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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 15

युधिष्ठिर के शासन की समृद्धि

वैशम्पायन धृतराष्ट्र को सान्त्वना देने के बाद युधिष्ठिर के शासन का वर्णन करते हैं: भाइयों के साथ मनु और राम के समान शासन करते हुए उन्होंने कलियुग को रोक रखा और भूमि कृतयुग जैसी हो गई। समय पर वर्षा होती थी, भूख और रोग नहीं थे, सब वर्ण अपने धर्म में स्थित थे और स्त्री-पुरुष, पशु तथा वनस्पतियाँ सब फलते-फूलते थे। सुन्दर और जितेन्द्रिय पाण्डवों ने अर्जुन के साथ मनु की प्राचीन मर्यादाओं के अनुसार शासन किया।

अध्याय 14अध्याय-सूचीअध्याय 16

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (14.15.1)

स समाश्वास्य पितरं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् । अन्वशासत धर्मात्मा पृथिवीं भ्रातृभिः सह ॥

sa samāśvāsya pitaraṃ prajñācakṣuṣamīśvaram | anvaśāsata dharmātmā pṛthivīṃ bhrātṛbhiḥ saha

प्रज्ञा ही जिनकी आँख थी, उन समर्थ पिता धृतराष्ट्र को सान्त्वना देकर धर्मात्मा युधिष्ठिर भाइयों के साथ पृथ्वी का शासन करने लगे।

श्लोक 2 (14.15.2)

यथा मनुर्महाराजो रामो दाशरथिर्यथा । तथा भरतसिंहोऽपि पालयामास मेदिनीम् ॥

yathā manurmahārājo rāmo dāśarathiryathā | tathā bharatasiṃho'pi pālayāmāsa medinīm

महाराज मनु और दशरथपुत्र राम की भाँति भरतवंश के उस सिंह ने भी पृथ्वी का पालन किया।

श्लोक 3 (14.15.3)

नाधर्म्यमभवत्तत्र सर्वो धर्मरुचिर्जनः । बभूव नरशार्दूल यथा कृतयुगे तथा ॥

nādharmyamabhavattatra sarvo dharmarucirjanaḥ | babhūva naraśārdūla yathā kṛtayuge tathā

वहाँ अधर्म नहीं रहा, सब लोग धर्म में रुचि रखने लगे। हे नरशार्दूल! जैसे कृतयुग में होता है, वैसा ही हुआ।

श्लोक 4 (14.15.4)

कलिमासन्नमाविष्टं निवार्य नृपनन्दनः । भ्रातृभिः सहितो धीमान्बभौ धर्मबलोद्धतः ॥

kalimāsannamāviṣṭaṃ nivārya nṛpanandanaḥ | bhrātṛbhiḥ sahito dhīmānbabhau dharmabaloddhataḥ

पास आ पहुँचे और घेर चुके कलि को रोककर राजकुमारों में श्रेष्ठ वे बुद्धिमान् युधिष्ठिर भाइयों सहित धर्म के बल से उन्नत होकर शोभित हुए।

श्लोक 5 (14.15.5)

ववर्ष भगवान्देवः काले देशे यथेप्सितम् । निरामयं जगदभूत्क्षुत्पिपासे न किञ्चन ॥

vavarṣa bhagavāndevaḥ kāle deśe yathepsitam | nirāmayaṃ jagadabhūtkṣutpipāse na kiñcana

भगवान् देव (इन्द्र) समय और स्थान के अनुसार इच्छित वर्षा करते थे। जगत् रोग से रहित था; भूख और प्यास कहीं थी ही नहीं।

श्लोक 6 (14.15.6)

आधिर्नास्ति मनुष्याणां व्यसने नाभवन्मतिः । ब्राह्मणप्रमुखा वर्णास्ते स्वधर्मोत्तराः शुभाः ॥

ādhirnāsti manuṣyāṇāṃ vyasane nābhavanmatiḥ | brāhmaṇapramukhā varṇāste svadharmottarāḥ śubhāḥ

मनुष्यों को कोई मानसिक पीड़ा नहीं थी, और किसी का मन विपत्ति की ओर नहीं जाता था। ब्राह्मण आदि सब वर्ण शुभ आचरण वाले थे और अपने धर्म को ही सर्वोपरि मानते थे।

श्लोक 7 (14.15.7)

धर्मसत्यप्रधानाश्च सत्यं सद्विषयान्वितम् । धर्मासनस्थः सद्भिः स स्त्रीबालातुरवृद्धकान् । वर्णक्रमान्पूर्णभृतान्साकल्याद्रक्षणोद्यतः ॥

dharmasatyapradhānāśca satyaṃ sadviṣayānvitam | dharmāsanasthaḥ sadbhiḥ sa strībālāturavṛddhakān | varṇakramānpūrṇabhṛtānsākalyādrakṣaṇodyataḥ

वे धर्म और सत्य को प्रधान मानते थे, और उनका सत्य सद्विषयों से युक्त था। न्याय के आसन पर सज्जनों के साथ बैठा हुआ वह राजा स्त्रियों, बालकों, रोगियों और वृद्धों की तथा सब वर्णों की, जिनका भली-भाँति भरण-पोषण होता था, पूरी तरह रक्षा करने में तत्पर रहता था।

श्लोक 8 (14.15.8)

अवृत्तिवृत्तिदानाद्यैर्यज्ञाद्यैर्व्याधितैरपि । आमुष्मिकं भयं नास्ति लौकिकं कृतमेव ॥

avṛttivṛttidānādyairyajñādyairvyādhitairapi | āmuṣmikaṃ bhayaṃ nāsti laukikaṃ kṛtameva

जिनके पास जीविका नहीं थी उन्हें जीविका-दान से, यज्ञ आदि से और रोगियों के उपचार से भी परलोक का कोई भय नहीं रहा, और लौकिक कार्य तो पहले से ही पूर्ण थे।

श्लोक 9 (14.15.9)

स्वर्गलोकोपमो लोकस्तदा तस्मिन्प्रशासति । बभूव सुखमेवाग्रं तद्विशिष्टतरं परम् ॥

svargalokopamo lokastadā tasminpraśāsati | babhūva sukhamevāgraṃ tadviśiṣṭataraṃ param

उसके शासन में लोक स्वर्ग के समान था; सुख ही सबसे आगे था, और उससे भी बढ़कर श्रेष्ठ सुख उसके पीछे था।

श्लोक 10 (14.15.10)

नार्यः पतिव्रताः सर्वा रूपवत्यः स्वलंकृताः । यथोक्तवृत्ताः स्वगुणैर्बभूवुः प्रीतिहेतवः ॥

nāryaḥ pativratāḥ sarvā rūpavatyaḥ svalaṃkṛtāḥ | yathoktavṛttāḥ svaguṇairbabhūvuḥ prītihetavaḥ

सब स्त्रियाँ पतिव्रता, रूपवती और भली-भाँति अलंकृत थीं; शास्त्रोक्त आचरण वाली वे अपने गुणों से प्रीति का कारण बनीं।

श्लोक 11 (14.15.11)

पुमांसः पुण्यशीलाढ्याः स्वंस्वं धर्ममनुव्रताः । सुखिनः सूक्ष्ममप्येनो न कुर्वन्ति कदाचन ॥

pumāṃsaḥ puṇyaśīlāḍhyāḥ svaṃsvaṃ dharmamanuvratāḥ | sukhinaḥ sūkṣmamapyeno na kurvanti kadācana

पुरुष पुण्यशील और गुणों से सम्पन्न थे, अपने-अपने धर्म में लगे रहते थे, सुखी थे और कभी थोड़ा-सा भी पाप नहीं करते थे।

श्लोक 12 (14.15.12)

सर्वे नराश्च नार्यश्च सततं प्रियवादिनः । अजिह्ममनसः शुक्ला बभूवुः श्रमवर्जिताः ॥

sarve narāśca nāryaśca satataṃ priyavādinaḥ | ajihmamanasaḥ śuklā babhūvuḥ śramavarjitāḥ

सभी स्त्री-पुरुष सदा प्रिय बोलने वाले, सरल मन वाले, शुद्ध और थकान से रहित थे।

श्लोक 13 (14.15.13)

भूषिताः कुण्डलैर्हारैः कटकैः कटिसूत्रकैः । सुवाससः सुगन्धाढ्याः प्रायशः पृथिवीतले ॥

bhūṣitāḥ kuṇḍalairhāraiḥ kaṭakaiḥ kaṭisūtrakaiḥ | suvāsasaḥ sugandhāḍhyāḥ prāyaśaḥ pṛthivītale

पृथ्वी पर प्रायः सभी कुण्डल, हार, कंगन और करधनी से सजे, सुन्दर वस्त्र पहने और सुगन्ध से भरे रहते थे।

श्लोक 14 (14.15.14)

सर्वे ब्रह्मविदो विप्राः सर्वत्र परिनिष्ठिताः । वलीपलितहीनास्तु सुखिनो दीर्घदर्शिनः ॥

sarve brahmavido viprāḥ sarvatra pariniṣṭhitāḥ | valīpalitahīnāstu sukhino dīrghadarśinaḥ

सब ब्राह्मण ब्रह्मज्ञानी थे और सर्वत्र प्रतिष्ठित थे; झुर्रियों और सफ़ेद बालों से रहित, वे सुखी और दूरदर्शी थे।

श्लोक 15 (14.15.15)

इच्छा न जायतेऽन्यत्र वर्णेषु न च सङ्करः । मनुष्याणां महाराज मर्यादा सुव्यवस्थिता ॥

icchā na jāyate'nyatra varṇeṣu na ca saṅkaraḥ | manuṣyāṇāṃ mahārāja maryādā suvyavasthitā

पराई वस्तु की इच्छा नहीं जागती थी और वर्णों में सङ्कर नहीं था। हे महाराज! मनुष्यों की मर्यादा भली-भाँति व्यवस्थित थी।

श्लोक 16 (14.15.16)

तस्मिञ्शासति राजेन्द्रे मृगव्यालसरीसृपाः । अन्योन्यमपि चान्येषु न बाधन्ते कदाचन ॥

tasmiñśāsati rājendre mṛgavyālasarīsṛpāḥ | anyonyamapi cānyeṣu na bādhante kadācana

उस राजेन्द्र के शासन में पशु, हिंसक जन्तु और सरीसृप न एक-दूसरे को और न किसी अन्य को कभी कष्ट देते थे।

श्लोक 17 (14.15.17)

गावः सुक्षीरभूयिष्ठाः सुस्ववालमुखोदराः । अपीडिताः कर्षकाद्यैर्हृतव्याधिकवत्सकाः ॥

gāvaḥ sukṣīrabhūyiṣṭhāḥ susvavālamukhodarāḥ | apīḍitāḥ karṣakādyairhṛtavyādhikavatsakāḥ

गायें बहुत दूध देने वाली थीं; उनकी पूँछ, मुख और पेट सुन्दर थे; किसानों आदि से पीड़ित न होने के कारण उनके बछड़े रोग से मुक्त थे।

श्लोक 18 (14.15.18)

अवन्ध्यकाला मनुजाः पुरुषार्थेषु च क्रमात् । विषयेष्वनिषिद्धेषु वेदशास्त्रेषु चोद्यताः ॥

avandhyakālā manujāḥ puruṣārtheṣu ca kramāt | viṣayeṣvaniṣiddheṣu vedaśāstreṣu codyatāḥ

मनुष्यों का समय कभी व्यर्थ नहीं जाता था; वे क्रम से पुरुषार्थों में, निषिद्ध न किए गए विषयों में तथा वेद और शास्त्रों में लगे रहते थे।

श्लोक 19 (14.15.19)

सुवृत्ता वृषभाः पुष्टा रसनाभाः सुखोदयाः ॥

suvṛttā vṛṣabhāḥ puṣṭā rasanābhāḥ sukhodayāḥ

बैल सुडौल, पुष्ट, कान्तिमान् और सुख देने वाले थे।

श्लोक 20 (14.15.20)

अतीव मधुरः शब्दः स्पर्शश्चातिसुखं रसम् । रूपं दृष्टिक्षमं रम्यं मनोज्ञं गन्धवद्बभौ ॥

atīva madhuraḥ śabdaḥ sparśaścātisukhaṃ rasam | rūpaṃ dṛṣṭikṣamaṃ ramyaṃ manojñaṃ gandhavadbabhau

शब्द अत्यन्त मधुर था, स्पर्श अति सुखद था और रस भी वैसा ही; रूप नेत्रों को भाने वाला, रमणीय और मनोहर था, और गन्ध सुगन्धित होकर शोभित हुआ।

श्लोक 21 (14.15.21)

धर्मार्थकामसंयुक्तं मोक्षाभ्युदयसाधनम् । प्रह्लादजननं पुण्यं सम्बभूवाथ मानसम् ॥

dharmārthakāmasaṃyuktaṃ mokṣābhyudayasādhanam | prahlādajananaṃ puṇyaṃ sambabhūvātha mānasam

उनके मन धर्म, अर्थ और काम से युक्त थे, मोक्ष और अभ्युदय के साधन थे, और आनन्द देने वाले तथा पवित्र हो गए।

श्लोक 22 (14.15.22)

स्थावरा बहुपुष्पाढ्याः फलच्छायावहास्तथा । सुस्पर्शा विषहीनाश्च सुपत्रत्वक्प्ररोहिणः ॥

sthāvarā bahupuṣpāḍhyāḥ phalacchāyāvahāstathā | susparśā viṣahīnāśca supatratvakprarohiṇaḥ

वृक्ष-लताएँ बहुत फूलों से भरी थीं, फल और छाया देती थीं; वे सुखद स्पर्श वाली, विष से रहित, सुन्दर पत्ते, छाल और अंकुरों वाली थीं।

श्लोक 23 (14.15.23)

मनोनुकूलाः सर्वेषां चेष्टाभूतापवर्जिताः । तथा बभूव राजर्षिस्तद्वृत्तमभवद्भुवि ॥

manonukūlāḥ sarveṣāṃ ceṣṭābhūtāpavarjitāḥ | tathā babhūva rājarṣistadvṛttamabhavadbhuvi

सबकी चेष्टाएँ मन के अनुकूल थीं और किसी प्राणी को हानि पहुँचाने वाली नहीं थीं। राजर्षि वैसे ही थे, और पृथ्वी पर वैसा ही आचरण प्रचलित हुआ।

श्लोक 24 (14.15.24)

सर्वलक्षणसम्पन्नाः पाण्डवा धर्मचारिणः । ज्येष्ठानुवर्तिनः सर्वे बभूवुः प्रियदर्शनाः ॥

sarvalakṣaṇasampannāḥ pāṇḍavā dharmacāriṇaḥ | jyeṣṭhānuvartinaḥ sarve babhūvuḥ priyadarśanāḥ

धर्म का आचरण करने वाले पाण्डव सब शुभ लक्षणों से सम्पन्न थे; सब ज्येष्ठ भाई के अनुगामी और देखने में प्रिय थे।

श्लोक 25 (14.15.25)

सिंहोरस्का जितक्रोधास्तेजोबलसमन्विताः । आजानुबाहवः सर्वे दानशीला जितेन्द्रियाः ॥

siṃhoraskā jitakrodhāstejobalasamanvitāḥ | ājānubāhavaḥ sarve dānaśīlā jitendriyāḥ

वे सिंह के समान चौड़ी छाती वाले, क्रोध को जीतने वाले, तेज और बल से सम्पन्न, घुटनों तक लम्बी भुजाओं वाले, दानशील और जितेन्द्रिय थे।

श्लोक 26 (14.15.26)

तेषु शासत्सु धरणीमृतवः स्वगुणैर्बभुः । सुखोदयाय वर्तन्ते ग्रहास्तारागणैः सह ॥

teṣu śāsatsu dharaṇīmṛtavaḥ svaguṇairbabhuḥ | sukhodayāya vartante grahāstārāgaṇaiḥ saha

उनके पृथ्वी पर शासन करते समय ऋतुएँ अपने गुणों से शोभित हुईं, और ग्रह तारागणों के साथ सुख की उन्नति के लिए गति करते थे।

श्लोक 27 (14.15.27)

मही च सस्यबहुला सर्वरत्नगुणोदया । कामधुग्धेनुवद्भोगान्फलति स्म सहस्रधा ॥

mahī ca sasyabahulā sarvaratnaguṇodayā | kāmadhugdhenuvadbhogānphalati sma sahasradhā

पृथ्वी अन्न से भरपूर और सब रत्नों के गुणों से सम्पन्न थी; कामधेनु की भाँति वह सहस्र गुना भोग देती थी।

श्लोक 28 (14.15.28)

मन्वादिभिः कृताः पूर्वं मर्यादा मानवेषु याः । अनतिक्रम्य ताः सर्वाः कुलेषु समयानि च । अन्वशासत राजानो धर्मपुत्रप्रियंकराः ॥

manvādibhiḥ kṛtāḥ pūrvaṃ maryādā mānaveṣu yāḥ | anatikramya tāḥ sarvāḥ kuleṣu samayāni ca | anvaśāsata rājāno dharmaputrapriyaṃkarāḥ

मनु आदि ने पहले मनुष्यों के लिए जो मर्यादाएँ और कुलों में जो नियम बनाए थे, उनमें से किसी का उल्लंघन न करके धर्मपुत्र का प्रिय करने वाले वे राजा सदा उन्हीं के अनुसार शासन करते थे।

श्लोक 29 (14.15.29)

महाकुलानि धर्मिष्ठा वर्धयन्तो विशेषतः । मनुप्रणीतया वृत्त्या तेऽन्वशासन्वसुन्धराम् ॥

mahākulāni dharmiṣṭhā vardhayanto viśeṣataḥ | manupraṇītayā vṛttyā te'nvaśāsanvasundharām

अत्यन्त धर्मनिष्ठ वे, विशेष रूप से बड़े कुलों को बढ़ाते हुए, मनु के बताए आचरण से पृथ्वी का शासन करते थे।

श्लोक 30 (14.15.30)

राजवृत्तिर्हि सा शश्वद्धर्मिष्ठाऽभून्महीतले । प्रायो लोकमतिस्तात राजवृत्तानुगामिनी ॥

rājavṛttirhi sā śaśvaddharmiṣṭhā'bhūnmahītale | prāyo lokamatistāta rājavṛttānugāminī

राजाओं का वह आचरण पृथ्वी पर सदा अत्यन्त धर्ममय था; क्योंकि हे तात! लोगों की बुद्धि प्रायः राजाओं के आचरण का ही अनुसरण करती है।

श्लोक 31 (14.15.31)

एवं भारतवर्षं स्वं राजा स्वर्गं सुरेन्द्रवत् । शशास जिष्णुना सार्धं गुप्तो गाण्डीवधन्वना ॥

evaṃ bhāratavarṣaṃ svaṃ rājā svargaṃ surendravat | śaśāsa jiṣṇunā sārdhaṃ gupto gāṇḍīvadhanvanā

इस प्रकार राजा ने इन्द्र के स्वर्ग के समान अपने भारतवर्ष का जिष्णु (अर्जुन) के साथ शासन किया, गाण्डीवधारी से रक्षित होकर।

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