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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 59

कृष्ण का द्वारका लौटना

जनमेजय पूछते हैं कि उदङ्क को वर देकर कृष्ण ने क्या किया। वैशम्पायन बताते हैं कि वे सात्यकि के साथ द्वारका पहुँचे, जहाँ रैवतक पर्वत का उत्सव चल रहा था, जिसका वैभव यहाँ वर्णित है। अदृश्य देवता, गन्धर्व और ऋषि उनकी स्तुति करते हैं; वे अपने भवन में जाकर माता-पिता और वृष्णियों से मिलते हैं और पिता के पूछने पर महायुद्ध का वृत्तान्त सुनाने लगते हैं।

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (14.59.1)

उदङ्कस्य वरं दत्त्वा गोविन्दो द्विजसत्तम । अत ऊर्ध्वं महाबाहुः किं चकार महायशाः ॥

udaṅkasya varaṃ dattvā govindo dvijasattama | ata ūrdhvaṃ mahābāhuḥ kiṃ cakāra mahāyaśāḥ

हे द्विजश्रेष्ठ, उदङ्क को वर देकर महाबाहु और महायशस्वी गोविन्द ने उसके बाद क्या किया?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 2 (14.59.2)

उदङ्काय वरं दत्त्वा प्रायात्सात्यकिना सह । द्वारकामेव गोविन्दः शीघ्रवेगैर्महाहयैः ॥

udaṅkāya varaṃ dattvā prāyātsātyakinā saha | dvārakāmeva govindaḥ śīghravegairmahāhayaiḥ

उदङ्क को वर देकर गोविन्द सात्यकि के साथ तेज़ चलने वाले बलवान् घोड़ों से द्वारका की ओर ही चल पड़े।

श्लोक 3 (14.59.3)

सरांसि सरितश्चैव वनानि च गिरींस्तथा । अतिक्रम्याससादाथ रम्यां द्वारवतीं पुरीम् ॥

sarāṃsi saritaścaiva vanāni ca girīṃstathā | atikramyāsasādātha ramyāṃ dvāravatīṃ purīm

सरोवरों, नदियों, वनों और पर्वतों को पार करते हुए वे रमणीय द्वारवती नगरी पहुँचे।

श्लोक 4 (14.59.4)

वर्तमाने महाराज महे रैवतकस्य च । उपायात्पुण्डरीकाक्षो युयुधानानुगस्तदा ॥

vartamāne mahārāja mahe raivatakasya ca | upāyātpuṇḍarīkākṣo yuyudhānānugastadā

हे महाराज, उस समय रैवतक पर्वत का उत्सव चल रहा था, जब कमलनयन श्रीकृष्ण युयुधान के साथ वहाँ पहुँचे।

श्लोक 5 (14.59.5)

अलङ्कृतस्तु स गिरिर्नानारूपैर्विचित्रितैः । बभौ रत्नमयैः कोशैः संवृतः पुरुषर्षभ ॥

alaṅkṛtastu sa girirnānārūpairvicitritaiḥ | babhau ratnamayaiḥ kośaiḥ saṃvṛtaḥ puruṣarṣabha

हे पुरुषश्रेष्ठ, अनेक प्रकार के विचित्र अलंकारों से सजा वह पर्वत रत्नजटित आवरणों से ढका हुआ शोभायमान था।

श्लोक 6 (14.59.6)

काञ्चनस्रग्भिरग्र्याभिः सुमनोभिस्तथैव च । वासोभिश्च महाशैलः कल्पवृक्षैस्तथैव च ॥

kāñcanasragbhiragryābhiḥ sumanobhistathaiva ca | vāsobhiśca mahāśailaḥ kalpavṛkṣaistathaiva ca

वह महापर्वत सोने की उत्तम मालाओं, फूलों, वस्त्रों और कल्पवृक्षों से सजा हुआ था।

श्लोक 7 (14.59.7)

दीपवृक्षैश्च सौवर्णैरभीक्ष्णमुपशोभितः । गुहानिर्झरदेशेषु दिवाभूतो बभूव ह ॥

dīpavṛkṣaiśca sauvarṇairabhīkṣṇamupaśobhitaḥ | guhānirjharadeśeṣu divābhūto babhūva ha

सोने के दीपवृक्षों से निरन्तर जगमगाता हुआ वह पर्वत अपनी गुफाओं और झरनों के स्थानों में भी दिन के समान प्रकाशित हो गया था।

श्लोक 8 (14.59.8)

पताकाभिर्विचित्राभिः सघण्टाभिः समन्ततः । पुंभिः स्त्रीभिश्च संघुष्टः प्रगीत इव चाभवत् । अतीव प्रेक्षणीयोऽभून्मेरुर्मुनिगणैरिव ॥

patākābhirvicitrābhiḥ saghaṇṭābhiḥ samantataḥ | puṃbhiḥ strībhiśca saṃghuṣṭaḥ pragīta iva cābhavat | atīva prekṣaṇīyo'bhūnmerurmunigaṇairiva

चारों ओर घण्टियों वाली रंग-बिरंगी पताकाओं से सजा और स्त्री-पुरुषों के कोलाहल से गूँजता हुआ वह पर्वत मानो गा रहा था। वह अत्यन्त दर्शनीय था, जैसे मुनिगणों से घिरा मेरु।

श्लोक 9 (14.59.9)

मत्तानां हृष्टरूपाणां स्त्रीणां पुंसां च भारत । गायतां पर्वतेन्द्रस्य दिविस्पृगिव निःस्वनः ॥

mattānāṃ hṛṣṭarūpāṇāṃ strīṇāṃ puṃsāṃ ca bhārata | gāyatāṃ parvatendrasya divispṛgiva niḥsvanaḥ

हे भारत, मतवाले और हर्ष से भरे गाते हुए स्त्री-पुरुषों से उस पर्वतराज से आकाश को छूता हुआ-सा स्वर उठ रहा था।

श्लोक 10 (14.59.10)

प्रमत्तमत्तसम्मत्तक्ष्वेडितोद्धुष्टसंकुलः । तथा किलकिलाशब्दैर्भूधरोऽभून्मनोहरः ॥

pramattamattasammattakṣveḍitoddhuṣṭasaṃkulaḥ | tathā kilakilāśabdairbhūdharo'bhūnmanoharaḥ

असावधान, मतवाले और उल्लसित लोगों, उनकी ललकारों और चीत्कारों तथा किलकारियों से भरा वह पर्वत मनोहर हो उठा था।

श्लोक 11 (14.59.11)

विपणापणवान्रम्यो भक्ष्यभोज्यविहारवान् । वस्त्रमाल्योत्करयुतो वीणावेणुमृदङ्गवान् ॥

vipaṇāpaṇavānramyo bhakṣyabhojyavihāravān | vastramālyotkarayuto vīṇāveṇumṛdaṅgavān

वह रमणीय पर्वत हाट-बाज़ारों से, खाने-पीने की वस्तुओं और विहार-स्थलों से, वस्त्रों और मालाओं के ढेरों से तथा वीणा, वंशी और मृदंग से युक्त था।

श्लोक 12 (14.59.12)

सुरामैरेयमिश्रेण भक्ष्यभोज्येन चैव ह । दीनान्धकृपणादिभ्यो दीयमानेन चानिशम् । बभौ परमकल्याणो महस्तस्य महागिरेः ॥

surāmaireyamiśreṇa bhakṣyabhojyena caiva ha | dīnāndhakṛpaṇādibhyo dīyamānena cāniśam | babhau paramakalyāṇo mahastasya mahāgireḥ

सुरा और मैरेय से मिले भक्ष्य-भोज्य पदार्थों से तथा दीनों, अन्धों और कंगालों आदि को निरन्तर दिए जाते दान से उस महागिरि का वह उत्सव परम मंगलमय होकर शोभित हो रहा था।

श्लोक 13 (14.59.13)

पुण्यावसथवान्वीरैः पुण्यकृद्भिर्निषेवितः । विहारो वृष्णिवीराणां महे रैवतस्य ह ॥

puṇyāvasathavānvīraiḥ puṇyakṛdbhirniṣevitaḥ | vihāro vṛṣṇivīrāṇāṃ mahe raivatasya ha

पवित्र विश्राम-स्थलों वाला और पुण्य कर्म करने वाले वीरों से सेवित वह पर्वत रैवतक के उत्सव में वृष्णि-वीरों का विहार-स्थल था।

श्लोक 14 (14.59.14)

स नानावेश्मसंकीर्णो देवलोक इवाबभौ । तदा च कृष्णसान्निध्यान्मुदा देवगणैर्युतः ॥

sa nānāveśmasaṃkīrṇo devaloka ivābabhau | tadā ca kṛṣṇasānnidhyānmudā devagaṇairyutaḥ

अनेक प्रकार के भवनों से भरा हुआ वह पर्वत देवलोक के समान शोभित हो रहा था; और तब कृष्ण की उपस्थिति से वह आनन्दपूर्वक देवगणों से भर गया।

श्लोक 15 (14.59.15)

स्तुवन्त्यन्तर्हिता देवा गन्धर्वाश्च सहर्षिभिः । साधकः सर्वधर्माणामसुराणां विनाशकः ॥

stuvantyantarhitā devā gandharvāśca saharṣibhiḥ | sādhakaḥ sarvadharmāṇāmasurāṇāṃ vināśakaḥ

अदृश्य देवता गन्धर्वों और ऋषियों के साथ उनकी स्तुति करने लगे: "आप सब धर्मों के साधक और असुरों के विनाशक हैं।

देवगन्धर्वर्षय ऊचुः

श्लोक 16 (14.59.16)

त्वं स्रष्टा सृज्यमाधारं कारणं धर्मवेदवित् । त्वया सत्क्रियते देव न जानीमोऽत्र मायया ॥

tvaṃ sraṣṭā sṛjyamādhāraṃ kāraṇaṃ dharmavedavit | tvayā satkriyate deva na jānīmo'tra māyayā

आप स्रष्टा हैं, रचे जाने वाले जगत् के आधार और कारण हैं, धर्म और वेद के ज्ञाता हैं। हे देव, आपके द्वारा जो उत्तम कर्म किया जाता है, उसे हम यहाँ आपकी माया के कारण नहीं जानते।

श्लोक 17 (14.59.17)

केवलं त्वाऽभिजानीमः शरणं परमेश्वरम् । ब्रह्मादीनां च गोविन्द सान्निध्यं शरणं नमः ॥

kevalaṃ tvā'bhijānīmaḥ śaraṇaṃ parameśvaram | brahmādīnāṃ ca govinda sānnidhyaṃ śaraṇaṃ namaḥ

हम केवल इतना जानते हैं कि आप ही परमेश्वर और शरण हैं। हे गोविन्द, ब्रह्मा आदि का भी आश्रय आपकी सन्निधि है; आपको नमस्कार है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 18 (14.59.18)

इति स्तुते मानुषैश्च पूजिते देवकीसुते । शक्रसद्मप्रतीकाशो बभूव स हि शैलराट् ॥

iti stute mānuṣaiśca pūjite devakīsute | śakrasadmapratīkāśo babhūva sa hi śailarāṭ

देवकीपुत्र की इस प्रकार स्तुति की जाने पर और मनुष्यों द्वारा भी उनका पूजन होने पर वह पर्वतराज इन्द्र के भवन के समान हो गया।

श्लोक 19 (14.59.19)

ततः सम्पूज्यमानः स विवेश भवनं शुभम् । गोविन्दः सात्यकिश्चैव जग्मतुर्भवनं स्वकम् ॥

tataḥ sampūjyamānaḥ sa viveśa bhavanaṃ śubham | govindaḥ sātyakiścaiva jagmaturbhavanaṃ svakam

तब सम्मानित होते हुए उन्होंने अपने सुन्दर भवन में प्रवेश किया; गोविन्द और सात्यकि दोनों अपने-अपने भवन को चले गए।

श्लोक 20 (14.59.20)

विवेश च प्रहृष्टात्मा चिरकालप्रवासतः । कृत्वा नसुकरं कर्म दानवेष्विव वासवः ॥

viveśa ca prahṛṣṭātmā cirakālapravāsataḥ | kṛtvā nasukaraṃ karma dānaveṣviva vāsavaḥ

बहुत समय तक प्रवास में रहने के बाद वे प्रसन्न मन से भीतर गए, जैसे दानवों के बीच दुष्कर कर्म करके इन्द्र लौटते हैं।

श्लोक 21 (14.59.21)

उपायान्तं तु वार्ष्णेयं भोजवृष्ण्यन्धकास्तथा । अभ्यगच्छन्महात्मानं देवा इव शतक्रतुम् ॥

upāyāntaṃ tu vārṣṇeyaṃ bhojavṛṣṇyandhakāstathā | abhyagacchanmahātmānaṃ devā iva śatakratum

वार्ष्णेय के आने पर भोज, वृष्णि और अन्धक उन महात्मा से मिलने गए, जैसे देवता इन्द्र से मिलने जाते हैं।

श्लोक 22 (14.59.22)

स तानभ्यर्च्य मेधावी पृष्ट्वा च कुशलं तदा । अभ्यवादयत प्रीतः पितरं मातरं तदा ॥

sa tānabhyarcya medhāvī pṛṣṭvā ca kuśalaṃ tadā | abhyavādayata prītaḥ pitaraṃ mātaraṃ tadā

उन बुद्धिमान् ने उनका सत्कार किया और कुशल पूछा, फिर प्रसन्न होकर अपने पिता और माता को प्रणाम किया।

श्लोक 23 (14.59.23)

ताभ्यां स सम्परिष्वक्तः सान्त्वितश्च महाभुजः । उपोपविष्टैः सर्वैस्तैर्वृष्णिभिः परिवारितः ॥

tābhyāṃ sa sampariṣvaktaḥ sāntvitaśca mahābhujaḥ | upopaviṣṭaiḥ sarvaistairvṛṣṇibhiḥ parivāritaḥ

माता-पिता से आलिंगित और सान्त्वना पाए हुए वे महाबाहु पास बैठे सभी वृष्णियों से घिरकर बैठ गए।

श्लोक 24 (14.59.24)

स विश्रान्तो महातेजाः कृतपादावनेजनः । कथयामास तत्सर्वं पृष्टः पित्रा महाहवम् ॥

sa viśrānto mahātejāḥ kṛtapādāvanejanaḥ | kathayāmāsa tatsarvaṃ pṛṣṭaḥ pitrā mahāhavam

विश्राम कर लेने पर और पाँव धो लेने के बाद उन महातेजस्वी ने पिता के पूछने पर उस महायुद्ध का सारा वृत्तान्त कहना आरम्भ किया।

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60