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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 48

सत्त्व और पुरुष: ब्रह्मा का ऋषियों को उत्तर

ब्रह्मा कहते हैं कि कुछ लोग संसार को ब्रह्ममय वृक्ष कहते हैं, कुछ ब्रह्ममय वन, और सब इसे अव्यक्त से उत्पन्न मानते हैं। वे बताते हैं कि मृत्यु के समय एक श्वास भर की समता, या बार-बार किया गया प्राणायाम भी अमरता की ओर ले जाता है, और सत्त्व पुरुष के आश्रित है, जिसे अनुमान से जाना जाता है। वे क्षेत्रज्ञ को सत्त्व से अलग बताते हैं और उनके संयोग तथा पृथकता को मच्छर और गूलर, मछली और जल, तथा कमल के पत्ते पर जल की बूँदों के उदाहरणों से समझाते हैं। अन्त में गुरु बताते हैं कि यह सुनकर ऋषि फिर संशय में पड़ गए और उन्होंने लोकपितामह से प्रश्न किया।

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ब्रह्मोवाच

श्लोक 1 (14.48.1)

केचिद्ब्रह्ममयं वृक्षं केचिद्ब्रह्ममयं वनम् । केचित्परममव्यक्तं केचित्परमनामयम् । मन्यन्ते सर्वमप्येतदव्यक्तप्रभवाव्ययम् ॥

kecidbrahmamayaṃ vṛkṣaṃ kecidbrahmamayaṃ vanam | kecitparamamavyaktaṃ kecitparamanāmayam | manyante sarvamapyetadavyaktaprabhavāvyayam

कोई इसे ब्रह्ममय वृक्ष कहते हैं, कोई ब्रह्ममय वन, कोई परम अव्यक्त, और कोई परम निरामय। वे यह सब अव्यक्त से उत्पन्न और अविनाशी मानते हैं।

श्लोक 2 (14.48.2)

उच्छ्वासमात्रमपि चेद्योऽन्तकाले समो भवेत् । आत्मानमुपसङ्गम्य सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥

ucchvāsamātramapi cedyo'ntakāle samo bhavet | ātmānamupasaṅgamya so'mṛtatvāya kalpate

यदि कोई अन्त समय में एक श्वास भर के लिए भी सम रहे, तो आत्मा के पास पहुँचकर वह अमरता के योग्य हो जाता है।

श्लोक 3 (14.48.3)

निमेषमात्रमपि चेत्संयम्यात्मानमात्मनि । गच्छत्यात्मप्रसादेन विदुषां प्राप्तिमव्ययाम् ॥

nimeṣamātramapi cetsaṃyamyātmānamātmani | gacchatyātmaprasādena viduṣāṃ prāptimavyayām

यदि वह पलक झपकने भर के लिए भी अपने को आत्मा में संयत कर ले, तो आत्मा की प्रसन्नता से वह ज्ञानियों की अविनाशी प्राप्ति को पा लेता है।

श्लोक 4 (14.48.4)

प्राणायामैरथ प्राणान्संयम्य स पुनःपुनः । दशद्वादशभिर्वापि चतुर्विंशात्समन्ततः ॥

prāṇāyāmairatha prāṇānsaṃyamya sa punaḥpunaḥ | daśadvādaśabhirvāpi caturviṃśātsamantataḥ

प्राणायाम से बार-बार प्राणों का संयम करके, दस या बारह, अथवा चौबीस तक भी,

श्लोक 5 (14.48.5)

एवं पूर्वं प्रसन्नात्मा लभते यद्यदिच्छति । अव्यक्तात्सत्वमुद्रिक्तममृतत्वाय कल्पते ॥

evaṃ pūrvaṃ prasannātmā labhate yadyadicchati | avyaktātsatvamudriktamamṛtatvāya kalpate

इस प्रकार वह पहले प्रसन्नचित्त होकर जो-जो चाहता है, पा लेता है; और अव्यक्त से उठा हुआ सत्त्व अमरता की ओर ले जाता है।

श्लोक 6 (14.48.6)

सत्वात्परतरं नान्यत्प्रशंसन्तीह तद्विदः । अनुमानाद्विजानीमः पुरुषं सत्वसंश्रयम् । न शक्यमन्यथा गन्तुं पुरुषं द्विजसत्तमाः ॥

satvātparataraṃ nānyatpraśaṃsantīha tadvidaḥ | anumānādvijānīmaḥ puruṣaṃ satvasaṃśrayam | na śakyamanyathā gantuṃ puruṣaṃ dvijasattamāḥ

उसे जानने वाले यहाँ सत्त्व से श्रेष्ठ कुछ नहीं मानते। अनुमान से हम जानते हैं कि पुरुष सत्त्व के आश्रित है; हे द्विजश्रेष्ठो, उस पुरुष तक पहुँचने का और कोई उपाय नहीं।

श्लोक 7 (14.48.7)

क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् । ज्ञानं त्यागोऽथ संन्यासः सात्विकं वृत्तमिष्यते ॥

kṣamā dhṛtirahiṃsā ca samatā satyamārjavam | jñānaṃ tyāgo'tha saṃnyāsaḥ sātvikaṃ vṛttamiṣyate

क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, ज्ञान, त्याग और संन्यास — ये सात्त्विक आचरण माने जाते हैं।

श्लोक 8 (14.48.8)

एतेनैवानुमानेन मन्यन्ते वै मनीषिणः । सत्वं च पुरुषश्चैव तत्र नास्ति विचारणा ॥

etenaivānumānena manyante vai manīṣiṇaḥ | satvaṃ ca puruṣaścaiva tatra nāsti vicāraṇā

इसी अनुमान से विचारशील लोग मानते हैं कि सत्त्व और पुरुष के विषय में अब और विचार की कोई आवश्यकता नहीं।

श्लोक 9 (14.48.9)

आहुरेके च विद्वांसो ये ज्ञाने सुप्रतिष्ठिताः । क्षेत्रज्ञसत्वयोरैक्यमित्येतन्नोपपद्यते ॥

āhureke ca vidvāṃso ye jñāne supratiṣṭhitāḥ | kṣetrajñasatvayoraikyamityetannopapadyate

ज्ञान में भली-भाँति स्थित कुछ विद्वान् कहते हैं कि क्षेत्रज्ञ और सत्त्व की एकता सिद्ध नहीं होती।

श्लोक 10 (14.48.10)

पृथग्भूतस्तथा नित्यमित्येतदविचारितम् । पृथग्भावश्च विज्ञेयः सहजश्चापि तत्त्वतः ॥

pṛthagbhūtastathā nityamityetadavicāritam | pṛthagbhāvaśca vijñeyaḥ sahajaścāpi tattvataḥ

"इस प्रकार वे सदा सर्वथा अलग हैं" — यह बात भी विचार से नहीं कही गई। उनके पृथक् होने को जानना चाहिए, और यह भी कि वास्तव में वह पृथक्ता सहज है।

श्लोक 11 (14.48.11)

तथैवैकत्वनानात्वमिष्यते विदुषां नयः । मशकोदुम्बरे चैक्यं पृथक्त्वमपि दृश्यते ॥

tathaivaikatvanānātvamiṣyate viduṣāṃ nayaḥ | maśakodumbare caikyaṃ pṛthaktvamapi dṛśyate

इसी प्रकार एकता और अनेकता दोनों मानी जाती हैं; यही विद्वानों की रीति है। मच्छर और गूलर में एकता भी दिखती है और अलगाव भी।

श्लोक 12 (14.48.12)

मत्स्यो यथाऽन्यः स्यादप्सु सम्प्रयोगस्तथा तयोः । सम्बन्धस्तोयबिन्दूनां पर्णैः कोकनदस्य च ॥

matsyo yathā'nyaḥ syādapsu samprayogastathā tayoḥ | sambandhastoyabindūnāṃ parṇaiḥ kokanadasya ca

जैसे मछली जल से अलग होकर भी उसके साथ जुड़ी रहती है, वैसे ही इन दोनों का संयोग है; और वैसा ही सम्बन्ध लाल कमल के पत्तों के साथ जल की बूँदों का है।

गुरुरुवाच

श्लोक 13 (14.48.13)

इत्युक्तवन्तस्ते विप्रास्तदा लोकपितामहम् । पुनः संशयमापन्नाः पप्रच्छुर्मुनिसत्तमाः ॥

ityuktavantaste viprāstadā lokapitāmaham | punaḥ saṃśayamāpannāḥ papracchurmunisattamāḥ

यह सुनकर और उसे समझकर वे श्रेष्ठ मुनि ब्राह्मण फिर संशय में पड़ गए और उन्होंने लोकपितामह से पूछा।

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