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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 60

कृष्ण द्वारा वसुदेव को युद्ध का वृत्तान्त

वसुदेव अपने पुत्र कृष्ण से, जिन्होंने युद्ध स्वयं देखा था, पूछते हैं कि वह कैसे लड़ा गया। कृष्ण संक्षेप में बताते हैं: भीष्म, द्रोण, कर्ण और शल्य का सेनापतित्व और उनकी मृत्यु, शकुनि का वध, भीम के हाथों दुर्योधन का अन्त, द्रोणपुत्र द्वारा रात का संहार, बचे हुए थोड़े-से लोग, और अठारह दिन का युद्ध। यह सुनकर वृष्णि शोक से भर जाते हैं।

अध्याय 59अध्याय-सूचीअध्याय 61

वसुदेव उवाच

श्लोक 1 (14.60.1)

श्रुतवानस्मि वार्ष्णेय सङ्ग्रामं परमाद्भुतम् । नराणां वदतां पुत्र कथोद्धातेषु नित्यशः ॥

śrutavānasmi vārṣṇeya saṅgrāmaṃ paramādbhutam | narāṇāṃ vadatāṃ putra kathoddhāteṣu nityaśaḥ

"हे वार्ष्णेय, मैंने उस परम अद्भुत संग्राम के विषय में सुना है; हे पुत्र, लोग बातचीत के आरम्भ में उसे सदा सुनाते रहते हैं।

श्लोक 2 (14.60.2)

त्वं तु प्रत्यक्षदर्शी च कार्यज्ञश्च महाभुजः । तस्मात्प्रब्रूहि सङ्ग्रामं याथातथ्येन मेऽनघ ॥

tvaṃ tu pratyakṣadarśī ca kāryajñaśca mahābhujaḥ | tasmātprabrūhi saṅgrāmaṃ yāthātathyena me'nagha

परन्तु हे महाबाहु, तुम प्रत्यक्ष देखने वाले थे और कर्तव्य को जानने वाले हो। इसलिए हे निष्पाप, उस संग्राम को ठीक-ठीक वैसा ही मुझे बताओ —

श्लोक 3 (14.60.3)

यथा तदभवद्युद्धं पाण्डवानां महात्मनाम् । भीष्मकर्णकृपद्रोणशल्यादिभिरनुत्तमम् ॥

yathā tadabhavadyuddhaṃ pāṇḍavānāṃ mahātmanām | bhīṣmakarṇakṛpadroṇaśalyādibhiranuttamam

महात्मा पाण्डवों का वह युद्ध कैसे हुआ, जो भीष्म, कर्ण, कृप, द्रोण, शल्य आदि के साथ अनुपम था,

श्लोक 4 (14.60.4)

अन्येषां क्षत्रियाणां च कृतास्त्राणामनेकशः । नानावेषाकृतिमतां नानादेशनिवासिनाम् ॥

anyeṣāṃ kṣatriyāṇāṃ ca kṛtāstrāṇāmanekaśaḥ | nānāveṣākṛtimatāṃ nānādeśanivāsinām

और जिसमें अस्त्रविद्या में निपुण, भिन्न-भिन्न वेश और आकृति वाले तथा अनेक देशों में रहने वाले दूसरे बहुत-से क्षत्रिय भी थे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (14.60.5)

इत्युक्तः पुण्डरीकाक्षः पित्रा मातुस्तदाऽन्तिके । शशंस कुरुवीराणां सङ्ग्रामे निधनं यथा ॥

ityuktaḥ puṇḍarīkākṣaḥ pitrā mātustadā'ntike | śaśaṃsa kuruvīrāṇāṃ saṅgrāme nidhanaṃ yathā

माता के समीप पिता के इस प्रकार कहने पर कमलनयन श्रीकृष्ण ने बताया कि संग्राम में कुरुवीरों का अन्त कैसे हुआ।

वासुदेव उवाच

श्लोक 6 (14.60.6)

अत्यद्भुतानि कर्माणि क्षत्रियाणां महात्मनाम् । बहुलत्वान्न सङ्ख्यातुं शक्यान्यब्दशतैरपि ॥

atyadbhutāni karmāṇi kṣatriyāṇāṃ mahātmanām | bahulatvānna saṅkhyātuṃ śakyānyabdaśatairapi

"महात्मा क्षत्रियों के कर्म अत्यन्त अद्भुत थे; उनकी संख्या इतनी अधिक है कि सैकड़ों वर्षों में भी उन्हें गिना नहीं जा सकता।

श्लोक 7 (14.60.7)

प्राधान्यतस्तु गदतः समासेनैव मे शृणु । कर्माणि पृथिवीशानां यथावदमरद्युते ॥

prādhānyatastu gadataḥ samāsenaiva me śṛṇu | karmāṇi pṛthivīśānāṃ yathāvadamaradyute

हे देवतुल्य तेजस्वी, पृथ्वी के स्वामियों के प्रमुख कर्मों को मैं संक्षेप में, जैसे वे हुए थे वैसे ही कहता हूँ; मुझसे सुनिए।

श्लोक 8 (14.60.8)

भीष्मः सेनापतिरभूदेकादशचमूपतिः । कौरव्यः कौरवेन्द्राणां देवानामिव पावकिः ॥

bhīṣmaḥ senāpatirabhūdekādaśacamūpatiḥ | kauravyaḥ kauravendrāṇāṃ devānāmiva pāvakiḥ

भीष्म सेनापति थे, ग्यारह अक्षौहिणी सेना के स्वामी; कौरवों के राजाओं में वे कौरव्य भीष्म वैसे ही थे जैसे देवताओं में पावकि (कार्तिकेय)।

श्लोक 9 (14.60.9)

शिखण्डी पाण्डुपुत्राणां नेता सप्तचमूपतिः । बभूव रक्षितो धीमाञ्श्रीमता सव्यसाचिना ॥

śikhaṇḍī pāṇḍuputrāṇāṃ netā saptacamūpatiḥ | babhūva rakṣito dhīmāñśrīmatā savyasācinā

शिखण्डी पाण्डवों के नेता और सात अक्षौहिणी सेना के स्वामी हुए; बुद्धिमान् शिखण्डी की रक्षा श्रीमान् सव्यसाची अर्जुन करते थे।

श्लोक 10 (14.60.10)

तेषां तदभवद्युद्धं दशाहानि महात्मनाम् । कुरूणां पाण्डवानां च सुमहद्रोमहर्षणम् ॥

teṣāṃ tadabhavadyuddhaṃ daśāhāni mahātmanām | kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca sumahadromaharṣaṇam

उन महात्मा कुरुओं और पाण्डवों का वह युद्ध दस दिन तक चला, जो अत्यन्त विशाल और रोमांचकारी था।

श्लोक 11 (14.60.11)

अयुध्यमानं गाङ्गेयं शिखण्डी तं महाद्युतिम् । जघान बहुभिर्बाणैः सह गाण्डीवधन्वना ॥

ayudhyamānaṃ gāṅgeyaṃ śikhaṇḍī taṃ mahādyutim | jaghāna bahubhirbāṇaiḥ saha gāṇḍīvadhanvanā

शिखण्डी ने गाण्डीवधारी अर्जुन के साथ मिलकर युद्ध न करते हुए तेजस्वी गंगापुत्र भीष्म को बहुत-से बाणों से मार गिराया।

श्लोक 12 (14.60.12)

अकरोत्स ततः कालं शरतल्पगतो मुनिः । अयनं दक्षिणं हित्वा सम्प्राप्ते चोत्तरायणे ॥

akarotsa tataḥ kālaṃ śaratalpagato muniḥ | ayanaṃ dakṣiṇaṃ hitvā samprāpte cottarāyaṇe

तब शरशय्या पर लेटे हुए उन मुनि ने सूर्य के दक्षिणायन को छोड़कर उत्तरायण में आ जाने पर देह त्याग किया।

श्लोक 13 (14.60.13)

ततः सेनापतिरभूद्द्रोणोऽस्त्रविदुषांवरः । प्रवीरः कौरवेन्द्रस्य काव्यो दैत्यपतेरिव ॥

tataḥ senāpatirabhūddroṇo'straviduṣāṃvaraḥ | pravīraḥ kauravendrasya kāvyo daityapateriva

तब अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ द्रोण सेनापति हुए, जो कौरवराज के प्रमुख वीर थे, जैसे दैत्यराज के काव्य (शुक्राचार्य) थे।

श्लोक 14 (14.60.14)

अक्षौहिणीभिः शिष्टाभिर्नवभिर्द्विजसत्तमः । संवृतः समरश्लाघी गुप्तः कृपसुतादिभिः ॥

akṣauhiṇībhiḥ śiṣṭābhirnavabhirdvijasattamaḥ | saṃvṛtaḥ samaraślāghī guptaḥ kṛpasutādibhiḥ

युद्ध में उत्साह रखने वाले वे द्विजश्रेष्ठ शेष नौ अक्षौहिणी सेनाओं से घिरे थे और कृपपुत्र आदि उनकी रक्षा करते थे।

श्लोक 15 (14.60.15)

धृष्टद्युम्नस्त्वभून्नेता पाण्डवानां महास्त्रवित् । गुप्तो भीमेन मेधावी मित्रेण वरुणो यथा ॥

dhṛṣṭadyumnastvabhūnnetā pāṇḍavānāṃ mahāstravit | gupto bhīmena medhāvī mitreṇa varuṇo yathā

और महान् अस्त्रों के ज्ञाता धृष्टद्युम्न पाण्डवों के नेता हुए, जिनकी रक्षा बुद्धिमान् भीम करते थे, जैसे मित्र द्वारा वरुण की रक्षा होती है।

श्लोक 16 (14.60.16)

स च सेनापरिवृतो द्रोणप्रेप्सुर्महामनाः । पितुर्निकारान्संस्मृत्य रणे कर्माकरोन्महत् ॥

sa ca senāparivṛto droṇaprepsurmahāmanāḥ | piturnikārānsaṃsmṛtya raṇe karmākaronmahat

अपनी सेना से घिरे उस उदारचित्त वीर ने, द्रोण को पाने की इच्छा से और पिता के प्रति किए गए अपमानों को स्मरण करके, रण में बड़े पराक्रम के कर्म किए।

श्लोक 17 (14.60.17)

तस्मिंस्ते पृथिवीपाला द्रोणपार्षतसङ्गरे । नानादिगागता वीराः प्रायशो निधनं गताः ॥

tasmiṃste pṛthivīpālā droṇapārṣatasaṅgare | nānādigāgatā vīrāḥ prāyaśo nidhanaṃ gatāḥ

द्रोण और पृषत-पुत्र (धृष्टद्युम्न) के उस संग्राम में अनेक दिशाओं से आए हुए वीर राजा प्रायः मारे गए।

श्लोक 18 (14.60.18)

दिनानि पञ्च तद्युद्धमभूत्परमदारुणम् । ततो द्रोणः परिश्रान्तो धृष्टद्युम्नवशं गतः ॥

dināni pañca tadyuddhamabhūtparamadāruṇam | tato droṇaḥ pariśrānto dhṛṣṭadyumnavaśaṃ gataḥ

वह अत्यन्त भयंकर युद्ध पाँच दिन चला; तब थके हुए द्रोण धृष्टद्युम्न के वश में आ गए।

श्लोक 19 (14.60.19)

ततः सेनापतिरभूत्कर्णो दौर्योधने बले । अक्षौहिणीभिः शिष्टाभिर्वृतः पञ्चभिराहवे ॥

tataḥ senāpatirabhūtkarṇo dauryodhane bale | akṣauhiṇībhiḥ śiṣṭābhirvṛtaḥ pañcabhirāhave

तब दुर्योधन की सेना में कर्ण सेनापति हुए, जो युद्ध में शेष पाँच अक्षौहिणी सेनाओं से घिरे हुए थे।

श्लोक 20 (14.60.20)

तिस्रस्तु पाण्डुपुत्राणां चम्वो बीभत्सुपालिताः । हतप्रवीरभूयिष्ठा बभूवुः समवस्थिताः ॥

tisrastu pāṇḍuputrāṇāṃ camvo bībhatsupālitāḥ | hatapravīrabhūyiṣṭhā babhūvuḥ samavasthitāḥ

पाण्डवों की तीन सेनाएँ, जिनके अधिकांश प्रमुख वीर मारे जा चुके थे, बीभत्सु (अर्जुन) से रक्षित होकर डटी रहीं।

श्लोक 21 (14.60.21)

ततः पार्थं समासाद्य पतङ्ग इव पावकम् । पञ्चत्वमगमत्सौतिर्द्वितीयेऽहनि दारुणः ॥

tataḥ pārthaṃ samāsādya pataṅga iva pāvakam | pañcatvamagamatsautirdvitīye'hani dāruṇaḥ

तब पार्थ के सामने पहुँचकर, पतंगे के आग में गिरने के समान, भयंकर सूतपुत्र कर्ण दूसरे दिन मृत्यु को प्राप्त हुआ।

श्लोक 22 (14.60.22)

हते कर्णे तु कौरव्या निरुत्साहा हतौजसः । अक्षौहिणीभिस्तिसृभिर्मद्रेशं पर्यवारयन् ॥

hate karṇe tu kauravyā nirutsāhā hataujasaḥ | akṣauhiṇībhistisṛbhirmadreśaṃ paryavārayan

कर्ण के मारे जाने पर उत्साहहीन और तेजहीन कौरवों ने तीन अक्षौहिणी सेनाओं के साथ मद्रराज शल्य को घेर लिया।

श्लोक 23 (14.60.23)

हतवाहनभूयिष्ठाः पाण्डवास्तु युधिष्ठिरम् । अक्षौहिण्या निरुत्साहाः शिष्टया पर्यवारयन् ॥

hatavāhanabhūyiṣṭhāḥ pāṇḍavāstu yudhiṣṭhiram | akṣauhiṇyā nirutsāhāḥ śiṣṭayā paryavārayan

जिनके अधिकांश वाहन मारे जा चुके थे, वे उत्साहहीन पाण्डव बची हुई एक अक्षौहिणी सेना के साथ युधिष्ठिर को घेरकर खड़े हो गए।

श्लोक 24 (14.60.24)

अवधीन्मद्रराजानं कुरुराजो युधिष्ठिरः । तस्मिंस्तदाऽर्धदिवसे कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥

avadhīnmadrarājānaṃ kururājo yudhiṣṭhiraḥ | tasmiṃstadā'rdhadivase kṛtvā karma suduṣkaram

कुरुराज युधिष्ठिर ने उस अत्यन्त कठिन कर्म को आधे दिन में ही करके मद्रराज शल्य का वध कर दिया।

श्लोक 25 (14.60.25)

हते शल्ये तु शकुनिं सहदेवो महामनाः । आहर्तारं कलेस्तस्य जघानामितविक्रमः ॥

hate śalye tu śakuniṃ sahadevo mahāmanāḥ | āhartāraṃ kalestasya jaghānāmitavikramaḥ

शल्य के मारे जाने पर महामना और अपरिमित पराक्रमी सहदेव ने कलह को जन्म देने वाले शकुनि को मार डाला।

श्लोक 26 (14.60.26)

निहते शकुनौ राजा धार्तराष्ट्रः सुदुर्मनाः । अपाक्रामद्गदापाणिर्हतभूयिष्ठसैनिकः ॥

nihate śakunau rājā dhārtarāṣṭraḥ sudurmanāḥ | apākrāmadgadāpāṇirhatabhūyiṣṭhasainikaḥ

शकुनि के मारे जाने पर धृतराष्ट्र का पुत्र राजा दुर्योधन अत्यन्त दुःखी होकर, गदा हाथ में लिए, अपने अधिकांश सैनिकों के मारे जाने पर रणभूमि से हट गया।

श्लोक 27 (14.60.27)

तमन्वधावत्संक्रुद्धो भीमसेनः प्रतापवान् । ह्रदे द्वैपायने चापि सलिलस्थं ददर्श तम् ॥

tamanvadhāvatsaṃkruddho bhīmasenaḥ pratāpavān | hrade dvaipāyane cāpi salilasthaṃ dadarśa tam

प्रतापी भीमसेन क्रोध से उसके पीछे दौड़े और उन्होंने उसे द्वैपायन सरोवर के जल में स्थित देखा।

श्लोक 28 (14.60.28)

ततः शिष्टेन सैन्येन समन्तात्परिवार्य तम् । अथोपविविशुर्हृष्टा ह्रदस्थं पञ्च पाण्डवाः ॥

tataḥ śiṣṭena sainyena samantātparivārya tam | athopaviviśurhṛṣṭā hradasthaṃ pañca pāṇḍavāḥ

तब पाँचों पाण्डवों ने हर्षित होकर अपनी शेष सेना के साथ उसे चारों ओर से घेर लिया और सरोवर में ठहरे उस दुर्योधन के पास बैठ गए।

श्लोक 29 (14.60.29)

विगाह्य सलिलं त्वाशु वाग्बाणैर्भृशविक्षतः । उत्थाय स गदापाणिर्युद्धाय समुपस्थितः ॥

vigāhya salilaṃ tvāśu vāgbāṇairbhṛśavikṣataḥ | utthāya sa gadāpāṇiryuddhāya samupasthitaḥ

शीघ्र ही जल में डुबकी लगाकर, उनके वचन-रूपी बाणों से बुरी तरह घायल हुआ वह उठ खड़ा हुआ और गदा हाथ में लेकर युद्ध के लिए तैयार हो गया।

श्लोक 30 (14.60.30)

ततः स निहतो राजा धार्तराष्ट्रो महारणे । भीमसेनेन विक्रम्य पश्यतां पृथिवीक्षिताम् ॥

tataḥ sa nihato rājā dhārtarāṣṭro mahāraṇe | bhīmasenena vikramya paśyatāṃ pṛthivīkṣitām

तब महायुद्ध में पृथ्वी के राजाओं के देखते-देखते भीमसेन ने पराक्रम दिखाकर धृतराष्ट्र के पुत्र राजा दुर्योधन को मार डाला।

श्लोक 31 (14.60.31)

ततस्तत्पाण्डवं सैन्यं प्रसुप्तं शिबिरे निशि । निहतं द्रोणपुत्रेण पितुर्वधममृष्यता ॥

tatastatpāṇḍavaṃ sainyaṃ prasuptaṃ śibire niśi | nihataṃ droṇaputreṇa piturvadhamamṛṣyatā

तब रात्रि में शिविर में सोई हुई पाण्डव सेना को द्रोणपुत्र ने, जो पिता के वध को सह नहीं पा रहा था, मार डाला।

श्लोक 32 (14.60.32)

हतपुत्रा हतबला हतमित्रा मया सह । युयुधानसहायेन पञ्च शिष्टास्तु पाण्डवाः ॥

hataputrā hatabalā hatamitrā mayā saha | yuyudhānasahāyena pañca śiṣṭāstu pāṇḍavāḥ

पुत्रों, सेनाओं और मित्रों के मारे जाने पर केवल पाँच पाण्डव बचे, मेरे साथ और युयुधान की सहायता से।

श्लोक 33 (14.60.33)

सहैव कृपभोजाभ्यां द्रौणिर्युद्धादमुच्यत । युयुत्सुश्चापि कौरव्यो मुक्तः पाण्डवसंश्रयात् ॥

sahaiva kṛpabhojābhyāṃ drauṇiryuddhādamucyata | yuyutsuścāpi kauravyo muktaḥ pāṇḍavasaṃśrayāt

द्रोणपुत्र कृप और भोज (कृतवर्मा) के साथ ही युद्ध से बच निकला; और कौरव्य युयुत्सु भी पाण्डवों की शरण में आ जाने से बच गया।

श्लोक 34 (14.60.34)

निहते कौरवेन्द्रे तु सानुबन्धे सुयोधने । विदुरः संजयश्चैव धर्मराजमुपस्थितौ ॥

nihate kauravendre tu sānubandhe suyodhane | viduraḥ saṃjayaścaiva dharmarājamupasthitau

कौरवों के स्वामी सुयोधन के अपने साथियों सहित मारे जाने पर विदुर और संजय धर्मराज युधिष्ठिर के पास उपस्थित हुए।

श्लोक 35 (14.60.35)

एवं तदभवद्युद्धमहान्यष्टादश प्रभो । यत्र ते पृथिवीपाला निहताः स्वर्गमावसन् ॥

evaṃ tadabhavadyuddhamahānyaṣṭādaśa prabho | yatra te pṛthivīpālā nihatāḥ svargamāvasan

हे प्रभो, इस प्रकार वह युद्ध अठारह दिन तक चला, जिसमें वे पृथ्वीपाल मारे जाकर स्वर्ग में जा बसे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 36 (14.60.36)

शृण्वतां तु महाराज कथां तां रोमहर्षणीम् । दुःखशोकपरिक्लेशा वृष्णीनामभवंस्तदा ॥

śṛṇvatāṃ tu mahārāja kathāṃ tāṃ romaharṣaṇīm | duḥkhaśokaparikleśā vṛṣṇīnāmabhavaṃstadā

हे महाराज, उस रोमांचकारी कथा को सुनते हुए वृष्णियों को उस समय दुःख, शोक और क्लेश ने घेर लिया।

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