आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 19
कर्म, गर्भ और सज्जनों का आचरण
ब्राह्मण सिद्ध के उपदेश को आगे बढ़ाते हैं: कर्म कभी नष्ट नहीं होते बल्कि अपने क्षेत्र में पकते हैं, और जीव पिघले धातु के साँचे का आकार लेने की तरह गर्भ में प्रवेश करता है। वे दान और आत्मसंयम से लेकर माता-पिता, अतिथि और गुरु के सम्मान तक सज्जनों के आचरणों को गिनाते हैं और कहते हैं कि आचार ही धर्म को बताता है। फिर वे ब्रह्मा की सृष्टि, काल के निश्चित परिमाण और उस विवेकी पुरुष की बात कहते हैं जो सब सुख को दुःख जानकर परम पद की खोज में लगता है।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 1 (14.19.1)
शुभानामशुभानां च नेह नाशोस्ति कर्मणाम् । प्राप्यप्राप्यानुपच्यन्ते क्षेत्रेक्षेत्रे तथातथा ॥
śubhānāmaśubhānāṃ ca neha nāśosti karmaṇām | prāpyaprāpyānupacyante kṣetrekṣetre tathātathā
शुभ और अशुभ कर्मों का यहाँ नाश नहीं होता; वे बार-बार प्राप्त होकर एक-एक क्षेत्र में, उस-उस प्रकार पकते रहते हैं।
श्लोक 2 (14.19.2)
यथा प्रसूयमानस्तु फली दद्यात्फलं बहु । तथा स्याद्विपुलं पुण्यं शुद्धेन मनसा कृतम् ॥
yathā prasūyamānastu phalī dadyātphalaṃ bahu | tathā syādvipulaṃ puṇyaṃ śuddhena manasā kṛtam
जैसे फलदार वृक्ष फलने पर बहुत फल देता है, वैसे ही शुद्ध मन से किया हुआ पुण्य विपुल हो जाता है।
श्लोक 3 (14.19.3)
पापं चापि तथैव स्यात्पापेन मनसा कृतम् । पुरोधाय मनो हीह कर्मण्यात्मा प्रवर्तते ॥
pāpaṃ cāpi tathaiva syātpāpena manasā kṛtam | purodhāya mano hīha karmaṇyātmā pravartate
उसी प्रकार पापी मन से किया हुआ पाप भी बढ़ता है; क्योंकि आत्मा मन को आगे रखकर ही कर्म में प्रवृत्त होता है।
श्लोक 4 (14.19.4)
यथा कर्मसमाविष्टः काममन्युसमावृतः । नरो गर्भं प्रविशति तत्रापि शृणु चोत्तरम् ॥
yathā karmasamāviṣṭaḥ kāmamanyusamāvṛtaḥ | naro garbhaṃ praviśati tatrāpi śṛṇu cottaram
कर्मों से बँधा हुआ, काम और क्रोध से घिरा मनुष्य जिस प्रकार गर्भ में प्रवेश करता है, उसे भी और आगे की बात को भी सुनो।
श्लोक 5 (14.19.5)
शुक्रं शोणितसंसृष्टं स्त्रिया गर्भाशयं गतम् । क्षेत्रं कर्मजमाप्नोति शुभं वा यदि वाऽशुभम् ॥
śukraṃ śoṇitasaṃsṛṣṭaṃ striyā garbhāśayaṃ gatam | kṣetraṃ karmajamāpnoti śubhaṃ vā yadi vā'śubham
रक्त से मिला हुआ वीर्य स्त्री के गर्भाशय में पहुँचकर कर्म से उत्पन्न क्षेत्र को पाता है, चाहे वह शुभ हो या अशुभ।
श्लोक 6 (14.19.6)
सौक्ष्म्यादव्यक्तभावाच्च न च क्वचन सज्जति । सम्प्राप्य ब्रह्मणः कायं तस्मात्तद्ब्रह्म शाश्वतम् ॥
saukṣmyādavyaktabhāvācca na ca kvacana sajjati | samprāpya brahmaṇaḥ kāyaṃ tasmāttadbrahma śāśvatam
अपनी सूक्ष्मता और अव्यक्त स्वभाव के कारण वह कहीं भी आसक्त नहीं होता। ब्रह्म के शरीर को पाकर इसीलिए वह शाश्वत ब्रह्म है।
श्लोक 7 (14.19.7)
तद्बीजं सर्वभूतानां तेन जीवन्ति जन्तवः ॥
tadbījaṃ sarvabhūtānāṃ tena jīvanti jantavaḥ
वही सब प्राणियों का बीज है; उसी से जीव जीवित रहते हैं।
श्लोक 8 (14.19.8)
स जीवः सर्वभूतानां गर्भमाविश्य भागशः । दधाति चेतना सद्यः प्राणस्थानेष्ववस्थितः । ततः स्पन्दयतेऽङ्गानि स गर्भश्चेतनान्वितः ॥
sa jīvaḥ sarvabhūtānāṃ garbhamāviśya bhāgaśaḥ | dadhāti cetanā sadyaḥ prāṇasthāneṣvavasthitaḥ | tataḥ spandayate'ṅgāni sa garbhaścetanānvitaḥ
वह जीव सब प्राणियों के गर्भ में अंश-अंश करके प्रवेश कर, प्राणों के स्थानों में स्थित होकर, तुरन्त चेतना से उसे धारण करता है; तब चेतना से युक्त वह गर्भ अपने अंगों को हिलाता है।
श्लोक 9 (14.19.9)
यथा लोहस्य विष्यन्दो निषिक्तो बिम्बविग्रहम् । उपैति तद्वज्जानीहि गर्भे जीवप्रवेशनम् ॥
yathā lohasya viṣyando niṣikto bimbavigraham | upaiti tadvajjānīhi garbhe jīvapraveśanam
जैसे साँचे में उँडेला हुआ पिघला लोहा साँचे का आकार ले लेता है, वैसे ही गर्भ में जीव के प्रवेश को जानो।
श्लोक 10 (14.19.10)
लोहपिण्डं यथा वह्निः प्रविश्य ह्यतितापयेत् । तथा त्वमपि जानीहि गर्भे जीवोपपादनम् ॥
lohapiṇḍaṃ yathā vahniḥ praviśya hyatitāpayet | tathā tvamapi jānīhi garbhe jīvopapādanam
जैसे अग्नि लोहे के पिण्ड में प्रवेश करके उसे खूब तपा देती है, वैसे ही तुम गर्भ में जीव के प्रवेश को भी जानो।
श्लोक 11 (14.19.11)
यथा च दीपः शरणं दीप्यमानः प्रकाशयेत् । एवमेव शरीराणि प्रकाशयति चेतनः ॥
yathā ca dīpaḥ śaraṇaṃ dīpyamānaḥ prakāśayet | evameva śarīrāṇi prakāśayati cetanaḥ
और जैसे जलता हुआ दीपक घर को प्रकाशित करता है, वैसे ही चेतना शरीरों को प्रकाशित करती है।
श्लोक 12 (14.19.12)
यद्यच्च कुरुते कर्म शुभं वा यदि वाऽशुभम् । पूर्वदेहकृतं सर्वमवश्यमुपभुज्यते ॥
yadyacca kurute karma śubhaṃ vā yadi vā'śubham | pūrvadehakṛtaṃ sarvamavaśyamupabhujyate
वह जो भी शुभ या अशुभ कर्म करता है, पूर्व शरीर में किया हुआ वह सब उसे अवश्य भोगना पड़ता है।
श्लोक 13 (14.19.13)
ततस्तु क्षीयते चैव पुनश्चान्यत्प्रचीयते । यावत्तु मोक्षयोगस्थं धर्मं नैवावबुध्यते ॥
tatastu kṣīyate caiva punaścānyatpracīyate | yāvattu mokṣayogasthaṃ dharmaṃ naivāvabudhyate
तब वह क्षीण होता है और दूसरा संचित होता जाता है, जब तक वह मोक्ष के साधन में स्थित धर्म को नहीं समझ लेता।
श्लोक 14 (14.19.14)
तत्ते धर्मं प्रवक्ष्यामि सुखी भवति येन वै । आवर्तमानो जातीषु यथाऽन्योन्यासु सत्तम ॥
tatte dharmaṃ pravakṣyāmi sukhī bhavati yena vai | āvartamāno jātīṣu yathā'nyonyāsu sattama
हे सत्पुरुष, मैं तुम्हें वह धर्म बताऊँगा जिससे एक के बाद दूसरे जन्मों में घूमता हुआ मनुष्य सुखी होता है।
श्लोक 15 (14.19.15)
दानं व्रतं ब्रह्मचर्यं यथोक्तव्रतधारणम् । दमः प्रशान्तता चैव भूतानां चानुकम्पनम् ॥
dānaṃ vrataṃ brahmacaryaṃ yathoktavratadhāraṇam | damaḥ praśāntatā caiva bhūtānāṃ cānukampanam
दान, व्रत, ब्रह्मचर्य, विधि के अनुसार व्रतों का पालन, दम, शान्ति और प्राणियों पर दया;
श्लोक 16 (14.19.16)
संयमश्चानृशंस्यं च परस्वादानवर्जनम् । व्यलीकानामकरणं भूतानां मनसा भुवि ॥
saṃyamaścānṛśaṃsyaṃ ca parasvādānavarjanam | vyalīkānāmakaraṇaṃ bhūtānāṃ manasā bhuvi
संयम, क्रूरता का अभाव, दूसरों के धन को न लेना, और इस भूमि पर प्राणियों के प्रति मन से भी अनिष्ट न करना;
श्लोक 17 (14.19.17)
मातापित्रोश्च शुश्रूषा देवतातिथिपूजनम् । गुरुपूजा घृणा शौचं नित्यमिन्द्रियसंयमः ॥
mātāpitrośca śuśrūṣā devatātithipūjanam | gurupūjā ghṛṇā śaucaṃ nityamindriyasaṃyamaḥ
माता-पिता की सेवा, देवताओं और अतिथियों का पूजन, गुरु की पूजा, करुणा, पवित्रता और इन्द्रियों का नित्य संयम;
श्लोक 18 (14.19.18)
प्रवर्तनं शुभानां च तत्सतां व्रतमुच्यते । ततो धर्मः प्रभवति यः प्रजाः पाति शाश्वतीः ॥
pravartanaṃ śubhānāṃ ca tatsatāṃ vratamucyate | tato dharmaḥ prabhavati yaḥ prajāḥ pāti śāśvatīḥ
और शुभ कर्मों में प्रवृत्त होना—यही सज्जनों का व्रत कहा जाता है। उससे वह धर्म उत्पन्न होता है जो प्रजाओं की सदा रक्षा करता है।
श्लोक 19 (14.19.19)
सद्भिराचरितो धर्मः सदाचारे प्रतिष्ठितः । उभयार्थो भवत्येव स्वर्गार्थो मोक्षतस्तथा ॥
sadbhirācarito dharmaḥ sadācāre pratiṣṭhitaḥ | ubhayārtho bhavatyeva svargārtho mokṣatastathā
सज्जनों द्वारा आचरित धर्म सदाचार में प्रतिष्ठित है; वह दोनों प्रयोजन सिद्ध करता है—स्वर्ग का भी और उसी प्रकार मोक्ष का भी।
श्लोक 20 (14.19.20)
एवं सत्सु सदा पश्येत्तत्र चाप्येषा ध्रुवा स्थितिः । आचारो धर्ममाचष्टे यस्मिन्सन्तो व्यवस्थिताः ॥
evaṃ satsu sadā paśyettatra cāpyeṣā dhruvā sthitiḥ | ācāro dharmamācaṣṭe yasminsanto vyavasthitāḥ
इसलिए सदा सज्जनों की ओर देखना चाहिए; क्योंकि उनमें भी यही ध्रुव स्थिति है। आचार धर्म को बताता है, और सज्जन उसी आचार में स्थित रहते हैं।
श्लोक 21 (14.19.21)
तेषु तत्कर्म निक्षिप्तं यः स धर्मः सनातनः । यस्तं समभिपद्येत न स दुर्गतिमाप्नुयात् ॥
teṣu tatkarma nikṣiptaṃ yaḥ sa dharmaḥ sanātanaḥ | yastaṃ samabhipadyeta na sa durgatimāpnuyāt
उनमें जो कर्म प्रतिष्ठित है, वही सनातन धर्म है। जो उसे अपनाता है, वह दुर्गति को नहीं पाता।
श्लोक 22 (14.19.22)
अतो नियम्यते लोकः प्रच्यवन्धर्मवर्त्मसु । यश्च योगी च मुक्तश्च स एतेभ्यो विशिष्यते ॥
ato niyamyate lokaḥ pracyavandharmavartmasu | yaśca yogī ca muktaśca sa etebhyo viśiṣyate
इसलिए धर्म के मार्गों से च्युत होता हुआ संसार नियन्त्रित किया जाता है। किन्तु जो योगी और मुक्त है, वह इन सबसे श्रेष्ठ है।
श्लोक 23 (14.19.23)
वर्तमानस्य धर्मेण पुरुषस्य यथा तथा । संसारतारणं ह्यस्य कालेन महता भवेत् ॥
vartamānasya dharmeṇa puruṣasya yathā tathā | saṃsāratāraṇaṃ hyasya kālena mahatā bhavet
जो पुरुष किसी भी प्रकार धर्म के अनुसार चलता है, उसके लिए संसार से पार होना दीर्घ काल में सम्भव होता है।
श्लोक 24 (14.19.24)
एवं पूर्वकृतं कर्म सर्वो जन्तुः प्रपद्यते । सर्वं तत्कारणं येन निकृतोऽयमिहागतः ॥
evaṃ pūrvakṛtaṃ karma sarvo jantuḥ prapadyate | sarvaṃ tatkāraṇaṃ yena nikṛto'yamihāgataḥ
इस प्रकार प्रत्येक प्राणी पूर्वकृत कर्म को प्राप्त होता है। वह सब वही कारण है जिससे यह जीव गिरकर यहाँ आया है।
श्लोक 25 (14.19.25)
शरीरग्रहणं चास्य केन पूर्वं प्रकल्पितम् । इत्येवं संशये लोके तच्च वक्ष्याम्यतः परम् ॥
śarīragrahaṇaṃ cāsya kena pūrvaṃ prakalpitam | ityevaṃ saṃśaye loke tacca vakṣyāmyataḥ param
और इसके लिए शरीर धारण करना पहले किसने निश्चित किया? लोक में यह जो संशय है, उसे मैं अब आगे कहता हूँ।
श्लोक 26 (14.19.26)
शरीरमात्मनः कृत्वा सर्वलोकपितामहः । त्रैलोक्यमसृजद्ब्रह्मा कृत्स्नं स्थावरजङ्गमम् ॥
śarīramātmanaḥ kṛtvā sarvalokapitāmahaḥ | trailokyamasṛjadbrahmā kṛtsnaṃ sthāvarajaṅgamam
सब लोकों के पितामह ब्रह्मा ने अपना शरीर बनाकर चर और अचर सहित सम्पूर्ण त्रिलोकी की सृष्टि की।
श्लोक 27 (14.19.27)
ततः प्रधानमसृजच्चेतनां तु शरीरिणाम् । यया सर्वमिदं व्याप्तं यां लोके परमां विदुः ॥
tataḥ pradhānamasṛjaccetanāṃ tu śarīriṇām | yayā sarvamidaṃ vyāptaṃ yāṃ loke paramāṃ viduḥ
फिर उसने प्रधान की सृष्टि की, जो देहधारियों की चेतना है, जिससे यह सब व्याप्त है और जिसे संसार में परम माना जाता है।
श्लोक 28 (14.19.28)
इदं तत्क्षरमित्युक्तं परं त्वमृतमक्षरम् । त्रयाणां मिथुनं सर्वमेकैकस्य पृथक्पृथक् ॥
idaṃ tatkṣaramityuktaṃ paraṃ tvamṛtamakṣaram | trayāṇāṃ mithunaṃ sarvamekaikasya pṛthakpṛthak
यह क्षर कहा गया है, और परम तो अमृत और अक्षर है। तीनों का यह सब मिथुन है, प्रत्येक का अलग-अलग।
श्लोक 29 (14.19.29)
असृजत्सर्वभूतानि पूर्वदृष्टः प्रजापतिः । स्थावराणि च भूतानि इत्येषा पौर्विकी श्रुतिः ॥
asṛjatsarvabhūtāni pūrvadṛṣṭaḥ prajāpatiḥ | sthāvarāṇi ca bhūtāni ityeṣā paurvikī śrutiḥ
पूर्वकाल में जाने गए प्रजापति ने सब प्राणियों की सृष्टि की, और स्थावर प्राणियों की भी—ऐसी प्राचीन श्रुति है।
श्लोक 30 (14.19.30)
तस्य कालपरीमाणमकरोत्स पितामहः । भूतेषु परिवृत्तिं च पुनरावृत्तिमेव च ॥
tasya kālaparīmāṇamakarotsa pitāmahaḥ | bhūteṣu parivṛttiṃ ca punarāvṛttimeva ca
उस पितामह ने उसके लिए काल का परिमाण निश्चित किया, तथा प्राणियों में आवर्तन और पुनरावर्तन भी।
श्लोक 31 (14.19.31)
यथा तु कश्चिन्मेधावी दृष्टात्मा पूर्वजन्मनि । यत्प्रवक्ष्यामि तत्सर्वं यथावदुपपद्यते ॥
yathā tu kaścinmedhāvī dṛṣṭātmā pūrvajanmani | yatpravakṣyāmi tatsarvaṃ yathāvadupapadyate
जैसे कोई बुद्धिमान, जिसने पूर्वजन्म में आत्मा को देख लिया हो—मैं जो कुछ कहूँगा वह सब ठीक वैसा ही सिद्ध होता है।
श्लोक 32 (14.19.32)
सुखदुःखे यथा सम्यगनित्ये यः प्रपश्यति । कायं चामेध्यसंस्थानं विनाशं कर्मसंहितम् ॥
sukhaduḥkhe yathā samyaganitye yaḥ prapaśyati | kāyaṃ cāmedhyasaṃsthānaṃ vināśaṃ karmasaṃhitam
जो सुख और दुःख को ठीक-ठीक अनित्य देखता है, शरीर को अपवित्र पदार्थों का समूह जानता है और विनाश को कर्मों से बँधा हुआ देखता है,
श्लोक 33 (14.19.33)
यच्च किञ्चित्सुखं तच्च दुःखं दृष्टमिति स्मरन् । संसारसागरं घोरं तरिष्यति सुदुस्तरम् ॥
yacca kiñcitsukhaṃ tacca duḥkhaṃ dṛṣṭamiti smaran | saṃsārasāgaraṃ ghoraṃ tariṣyati sudustaram
और यह स्मरण करता है कि जो कुछ सुख है वह भी दुःख ही देखा गया है, वह घोर और अत्यन्त दुस्तर संसार-सागर को पार कर जाएगा।
श्लोक 34 (14.19.34)
जनीमरणरोगैश्च समाविष्टः प्रधानवित् । चेतनावत्सु चैतन्यं समं भूतेषु पश्यति ॥
janīmaraṇarogaiśca samāviṣṭaḥ pradhānavit | cetanāvatsu caitanyaṃ samaṃ bhūteṣu paśyati
जन्म, मृत्यु और रोगों से घिरा हुआ जो प्रधान को जानने वाला है, वह चेतन प्राणियों में चैतन्य को सब भूतों में समान देखता है।
श्लोक 35 (14.19.35)
निर्विद्यते ततः कश्चिन्मार्गमाणः परं पदम् । तस्योपदेशं वक्ष्यामि याथातथ्येन सत्तम ॥
nirvidyate tataḥ kaścinmārgamāṇaḥ paraṃ padam | tasyopadeśaṃ vakṣyāmi yāthātathyena sattama
तब संसार से विरक्त होकर कोई परम पद को खोजता है। हे सत्पुरुष, मैं उसका उपदेश ठीक-ठीक बताऊँगा।
श्लोक 36 (14.19.36)
शाश्वतस्याव्ययस्याथ यदस्य ज्ञानमुत्तमम् । प्रोच्यमानं मया विप्र निबोधेदमशेषतः ॥
śāśvatasyāvyayasyātha yadasya jñānamuttamam | procyamānaṃ mayā vipra nibodhedamaśeṣataḥ
हे ब्राह्मण, इस शाश्वत और अविनाशी पद का जो परम ज्ञान है, उसे मेरे कहते समय पूर्ण रूप से सुनो।