आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 61
वसुदेव को अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार
कृष्ण अपने पिता को महायुद्ध की कथा सुनाते हुए अभिमन्यु के वध की बात छोड़ देते हैं; सुभद्रा के पूछने पर वह समाचार प्रकट हो जाता है और वे तथा वसुदेव दोनों मूर्छित हो जाते हैं। वसुदेव कृष्ण से पूछते हैं कि उनका दौहित्र कैसे मारा गया, और कृष्ण बताते हैं कि वह पीछे नहीं हटा, बल्कि अर्जुन के दूर हट जाने पर द्रोण आदि ने उसे घेर लिया। वे सुभद्रा के शोक, कुन्ती के सान्त्वना-वचनों और अभिमन्यु के श्राद्ध का वर्णन करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.61.1)
कथयन्नेव तु तदा वासुदेवः प्रतापवान् । महाभारतयुद्धं तत्कथान्ते पितुरग्रतः ॥
kathayanneva tu tadā vāsudevaḥ pratāpavān | mahābhāratayuddhaṃ tatkathānte pituragrataḥ
प्रतापी वासुदेव अपने पिता के सामने महाभारत-युद्ध की कथा सुना रहे थे, और जब वह कथा समाप्त होने को आई,
श्लोक 2 (14.61.2)
अभिमन्योर्वधं वीरः सोत्यक्रामन्महामतिः । अप्रियं वसुदेवस्य माभूदिति महामनाः ॥
abhimanyorvadhaṃ vīraḥ sotyakrāmanmahāmatiḥ | apriyaṃ vasudevasya mābhūditi mahāmanāḥ
तब उस बुद्धिमान और उदार वीर ने अभिमन्यु के वध की बात छोड़ दी, यह सोचकर कि वसुदेव को कोई अप्रिय बात न सुननी पड़े।
श्लोक 3 (14.61.3)
मा दौहित्रवधं श्रुत्वा वसुदेवो महात्ययम् । दुःखशोकाभिसंतप्तो भवेदिति महामतिः ॥
mā dauhitravadhaṃ śrutvā vasudevo mahātyayam | duḥkhaśokābhisaṃtapto bhavediti mahāmatiḥ
"दौहित्र की मृत्यु सुनकर वसुदेव इस भारी विपत्ति से दुःख और शोक में जलने न लगें," ऐसा उस बुद्धिमान ने सोचा।
श्लोक 4 (14.61.4)
सुभद्रा तु तमुत्क्रान्तमात्मजस्य वधं रणे । आचक्ष्व कृष्ण सौभद्रवधमित्यपतद्भुवि ॥
subhadrā tu tamutkrāntamātmajasya vadhaṃ raṇe | ācakṣva kṛṣṇa saubhadravadhamityapatadbhuvi
परन्तु सुभद्रा समझ गईं कि अपने पुत्र के रण में मारे जाने की बात छोड़ दी गई है; "कृष्ण, सौभद्र के वध की बात मुझे बताओ!" ऐसा कहकर वे भूमि पर गिर पड़ीं।
श्लोक 5 (14.61.5)
तामपश्यन्निपतितां वसुदेवः क्षितौ तदा । दृष्ट्वैव च पपातोर्व्यां सोऽपि दुःखेन मूर्छितः ॥
tāmapaśyannipatitāṃ vasudevaḥ kṣitau tadā | dṛṣṭvaiva ca papātorvyāṃ so'pi duḥkhena mūrchitaḥ
उन्हें भूमि पर गिरा देखकर वसुदेव भी दुःख से मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
श्लोक 6 (14.61.6)
ततः स दौहित्रवधाद्दुःखशोकसमाहतः । वसुदेवो महाराज कृष्णं वाक्यमथाब्रवीत् ॥
tataḥ sa dauhitravadhādduḥkhaśokasamāhataḥ | vasudevo mahārāja kṛṣṇaṃ vākyamathābravīt
तब दौहित्र के वध से दुःख और शोक में डूबे हुए वसुदेव ने कृष्ण से यह वचन कहा, हे महाराज।
वसुदेव उवाच
श्लोक 7 (14.61.7)
ननु त्वं पुण्डरीकाक्ष सत्यवाग्भुवि विश्रुतः । यद्दौहित्रवधं मेऽद्य न ख्यापयसि शत्रुहन् ॥
nanu tvaṃ puṇḍarīkākṣa satyavāgbhuvi viśrutaḥ | yaddauhitravadhaṃ me'dya na khyāpayasi śatruhan
कमलनयन, क्या तुम पृथ्वी पर सत्यवादी के रूप में प्रसिद्ध नहीं हो? फिर भी, हे शत्रुहन्ता, आज तुम मुझे दौहित्र के वध की बात नहीं बता रहे हो।
श्लोक 8 (14.61.8)
तद्भागिनेयनिधनं तत्त्वेनाचक्ष्व मे प्रभो । सदृशाक्षस्तव कथं शत्रुभिर्निहतो रणे ॥
tadbhāgineyanidhanaṃ tattvenācakṣva me prabho | sadṛśākṣastava kathaṃ śatrubhirnihato raṇe
प्रभु, अपने भानजे की मृत्यु मुझे ठीक-ठीक बताओ। तुम्हारे समान नेत्रों वाला वह रण में शत्रुओं के हाथ कैसे मारा गया?
श्लोक 9 (14.61.9)
दुर्भरं बत वार्ष्णेय कालेऽप्राप्ते नृभिः सह । यत्र मे हृदयं दुःखाच्छतधा न विदीर्यते ॥
durbharaṃ bata vārṣṇeya kāle'prāpte nṛbhiḥ saha | yatra me hṛdayaṃ duḥkhācchatadhā na vidīryate
हाय वार्ष्णेय, जब काल नहीं आया हो तब ऐसा वियोग मनुष्यों के लिए सहना कठिन होता है; तभी तो दुःख से मेरा हृदय सौ टुकड़े नहीं हो जाता।
श्लोक 10 (14.61.10)
किमब्रवीत्त्वां सङ्ग्रामे सुभद्रां मातरं प्रति । मां चापि पुण्डरीकाक्षि चपलाक्षः प्रियो मम ॥
kimabravīttvāṃ saṅgrāme subhadrāṃ mātaraṃ prati | māṃ cāpi puṇḍarīkākṣi capalākṣaḥ priyo mama
कमलनयन, चंचल नेत्रों वाले मेरे उस प्रिय बालक ने रण में तुमसे क्या कहा था—अपनी माता सुभद्रा के विषय में, और मेरे विषय में भी?
श्लोक 11 (14.61.11)
आहवं पृष्ठतः कृत्वा कच्चिन्न निहतः परैः । कच्चिन्मुखं न गोविन्द तेनाजौ विकृतं कृतम् ॥
āhavaṃ pṛṣṭhataḥ kṛtvā kaccinna nihataḥ paraiḥ | kaccinmukhaṃ na govinda tenājau vikṛtaṃ kṛtam
कहीं ऐसा तो नहीं कि वह युद्ध की ओर पीठ करके शत्रुओं के हाथ मारा गया? गोविन्द, क्या रण में उसका मुख विकृत तो नहीं हो गया था?
श्लोक 12 (14.61.12)
स हि कृष्ण महातेजाः श्लाघन्निव ममाग्रतः । बालभावेन विजयमात्मनोऽकथयत्प्रभुः ॥
sa hi kṛṣṇa mahātejāḥ ślāghanniva mamāgrataḥ | bālabhāvena vijayamātmano'kathayatprabhuḥ
कृष्ण, वह महातेजस्वी बालक बाल-स्वभाव से मेरे सामने मानो इतराते हुए अपनी विजयों की चर्चा किया करता था।
श्लोक 13 (14.61.13)
कच्चिन्न निकृतो बालो द्रोणकर्णकृपादिभिः । धरण्यां निहतः शेते तन्ममाचक्ष्व केशव ॥
kaccinna nikṛto bālo droṇakarṇakṛpādibhiḥ | dharaṇyāṃ nihataḥ śete tanmamācakṣva keśava
कहीं द्रोण, कर्ण, कृप आदि ने उस बालक को छल तो नहीं लिया? क्या वह धरती पर मरा पड़ा है? केशव, मुझे यह बताओ।
श्लोक 14 (14.61.14)
स हि द्रोणं च भीष्मं च कर्णं च बलीनां वरम् । स्पर्धते स्म रणे नित्यं दुहितुः पुत्रको मम ॥
sa hi droṇaṃ ca bhīṣmaṃ ca karṇaṃ ca balīnāṃ varam | spardhate sma raṇe nityaṃ duhituḥ putrako mama
मेरी पुत्री का वह पुत्र रण में द्रोण, भीष्म और बलवानों में श्रेष्ठ कर्ण से भी सदा होड़ किया करता था।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 15 (14.61.15)
एवंविधं बहु तदा विलपन्तं सुदुःखितम् । पितरं दुःखिततरं गोविन्दो वाक्यमब्रवीत् ॥
evaṃvidhaṃ bahu tadā vilapantaṃ suduḥkhitam | pitaraṃ duḥkhitataraṃ govindo vākyamabravīt
इस प्रकार अत्यन्त दुःखी होकर बहुत विलाप करते हुए पिता से, उनसे भी अधिक दुःखी गोविन्द ने कहा।
वासुदेव उवाच
श्लोक 16 (14.61.16)
न तेन विकृतं वक्त्रं कृतं सङ्ग्राममूर्धनि । न पृष्ठतः कृतश्चापि सङ्ग्रामस्तेन दुस्तरः ॥
na tena vikṛtaṃ vaktraṃ kṛtaṃ saṅgrāmamūrdhani | na pṛṣṭhataḥ kṛtaścāpi saṅgrāmastena dustaraḥ
उसने युद्ध के अग्रभाग में अपना मुख विकृत नहीं होने दिया, और उस दुस्तर संग्राम में पीठ भी नहीं दिखाई।
श्लोक 17 (14.61.17)
निहत्य पृथिवीपालान्सहस्रशतसङ्घशः । खेदितो द्रोणकर्णाभ्यां दौःशासनिवशं गतः ॥
nihatya pṛthivīpālānsahasraśatasaṅghaśaḥ | khedito droṇakarṇābhyāṃ dauḥśāsanivaśaṃ gataḥ
सैकड़ों-हज़ारों और झुंड-के-झुंड राजाओं को मारकर, द्रोण और कर्ण से थकाया जाकर वह दुःशासन-पुत्र के वश में आ गया।
श्लोक 18 (14.61.18)
एको ह्येकेन सततं युध्यमानो यदि प्रभो । न स शक्येत सङ्ग्रामे निहन्तुमपि वज्रिणा ॥
eko hyekena satataṃ yudhyamāno yadi prabho | na sa śakyeta saṅgrāme nihantumapi vajriṇā
प्रभो, यदि वह एक से एक ही लड़ता होता, तो रण में वज्रधारी इन्द्र भी उसे नहीं मार सकता था।
श्लोक 19 (14.61.19)
समाहूते च सङ्ग्रामे पार्थे संशप्तकैस्तदा । पर्यवार्यत संक्रुद्धैः स द्रोणादिभिराहवे ॥
samāhūte ca saṅgrāme pārthe saṃśaptakaistadā | paryavāryata saṃkruddhaiḥ sa droṇādibhirāhave
परन्तु जब संशप्तकों ने पार्थ को युद्ध के लिए ललकारकर दूर खींच लिया, तब क्रुद्ध द्रोण आदि ने रण में उसे घेर लिया।
श्लोक 20 (14.61.20)
ततः शत्रुवधं कृत्वा सुमहान्तं रणे पितः । दौहित्रस्तव वार्ष्णेय दौःशासनिवशं गतः ॥
tataḥ śatruvadhaṃ kṛtvā sumahāntaṃ raṇe pitaḥ | dauhitrastava vārṣṇeya dauḥśāsanivaśaṃ gataḥ
तब, पिताजी, रण में शत्रुओं का बहुत बड़ा संहार करके आपका दौहित्र, हे वार्ष्णेय, दुःशासन-पुत्र के वश में हो गया।
श्लोक 21 (14.61.21)
नूनं च स गतः स्वर्गं जहि शोकं महामते । न हि व्यसनमासाद्य सीदन्ति कृतबुद्धयः ॥
nūnaṃ ca sa gataḥ svargaṃ jahi śokaṃ mahāmate | na hi vyasanamāsādya sīdanti kṛtabuddhayaḥ
निश्चय ही वह स्वर्ग गया है। हे महामते, शोक छोड़िए; दृढ़ निश्चय वाले लोग विपत्ति आने पर भी हताश नहीं होते।
श्लोक 22 (14.61.22)
द्रोणकर्णप्रभृतयो येन प्रतिसमासिताः । रणे महेन्द्रप्रतिमाः स कथं नाप्नुयाद्दिवम् ॥
droṇakarṇaprabhṛtayo yena pratisamāsitāḥ | raṇe mahendrapratimāḥ sa kathaṃ nāpnuyāddivam
जिसने रण में महेन्द्र के समान द्रोण, कर्ण आदि को रोक रखा था, वह स्वर्ग कैसे न पाता?
श्लोक 23 (14.61.23)
स शोकं जहि दुर्धर्ष मा च मन्युवशं गमः । शस्त्रपूतां हि स गतिं गतः परपुरंजयः ॥
sa śokaṃ jahi durdharṣa mā ca manyuvaśaṃ gamaḥ | śastrapūtāṃ hi sa gatiṃ gataḥ parapuraṃjayaḥ
हे दुर्धर्ष, शोक छोड़िए और उसके वश में न हों। शत्रुओं के नगर जीतने वाला वह उस गति को गया है जो शस्त्र से पवित्र होती है।
श्लोक 24 (14.61.24)
तस्मिंस्तु निहते वीरे सुभद्रेयं स्वसा मम । दुःखार्ताऽथो पृथां प्राप्य कुररीव ननाद ह ॥
tasmiṃstu nihate vīre subhadreyaṃ svasā mama | duḥkhārtā'tho pṛthāṃ prāpya kurarīva nanāda ha
उस वीर के मारे जाने पर मेरी यह बहन सुभद्रा दुःख से व्याकुल होकर पृथा (कुन्ती) के पास पहुँची और कुररी की तरह चीख उठी।
श्लोक 25 (14.61.25)
द्रौपदीं च समासाद्य पर्यतप्यत दुःखिता । आर्ये क्व दारकाः सर्वे द्रष्टुमिच्छामि तानहम् ॥
draupadīṃ ca samāsādya paryatapyata duḥkhitā | ārye kva dārakāḥ sarve draṣṭumicchāmi tānaham
फिर द्रौपदी के पास जाकर वह दुःख से विलाप करने लगी: "आर्ये, सब बालक कहाँ हैं? मैं उन्हें देखना चाहती हूँ।"
श्लोक 26 (14.61.26)
अस्यास्तु वचनं श्रुत्वा सर्वास्ताः कुरुयोषितः । भुजाभ्यां परिगृह्यैनां चुक्रुशुः परमार्तवत् ॥
asyāstu vacanaṃ śrutvā sarvāstāḥ kuruyoṣitaḥ | bhujābhyāṃ parigṛhyaināṃ cukruśuḥ paramārtavat
उसकी बात सुनकर कुरुकुल की सब स्त्रियों ने उसे भुजाओं में भर लिया और अत्यन्त पीड़ित होकर रो पड़ीं।
श्लोक 27 (14.61.27)
उत्तरां चाब्रवीद्भद्रे भर्ता स क्व नु ते गतः । क्षिप्रमागमनं मह्यं तस्य त्वं वेदयस्व ह ॥
uttarāṃ cābravīdbhadre bhartā sa kva nu te gataḥ | kṣipramāgamanaṃ mahyaṃ tasya tvaṃ vedayasva ha
उसने उत्तरा से कहा, "कल्याणी, तुम्हारा पति कहाँ गया है? उसे शीघ्र बता दो कि वह मेरे पास आए।
सुभद्रोवाच
श्लोक 28 (14.61.28)
ननु नामाद्य वैराटि श्रुत्वा मम गिरं सदा । भवनान्निष्पतत्याशु कस्मान्नाभ्येति ते पतिः ॥
nanu nāmādya vairāṭi śrutvā mama giraṃ sadā | bhavanānniṣpatatyāśu kasmānnābhyeti te patiḥ
विराट की पुत्री, मेरी आवाज़ सुनते ही वह सदा तुरन्त घर से निकल पड़ता था। आज तुम्हारा पति क्यों नहीं आ रहा?
श्लोक 29 (14.61.29)
अभिमन्योऽनुशयिनो मातुलास्ते महारथाः । कुशलं चाब्रुवन्सर्वे त्वां युयुत्सुमिहागतम् ॥
abhimanyo'nuśayino mātulāste mahārathāḥ | kuśalaṃ cābruvansarve tvāṃ yuyutsumihāgatam
अभिमन्यु, तुम्हारे मामा, वे महारथी, जो तुम्हारे प्रति बहुत स्नेह रखते हैं, सब तुम्हारा कुशल पूछ रहे थे, जब तुम युद्ध की इच्छा से यहाँ आए थे।
श्लोक 30 (14.61.30)
आचक्ष्व मेऽद्य सङ्ग्रामं यथापूर्वमरिन्दम । कस्मादेवं विलपतीं नाद्येह प्रतिभाषसे ॥
ācakṣva me'dya saṅgrāmaṃ yathāpūrvamarindama | kasmādevaṃ vilapatīṃ nādyeha pratibhāṣase
शत्रुदमन, आज भी युद्ध का हाल मुझे वैसे ही सुनाओ जैसे पहले सुनाते थे। मैं इस प्रकार विलाप कर रही हूँ, फिर भी तुम आज मुझे उत्तर क्यों नहीं देते?"
वासुदेव उवाच
श्लोक 31 (14.61.31)
एवमादि तु वार्ष्णेय्यास्तस्यास्तत्परिदेवितम् । श्रुत्वा पृथा सुदुःखार्ता शनैर्वाक्यमथाब्रवीत् ॥
evamādi tu vārṣṇeyyāstasyāstatparidevitam | śrutvā pṛthā suduḥkhārtā śanairvākyamathābravīt
वार्ष्णेयी (सुभद्रा) का इस प्रकार का विलाप सुनकर अत्यन्त दुःखी पृथा ने धीरे से कहा।
कुन्त्युवाच
श्लोक 32 (14.61.32)
सुभद्रे वासुदेवेन तथा सात्यकिना रणे । पित्रा च लालितो बालः स हतः कालधर्मणा ॥
subhadre vāsudevena tathā sātyakinā raṇe | pitrā ca lālito bālaḥ sa hataḥ kāladharmaṇā
सुभद्रा, वासुदेव, युद्ध में सात्यकि और अपने पिता से लाड़-प्यार और रक्षा पाया हुआ वह बालक भी काल के नियम से मारा गया।
श्लोक 33 (14.61.33)
ईदृशो मर्त्यधर्मोऽयं मा शुचो यदुनन्दिनि । पुत्रो हि तव दुर्धर्षः सम्प्राप्तः परमां गतिम् ॥
īdṛśo martyadharmo'yaṃ mā śuco yadunandini | putro hi tava durdharṣaḥ samprāptaḥ paramāṃ gatim
मनुष्यों का यही धर्म है; यदुनन्दिनी, शोक मत करो। तुम्हारा दुर्धर्ष पुत्र परम गति को प्राप्त हुआ है।
श्लोक 34 (14.61.34)
कुले महति जातासि क्षत्रियाणां महात्मनाम् । मा शुचश्चपलाक्षं त्वं पद्मपत्रनिभेक्षणे ॥
kule mahati jātāsi kṣatriyāṇāṃ mahātmanām | mā śucaścapalākṣaṃ tvaṃ padmapatranibhekṣaṇe
तुम महान् क्षत्रिय-कुल में उत्पन्न हुई हो, कमलनयनी; उस चंचल नेत्रों वाले बालक के लिए शोक मत करो।
श्लोक 35 (14.61.35)
उत्तरां त्वमवेक्षस्व गुर्विणीं मा शुचः शुभे । पुत्रमेषा हि तस्याशु जनयिष्यति भामिनी ॥
uttarāṃ tvamavekṣasva gurviṇīṃ mā śucaḥ śubhe | putrameṣā hi tasyāśu janayiṣyati bhāminī
गर्भवती उत्तरा की ओर देखो; शुभे, शोक मत करो। वह सुन्दरी शीघ्र ही उसके पुत्र को जन्म देगी।"
वासुदेव उवाच
श्लोक 36 (14.61.36)
एवमाश्वासयित्वैनां कुन्ती यदुकुलोद्वह । विहाय शोकं दुर्धर्षं श्राद्धमस्य ह्यकल्पयत् ॥
evamāśvāsayitvaināṃ kuntī yadukulodvaha | vihāya śokaṃ durdharṣaṃ śrāddhamasya hyakalpayat
हे यदुकुलश्रेष्ठ, इस प्रकार सुभद्रा को ढाढ़स बँधाकर कुन्ती ने अपना असह्य शोक छोड़ा और उसके श्राद्ध की व्यवस्था की।
श्लोक 37 (14.61.37)
समनुज्ञाप्य धर्मज्ञं राजानं भीममेव च । यमौ यमोपमौ चैव ददौ दानान्यनेकशः ॥
samanujñāpya dharmajñaṃ rājānaṃ bhīmameva ca | yamau yamopamau caiva dadau dānānyanekaśaḥ
धर्म को जानने वाले राजा (युधिष्ठिर), भीम और यम के समान दोनों जुड़वाँ भाइयों से अनुमति लेकर उसने अनेक दान दिए।
श्लोक 38 (14.61.38)
ततः प्रदाय बह्वीर्गा ब्राह्मणेभ्यो यदूद्वह । समाहृष्य तु वार्ष्णेयी वैराटीमब्रवीदिदम् ॥
tataḥ pradāya bahvīrgā brāhmaṇebhyo yadūdvaha | samāhṛṣya tu vārṣṇeyī vairāṭīmabravīdidam
फिर, हे यदुवंशी, ब्राह्मणों को बहुत-सी गौएँ देकर, कुछ प्रसन्न हुई वार्ष्णेयी (कुन्ती) ने विराट-पुत्री से यह कहा।
कुन्त्युवाच
श्लोक 39 (14.61.39)
वैराटि नेह संतापस्त्वया कार्यो ह्यनिन्दिते । भर्तारं प्रति सुश्रोणि गर्भस्थं रक्ष वै शिशुम् ॥
vairāṭi neha saṃtāpastvayā kāryo hyanindite | bhartāraṃ prati suśroṇi garbhasthaṃ rakṣa vai śiśum
विराट-पुत्री, निर्दोष, तुम्हें यहाँ शोक नहीं करना चाहिए। सुन्दर कटि वाली, अपने पति के लिए गर्भ में स्थित शिशु की रक्षा करो।"
वासुदेव उवाच
श्लोक 40 (14.61.40)
एवमुक्त्वा ततः कुन्ती विरराम महाद्युते । तामनुज्ञाप्य चैवेमां सुभद्रां समुपानयम् ॥
evamuktvā tataḥ kuntī virarāma mahādyute | tāmanujñāpya caivemāṃ subhadrāṃ samupānayam
हे महाद्युति, यह कहकर कुन्ती चुप हो गईं; और उनकी अनुमति लेकर मैं इस सुभद्रा को यहाँ ले आया हूँ।
श्लोक 41 (14.61.41)
एवं स निधनं प्राप्तो दौहित्रस्तव मानद । संतापं त्यज दुर्धर्ष मा च शोके मनः कृथाः ॥
evaṃ sa nidhanaṃ prāpto dauhitrastava mānada | saṃtāpaṃ tyaja durdharṣa mā ca śoke manaḥ kṛthāḥ
इस प्रकार आपका दौहित्र मृत्यु को प्राप्त हुआ, हे मान देने वाले। हे दुर्धर्ष, सन्ताप छोड़िए और मन को शोक में मत लगाइए।