāravarjitaḥ | manīṣī manasā vipraḥ paśyatyātmānamātmani
तपस्वी, दृढ़ संकल्प वाला, दम्भ और अहंकार से रहित, विवेकशील ब्राह्मण मन के द्वारा आत्मा में आत्मा को देखता है।
श्लोक 19 (14.20.19)
स चेच्छक्रोत्ययं साधुर्योक्तुमात्मानमात्मनि । तत एकान्तशीलः स पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥
sa cecchakrotyayaṃ sādhuryoktumātmānamātmani | tata ekāntaśīlaḥ sa paśyatyātmānamātmani
यदि यह साधु पुरुष आत्मा को आत्मा में जोड़ने में समर्थ हो जाता है, तो एकान्त-स्वभाव वाला होकर वह आत्मा में आत्मा को देखता है।
श्लोक 20 (14.20.20)
संयतः सततं युक्त आत्मवान्विजितेन्द्रियः । यथा य आत्मनाऽऽत्मानं सम्प्रयुक्तः प्रपश्यति ॥
saṃyataḥ satataṃ yukta ātmavānvijitendriyaḥ | yathā ya ātmanā''tmānaṃ samprayuktaḥ prapaśyati
संयमी, सदा सावधान, आत्मवान् और जितेन्द्रिय पुरुष, पूर्ण समाधि में लगा हुआ, आत्मा के द्वारा आत्मा को देखता है।
श्लोक 21 (14.20.21)
यथाहि पुरुषः स्वप्ने दृष्ट्वा पश्यत्यसाविति । तथारूपमिवात्मानं साधुयुक्तः प्रपश्यति ॥
yathāhi puruṣaḥ svapne dṛṣṭvā paśyatyasāviti | tathārūpamivātmānaṃ sādhuyuktaḥ prapaśyati
जैसे मनुष्य स्वप्न में किसी को देखकर कहता है, "यह वही है", वैसे ही भली-भाँति योग में लगा हुआ पुरुष आत्मा को मानो उसी रूप में देखता है।
श्लोक 22 (14.20.22)
इषीकां च यथा मुञ्जात्कश्चिन्निष्कृष्य दर्शयेत् । योगी निष्कृष्य चात्मानं तथा पश्यति देहतः ॥
iṣīkāṃ ca yathā muñjātkaścinniṣkṛṣya darśayet | yogī niṣkṛṣya cātmānaṃ tathā paśyati dehataḥ
जैसे कोई मूँज में से सींक खींचकर दिखा दे, वैसे ही योगी शरीर में से आत्मा को खींचकर देखता है।
श्लोक 23 (14.20.23)
मुञ्जं शरीरमित्याहुरिषीकामात्मनि श्रिताम् । एतन्निदर्शनं प्रोक्तं योगविद्भिरनुत्तमम् ॥
muñjaṃ śarīramityāhuriṣīkāmātmani śritām | etannidarśanaṃ proktaṃ yogavidbhiranuttamam
शरीर को मूँज कहते हैं और उसमें स्थित आत्मा को सींक; योग जानने वालों ने यह सर्वोत्तम दृष्टान्त बताया है।
श्लोक 24 (14.20.24)
यदा हि युक्तमात्मानं सम्यक् पश्यति देहभूत् । न तस्येहेश्वरः कश्चित्त्रैलोक्यस्यापि यः प्रभुः ॥
yadā hi yuktamātmānaṃ samyak paśyati dehabhūt | na tasyeheśvaraḥ kaścittrailokyasyāpi yaḥ prabhuḥ
जब देहधारी अपने को योग में भली-भाँति लगा हुआ देखता है, तब यहाँ कोई उसका स्वामी नहीं रहता, तीनों लोकों का जो प्रभु है वह भी नहीं।
श्लोक 25 (14.20.25)
अन्यान्याश्चैव तनवो यथेष्टं प्रतिपद्यते । विनिर्भिद्य जरां मृत्युं न शोचति न हृष्यति ॥
anyānyāścaiva tanavo yatheṣṭaṃ pratipadyate | vinirbhidya jarāṃ mṛtyuṃ na śocati na hṛṣyati
वह इच्छानुसार दूसरे शरीर भी धारण कर लेता है; जरा और मृत्यु को भेदकर वह न शोक करता है, न हर्ष।
श्लोक 26 (14.20.26)
देवानामपि देवत्वं युक्तः कारयते वशी । ब्रह्म चाव्ययमाप्नोति हित्वा देहमशाश्वतम् ॥
devānāmapi devatvaṃ yuktaḥ kārayate vaśī | brahma cāvyayamāpnoti hitvā dehamaśāśvatam
योग में लगा हुआ जितेन्द्रिय पुरुष देवताओं को भी देवत्व प्राप्त करा सकता है; और नश्वर शरीर को छोड़कर अविनाशी ब्रह्म को पा लेता है।
श्लोक 27 (14.20.27)
विनश्यत्सु च लोकेषु न भयं तस्य जायते । क्लिश्यमानेषु भूतेषु न स क्लिश्यति केनचित् ॥
vinaśyatsu ca lokeṣu na bhayaṃ tasya jāyate | kliśyamāneṣu bhūteṣu na sa kliśyati kenacit
लोकों के नष्ट होने पर भी उसे भय नहीं होता; प्राणियों के पीड़ित होने पर भी वह किसी से पीड़ित नहीं होता।
श्लोक 28 (14.20.28)
दुःखशोकमलैर्घोरैः सङ्गस्नेहसमुद्भवैः । न विचाल्यते युक्तात्मा निस्पृहः शान्तमानसः ॥
duḥkhaśokamalairghoraiḥ saṅgasnehasamudbhavaiḥ | na vicālyate yuktātmā nispṛhaḥ śāntamānasaḥ
योग में लगा हुआ, निस्पृह और शान्त मन वाला पुरुष आसक्ति और स्नेह से उत्पन्न घोर दुःख, शोक और मलों से विचलित नहीं होता।
श्लोक 29 (14.20.29)
नैनं शस्त्राणि विध्यन्ते न मृत्युश्चास्य विद्यते । नातः सुखतरं किञ्चिल्लोके क्वचन दृश्यते ॥
nainaṃ śastrāṇi vidhyante na mṛtyuścāsya vidyate | nātaḥ sukhataraṃ kiñcilloke kvacana dṛśyate
उसे शस्त्र नहीं बेधते और उसके लिए मृत्यु नहीं है; संसार में इससे अधिक सुखदायी कुछ भी कहीं नहीं दिखाई देता।
श्लोक 30 (14.20.30)
सम्यग्युक्त्वा स आत्मानमात्मन्येव प्रतिष्ठिते । विनिवृत्तजरादुःखः सुखं स्वपिति चापि सः ॥
samyagyuktvā sa ātmānamātmanyeva pratiṣṭhite | vinivṛttajarāduḥkhaḥ sukhaṃ svapiti cāpi saḥ
भली-भाँति योग में लगकर वह आत्मा में ही स्थित हो जाता है; जरा और दुःख से छूटकर वह सुख से सोता भी है।
श्लोक 31 (14.20.31)
देहान्यथेष्टमभ्येति हित्वेमां मानुषीं तनुम् । निर्वेदस्तु न कर्तव्यो भुञ्जानेन कथञ्चन ॥
dehānyatheṣṭamabhyeti hitvemāṃ mānuṣīṃ tanum | nirvedastu na kartavyo bhuñjānena kathañcana
इस मानव शरीर को छोड़कर वह इच्छानुसार दूसरे शरीरों को प्राप्त होता है; किन्तु भोग करने वाले को कभी भी वैराग्य की ग्लानि नहीं करनी चाहिए।
श्लोक 32 (14.20.32)
सम्यग्युक्तो यदात्मानमात्मन्येव प्रपश्यति । तदैव न स्पृहयते साक्षादपि शतक्रतोः ॥
samyagyukto yadātmānamātmanyeva prapaśyati | tadaiva na spṛhayate sākṣādapi śatakratoḥ
जब भली-भाँति योग में लगा हुआ वह आत्मा में ही आत्मा को देखता है, तब वह साक्षात् शतक्रतु इन्द्र की भी इच्छा नहीं करता।
श्लोक 33 (14.20.33)
योगमेकान्तशीलस्तु यथा विन्दति तच्छृणु । दृष्टपूर्वां दिशं चिन्त्य यस्मिन्संनिवसेत्पुरे ॥
yogamekāntaśīlastu yathā vindati tacchṛṇu | dṛṣṭapūrvāṃ diśaṃ cintya yasminsaṃnivasetpure
सुनो, एकान्त-स्वभाव वाला पुरुष योग को कैसे पाता है: वह पहले देखी हुई किसी दिशा का और उस नगर का चिन्तन करे जिसमें वह रह सके।
श्लोक 34 (14.20.34)
पुरस्याभ्यन्तरे तस्य मनः स्थाप्यं न बाह्यतः । पुरस्याभ्यन्तरे तिष्ठन्यस्मिन्नावसथे वसेत् । तस्मिन्नावसथे धार्यं सबाह्याभ्यन्तरं मनः ॥
purasyābhyantare tasya manaḥ sthāpyaṃ na bāhyataḥ | purasyābhyantare tiṣṭhanyasminnāvasathe vaset | tasminnāvasathe dhāryaṃ sabāhyābhyantaraṃ manaḥ
उस नगर के भीतर ही मन को स्थापित करे, बाहर नहीं। नगर के भीतर रहता हुआ वह जिस घर में रहे, उसी घर में बाहर और भीतर सहित मन को टिकाए रखे।
श्लोक 35 (14.20.35)
प्रचिन्त्यावसथे कृत्स्नं यस्मिन्काये स पश्यति । तस्मिन्काये मनश्चास्य न च किञ्चन बाह्यतः ॥
pracintyāvasathe kṛtsnaṃ yasminkāye sa paśyati | tasminkāye manaścāsya na ca kiñcana bāhyataḥ
पूरे निवास का चिन्तन करके—जिस शरीर में वह देखता है—उसका मन उसी शरीर में रहता है और उसके लिए बाहर कुछ भी नहीं रहता।
श्लोक 36 (14.20.36)
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं निर्घोषे निर्जने वने । कायमभ्यन्तरं कृत्स्नमेकाग्रः परिचिन्तयेत् ॥
sanniyamyendriyagrāmaṃ nirghoṣe nirjane vane | kāyamabhyantaraṃ kṛtsnamekāgraḥ paricintayet
शब्दरहित, निर्जन वन में इन्द्रिय-समूह को रोककर वह एकाग्र होकर सम्पूर्ण भीतरी शरीर का चिन्तन करे।
श्लोक 37 (14.20.37)
दन्तांस्तालु च जिह्वां च गलं ग्रीवां तथैव च । हृदयं चिन्तयेच्चापि तथा हृदयबन्धनम् ॥
dantāṃstālu ca jihvāṃ ca galaṃ grīvāṃ tathaiva ca | hṛdayaṃ cintayeccāpi tathā hṛdayabandhanam
वह दाँतों, तालु और जीभ का, गले और गर्दन का तथा हृदय और हृदय के बन्धन का भी चिन्तन करे।
श्लोक 38 (14.20.38)
इत्युक्तः स मया शिष्यो मेधावी मधुसूदन । पप्रच्छ पुनरेवेमं मोक्षधर्मं सुदुर्वचम् ॥
ityuktaḥ sa mayā śiṣyo medhāvī madhusūdana | papraccha punarevemaṃ mokṣadharmaṃ sudurvacam
हे मधुसूदन! मेरे इस प्रकार उपदेश देने पर उस बुद्धिमान् शिष्य ने मोक्षधर्म के उस अत्यन्त दुर्वचनीय विषय के बारे में फिर पूछा।
काश्यप उवाच
श्लोक 39 (14.20.39)
भुक्तं भुक्तमिदं कोष्ठे कथमन्नं विपच्यते । कथं रसत्वं व्रजति शोणितत्वं कथं पुनः ॥
bhuktaṃ bhuktamidaṃ koṣṭhe kathamannaṃ vipacyate | kathaṃ rasatvaṃ vrajati śoṇitatvaṃ kathaṃ punaḥ
बार-बार खाया हुआ यह अन्न पेट में कैसे पचता है? वह रस कैसे बनता है और फिर रक्त कैसे बनता है?
श्लोक 40 (14.20.40)
तथा मांसं च मेदश्च स्नाय्वस्थीनि च पोषयेत् । कथमेतानि सर्वाणि शरीराणि शरीरिणाम् ॥
tathā māṃsaṃ ca medaśca snāyvasthīni ca poṣayet | kathametāni sarvāṇi śarīrāṇi śarīriṇām
और वह मांस, मेद, स्नायु और हड्डियों का पोषण कैसे करता है? देहधारियों के ये सब शरीर कैसे
श्लोक 41 (14.20.41)
वर्धन्ते वर्धमानस्य वर्धते च कथं बलम् । निरासनं निष्कसनं मलानां च पृथक् पृथक् ॥
vardhante vardhamānasya vardhate ca kathaṃ balam | nirāsanaṃ niṣkasanaṃ malānāṃ ca pṛthak pṛthak
बढ़ते हैं, जब मनुष्य बढ़ता है? और बल कैसे बढ़ता है? तथा मलों का निकलना और बाहर जाना अलग-अलग कैसे होता है?
श्लोक 42 (14.20.42)
कुतो वाऽयं प्रश्वसिति उच्छ्वसित्यपि वा पुनः । कं च देशमधिष्ठाय तिष्ठत्यात्माऽयमात्मनि ॥
kuto vā'yaṃ praśvasiti ucchvasityapi vā punaḥ | kaṃ ca deśamadhiṣṭhāya tiṣṭhatyātmā'yamātmani
यह श्वास कहाँ से बाहर निकालता है और फिर भीतर कैसे लेता है? और यह आत्मा किस स्थान को आश्रय बनाकर शरीर में ठहरता है?
श्लोक 43 (14.20.43)
जीवः कथं वहति च चेष्टमानः कलेवरम् । किंवर्णं कीदृशं चैव निवेशयति वै मनः ॥
jīvaḥ kathaṃ vahati ca ceṣṭamānaḥ kalevaram | kiṃvarṇaṃ kīdṛśaṃ caiva niveśayati vai manaḥ
जीव चेष्टा करता हुआ इस शरीर को कैसे धारण करता है? और वह मन को किस रंग और किस प्रकार का बनाकर स्थापित करता है?
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 44 (14.20.44)
याथातथ्येन भगवन्वक्तुमर्हसि मेऽनघ । इति सम्परिपृष्टोऽहं तेन विप्रेण माधव ॥
yāthātathyena bhagavanvaktumarhasi me'nagha | iti samparipṛṣṭo'haṃ tena vipreṇa mādhava
"हे भगवन्, हे निष्पाप! आप मुझे यह ठीक-ठीक बताने योग्य हैं।" हे माधव! उस ब्राह्मण के इस प्रकार भली-भाँति पूछने पर
श्लोक 45 (14.20.45)
प्रत्यब्रवं महाबाहो यथाश्रुतमरिंदम । यथा स्वकोष्ठे प्रक्षिप्य भाण्डं भाण्डमना भवेत् ॥
pratyabravaṃ mahābāho yathāśrutamariṃdama | yathā svakoṣṭhe prakṣipya bhāṇḍaṃ bhāṇḍamanā bhavet
हे महाबाहो, हे शत्रुदमन! मैंने जैसा सुना था वैसा उत्तर दिया: जैसे कोई अपने भण्डार में बर्तन रखकर उसी बर्तन में मन लगाए रखता है,
श्लोक 46 (14.20.46)
तथा स्वकाये प्रक्षिप्य मनोद्वारैरनिश्चलैः । आत्मानं तत्र मार्गेत प्रमादं परिवर्जयेत् ॥
tathā svakāye prakṣipya manodvārairaniścalaiḥ | ātmānaṃ tatra mārgeta pramādaṃ parivarjayet
वैसे ही मन को अपने शरीर में स्थापित करके, मन के अचल द्वारों से वह वहीं आत्मा को खोजे और प्रमाद से बचे।
श्लोक 47 (14.20.47)
एवं सततमुद्युक्तः प्रीतात्मा नचिरादिव । आसादयति तद्ब्रह्म यद्दृष्ट्वा स्यात्प्रधानवित् ॥
evaṃ satatamudyuktaḥ prītātmā nacirādiva | āsādayati tadbrahma yaddṛṣṭvā syātpradhānavit
इस प्रकार निरन्तर उद्यम में लगा और प्रसन्नचित्त पुरुष शीघ्र ही उस ब्रह्म को पा लेता है जिसे देखकर वह प्रधान का ज्ञाता हो जाता है।
श्लोक 48 (14.20.48)
न त्वसौ चक्षुषा ग्राह्यो न च सर्वैरपीन्द्रियैः । मनसैव प्रदीपेन महानात्मा प्रदृश्यते ॥
na tvasau cakṣuṣā grāhyo na ca sarvairapīndriyaiḥ | manasaiva pradīpena mahānātmā pradṛśyate
वह न आँख से पकड़ा जा सकता है, न सब इन्द्रियों से; केवल मन रूपी दीपक से ही महान् आत्मा दिखाई देता है।
श्लोक 49 (14.20.49)
सर्वतः पाणिपादान्तः सर्वतोक्षिशिरोमुखः । सर्वतः श्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
sarvataḥ pāṇipādāntaḥ sarvatokṣiśiromukhaḥ | sarvataḥ śrutimām̐lloke sarvamāvṛtya tiṣṭhati
सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर आँख, सिर और मुख वाला, लोक में सब ओर कान वाला वह सबको व्याप्त करके स्थित है।
श्लोक 50 (14.20.50)
जीवो निष्क्रान्तमात्मानं शरीरात्सम्प्रपश्यति । स तमुत्सृज्य देहं स्वं पारयेद्ब्रह्म केवलम् ॥
jīvo niṣkrāntamātmānaṃ śarīrātsamprapaśyati | sa tamutsṛjya dehaṃ svaṃ pārayedbrahma kevalam
जीव शरीर से निकले हुए आत्मा को देखता है; वह अपने उस शरीर को छोड़कर केवल ब्रह्म तक पहुँच जाता है।
श्लोक 51 (14.20.51)
आत्मानमालोकयति मनसा प्रहसन्निव । तदेवमाश्रयं कृत्वा मोक्षं याति ततो मयि ॥
ātmānamālokayati manasā prahasanniva | tadevamāśrayaṃ kṛtvā mokṣaṃ yāti tato mayi
वह मन से आत्मा को मानो हँसता हुआ देखता है; इसी को आश्रय बनाकर फिर वह मुझमें मोक्ष को प्राप्त होता है।
श्लोक 52 (14.20.52)
इदं सर्वरहस्यं ते मया प्रोक्तं द्विजोत्तम । आपृच्छे साधयिष्यामि गच्छ विप्र यथासुखम् ॥
idaṃ sarvarahasyaṃ te mayā proktaṃ dvijottama | āpṛcche sādhayiṣyāmi gaccha vipra yathāsukham
हे द्विजश्रेष्ठ! यह सारा रहस्य मैंने तुम्हें बता दिया। अब मैं आज्ञा लेता हूँ और अपना कार्य सिद्ध करूँगा; हे विप्र! तुम सुखपूर्वक जाओ।
श्लोक 53 (14.20.53)
इत्युक्तः स तदा कृष्ण मया शिष्यो महातपाः । अगच्छत यथाकामं ब्राह्मणश्छिन्नसंशयः ॥
ityuktaḥ sa tadā kṛṣṇa mayā śiṣyo mahātapāḥ | agacchata yathākāmaṃ brāhmaṇaśchinnasaṃśayaḥ
हे कृष्ण! मेरे ऐसा कहने पर संशयरहित हुआ वह महातपस्वी शिष्य ब्राह्मण इच्छानुसार चला गया।
वासुदेव उवाच
श्लोक 54 (14.20.54)
इत्युक्त्वा स तदा वाक्यं मां पार्थ द्विजसत्तमः । मोक्षधर्माश्रितं सम्यक् तत्रैवान्तरधीयत ॥
ityuktvā sa tadā vākyaṃ māṃ pārtha dvijasattamaḥ | mokṣadharmāśritaṃ samyak tatraivāntaradhīyata
हे पार्थ! मुझसे मोक्षधर्म पर आधारित ये वचन भली-भाँति कहकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण वहीं अन्तर्धान हो गया।
श्लोक 55 (14.20.55)
कच्चिदेतत्त्वया पार्थ श्रुतमेकाग्रचेतसा । तदापि हि रथस्थस्त्वं श्रुतवानेतदेव हि ॥
kaccidetattvayā pārtha śrutamekāgracetasā | tadāpi hi rathasthastvaṃ śrutavānetadeva hi
हे पार्थ! क्या तुमने इसे एकाग्र चित्त से सुना? उस समय भी तो रथ पर बैठे हुए तुमने यही उपदेश सुना था।
श्लोक 56 (14.20.56)
नैतत्पार्थ सुविज्ञेयं व्यामिश्रेणेति मे मतिः । नरेणाकृतसङ्गेन विशुद्धेनान्तरात्मना ॥
naitatpārtha suvijñeyaṃ vyāmiśreṇeti me matiḥ | nareṇākṛtasaṅgena viśuddhenāntarātmanā
हे पार्थ! मेरा मत है कि जिसका मन मिला-जुला (अशुद्ध) है, उसके लिए यह सहज समझ में आने योग्य नहीं है; यह उसी मनुष्य के लिए है जो आसक्ति नहीं करता और जिसकी अन्तरात्मा शुद्ध है।
श्लोक 57 (14.20.57)
सुरहस्यमिदं प्रोक्तं देवानां भरतर्षभ । कच्चित्त्विदं श्रुतं पार्थ मनुष्येणेह कर्हिचित् ॥
surahasyamidaṃ proktaṃ devānāṃ bharatarṣabha | kaccittvidaṃ śrutaṃ pārtha manuṣyeṇeha karhicit
हे भरतश्रेष्ठ! यह देवताओं का परम रहस्य कहा गया है। हे पार्थ! क्या कभी यहाँ किसी मनुष्य ने इसे सुना है?
श्लोक 58 (14.20.58)
न ह्येतच्छ्रोतुमर्होऽन्यो मनुष्यस्त्वामृतेऽनघ । नैतदन्येन विज्ञेयं व्यामिश्रेणान्तरात्मना ॥
na hyetacchrotumarho'nyo manuṣyastvāmṛte'nagha | naitadanyena vijñeyaṃ vyāmiśreṇāntarātmanā
हे निष्पाप! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई मनुष्य इसे सुनने के योग्य नहीं है; और जिसकी अन्तरात्मा मिली-जुली है, वह इसे समझ भी नहीं सकता।
श्लोक 59 (14.20.59)
क्रियावद्भिर्हि कौन्तेय देवलोकः समावृतः । न चैतदिष्टं देवानां मर्त्यैरुपरि वर्तनम् ॥
kriyāvadbhirhi kaunteya devalokaḥ samāvṛtaḥ | na caitadiṣṭaṃ devānāṃ martyairupari vartanam
हे कौन्तेय! देवलोक कर्मकाण्ड करने वालों से भरा हुआ है; और देवताओं को यह पसन्द नहीं कि मनुष्य उनसे ऊपर उठ जाएँ।
श्लोक 60 (14.20.60)
परा हि सा गतिः पार्थ यत्तद्ब्रह्म सनातनम् । यत्रामृतत्वं प्राप्नोति त्यक्त्वा दुःखं सदा सुखी ॥
parā hi sā gatiḥ pārtha yattadbrahma sanātanam | yatrāmṛtatvaṃ prāpnoti tyaktvā duḥkhaṃ sadā sukhī
हे पार्थ! वही परम गति है—वह सनातन ब्रह्म, जहाँ मनुष्य दुःख त्यागकर अमरत्व पाता है और सदा सुखी रहता है।
श्लोक 61 (14.20.61)
इमं धर्मं समास्थाय येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥
imaṃ dharmaṃ samāsthāya ye'pi syuḥ pāpayonayaḥ | striyo vaiśyāstathā śūdrāste'pi yānti parāṃ gatim
जो पापयोनि में उत्पन्न हों—स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र—वे भी इस धर्म का आश्रय लेकर परम गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 62 (14.20.62)
किं पुनर्ब्राह्मणाः पार्थ क्षत्रिया वा बहुश्रुताः । स्वधर्मरतयो नित्यं ब्रह्मलोकपरायणाः ॥
kiṃ punarbrāhmaṇāḥ pārtha kṣatriyā vā bahuśrutāḥ | svadharmaratayo nityaṃ brahmalokaparāyaṇāḥ
हे पार्थ! फिर उन ब्राह्मणों या बहुश्रुत क्षत्रियों का तो कहना ही क्या, जो सदा अपने धर्म में लगे रहते हैं और ब्रह्मलोक की ओर परायण हैं?
श्लोक 63 (14.20.63)
हेतुमच्चैतदुद्दिष्टमुपायाश्चास्य साधने । सिद्धिं फलं च मोक्षश्च दुःखस्य च विनिर्णयः ॥
hetumaccaitaduddiṣṭamupāyāścāsya sādhane | siddhiṃ phalaṃ ca mokṣaśca duḥkhasya ca vinirṇayaḥ
यह उपदेश युक्तियों सहित कहा गया है—इसके साधन के उपाय, इसकी सिद्धि और फल, मोक्ष तथा दुःख का निर्णय भी।
श्लोक 64 (14.20.64)
नातः परं सुखं त्वन्यत्किंचित्स्याद्भरतर्षभ । श्रुतवाञ्श्रद्दधानश्च पराक्रान्तश्च पाण्डव ॥
nātaḥ paraṃ sukhaṃ tvanyatkiṃcitsyādbharatarṣabha | śrutavāñśraddadhānaśca parākrāntaśca pāṇḍava
हे भरतश्रेष्ठ! इससे बढ़कर कोई दूसरा सुख नहीं हो सकता। हे पाण्डव! जिसने सुना है, जिसमें श्रद्धा है और जो पराक्रम करता है,
श्लोक 65 (14.20.65)
यः परित्यजते मर्त्यो लोकसारमसारवत् । एतैरुपायैः स क्षिप्रं परां गतिमवाप्नुते ॥
yaḥ parityajate martyo lokasāramasāravat | etairupāyaiḥ sa kṣipraṃ parāṃ gatimavāpnute
और जो संसार के सार को निःसार के समान त्याग देता है, वह इन उपायों से शीघ्र परम गति को पा लेता है।
श्लोक 66 (14.20.66)
एतावदेव वक्तव्यं नान्तो भूयोस्ति किञ्चन । षण्मासान्नित्ययुक्तस्य योगः पार्थ प्रवर्तते ॥
etāvadeva vaktavyaṃ nānto bhūyosti kiñcana | ṣaṇmāsānnityayuktasya yogaḥ pārtha pravartate
बस इतना ही कहना था, इससे अधिक कुछ नहीं है। हे पार्थ! जो निरन्तर लगा रहता है, उसे छह महीने में योग सिद्ध हो जाता है।