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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 17

अर्जुन की पुनः उपदेश की प्रार्थना: काश्यप और सिद्ध

जनमेजय पूछते हैं कि सभा में कृष्ण और अर्जुन के बीच क्या बातचीत हुई। अर्जुन कहते हैं कि युद्ध के समय कृष्ण ने जो उपदेश दिया था वह उन्हें भूल गया है और उसे फिर सुनना चाहते हैं। कृष्ण उन्हें उलाहना देते हैं, कहते हैं कि वह सब पूरा दोहराया नहीं जा सकता, और उसके स्थान पर एक प्राचीन वृत्तान्त सुनाते हैं: ब्रह्मलोक से आए एक ब्राह्मण ने उन्हें बताया था कि काश्यप ने एक सिद्ध महात्मा की सेवा की, जिन्होंने अपने अनेक जन्मों के दीर्घ कष्ट और सिद्धि तक पहुँचने के मार्ग का वर्णन किया और काश्यप से जो चाहें पूछने को कहा।

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (14.17.1)

सभायां वसतोस्तत्र निहत्यारीन्महात्मनोः । केशवार्जुनयोः का नु कथा समभवद्द्विज ॥

sabhāyāṃ vasatostatra nihatyārīnmahātmanoḥ | keśavārjunayoḥ kā nu kathā samabhavaddvija

हे द्विज! शत्रुओं को मारकर उस सभा में रहते हुए उन दोनों महात्माओं, केशव और अर्जुन, के बीच कौन-सी कथा हुई?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 2 (14.17.2)

कृष्णेन सहितः पार्थः स्वं राज्यं प्राप्य केवलम् । तस्यां सभायां दिव्यायां विजहार मुदा युतः ॥

kṛṣṇena sahitaḥ pārthaḥ svaṃ rājyaṃ prāpya kevalam | tasyāṃ sabhāyāṃ divyāyāṃ vijahāra mudā yutaḥ

अपना राज्य पूरा पा लेने पर पार्थ कृष्ण के साथ उस दिव्य सभा में आनन्दपूर्वक विहार करने लगे।

श्लोक 3 (14.17.3)

तत्र कञ्चित्सभोद्देशं स्वर्गोद्देशसमं नृप । यदृच्छया तौ मुदितौ जग्मतुः स्वजनावृतौ ॥

tatra kañcitsabhoddeśaṃ svargoddeśasamaṃ nṛpa | yadṛcchayā tau muditau jagmatuḥ svajanāvṛtau

हे राजन्! वे दोनों प्रसन्न होकर स्वजनों से घिरे हुए संयोगवश सभा के एक ऐसे स्थान पर गए जो स्वर्ग के किसी स्थान के समान था।

श्लोक 4 (14.17.4)

ततः प्रतीतः कृष्णेन सहितः पाण्डवोऽर्जुनः । निरीक्ष्य तां सभां रम्यामिदं वचनमब्रवीत् ॥

tataḥ pratītaḥ kṛṣṇena sahitaḥ pāṇḍavo'rjunaḥ | nirīkṣya tāṃ sabhāṃ ramyāmidaṃ vacanamabravīt

तब प्रसन्न पाण्डव अर्जुन ने कृष्ण के साथ उस रमणीय सभा को देखकर ये वचन कहे:

अर्जुन उवाच

श्लोक 5 (14.17.5)

विदितं मे महाबाहो सङ्ग्रामे समुपस्थिते । महात्म्यं देवकीपुत्र तच्च ते रूपमैश्वरम् ॥

viditaṃ me mahābāho saṅgrāme samupasthite | mahātmyaṃ devakīputra tacca te rūpamaiśvaram

"हे महाबाहो! हे देवकीपुत्र! युद्ध उपस्थित होने पर मैंने आपकी महिमा और आपके उस ऐश्वर्यमय रूप को जाना था।

श्लोक 6 (14.17.6)

यत्तु तद्भवता प्रोक्तं पुरा केशव सौहृदात् । तत्सर्वं पुरुषव्याघ्र नष्टं मे व्यग्रचेतसः ॥

yattu tadbhavatā proktaṃ purā keśava sauhṛdāt | tatsarvaṃ puruṣavyāghra naṣṭaṃ me vyagracetasaḥ

हे केशव! हे पुरुषव्याघ्र! आपने उस समय सौहार्दवश जो कुछ कहा था, वह सब मेरे विचलित चित्त से नष्ट हो गया।

श्लोक 7 (14.17.7)

मम कौतूहलं त्वस्ति तेष्वर्थेषु पुनः पुनः । भवांस्तु द्वारकां गन्ता नचिरादिव माधव ॥

mama kautūhalaṃ tvasti teṣvartheṣu punaḥ punaḥ | bhavāṃstu dvārakāṃ gantā nacirādiva mādhava

हे प्रभो! उन्हीं विषयों को फिर सुनने की मुझे उत्सुकता है; और हे माधव! आप शीघ्र ही द्वारका जाने वाले हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 8 (14.17.8)

एवमुक्तस्तु तं कृष्णः फाल्गुनं प्रत्यभाषत । परिष्वज्य महातेजा वचनं वदतांवरः ॥

evamuktastu taṃ kṛṣṇaḥ phālgunaṃ pratyabhāṣata | pariṣvajya mahātejā vacanaṃ vadatāṃvaraḥ

ऐसा कहे जाने पर वक्ताओं में श्रेष्ठ महातेजस्वी कृष्ण ने फाल्गुन का आलिंगन करके उन्हें उत्तर दिया।

वासुदेव उवाच

श्लोक 9 (14.17.9)

श्रावितस्त्वं मया गुह्यं ज्ञापितश्च सनातनम् । धर्मं स्वरूपिणं पार्थ सर्वलोकांश्च शाश्वतान् ॥

śrāvitastvaṃ mayā guhyaṃ jñāpitaśca sanātanam | dharmaṃ svarūpiṇaṃ pārtha sarvalokāṃśca śāśvatān

"हे पार्थ! मैंने तुम्हें गुप्त और सनातन उपदेश सुनाया था, धर्म का स्वरूप और सब शाश्वत लोक बताए थे।

श्लोक 10 (14.17.10)

अबुद्ध्या यन्न गृह्णीतास्तन्मे सुमहदप्रियम् । न च साऽद्य पुनर्भूयः स्मृतिर्मे सम्भविष्यति ॥

abuddhyā yanna gṛhṇītāstanme sumahadapriyam | na ca sā'dya punarbhūyaḥ smṛtirme sambhaviṣyati

तुमने समझ न पाने के कारण उसे ग्रहण नहीं किया, यह मुझे बहुत अप्रिय है; और अब वह स्मृति मुझे भी फिर नहीं होगी।

श्लोक 11 (14.17.11)

नूनमश्रद्दधानोऽसि दुर्मेधा ह्यसि पाण्डव । न च शक्यं पुनर्वक्तुमशेषेण धनंजय ॥

nūnamaśraddadhāno'si durmedhā hyasi pāṇḍava | na ca śakyaṃ punarvaktumaśeṣeṇa dhanaṃjaya

निश्चय ही तुम श्रद्धा से रहित हो और मन्दबुद्धि हो, हे पाण्डव! और हे धनञ्जय! उसे फिर पूरा नहीं कहा जा सकता।

श्लोक 12 (14.17.12)

स हि धर्मः सुपर्याप्तो ब्रह्मणः पदवेदने । न शक्यं तन्मया भूयस्तथा वक्तुमशेषतः ॥

sa hi dharmaḥ suparyāpto brahmaṇaḥ padavedane | na śakyaṃ tanmayā bhūyastathā vaktumaśeṣataḥ

वह धर्म ब्रह्म के पद को जानने के लिए पूर्ण रूप से पर्याप्त था; अब मैं उसे फिर पूरा नहीं कह सकता।

श्लोक 13 (14.17.13)

परं हि ब्रह्म कथितं योगयुक्तेन तन्मया । इतिहासं तु वक्ष्यामि तस्मिन्नर्थे पुरातनम् ॥

paraṃ hi brahma kathitaṃ yogayuktena tanmayā | itihāsaṃ tu vakṣyāmi tasminnarthe purātanam

योग में लीन होकर मैंने परब्रह्म का वर्णन किया था। पर उसी विषय में मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा,

श्लोक 14 (14.17.14)

यथा तां बुद्धिमास्थाय गतिमग्र्यां गमिष्यसि । शृणु धर्मभृतांश्रेष्ठ गदतः सर्वमेव मे ॥

yathā tāṃ buddhimāsthāya gatimagryāṃ gamiṣyasi | śṛṇu dharmabhṛtāṃśreṣṭha gadataḥ sarvameva me

जिससे उस बुद्धि को धारण करके तुम परम गति पाओगे। हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ! मैं जो कुछ कहता हूँ, वह सब सुनो।

श्लोक 15 (14.17.15)

आगच्छद्ब्राह्मणः कश्चित्स्वर्गलोकादरिंदम । ब्रह्मलोकाच्च दुर्धर्षः सोस्माभिः पूजितोऽभवत् ॥

āgacchadbrāhmaṇaḥ kaścitsvargalokādariṃdama | brahmalokācca durdharṣaḥ sosmābhiḥ pūjito'bhavat

हे शत्रुदमन! एक बार हमारे पास स्वर्गलोक से, ब्रह्मलोक से, एक दुर्धर्ष ब्राह्मण आए, और हमने उनका सत्कार किया।

श्लोक 16 (14.17.16)

अस्माभिः परिपृष्टश्च यदाह भरतर्षभ । दिव्येन विधिना पार्थ तच्छृणुष्वाविचारयन् ॥

asmābhiḥ paripṛṣṭaśca yadāha bharatarṣabha | divyena vidhinā pārtha tacchṛṇuṣvāvicārayan

हे भरतश्रेष्ठ! हमारे पूछने पर उन्होंने दिव्य विधि से जो कहा, हे पार्थ! उसे निःसंकोच सुनो।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 17 (14.17.17)

मोक्षधर्मं समाश्रित्य कृष्ण यन्माऽनुपृच्छसि । भूतानामनुकम्पार्थं मन्मोहच्छेदनं विभो ॥

mokṣadharmaṃ samāśritya kṛṣṇa yanmā'nupṛcchasi | bhūtānāmanukampārthaṃ manmohacchedanaṃ vibho

"हे कृष्ण! मोक्षधर्म को आधार बनाकर, प्राणियों पर दया के लिए, हे विभो, मेरे मोह को काटने के लिए आप जो मुझसे पूछ रहे हैं,

श्लोक 18 (14.17.18)

तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथावन्मधुसूदन । शृणुष्वावहितो भूत्वा गदतो मम माधव ॥

tatte'haṃ sampravakṣyāmi yathāvanmadhusūdana | śṛṇuṣvāvahito bhūtvā gadato mama mādhava

वह मैं आपको यथावत् बताऊँगा, हे मधुसूदन! हे माधव! मैं कहता हूँ, आप सावधान होकर सुनिए।

श्लोक 19 (14.17.19)

कश्चिद्विप्रस्तपोयुक्तः काश्यपो धर्मवित्तमः । आससाद द्विजं कंचिद्धर्माणामागतागमम् ॥

kaścidviprastapoyuktaḥ kāśyapo dharmavittamaḥ | āsasāda dvijaṃ kaṃciddharmāṇāmāgatāgamam

काश्यप नाम के एक तपस्वी ब्राह्मण थे, जो धर्म को जानने वालों में सर्वश्रेष्ठ थे। वे एक द्विज के पास पहुँचे जो धर्मों के शास्त्र के ज्ञाता थे,

श्लोक 20 (14.17.20)

गतागमं सुबहुशो ज्ञानविज्ञानपारगम् । लोकतत्त्वार्थकुशलं ज्ञातारं सुखदुःखयोः ॥

gatāgamaṃ subahuśo jñānavijñānapāragam | lokatattvārthakuśalaṃ jñātāraṃ sukhaduḥkhayoḥ

जिन्होंने शास्त्रों का अनेक बार अवगाहन किया था, जो ज्ञान और विज्ञान के पारगामी, लोक के तत्त्व और अर्थ में कुशल तथा सुख-दुःख के जानने वाले थे,

श्लोक 21 (14.17.21)

जातिस्मरणतत्त्वज्ञं कोविदं पापपुण्ययोः । द्रष्टारमुच्चनीचानां कर्मभिर्देहिनां गतिम् ॥

jātismaraṇatattvajñaṃ kovidaṃ pāpapuṇyayoḥ | draṣṭāramuccanīcānāṃ karmabhirdehināṃ gatim

जो पूर्वजन्मों के स्मरण के तत्त्व को जानते थे, पाप और पुण्य के ज्ञाता थे, और देहधारियों की ऊँची-नीची गति को उनके कर्मों के अनुसार देखने वाले थे,

श्लोक 22 (14.17.22)

चरन्तं मुक्तवत्सिद्धं प्रशान्तं संयतेन्द्रियम् । दीप्यमानं श्रिया ब्राह्म्या क्रममाणं च सर्वशः ॥

carantaṃ muktavatsiddhaṃ praśāntaṃ saṃyatendriyam | dīpyamānaṃ śriyā brāhmyā kramamāṇaṃ ca sarvaśaḥ

जो मुक्त पुरुष के समान विचरते थे, सिद्ध, शान्त और संयतेन्द्रिय थे, ब्राह्मी शोभा से दीप्त थे और सब ओर घूमते थे,

श्लोक 23 (14.17.23)

अन्तर्धानगतिज्ञं च श्रुत्वा तत्त्वेन काश्यपः । तथैवान्तर्हितैः सिद्धैर्यान्तं चक्रधरैः सह ॥

antardhānagatijñaṃ ca śrutvā tattvena kāśyapaḥ | tathaivāntarhitaiḥ siddhairyāntaṃ cakradharaiḥ saha

जो अन्तर्धान होने की गति जानते थे, जैसा काश्यप ने सच्चाई से सुना था, और जो अन्तर्हित सिद्धों तथा चक्रधारियों के साथ चलते थे,

श्लोक 24 (14.17.24)

सम्भाषमाणमेकान्ते समासीनं च तैः सह । यदृच्छया च गच्छन्तमसक्तं पवनं यथा ॥

sambhāṣamāṇamekānte samāsīnaṃ ca taiḥ saha | yadṛcchayā ca gacchantamasaktaṃ pavanaṃ yathā

जो एकान्त में उनसे वार्तालाप करते और उनके साथ बैठते थे, और जो वायु के समान अनासक्त होकर इच्छानुसार चलते थे।

श्लोक 25 (14.17.25)

तं समासाद्य मेधावी स तदा द्विजसत्तमः । चरणौ धर्मकामो वै स तस्य सुसमाहितः । प्रतिपेदे यथान्यायं भक्त्या परमया युतः ॥

taṃ samāsādya medhāvī sa tadā dvijasattamaḥ | caraṇau dharmakāmo vai sa tasya susamāhitaḥ | pratipede yathānyāyaṃ bhaktyā paramayā yutaḥ

उनके पास जाकर बुद्धिमान् द्विजश्रेष्ठ काश्यप ने, धर्म की कामना से और पूर्ण एकाग्र होकर, परम भक्ति से विधिपूर्वक उनके चरणों में प्रणाम किया।

श्लोक 26 (14.17.26)

विस्मितश्चाद्भुतं दृष्ट्वा काश्यपस्तं द्विजोत्तमम् । परिचारेण महता गुरुं तं पर्यतोषयत् ॥

vismitaścādbhutaṃ dṛṣṭvā kāśyapastaṃ dvijottamam | paricāreṇa mahatā guruṃ taṃ paryatoṣayat

उस अद्भुत पुरुष को देखकर विस्मित हुए द्विजश्रेष्ठ काश्यप ने बड़ी सेवा से अपने गुरु को सन्तुष्ट किया।

श्लोक 27 (14.17.27)

उपपन्नं च तत्सर्वं श्रुतचारित्रसंयुतम् । भौमेनातोषयच्चैनं गुरुवृत्तिं समास्थितः ॥

upapannaṃ ca tatsarvaṃ śrutacāritrasaṃyutam | bhaumenātoṣayaccainaṃ guruvṛttiṃ samāsthitaḥ

श्रुत और सदाचार से युक्त जो कुछ भी उचित था वह सब, और विनम्र सेवा से भी, उन्होंने शिष्य के आचरण में स्थित रहकर इन गुरु को प्रसन्न किया।

श्लोक 28 (14.17.28)

तस्मै तुष्टः स शिष्याय यत्प्रसन्नोऽब्रवीद्गुरुः । सिद्धिं परामभिप्रेक्ष्य शृणु मत्तो जनार्दन ॥

tasmai tuṣṭaḥ sa śiṣyāya yatprasanno'bravīdguruḥ | siddhiṃ parāmabhiprekṣya śṛṇu matto janārdana

उस शिष्य से सन्तुष्ट और प्रसन्न होकर गुरु ने, परम सिद्धि की ओर दृष्टि रखते हुए, उससे कहा। हे जनार्दन! वह मुझसे सुनिए।

सिद्ध उवाच

श्लोक 29 (14.17.29)

विविधैः कर्मभिस्तात पुण्ययोगैश्च केवलैः । गच्छन्तीह गतिं मर्त्या देवलोके च वा स्थितिम् ॥

vividhaiḥ karmabhistāta puṇyayogaiśca kevalaiḥ | gacchantīha gatiṃ martyā devaloke ca vā sthitim

"हे तात! नाना कर्मों से और केवल पुण्य के योग से मनुष्य यहाँ किसी गति को, अथवा देवलोक में किसी स्थिति को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 30 (14.17.30)

न क्वचित्सुखमत्यन्तं न क्वचिच्छाश्वती स्थितिः । स्थानाच्च महतो भ्रंशो दुःखलब्धात्पुनः पुनः ॥

na kvacitsukhamatyantaṃ na kvacicchāśvatī sthitiḥ | sthānācca mahato bhraṃśo duḥkhalabdhātpunaḥ punaḥ

कहीं भी अनन्त सुख नहीं है, कहीं भी स्थायी स्थिति नहीं है; कष्ट से पाए हुए बड़े स्थान से बार-बार पतन होता है।

श्लोक 31 (14.17.31)

अशुभा गतयः प्राप्ताः कष्टा मे पापसेवनात् । काममन्युपरीतेन तृष्णया मोहितेन च ॥

aśubhā gatayaḥ prāptāḥ kaṣṭā me pāpasevanāt | kāmamanyuparītena tṛṣṇayā mohitena ca

पाप के सेवन से मुझे अशुभ और कष्टदायक गतियाँ प्राप्त हुईं, जब मैं काम और क्रोध से घिरा हुआ और तृष्णा से मोहित था।

श्लोक 32 (14.17.32)

पुनः पुनश्च मरणं जन्म चैव पुनः पुनः । आहारा विविधा भुक्ताः पीता नानाविधाः स्तनाः ॥

punaḥ punaśca maraṇaṃ janma caiva punaḥ punaḥ | āhārā vividhā bhuktāḥ pītā nānāvidhāḥ stanāḥ

बार-बार मृत्यु और बार-बार जन्म हुआ; मैंने अनेक प्रकार के आहार खाए और अनेक प्रकार के स्तनों का दूध पिया।

श्लोक 33 (14.17.33)

मातरो विविधा दृष्टाः पितरश्च पृथग्विधाः । सुखानि च विचित्राणि दुःखानि च मयाऽनघ ॥

mātaro vividhā dṛṣṭāḥ pitaraśca pṛthagvidhāḥ | sukhāni ca vicitrāṇi duḥkhāni ca mayā'nagha

मैंने अनेक प्रकार की माताएँ और भिन्न-भिन्न प्रकार के पिता देखे हैं, और हे अनघ! विचित्र सुख और दुःख भोगे हैं।

श्लोक 34 (14.17.34)

प्रियैर्विवासो बहुशः संवासश्चाप्रियैः सह । धननाशश्च सम्प्राप्तो लब्ध्वा दुःखेन तद्धनम् ॥

priyairvivāso bahuśaḥ saṃvāsaścāpriyaiḥ saha | dhananāśaśca samprāpto labdhvā duḥkhena taddhanam

मैं बहुत बार प्रियजनों से बिछड़ा और अप्रियजनों के साथ रहा; मुझे धन का नाश भी झेलना पड़ा, और जो धन मिला वह भी कष्ट से मिला।

श्लोक 35 (14.17.35)

अवमानाः सुकष्टाश्च परतः स्वजनात्तथा । शारीरा मानसा वाऽपि वेदना भृशदारुणाः ॥

avamānāḥ sukaṣṭāśca parataḥ svajanāttathā | śārīrā mānasā vā'pi vedanā bhṛśadāruṇāḥ

मुझे अत्यन्त कष्टदायक अपमान मिले, अपने ही स्वजनों से भी, और शारीरिक तथा मानसिक पीड़ाएँ भी बड़ी दारुण थीं।

श्लोक 36 (14.17.36)

प्राप्ता विमाननाश्चोग्रा वधबन्धाश्च दारुणाः । पतनं निरये चैव यातनाश्च यमक्षये ॥

prāptā vimānanāścogrā vadhabandhāśca dāruṇāḥ | patanaṃ niraye caiva yātanāśca yamakṣaye

मुझे उग्र अपमान, भयंकर वध और बन्धन, नरक में पतन और यमलोक में यातनाएँ प्राप्त हुईं।

श्लोक 37 (14.17.37)

जरारोगाश्च सततं व्यसनानि च भूरिशः । लोकेऽस्मिन्ननुभूतानि द्वन्द्वजानि भृशं मया ॥

jarārogāśca satataṃ vyasanāni ca bhūriśaḥ | loke'sminnanubhūtāni dvandvajāni bhṛśaṃ mayā

बुढ़ापा और रोग निरन्तर, और अनेक विपत्तियाँ, तथा द्वन्द्वों से उत्पन्न दुःख मैंने इस संसार में बहुत अधिक भोगे हैं।

श्लोक 38 (14.17.38)

ततः कदाचिन्निर्वेदान्निकारान्निकृतेन च । लोकतन्त्रं परित्यक्तं दुःखार्तेन भृशं मया ॥

tataḥ kadācinnirvedānnikārānnikṛtena ca | lokatantraṃ parityaktaṃ duḥkhārtena bhṛśaṃ mayā

तब किसी समय वैराग्य से, और दूसरों के अपकार तथा छल के कारण, दुःख से बहुत पीड़ित होकर मैंने लोक-व्यवहार का त्याग कर दिया।

श्लोक 39 (14.17.39)

लोकेऽस्मिन्ननुभूयाहमिमं मार्गमनुष्ठितः । ततः सिद्धिरियं प्राप्ता प्रसादादात्मनो मया । नाहं पुनरिहागन्ता लोकानालोकयाम्यहम् ॥

loke'sminnanubhūyāhamimaṃ mārgamanuṣṭhitaḥ | tataḥ siddhiriyaṃ prāptā prasādādātmano mayā | nāhaṃ punarihāgantā lokānālokayāmyaham

इस लोक का अनुभव करके मैं इस मार्ग पर चला; तब आत्मा की कृपा से मुझे यह सिद्धि प्राप्त हुई। मैं अब यहाँ नहीं लौटूँगा; मैं लोकों को देखता हूँ।

श्लोक 40 (14.17.40)

आसिद्धेराप्रजासर्गादात्मनोपि गतीः शुभाः । उपलब्धा द्विजश्रेष्ठ तथेयं सिद्धिरुत्तमा ॥

āsiddherāprajāsargādātmanopi gatīḥ śubhāḥ | upalabdhā dvijaśreṣṭha tatheyaṃ siddhiruttamā

सिद्धि तक और प्राणियों की सृष्टि तक आत्मा की शुभ गतियाँ भी मैंने पा ली हैं, हे द्विजश्रेष्ठ! और वैसे ही यह परम सिद्धि भी।

श्लोक 41 (14.17.41)

इतः परं गमिष्यामि ततः परतरं पुनः । ब्रह्मणः पदमव्यक्तं मा तेऽभूदत्र संशयः ॥

itaḥ paraṃ gamiṣyāmi tataḥ parataraṃ punaḥ | brahmaṇaḥ padamavyaktaṃ mā te'bhūdatra saṃśayaḥ

यहाँ से मैं आगे जाऊँगा, और उससे भी आगे, ब्रह्म के अव्यक्त पद तक; इस विषय में तुम्हें कोई संशय न हो।

श्लोक 42 (14.17.42)

नाहं पुनरिहागन्ता मर्त्यलोकं परन्तप । प्रीतोस्मि ते महाप्राज्ञ ब्रूहि किं करवाणि ते ॥

nāhaṃ punarihāgantā martyalokaṃ parantapa | prītosmi te mahāprājña brūhi kiṃ karavāṇi te

हे परंतप! मैं मर्त्यलोक में फिर नहीं लौटूँगा। हे महाप्राज्ञ! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; कहो, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?

श्लोक 43 (14.17.43)

यदीप्सुरुपपन्नस्त्वं तस्य कालोऽयमागतः । अभिजाने च तदहं यदर्थं मामुपागतः ॥

yadīpsurupapannastvaṃ tasya kālo'yamāgataḥ | abhijāne ca tadahaṃ yadarthaṃ māmupāgataḥ

तुम जिस वस्तु की इच्छा से आए हो, उसका समय आ गया है। तुम मेरे पास जिस प्रयोजन से आए हो, उसे मैं जानता हूँ।

श्लोक 44 (14.17.44)

अचिरात्तु गमिष्यामि येनाहं त्वामचूचुदम् । भृशं प्रीतोस्मि भवतश्चारित्रेण विचक्षण ॥

acirāttu gamiṣyāmi yenāhaṃ tvāmacūcudam | bhṛśaṃ prītosmi bhavataścāritreṇa vicakṣaṇa

मैं शीघ्र ही चला जाऊँगा; इसी कारण मैंने तुम्हें प्रेरित किया था। हे विचक्षण! तुम्हारे आचरण से मैं बहुत प्रसन्न हूँ।

श्लोक 45 (14.17.45)

परिपृच्छ यावद्भवतो भाषे यद्यत्तवेप्सितम् ॥

paripṛccha yāvadbhavato bhāṣe yadyattavepsitam

जो चाहो पूछो; तुम जो-जो चाहोगे, मैं कहूँगा।

श्लोक 46 (14.17.46)

बहुमन्ये च ते बुद्धिं भृशं सम्पूजयामि च । येनाहं भवता बुद्धो मेधावी ह्यसि काश्यप ॥

bahumanye ca te buddhiṃ bhṛśaṃ sampūjayāmi ca | yenāhaṃ bhavatā buddho medhāvī hyasi kāśyapa

मैं तुम्हारी बुद्धि का बड़ा आदर करता हूँ और तुम्हारा बहुत सम्मान करता हूँ, क्योंकि तुमने मुझे पहचान लिया; हे काश्यप! तुम बुद्धिमान् हो।"

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18