Skip to main content

आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 16

कृष्ण का द्वारका लौटने का प्रस्ताव

जनमेजय पूछते हैं कि विजय के बाद कृष्ण और अर्जुन ने क्या किया। वैशम्पायन बताते हैं कि वे इन्द्रप्रस्थ में सुखपूर्वक रहे, घूमते रहे और युद्ध तथा प्राचीन वंशों की कथाएँ कहते रहे, और कृष्ण अर्जुन के शोक को शान्त करते रहे। फिर कृष्ण कहते हैं कि उनके रुकने का प्रयोजन पूरा हो चुका है, वे द्वारका में अपने स्वजनों को देखना चाहते हैं, और अर्जुन से कहते हैं कि वे उनके साथ युधिष्ठिर के पास चलकर विदा माँगें, क्योंकि वे राजा का अप्रिय कभी नहीं करेंगे। अर्जुन सहमत हो जाते हैं।

अध्याय 15अध्याय-सूचीअध्याय 17

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (14.16.1)

विजिते पाण्डवेयैस्तु प्रशान्ते च द्विजोत्तम । राष्ट्रे ते चक्रतुर्वीरौ वासुदेवधनंजयौ ॥

vijite pāṇḍaveyaistu praśānte ca dvijottama | rāṣṭre te cakraturvīrau vāsudevadhanaṃjayau

हे द्विजश्रेष्ठ! पाण्डवों की विजय हो जाने और राज्य के शान्त हो जाने पर उन दोनों वीरों, वासुदेव और धनञ्जय, ने राज्य में क्या किया?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 2 (14.16.2)

विजिते पाण्डवे राजन्प्रशान्ते च विशाम्पतौ । राष्ट्रे बभूवतुर्हृष्टौ वासुदेवधनंजयौ ॥

vijite pāṇḍave rājanpraśānte ca viśāmpatau | rāṣṭre babhūvaturhṛṣṭau vāsudevadhanaṃjayau

हे राजन्! पाण्डव की विजय हो जाने और प्रजापति राजा के शान्त हो जाने पर वासुदेव और धनञ्जय राज्य में प्रसन्नतापूर्वक रहे।

श्लोक 3 (14.16.3)

विजह्राते मुदा युक्तौ दिवि देवेश्वराविव । तौ वनेषु विचित्रेषु पर्वतेषु ससानुषु ॥

vijahrāte mudā yuktau divi deveśvarāviva | tau vaneṣu vicitreṣu parvateṣu sasānuṣu

आनन्द से युक्त वे दोनों स्वर्ग में दो देवेश्वरों की भाँति विचित्र वनों में और शिखरों सहित पर्वतों पर विहार करते थे।

श्लोक 4 (14.16.4)

तीर्थेषु चैव पुण्येषु पल्वलेषु नदीषु च । चंक्रम्यमाणौ संहृष्टावश्विनाविव नन्दने ॥

tīrtheṣu caiva puṇyeṣu palvaleṣu nadīṣu ca | caṃkramyamāṇau saṃhṛṣṭāvaśvināviva nandane

पवित्र तीर्थों में, सरोवरों और नदियों में प्रसन्न होकर घूमते हुए वे नन्दन वन में दोनों अश्विनीकुमारों के समान लगते थे।

श्लोक 5 (14.16.5)

इन्द्रप्रस्थे महात्मानौ रेमाते कृष्णपाण्डवौ । प्रविश्य तां सभां रम्यां विजह्राते च भारत ॥

indraprasthe mahātmānau remāte kṛṣṇapāṇḍavau | praviśya tāṃ sabhāṃ ramyāṃ vijahrāte ca bhārata

महात्मा कृष्ण और पाण्डव इन्द्रप्रस्थ में आनन्द करते रहे; हे भारत! उस रमणीय सभा में प्रवेश कर वे वहाँ विहार करने लगे।

श्लोक 6 (14.16.6)

तत्र युद्धकथाश्चित्राः परिक्लेशांश्च पार्थिव । कथायोगे कथायोगे कथयामासतुः सदा ॥

tatra yuddhakathāścitrāḥ parikleśāṃśca pārthiva | kathāyoge kathāyoge kathayāmāsatuḥ sadā

हे राजन्! वहाँ बातचीत के हर प्रसंग पर वे दोनों युद्ध की विचित्र कथाएँ और अपने सहे हुए कष्ट सुनाते रहे।

श्लोक 7 (14.16.7)

ऋषीणां देवतानां च वंशांस्तावाहतुः सदा । प्रीयमाणौ महात्मानौ पुराणावृषिसत्तमौ ॥

ṛṣīṇāṃ devatānāṃ ca vaṃśāṃstāvāhatuḥ sadā | prīyamāṇau mahātmānau purāṇāvṛṣisattamau

वे दोनों महात्मा, प्राचीन ऋषिश्रेष्ठ, प्रसन्न होकर ऋषियों और देवताओं की वंशावलियाँ भी सुनाते थे।

श्लोक 8 (14.16.8)

मधुरास्तु कथाश्चित्राश्चित्रार्थपदनिश्चयाः । निश्चयज्ञः स पार्थाय कथयामास केशवः ॥

madhurāstu kathāścitrāścitrārthapadaniścayāḥ | niścayajñaḥ sa pārthāya kathayāmāsa keśavaḥ

वे कथाएँ मधुर और विचित्र थीं, उनके अर्थ और पद विचित्र किन्तु सुनिश्चित थे; तत्त्व को जानने वाले केशव ने उन्हें पार्थ को सुनाया।

श्लोक 9 (14.16.9)

पुत्रशोकाभिसंतप्तं ज्ञातीनां च सहस्रशः । कथाभिः शमयामास पार्थं शौरिर्जनार्दनः ॥

putraśokābhisaṃtaptaṃ jñātīnāṃ ca sahasraśaḥ | kathābhiḥ śamayāmāsa pārthaṃ śaurirjanārdanaḥ

पुत्रों के शोक से और हज़ारों जातिजनों के शोक से सन्तप्त पार्थ को शौरि जनार्दन ने कथाओं से शान्त किया।

श्लोक 10 (14.16.10)

स तमाश्वास्य विधिवद्विधानज्ञो महातपाः । अपहृत्यात्मनो भारं विशश्रामेव सात्वतः ॥

sa tamāśvāsya vidhivadvidhānajño mahātapāḥ | apahṛtyātmano bhāraṃ viśaśrāmeva sātvataḥ

विधि को जानने वाले महातपस्वी सात्वत कृष्ण उन्हें विधिपूर्वक सान्त्वना देकर, मानो अपना भार उतारकर, विश्राम करने लगे।

श्लोक 11 (14.16.11)

ततः कथान्ते गोविन्दो गुडाकेशमुवाच ह । सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया वाचा हेतुयुक्तमिदं वचः ॥

tataḥ kathānte govindo guḍākeśamuvāca ha | sāntvayañślakṣṇayā vācā hetuyuktamidaṃ vacaḥ

तब कथाओं के अन्त में गोविन्द ने गुडाकेश से कोमल वाणी में सान्त्वना देते हुए ये युक्तिपूर्ण वचन कहे:

वासुदेव उवाच

श्लोक 12 (14.16.12)

विजितेयं धरा कृत्स्ना सव्यसाचिन्परंतप । त्वद्बाहुबलमाश्रित्य राज्ञा धर्मसुतेन ह ॥

vijiteyaṃ dharā kṛtsnā savyasācinparaṃtapa | tvadbāhubalamāśritya rājñā dharmasutena ha

"हे सव्यसाचिन्! हे परंतप! धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने तुम्हारी भुजाओं के बल का आश्रय लेकर यह सारी पृथ्वी जीत ली है।

श्लोक 13 (14.16.13)

असपत्नां महीं भुङ्क्ते धर्मराजो युधिष्ठिरः । भीमसेनानुभावेन यमयोश्च नरोत्तम ॥

asapatnāṃ mahīṃ bhuṅkte dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | bhīmasenānubhāvena yamayośca narottama

हे नरश्रेष्ठ! धर्मराज युधिष्ठिर भीमसेन और दोनों जुड़वाँ भाइयों के प्रभाव से निष्कण्टक पृथ्वी का भोग कर रहे हैं।

श्लोक 14 (14.16.14)

धर्मेण राज्ञा धर्मज्ञ प्राप्तं राज्यमकण्टकम् । धर्मेण निहतः सङ्ख्ये स च राजा सुयोधनः ॥

dharmeṇa rājñā dharmajña prāptaṃ rājyamakaṇṭakam | dharmeṇa nihataḥ saṅkhye sa ca rājā suyodhanaḥ

हे धर्मज्ञ! धर्मात्मा राजा ने कण्टकरहित राज्य पाया है; और राजा सुयोधन धर्म के द्वारा ही युद्ध में मारा गया।

श्लोक 15 (14.16.15)

अधर्मरुचयो लुब्धाः सदा चाप्रियवादिनः । धार्तराष्ट्रा दुरात्मानः सानुबन्धा निपातिताः ॥

adharmarucayo lubdhāḥ sadā cāpriyavādinaḥ | dhārtarāṣṭrā durātmānaḥ sānubandhā nipātitāḥ

अधर्म में रुचि रखने वाले, लोभी, सदा अप्रिय बोलने वाले दुष्ट धृतराष्ट्र-पुत्र अपने अनुयायियों सहित मारे गए।

श्लोक 16 (14.16.16)

प्रशान्तामखिलां पार्थ पृथिवीं पृथिवीपतिः । भुङ्क्ते धर्मसुतो राजा त्वया गुप्तः कुरूद्वह ॥

praśāntāmakhilāṃ pārtha pṛthivīṃ pṛthivīpatiḥ | bhuṅkte dharmasuto rājā tvayā guptaḥ kurūdvaha

हे कुरुश्रेष्ठ! तुमसे रक्षित धर्मपुत्र राजा अब शान्त हुई समस्त पृथ्वी का भोग कर रहे हैं।

श्लोक 17 (14.16.17)

रमे चाहं त्वया सार्धमरण्येष्वपि पाण्डव । किमु यत्र जनोऽयं वै पृथा चामित्रकर्शन ॥

rame cāhaṃ tvayā sārdhamaraṇyeṣvapi pāṇḍava | kimu yatra jano'yaṃ vai pṛthā cāmitrakarśana

हे पाण्डव! मैं तुम्हारे साथ वनों में भी आनन्द पाता हूँ; फिर यहाँ, जहाँ ये लोग और पृथा हैं, तब तो कहना ही क्या, हे शत्रुसंहारक!

श्लोक 18 (14.16.18)

यत्र धर्मसुतो राजा यत्र यत्र भीमो महाबलः । यत्र माद्रवतीपुत्रौ रतिस्तत्र परा मम ॥

yatra dharmasuto rājā yatra yatra bhīmo mahābalaḥ | yatra mādravatīputrau ratistatra parā mama

जहाँ धर्मपुत्र राजा हैं, जहाँ महाबली भीम हैं, जहाँ माद्री के दोनों पुत्र हैं, वहीं मेरी सबसे बड़ी प्रीति है।

श्लोक 19 (14.16.19)

तथैव स्वर्गलोकेषु सभोद्देशेषु कौरव । रमणीयेषु पुण्येषु सहितस्य त्वयाऽनध ॥

tathaiva svargalokeṣu sabhoddeśeṣu kaurava | ramaṇīyeṣu puṇyeṣu sahitasya tvayā'nadha

इसी प्रकार, हे कुरुवंशी! हे निष्पाप! तुम्हारे साथ होने पर मैं सभा के स्वर्ग-जैसे, रमणीय और पवित्र स्थानों में भी आनन्द पाता हूँ।

श्लोक 20 (14.16.20)

कालो महांस्त्वतीतो मे शूरसूनुमपश्यतः । बलदेवं च कौरव्य तथाऽन्यान्वृष्णिपुङ्गवान् ॥

kālo mahāṃstvatīto me śūrasūnumapaśyataḥ | baladevaṃ ca kauravya tathā'nyānvṛṣṇipuṅgavān

शूरपुत्र (मेरे पिता), बलदेव और वृष्णिकुल के अन्य श्रेष्ठ पुरुषों को देखे बिना, हे कुरुवंशी, मेरा बहुत समय बीत गया।

श्लोक 21 (14.16.21)

सोहं गन्तुमभीप्सामि पुरीं द्वारावतीं प्रति । रोचतां गमनं तुभ्यं ममापि पुरुषर्षभ ॥

sohaṃ gantumabhīpsāmi purīṃ dvārāvatīṃ prati | rocatāṃ gamanaṃ tubhyaṃ mamāpi puruṣarṣabha

इसलिए मैं द्वारावती नगरी जाना चाहता हूँ। हे पुरुषश्रेष्ठ! मेरा जाना तुम्हें भी अच्छा लगे।

श्लोक 22 (14.16.22)

उक्तो बहुविधं राजा तत्रतत्र युधिष्ठिरः । सह भीष्मेण यद्युक्तमस्माभिः शोककर्शितः ॥

ukto bahuvidhaṃ rājā tatratatra yudhiṣṭhiraḥ | saha bhīṣmeṇa yadyuktamasmābhiḥ śokakarśitaḥ

शोक से क्षीण हुए राजा युधिष्ठिर को हमने भीष्म के साथ यहाँ-वहाँ जिस प्रकार उचित था, अनेक प्रकार से समझाया।

श्लोक 23 (14.16.23)

शिष्टो युधिष्ठिरोऽस्माभिः शास्ता सन्नपि पाण्डवः । तेन तत्तु वचः सम्यग्गृहीतं सुमहात्मना ॥

śiṣṭo yudhiṣṭhiro'smābhiḥ śāstā sannapi pāṇḍavaḥ | tena tattu vacaḥ samyaggṛhītaṃ sumahātmanā

शासक होते हुए भी पाण्डव युधिष्ठिर को हमने शिक्षा दी; और उन महात्मा ने उस उपदेश को भली-भाँति ग्रहण किया।

श्लोक 24 (14.16.24)

धर्मपुत्रे हि धर्मज्ञे कृतज्ञे सत्यवादिनि । सत्यं धर्मो मतिश्चाग्र्या स्थितिश्च सततं स्थिरा ॥

dharmaputre hi dharmajñe kṛtajñe satyavādini | satyaṃ dharmo matiścāgryā sthitiśca satataṃ sthirā

धर्म को जानने वाले, कृतज्ञ और सत्यवादी धर्मपुत्र में सत्य, धर्म और श्रेष्ठ बुद्धि रहती है, और उनकी स्थिति सदा दृढ़ रहती है।

श्लोक 25 (14.16.25)

तत्र गत्वा महात्मानं यदि ते रोचतेऽर्जुन । अस्मद्गमनसंयुक्तं वचो ब्रूहि जनाधिपम् ॥

tatra gatvā mahātmānaṃ yadi te rocate'rjuna | asmadgamanasaṃyuktaṃ vaco brūhi janādhipam

हे अर्जुन! यदि तुम्हें अच्छा लगे तो उन महात्मा राजा के पास जाकर हमारे जाने के विषय में उनसे निवेदन करो।

श्लोक 26 (14.16.26)

न हि तस्याप्रियं कुर्यां प्राणत्यागेऽप्युपस्थिते । कुतो गन्तुं महाबाहो पुरीं द्वारावतीं प्रति ॥

na hi tasyāpriyaṃ kuryāṃ prāṇatyāge'pyupasthite | kuto gantuṃ mahābāho purīṃ dvārāvatīṃ prati

प्राण त्यागने का समय आ जाने पर भी मैं उनका अप्रिय नहीं करूँगा; फिर, हे महाबाहो, उनकी आज्ञा के बिना द्वारावती नगरी कैसे जाऊँगा?

श्लोक 27 (14.16.27)

सर्वं त्विदमहं पार्थ त्वत्प्रीतिहितकाम्यया । ब्रवीमि सत्यं कौरव्य न मिथ्यैतत्कथञ्चन ॥

sarvaṃ tvidamahaṃ pārtha tvatprītihitakāmyayā | bravīmi satyaṃ kauravya na mithyaitatkathañcana

हे पार्थ! यह सब मैं तुम्हारी प्रीति और हित की कामना से कहता हूँ; हे कुरुवंशी! यह सत्य है, किसी प्रकार भी मिथ्या नहीं।

श्लोक 28 (14.16.28)

प्रयोजनं च निर्वृत्तमिह वासेन मेऽर्जुन । धार्तराष्ट्रो हतो राजा सबलः सपदानुगः ॥

prayojanaṃ ca nirvṛttamiha vāsena me'rjuna | dhārtarāṣṭro hato rājā sabalaḥ sapadānugaḥ

हे अर्जुन! यहाँ रहने का मेरा प्रयोजन पूरा हो गया है: धृतराष्ट्र का पुत्र राजा सेना और अनुचरों सहित मारा गया।

श्लोक 29 (14.16.29)

पृथिवी च वशे तात धर्मपुत्रस्य धीमतः । स्थिता समुद्रवसना सशैलवनकानना ॥

pṛthivī ca vaśe tāta dharmaputrasya dhīmataḥ | sthitā samudravasanā saśailavanakānanā

हे तात! समुद्ररूपी वस्त्र वाली, पर्वत, वन और उपवनों सहित यह पृथ्वी बुद्धिमान् धर्मपुत्र के वश में स्थित है;

श्लोक 30 (14.16.30)

चिता रत्नैर्बहुविधैः कुरुराजस्य पाण्डव । धर्मेण राजा धर्मज्ञः पातु सर्वां वसुन्धराम् ॥

citā ratnairbahuvidhaiḥ kururājasya pāṇḍava | dharmeṇa rājā dharmajñaḥ pātu sarvāṃ vasundharām

हे पाण्डव! कुरुराज के लिए वह अनेक प्रकार के रत्नों से भरी हुई है। धर्म को जानने वाले वे राजा धर्म से सारी पृथ्वी की रक्षा करें,

श्लोक 31 (14.16.31)

उपास्यमानो मुनिभिः सिद्धैश्चापि महात्मभिः । स्तूयमानश्च सततं बन्दिभिर्भरतर्षभ ॥

upāsyamāno munibhiḥ siddhaiścāpi mahātmabhiḥ | stūyamānaśca satataṃ bandibhirbharatarṣabha

मुनियों और महात्मा सिद्धों से सेवित होकर और बन्दियों से निरन्तर स्तुति पाते हुए, हे भरतश्रेष्ठ!

श्लोक 32 (14.16.32)

तं मया सह गत्वाऽद्य राजानं कुरुवर्धनम् । आपृच्छ कुरुशार्दूल गमनं द्वारकां प्रति ॥

taṃ mayā saha gatvā'dya rājānaṃ kuruvardhanam | āpṛccha kuruśārdūla gamanaṃ dvārakāṃ prati

इसलिए आज मेरे साथ कुरुवंश को बढ़ाने वाले उन राजा के पास चलकर, हे कुरुश्रेष्ठ, द्वारका जाने की आज्ञा माँगो।

श्लोक 33 (14.16.33)

इदं शरीरं वसु यच्च मे गृहे । निवेदितं पार्थ सदा युधिष्ठिरे । प्रियश्च मान्यश्च हि मे युधिष्ठिरः । सदा कुरूणामधिपो महामतिः ॥

idaṃ śarīraṃ vasu yacca me gṛhe | niveditaṃ pārtha sadā yudhiṣṭhire | priyaśca mānyaśca hi me yudhiṣṭhiraḥ | sadā kurūṇāmadhipo mahāmatiḥ

हे पार्थ! मेरा यह शरीर और मेरे घर में जो धन है, वह सब सदा युधिष्ठिर को समर्पित है; क्योंकि कुरुओं के अधिपति बुद्धिमान् युधिष्ठिर मुझे प्रिय और सदा माननीय हैं।

श्लोक 34 (14.16.34)

प्रयोजनं चापि निवासकारणे । न विद्यते मे त्वदृते नृपात्मज । स्थिता हि पृथ्वी तव पार्थ शासने । गुरोः सुवृत्तस्य युधिष्ठिरस्य च ॥

prayojanaṃ cāpi nivāsakāraṇe | na vidyate me tvadṛte nṛpātmaja | sthitā hi pṛthvī tava pārtha śāsane | guroḥ suvṛttasya yudhiṣṭhirasya ca

हे राजकुमार! तुम्हारे बिना यहाँ रहने का मेरा कोई प्रयोजन नहीं है; क्योंकि हे पार्थ! पृथ्वी तुम्हारे और तुम्हारे सदाचारी बड़े भाई युधिष्ठिर के शासन में स्थित है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 35 (14.16.35)

इतीदमुक्तः स तदा महात्मना । जनार्दनेनामितविक्रमोऽर्जुनः । तथेति दुःखादिव वाक्यमैरय- । ज्जनार्दनं सम्प्रतिपूज्य पार्थिव ॥

itīdamuktaḥ sa tadā mahātmanā | janārdanenāmitavikramo'rjunaḥ | tatheti duḥkhādiva vākyamairaya- | jjanārdanaṃ sampratipūjya pārthiva

महात्मा जनार्दन के ऐसा कहने पर अमित पराक्रम वाले अर्जुन ने मानो दुःख से "ऐसा ही हो" कहा और, हे राजन्, जनार्दन का सम्मान किया।

अध्याय 15अध्याय-सूचीअध्याय 17