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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 18

सिद्ध द्वारा मृत्यु और पुनर्जन्म का वर्णन

ब्राह्मण की कथा को आगे बढ़ाते हुए काश्यप सिद्ध से पूछते हैं कि प्राणी शरीर कैसे छोड़ता है, फिर कैसे जन्म लेता है और अपने कर्मों का फल कैसे भोगता है। सिद्ध बताते हैं कि हानिकारक आचरण और कुपित भीतरी ऊष्मा मर्मस्थानों को कैसे भेदती है, जीव कैसे पीड़ा के साथ निकलता है और सिद्ध उसे दिव्य दृष्टि से कैसे देखते हैं। वे पृथ्वी को कर्मभूमि, अधोगति की पीड़ा और तारों, चन्द्र तथा सूर्य के उन लोकों का वर्णन करते हैं जिन्हें पुण्य से पाया जा सकता है पर जिनसे पतन होता है, और अन्त में गर्भ की उत्पत्ति कहने का वचन देते हैं।

अध्याय 17अध्याय-सूचीअध्याय 19

वासुदेव उवाच

श्लोक 1 (14.18.1)

ततस्तस्योपसङ्गृह्य पादौ प्रश्नान्सुदुर्वचान् । पप्रच्छ तांश्च धर्मान्स प्राह धर्मभृतांवरः ॥

tatastasyopasaṅgṛhya pādau praśnānsudurvacān | papraccha tāṃśca dharmānsa prāha dharmabhṛtāṃvaraḥ

तब उसके चरण पकड़कर उसने उन अत्यन्त कठिन प्रश्नों को पूछा और उन धर्म-सम्बन्धी बातों को भी पूछा; और धर्म को धारण करने वालों में श्रेष्ठ उसने उत्तर दिया।

काश्यप उवाच

श्लोक 2 (14.18.2)

कथं शरीराच्च्यवते कथं चैवोपपद्यते । कथं कष्टाच्च संसारात्संसरन्परिमुच्यते ॥

kathaṃ śarīrāccyavate kathaṃ caivopapadyate | kathaṃ kaṣṭācca saṃsārātsaṃsaranparimucyate

प्राणी शरीर से कैसे च्युत होता है और कैसे फिर उत्पन्न होता है? इस कष्टमय संसार में भटकता हुआ वह उससे कैसे मुक्त होता है?

श्लोक 3 (14.18.3)

आत्मानं वा कथं युक्त्वा तच्छरीरं विमुञ्चति । शरीरे च विनिर्मुक्तो कथमन्यत्प्रपद्यते ॥

ātmānaṃ vā kathaṃ yuktvā taccharīraṃ vimuñcati | śarīre ca vinirmukto kathamanyatprapadyate

और आत्मा को योग में लगाकर वह उस शरीर को कैसे छोड़ता है? शरीर से मुक्त होकर वह दूसरे शरीर को कैसे प्राप्त होता है?

श्लोक 4 (14.18.4)

कथं शुभाशुभे चायं कर्मणी स्वकृते नरः । उपभुङ्क्ते क्व वा कर्म विदेहस्योपतिष्ठते ॥

kathaṃ śubhāśubhe cāyaṃ karmaṇī svakṛte naraḥ | upabhuṅkte kva vā karma videhasyopatiṣṭhate

मनुष्य अपने किए हुए शुभ और अशुभ कर्मों का फल कैसे भोगता है? और देहरहित हो जाने पर उसका कर्म कहाँ टिका रहता है?

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 5 (14.18.5)

एवं सञ्चोदितः सिद्धः प्रश्नांस्तान्प्रत्यभाषत । आनुपूर्व्येण वार्ष्णेय तन्मे निगदतः शृणु ॥

evaṃ sañcoditaḥ siddhaḥ praśnāṃstānpratyabhāṣata | ānupūrvyeṇa vārṣṇeya tanme nigadataḥ śṛṇu

इस प्रकार प्रेरित किए जाने पर सिद्ध ने उन प्रश्नों का उत्तर दिया। हे वृष्णिवंशी, मैं क्रम से जो कहता हूँ, उसे सुनो।

सिद्ध उवाच

श्लोक 6 (14.18.6)

अस्मिन्नेवाशु फलदा आयुष्यास्तु क्रियाःस्मृताः । आयुःकीर्तिकराणीह यानि कृत्यानि सेवते । शरीरग्रहणेऽन्यस्मिंस्तेषु क्षीणेषु सर्वशः ॥

asminnevāśu phaladā āyuṣyāstu kriyāḥsmṛtāḥ | āyuḥkīrtikarāṇīha yāni kṛtyāni sevate | śarīragrahaṇe'nyasmiṃsteṣu kṣīṇeṣu sarvaśaḥ

आयु बढ़ाने वाले कर्म इसी जन्म में शीघ्र फल देने वाले माने गए हैं। जो कर्म वह यहाँ करता है और जो आयु तथा कीर्ति देने वाले हैं, उन सबके पूरी तरह क्षीण हो जाने पर, जब दूसरा शरीर लेने का समय आता है,

श्लोक 7 (14.18.7)

आयुःक्षयपरीतात्मा विपरीतानि सेवते । बुद्धिर्व्यावर्तते चास्य विनाशे प्रत्युपस्थिते ॥

āyuḥkṣayaparītātmā viparītāni sevate | buddhirvyāvartate cāsya vināśe pratyupasthite

आयु के क्षय से ग्रसित मनवाला वह हानिकारक आचरणों में लग जाता है; और विनाश के निकट आने पर उसकी बुद्धि उलट जाती है।

श्लोक 8 (14.18.8)

सत्त्वं बलं च कालं चाविदित्वा चात्मनस्तथा । अतिवेलमुपाश्नाति स्वविरुद्धान्यनात्मवान् ॥

sattvaṃ balaṃ ca kālaṃ cāviditvā cātmanastathā | ativelamupāśnāti svaviruddhānyanātmavān

अपने सत्त्व, बल और उचित समय को न जानकर, आत्मसंयम से रहित मनुष्य अपने लिए हानिकर वस्तुओं का सीमा से अधिक सेवन करता है।

श्लोक 9 (14.18.9)

यदाऽयमतिकष्टानि सर्वाण्युपनिषेवते । अत्यर्थमपि वा भुङ्क्ते न वा भुङ्क्ते कदाचन ॥

yadā'yamatikaṣṭāni sarvāṇyupaniṣevate | atyarthamapi vā bhuṅkte na vā bhuṅkte kadācana

जब वह कष्ट देने वाले सब प्रकार के अतिरेकों का सेवन करता है, कभी बहुत अधिक खाता है और कभी बिल्कुल नहीं खाता,

श्लोक 10 (14.18.10)

दुष्टान्नामिषपानं च यदन्योन्यविरोधि च । गुरु चाप्यमितं भुङ्क्ते नातिजीर्णे दिवा पुनः ॥

duṣṭānnāmiṣapānaṃ ca yadanyonyavirodhi ca | guru cāpyamitaṃ bhuṅkte nātijīrṇe divā punaḥ

दूषित अन्न, मांस और पेय लेता है, परस्पर विरोधी वस्तुएँ खाता है, भारी भोजन असीम मात्रा में खाता है और पहले का भोजन पचे बिना दिन में फिर खा लेता है,

श्लोक 11 (14.18.11)

व्यायाममतिमात्रं च व्यवायं चोपसेवते । सततं कर्मलोभाद्वा प्राप्तं वेगं विधारयेत् ॥

vyāyāmamatimātraṃ ca vyavāyaṃ copasevate | satataṃ karmalobhādvā prāptaṃ vegaṃ vidhārayet

अत्यधिक व्यायाम और मैथुन में लगता है, या निरन्तर कर्म के लोभ से आए हुए वेग को रोकता है,

श्लोक 12 (14.18.12)

रसाभियुक्तमन्नं वा दिवास्वप्नं च सेवते । अपक्वानागते काले स्वयं दोषान्प्रकोपयेत् ॥

rasābhiyuktamannaṃ vā divāsvapnaṃ ca sevate | apakvānāgate kāle svayaṃ doṣānprakopayet

या रसों से भरा अन्न खाता है और दिन में सोता है; इस तरह उचित समय आने से पहले, अपक्व भोजन के रहते, वह स्वयं अपने शरीर के दोषों को कुपित कर लेता है।

श्लोक 13 (14.18.13)

स्वदोषकोपनाद्रोगं लभते मरणान्तिकम् । अपि वोद्बन्धनादीनि परीतानि व्यवस्यति ॥

svadoṣakopanādrogaṃ labhate maraṇāntikam | api vodbandhanādīni parītāni vyavasyati

अपने दोषों के कुपित होने से वह मृत्यु में समाप्त होने वाला रोग पाता है; या फाँसी लगाने जैसे विनाशकारी उपाय करने का निश्चय कर लेता है।

श्लोक 14 (14.18.14)

तस्य तैः कारणैर्जन्तोः शरीरं च्यवते तदा । जीवितं प्रोच्यमानं तद्यथावदुपधारय ॥

tasya taiḥ kāraṇairjantoḥ śarīraṃ cyavate tadā | jīvitaṃ procyamānaṃ tadyathāvadupadhāraya

ऐसे कारणों से प्राणी का शरीर उस समय छूट जाता है। अब जीवन के विषय में जो कहा जा रहा है, उसे ठीक-ठीक समझो।

श्लोक 15 (14.18.15)

ऊष्मा प्रकुपितः काये तीव्रवायुसमीरितः । शरीरमनुपर्येत्य सर्वान्प्राणान्रुणद्धि वै ॥

ūṣmā prakupitaḥ kāye tīvravāyusamīritaḥ | śarīramanuparyetya sarvānprāṇānruṇaddhi vai

शरीर में कुपित हुई ऊष्मा, तीव्र वायु से प्रेरित होकर, सारे शरीर में फैल जाती है और सब प्राणों को रोक देती है।

श्लोक 16 (14.18.16)

अत्यर्थं बलवानूष्मा शरीरे परिकोपितः । भिनत्ति जीवस्थानानि तानि मर्माणि विद्धि च ॥

atyarthaṃ balavānūṣmā śarīre parikopitaḥ | bhinatti jīvasthānāni tāni marmāṇi viddhi ca

शरीर में अत्यन्त बलवान होकर कुपित हुई ऊष्मा जीव के निवास-स्थानों को भेद देती है; उन्हें मर्मस्थान जानो।

श्लोक 17 (14.18.17)

ततः सवेदनः सद्यो जीवः प्रच्यवते क्षरन् । शरीरं त्यजते जन्तुश्छिद्यमानेषु मर्मसु । वेदनाभिः परीतात्मा तद्विद्धि द्विजसत्तम ॥

tataḥ savedanaḥ sadyo jīvaḥ pracyavate kṣaran | śarīraṃ tyajate jantuśchidyamāneṣu marmasu | vedanābhiḥ parītātmā tadviddhi dvijasattama

तब वेदना से भरा जीव तुरन्त बहता हुआ-सा निकल जाता है। मर्मस्थानों के कटते समय प्राणी वेदनाओं से अभिभूत होकर शरीर छोड़ता है। हे द्विजश्रेष्ठ, इसे जानो।

श्लोक 18 (14.18.18)

जनीमरणसंविग्नाः सततं सर्वजन्तवः । दृश्यन्ते संत्यजन्तश्च शरीराणि द्विजर्षभ ॥

janīmaraṇasaṃvignāḥ satataṃ sarvajantavaḥ | dṛśyante saṃtyajantaśca śarīrāṇi dvijarṣabha

सब प्राणी जन्म और मृत्यु से सदा भयभीत रहते हैं, और हे द्विजश्रेष्ठ, वे शरीरों को छोड़ते हुए दिखाई देते हैं।

श्लोक 19 (14.18.19)

गर्भसंक्रमणे चापि गर्भाणामुपसर्पणे । तादृशीमेव लभते वेदनां मानवः पुनः ॥

garbhasaṃkramaṇe cāpi garbhāṇāmupasarpaṇe | tādṛśīmeva labhate vedanāṃ mānavaḥ punaḥ

और गर्भ में प्रवेश के समय, गर्भों के आने पर, मनुष्य फिर उसी प्रकार की वेदना पाता है।

श्लोक 20 (14.18.20)

भिन्नसंधिरथ क्लेदमद्भिः स लभते नरः ॥

bhinnasaṃdhiratha kledamadbhiḥ sa labhate naraḥ

तब बन्धन ढीले पड़ जाने पर वह मनुष्य जल से आर्द्रता पाता है।

श्लोक 21 (14.18.21)

यथा पञ्चसु भूतेषु सम्भूतत्वं नियच्छति । शैत्यात्प्रकुपितः काये तीव्रवायुसमीरितः ॥

yathā pañcasu bhūteṣu sambhūtatvaṃ niyacchati | śaityātprakupitaḥ kāye tīvravāyusamīritaḥ

इस प्रकार वह पाँच भूतों में संयुक्त होने की अवस्था में रहता है; और शरीर में शीत से कुपित तथा तीव्र वेग से प्रेरित वायु,

श्लोक 22 (14.18.22)

यः स पञ्चसु भूतेषु प्राणापाने व्यवस्थितः । स गच्छत्यूर्ध्वगो वायुः कृच्छ्रान्मुक्त्वा शरीरिणः । शरीरं च जहात्येवं निरुच्छ्वासश्च दृश्यते ॥

yaḥ sa pañcasu bhūteṣu prāṇāpāne vyavasthitaḥ | sa gacchatyūrdhvago vāyuḥ kṛcchrānmuktvā śarīriṇaḥ | śarīraṃ ca jahātyevaṃ nirucchvāsaśca dṛśyate

जो वायु पाँच भूतों में प्राण और अपान के रूप में स्थित है, वह ऊपर की ओर चढ़ती है और कठिनाई से देहधारी को छोड़ती है; इस प्रकार वह शरीर को त्याग देता है और श्वासहीन दिखाई देता है।

श्लोक 23 (14.18.23)

स निरूष्मा निरुच्छ्वासो निःश्रीको गतचेतनः । कर्मणा सम्परित्यक्तो मृत इत्युच्यते नरः ॥

sa nirūṣmā nirucchvāso niḥśrīko gatacetanaḥ | karmaṇā samparityakto mṛta ityucyate naraḥ

ऊष्मा से रहित, श्वास से रहित, कान्तिहीन और चेतनाहीन, कर्म से परित्यक्त वह मनुष्य मृत कहा जाता है।

श्लोक 24 (14.18.24)

स्रोतोभिर्यैर्विजानाति इन्द्रियार्थाञ्शरीरभृत् । तैरेव न विजानाति प्राणानाहारसम्भवान् ॥

srotobhiryairvijānāti indriyārthāñśarīrabhṛt | taireva na vijānāti prāṇānāhārasambhavān

जिन स्रोतों से देहधारी इन्द्रियों के विषयों को जानता है, उन्हीं से वह आहार से उत्पन्न होने वाले प्राणों को नहीं जानता।

श्लोक 25 (14.18.25)

तत्रैव कुरुते काये यः स जीवः सनातनः ॥

tatraiva kurute kāye yaḥ sa jīvaḥ sanātanaḥ

वही सनातन जीव है जो उसी शरीर में कर्म करता है।

श्लोक 26 (14.18.26)

तथा यद्यद्भवेन्युक्तं सन्निपाते क्वचित्क्वचित् । तत्तन्मर्म विजानीहि शास्त्रदृष्टं हि तत्तथा ॥

tathā yadyadbhavenyuktaṃ sannipāte kvacitkvacit | tattanmarma vijānīhi śāstradṛṣṭaṃ hi tattathā

इसी प्रकार जहाँ-जहाँ किसी सन्धिस्थल पर कुछ संयुक्त हो, उस-उस स्थान को मर्मस्थान जानो; क्योंकि शास्त्र में ऐसा ही देखा गया है।

श्लोक 27 (14.18.27)

तेषु मर्मसु भिन्नेषु ततः स समुदीरयन् । आविश्य हृदयं जन्तोः सत्त्वं चाशु रुणद्धि वै ॥

teṣu marmasu bhinneṣu tataḥ sa samudīrayan | āviśya hṛdayaṃ jantoḥ sattvaṃ cāśu ruṇaddhi vai

उन मर्मस्थानों के भिद जाने पर ऊपर उठती हुई वायु प्राणी के हृदय में प्रवेश करके शीघ्र ही उसकी चेतना को रोक देती है।

श्लोक 28 (14.18.28)

ततः सचेतनो जन्तुर्नाभिजानाति किञ्चन । तमसा संवृतज्ञानः संवृतेष्वेव मर्मसु । स जीवो निरधिष्ठानश्चाल्यते मातरिश्वना ॥

tataḥ sacetano janturnābhijānāti kiñcana | tamasā saṃvṛtajñānaḥ saṃvṛteṣveva marmasu | sa jīvo niradhiṣṭhānaścālyate mātariśvanā

तब प्राणी सचेत रहते हुए भी कुछ नहीं जानता; उसका ज्ञान अन्धकार से ढक जाता है, मर्मस्थान बन्द हो जाते हैं; और वह जीव, आधार से रहित होकर, वायु से हिलाया जाता है।

श्लोक 29 (14.18.29)

ततः स तं महोच्छ्वासं भृशमुच्छ्वस्य दारुणम् । निष्क्रमन्कम्पयत्याशु तच्छरीरमचेतनम् ॥

tataḥ sa taṃ mahocchvāsaṃ bhṛśamucchvasya dāruṇam | niṣkramankampayatyāśu taccharīramacetanam

तब वह उस महान और भयंकर श्वास को गहराई से खींचकर निकलता हुआ उस अचेत शरीर को झकझोर देता है।

श्लोक 30 (14.18.30)

स जीवः प्रच्युतः कायात्कर्मभिः स्वैः समावृतः । अङ्कितः स्वैः शुभैः पुण्यैः पापैर्वाऽप्युपपद्यते ॥

sa jīvaḥ pracyutaḥ kāyātkarmabhiḥ svaiḥ samāvṛtaḥ | aṅkitaḥ svaiḥ śubhaiḥ puṇyaiḥ pāpairvā'pyupapadyate

वह जीव शरीर से छूटकर अपने कर्मों से घिरा हुआ, अपने शुभ पुण्यों अथवा पापों से चिह्नित होकर नया जन्म पाता है।

श्लोक 31 (14.18.31)

ब्राह्मणा ज्ञानसम्पन्ना यथावच्छ्रुतनिश्चयाः । इतरं कृतपुण्यं वा तं विजानन्ति लक्षणैः ॥

brāhmaṇā jñānasampannā yathāvacchrutaniścayāḥ | itaraṃ kṛtapuṇyaṃ vā taṃ vijānanti lakṣaṇaiḥ

ज्ञान से सम्पन्न और यथावत् सीखे हुए का निश्चय रखने वाले ब्राह्मण लक्षणों से पहचान लेते हैं कि वह पुण्य कमाने वाला है या उससे भिन्न।

श्लोक 32 (14.18.32)

यथान्धकारे खद्योतं दीप्यमानं ततस्ततः । चक्षुष्मन्तः प्रपश्यन्ति तथा च ज्ञानचक्षुषः ॥

yathāndhakāre khadyotaṃ dīpyamānaṃ tatastataḥ | cakṣuṣmantaḥ prapaśyanti tathā ca jñānacakṣuṣaḥ

जैसे अन्धकार में आँखों वाले लोग इधर-उधर चमकते जुगनू को देख लेते हैं, वैसे ही ज्ञान की आँख वाले उसे देखते हैं।

श्लोक 33 (14.18.33)

पश्यन्त्येवंविधं सिद्धा जीवं दिव्येन चक्षुषा । च्यवन्तं जायमानं च योनिं चानुप्रवेशितम् ॥

paśyantyevaṃvidhaṃ siddhā jīvaṃ divyena cakṣuṣā | cyavantaṃ jāyamānaṃ ca yoniṃ cānupraveśitam

इसी प्रकार सिद्ध लोग दिव्य दृष्टि से जीव को देखते हैं—जब वह च्युत होता है, जब जन्म लेता है और जब योनि में प्रवेश करता है।

श्लोक 34 (14.18.34)

तस्य स्थानानि दृष्टानि विविधानीह शास्त्रतः । कर्मभूमिरियं भूमिर्यत्र तिष्ठन्ति जन्तवः ॥

tasya sthānāni dṛṣṭāni vividhānīha śāstrataḥ | karmabhūmiriyaṃ bhūmiryatra tiṣṭhanti jantavaḥ

शास्त्र से यहाँ उसके अनेक प्रकार के स्थान जाने गए हैं। यह भूमि कर्मभूमि है, जहाँ प्राणी रहते हैं।

श्लोक 35 (14.18.35)

ततः शुभाशुभं कृत्वा लभन्ते सर्वदेहिनः । इहैवोच्चावचान्भोगान्प्राप्नुवन्ति स्वकर्मभिः ॥

tataḥ śubhāśubhaṃ kṛtvā labhante sarvadehinaḥ | ihaivoccāvacānbhogānprāpnuvanti svakarmabhiḥ

यहाँ शुभ और अशुभ कर्म करके सब देहधारी अपने कर्मों से इसी लोक में ऊँचे-नीचे भोग पाते हैं।

श्लोक 36 (14.18.36)

इहैवाशुभकर्माणः कर्मभिर्निरयं गताः । अवाग्गतिरियं कष्टा यत्र पच्यन्ति मानवाः । तस्मात्सुदुर्लभो मोक्षो रक्ष्यश्चात्मा ततो भृशम् ॥

ihaivāśubhakarmāṇaḥ karmabhirnirayaṃ gatāḥ | avāggatiriyaṃ kaṣṭā yatra pacyanti mānavāḥ | tasmātsudurlabho mokṣo rakṣyaścātmā tato bhṛśam

अशुभ कर्म करने वाले अपने कर्मों से यहीं नरक को प्राप्त होते हैं। यह अधोगति कष्टदायी है, जहाँ मनुष्य पकाए जाते हैं। इसलिए मोक्ष अत्यन्त दुर्लभ है, और आत्मा की बहुत सावधानी से रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 37 (14.18.37)

ऊर्ध्वं तु जन्तवो गत्वा येषु स्थानेष्ववस्थिताः । कीर्त्यमानानि तानीह तत्त्वतः संनिबोध मे ॥

ūrdhvaṃ tu jantavo gatvā yeṣu sthāneṣvavasthitāḥ | kīrtyamānāni tānīha tattvataḥ saṃnibodha me

अब ऊपर जाकर प्राणी जिन स्थानों में रहते हैं, उनका यथार्थ वर्णन मुझसे सुनो; वे यहाँ बताए जा रहे हैं।

श्लोक 38 (14.18.38)

तच्छ्रुत्वा नैष्ठिकीं बुद्धिं बुद्ध्येथाः कर्मनिश्चयम् । तारारूपाणि सर्वाणि यत्रैतच्चन्द्रमण्डलम् ॥

tacchrutvā naiṣṭhikīṃ buddhiṃ buddhyethāḥ karmaniścayam | tārārūpāṇi sarvāṇi yatraitaccandramaṇḍalam

उसे सुनकर तुम निश्चयात्मक बुद्धि को ग्रहण करो और कर्म के निश्चय को समझो: ये सब तारों के रूप और यह चन्द्रमण्डल,

श्लोक 39 (14.18.39)

यत्र विभ्राजते लोके स्वभासा सूर्यमण्डलम् । स्थानान्येतानि जानीहि जनानां पुण्यकर्मणाम् ॥

yatra vibhrājate loke svabhāsā sūryamaṇḍalam | sthānānyetāni jānīhi janānāṃ puṇyakarmaṇām

और जहाँ सूर्यमण्डल अपनी आभा से लोक में चमकता है, इन सबको पुण्यकर्म करने वाले लोगों के स्थान जानो।

श्लोक 40 (14.18.40)

कर्मक्षयाच्च ते सर्वे च्यवन्ते वै पुनः पुनः । तत्रापि च विशेषोस्ति दिवि नीचोच्चमध्यमः ॥

karmakṣayācca te sarve cyavante vai punaḥ punaḥ | tatrāpi ca viśeṣosti divi nīcoccamadhyamaḥ

किन्तु कर्मों के क्षीण होने पर वे सब बार-बार नीचे गिरते हैं; और वहाँ भी स्वर्ग में नीच, उच्च और मध्यम का भेद है।

श्लोक 41 (14.18.41)

न च तत्रापि संतोषो दृष्ट्वा दीप्ततरां श्रियम् । इत्येता गतयः सर्वाः पृथक्ते समुदीरिताः ॥

na ca tatrāpi saṃtoṣo dṛṣṭvā dīptatarāṃ śriyam | ityetā gatayaḥ sarvāḥ pṛthakte samudīritāḥ

वहाँ भी अधिक दीप्तिमान वैभव को देखकर सन्तोष नहीं होता। इस प्रकार ये सब गतियाँ तुम्हें अलग-अलग बता दी गईं।

श्लोक 42 (14.18.42)

उपपत्तिं तु वक्ष्यामि गर्भस्याहमतः परम् । यथावत्तां निगदतः शृणुष्वावहितो द्विज ॥

upapattiṃ tu vakṣyāmi garbhasyāhamataḥ param | yathāvattāṃ nigadataḥ śṛṇuṣvāvahito dvija

इसके बाद मैं गर्भ की उत्पत्ति बताऊँगा। हे द्विज, मैं उसे जैसा है वैसा कहता हूँ, ध्यान से सुनो।

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