Skip to main content

आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 58

उदङ्क द्वारा नागलोक से कुण्डलों की प्राप्ति

वैशम्पायन उदङ्क की कथा आगे सुनाते हैं। सौदास उदङ्क को रानी के लिए पहचान का चिह्न देते हैं और उन्हें फिर कभी न आने की सलाह देते हैं। मार्ग में बेल के वृक्ष से कुण्डल गिर जाने पर एक सर्प उन्हें ले जाता है। उदङ्क नागलोक की ओर खुदाई करते हैं, इन्द्र का वज्र मार्ग खोल देता है, और अग्निरूप अश्व उन्हें अपने पीछे के मार्ग में फूँकने को कहता है। धुएँ से घबराए नाग कुण्डल लौटा देते हैं, और उदङ्क उन्हें गुरुपत्नी को दे देते हैं।

अध्याय 57अध्याय-सूचीअध्याय 59

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (14.58.1)

स मित्रसहमासाद्य अभिज्ञानमयाचत । तस्मै ददावभिज्ञानं स चेक्ष्वाकुवरस्तदा ॥

sa mitrasahamāsādya abhijñānamayācata | tasmai dadāvabhijñānaṃ sa cekṣvākuvarastadā

उदङ्क मित्रसह (सौदास) के पास पहुँचे और उनसे पहचान का चिह्न माँगा। तब इक्ष्वाकुवंश के उस श्रेष्ठ राजा ने उन्हें वह चिह्न दे दिया।

सौदास उवाच

श्लोक 2 (14.58.2)

न चैवैषा गतिः क्षेम्या न चान्या विद्यते गतिः । एतन्मे तत्वमाज्ञाय प्रयच्छ मणिकुण्डले ॥

na caivaiṣā gatiḥ kṣemyā na cānyā vidyate gatiḥ | etanme tatvamājñāya prayaccha maṇikuṇḍale

"यह मार्ग कल्याणकारी नहीं है, और दूसरा कोई मार्ग भी नहीं है। मुझसे इस बात का तत्त्व जानकर मणियों से जड़े दोनों कुण्डल दे दो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 3 (14.58.3)

इत्युक्तस्तामुदङ्कस्तु भर्तुर्वाक्यमथाब्रवीत् । श्रुत्वा च सा तदा प्रादात्ततस्ते मणिकुण्डले ॥

ityuktastāmudaṅkastu bharturvākyamathābravīt | śrutvā ca sā tadā prādāttataste maṇikuṇḍale

राजा के ऐसा कहने पर उदङ्क ने रानी से उसके पति की बात कह सुनाई। उसे सुनकर उसने उन्हें दोनों मणिकुण्डल दे दिए।

श्लोक 4 (14.58.4)

अवाप्य कुण्डले ते तु राजानं पुनरब्रवीत् । किमेतद्गुह्यवचनं श्रोतुमिच्छामि पार्थिव ॥

avāpya kuṇḍale te tu rājānaṃ punarabravīt | kimetadguhyavacanaṃ śrotumicchāmi pārthiva

दोनों कुण्डल पाकर उसने फिर राजा से कहा, "हे राजन्, यह गुप्त वचन क्या है? मैं इसे सुनना चाहता हूँ।"

सौदास उवाच

श्लोक 5 (14.58.5)

प्रजाविसर्गाद्विप्रान्वै क्षत्रियाः पूजयन्ति ह । विप्रेभ्यश्चापि बहवो दोषाः प्रादुर्भवन्ति नः ॥

prajāvisargādviprānvai kṣatriyāḥ pūjayanti ha | viprebhyaścāpi bahavo doṣāḥ prādurbhavanti naḥ

"प्रजा की सृष्टि के समय से ही क्षत्रिय ब्राह्मणों का आदर करते आए हैं; फिर भी ब्राह्मणों से हम पर बहुत-से दोष आ पड़ते हैं।"

श्लोक 6 (14.58.6)

सोहं द्विजेभ्यः प्रणतो विप्राद्दोषमवाप्तवान् । गतिमन्यां न पश्यामि मदयन्तीसहायवान् ॥

sohaṃ dvijebhyaḥ praṇato viprāddoṣamavāptavān | gatimanyāṃ na paśyāmi madayantīsahāyavān

"मैं द्विजों के आगे झुकता रहा, फिर भी एक ब्राह्मण से मुझे दोष प्राप्त हुआ। मदयन्ती ही मेरी एकमात्र सहायिका है; मुझे और कोई उपाय नहीं सूझता।"

श्लोक 7 (14.58.7)

न चान्यामपि पश्यामि गतिं गतिमतांवर । स्वर्गद्वारस्य गमने स्थाने चेह द्विजोत्तम ॥

na cānyāmapi paśyāmi gatiṃ gatimatāṃvara | svargadvārasya gamane sthāne ceha dvijottama

"हे उपाय जानने वालों में श्रेष्ठ द्विजोत्तम, स्वर्ग के द्वार तक पहुँचने का, अथवा यहाँ रहने का भी, मुझे कोई दूसरा उपाय नहीं दिखता।"

श्लोक 8 (14.58.8)

न हि राज्ञा विशेषेण विरुद्धेन द्विजातिभिः । शक्यं हि लोके स्थातुं वै प्रेत्य वा सुखमेधितुम् ॥

na hi rājñā viśeṣeṇa viruddhena dvijātibhiḥ | śakyaṃ hi loke sthātuṃ vai pretya vā sukhamedhitum

"जो राजा द्विजों से विशेष रूप से विरोध करता है, वह न तो मनुष्यलोक में टिक सकता है और न मरने के बाद सुख पा सकता है।"

श्लोक 9 (14.58.9)

तदिष्टे ते मया दत्ते एते स्वे मणिकुण्डले । यः कृतस्तेऽद्य समयः सफलं तं कुरुष्व मे ॥

tadiṣṭe te mayā datte ete sve maṇikuṇḍale | yaḥ kṛtaste'dya samayaḥ saphalaṃ taṃ kuruṣva me

"इसलिए मैंने तुम्हारी इच्छा के अनुसार अपने ये दोनों मणिकुण्डल तुम्हें दे दिए हैं। आज तुमने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे मेरे लिए सफल करो।"

उदङ्क उवाच

श्लोक 10 (14.58.10)

राजंस्तथेह कर्तास्मि पुनरेष्यामि ते वशम् । प्रश्नं च कञ्चित्प्रष्टुं त्वां व्यवसिष्ये परंतप ॥

rājaṃstatheha kartāsmi punareṣyāmi te vaśam | praśnaṃ ca kañcitpraṣṭuṃ tvāṃ vyavasiṣye paraṃtapa

"हे राजन्, मैं वैसा ही करूँगा और फिर आपके अधीन लौट आऊँगा। परन्तु हे परंतप, मैंने आपसे एक प्रश्न पूछने का निश्चय किया है।"

सौदास उवाच

श्लोक 11 (14.58.11)

ब्रूहि विप्र यथाकामं प्रतिवक्तास्मि ते वचः । छेत्तास्मि संशयं तेऽद्य न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥

brūhi vipra yathākāmaṃ prativaktāsmi te vacaḥ | chettāsmi saṃśayaṃ te'dya na me'trāsti vicāraṇā

"हे विप्र, जैसी इच्छा हो कहिए; मैं आपकी बात का उत्तर दूँगा। आज मैं आपका संशय दूर कर दूँगा, इसमें मुझे कोई हिचक नहीं है।"

उदङ्क उवाच

श्लोक 12 (14.58.12)

प्राहुर्वाक्संयतं विप्रं धर्मनैपुणदर्शिनः । मित्रेषु यश्च विषमः स्तेन इत्येव तं विदुः ॥

prāhurvāksaṃyataṃ vipraṃ dharmanaipuṇadarśinaḥ | mitreṣu yaśca viṣamaḥ stena ityeva taṃ viduḥ

"धर्म की सूक्ष्मता को देखने वाले कहते हैं कि जो वाणी को संयम में रखता है, वही सच्चा विप्र है; और जो मित्रों के प्रति विषम व्यवहार करता है, उसे वे चोर ही मानते हैं।"

श्लोक 13 (14.58.13)

स भवान्मित्रतामद्य सम्प्राप्तो मम पार्थिव । स मे बुद्धिं प्रयच्छस्व सम्मतां पुरुषर्षभ ॥

sa bhavānmitratāmadya samprāpto mama pārthiva | sa me buddhiṃ prayacchasva sammatāṃ puruṣarṣabha

"हे राजन्, आज आप मेरे मित्र बन गए हैं। इसलिए हे पुरुषश्रेष्ठ, मुझे ऐसी सम्मति दीजिए जो मुझे मान्य हो।"

श्लोक 14 (14.58.14)

अवाप्तार्थोऽहमद्येह भवांश्च पुरुषादकः । भवत्सकाशमागन्तुं क्षमं मम न वेति वै ॥

avāptārtho'hamadyeha bhavāṃśca puruṣādakaḥ | bhavatsakāśamāgantuṃ kṣamaṃ mama na veti vai

"आज मेरा कार्य सिद्ध हो गया है, और आप नरभक्षी हैं। बताइए, मेरा आपके पास आना उचित है या नहीं?"

सौदास उवाच

श्लोक 15 (14.58.15)

क्षमं चेदिह वक्तव्यं मया द्विजवरोत्तम । मत्समीपं द्विजश्रेष्ठ नागन्तव्यं कथञ्चन ॥

kṣamaṃ cediha vaktavyaṃ mayā dvijavarottama | matsamīpaṃ dvijaśreṣṭha nāgantavyaṃ kathañcana

"हे द्विजश्रेष्ठ, यदि उचित बात कहनी हो तो यही कि आपको किसी भी प्रकार मेरे पास नहीं आना चाहिए।"

श्लोक 16 (14.58.16)

एवं तव प्रपश्यामि श्रेयो भृगुकुलोद्वह । आगच्छतो हि ते विप्र भवेन्मृत्युर्न संशयः ॥

evaṃ tava prapaśyāmi śreyo bhṛgukulodvaha | āgacchato hi te vipra bhavenmṛtyurna saṃśayaḥ

"हे भृगुकुल के वंशज, आपके लिए मुझे यही श्रेयस्कर दिखता है; क्योंकि यदि आप आएँगे तो आपकी मृत्यु निश्चित है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 17 (14.58.17)

इत्युक्तः स तदा राजा क्षमं बुद्धिमता हितम् । अनुज्ञाप्य स राजानमहल्यां प्रति जग्मिवान् ॥

ityuktaḥ sa tadā rājā kṣamaṃ buddhimatā hitam | anujñāpya sa rājānamahalyāṃ prati jagmivān

बुद्धिमान् राजा के इस प्रकार उचित और हितकर बात कहने पर उदङ्क राजा से आज्ञा लेकर अहल्या के पास चल पड़े।

श्लोक 18 (14.58.18)

गृहीत्वा कुण्डले दिव्ये गुरुपत्न्याः प्रियंकरः । जवेन महता प्रायाद्गौतमस्याश्रमं प्रति ॥

gṛhītvā kuṇḍale divye gurupatnyāḥ priyaṃkaraḥ | javena mahatā prāyādgautamasyāśramaṃ prati

गुरुपत्नी का प्रिय करने वाले वे दोनों दिव्य कुण्डल लेकर बड़े वेग से गौतम के आश्रम की ओर चले।

श्लोक 19 (14.58.19)

यथा तयो रक्षणं च मदयन्त्याऽभिभाषितम् । तथा ते कुण्डले बध्वा तदा कृष्णाजिनेऽनयत् ॥

yathā tayo rakṣaṇaṃ ca madayantyā'bhibhāṣitam | tathā te kuṇḍale badhvā tadā kṛṣṇājine'nayat

मदयन्ती ने उन दोनों की रक्षा के विषय में जैसा बताया था, वैसे ही उन्होंने दोनों कुण्डलों को कृष्णमृगचर्म में बाँध लिया और उसे लेकर चले।

श्लोक 20 (14.58.20)

स कस्मिंश्चित्क्षुधाविष्टः फलभारसमन्वितम् । बिल्वं ददर्श विप्रर्षिरारुरोह च तं ततः ॥

sa kasmiṃścitkṣudhāviṣṭaḥ phalabhārasamanvitam | bilvaṃ dadarśa viprarṣirāruroha ca taṃ tataḥ

मार्ग में कहीं भूख से व्याकुल उस विप्रर्षि ने फलों के भार से झुका हुआ एक बेल का वृक्ष देखा और उस पर चढ़ गए।

श्लोक 21 (14.58.21)

शाखास्वासज्य तस्यैव कृष्णाजिनमरिंदम । पातयामास बिल्वानि तदा स द्विजपुङ्गवः ॥

śākhāsvāsajya tasyaiva kṛṣṇājinamariṃdama | pātayāmāsa bilvāni tadā sa dvijapuṅgavaḥ

हे शत्रुदमन, उन्होंने वही कृष्णमृगचर्म उस वृक्ष की डालियों पर टाँग दिया और वे द्विजश्रेष्ठ बेल के फल गिराने लगे।

श्लोक 22 (14.58.22)

अथ पातयमानस्य बिल्वापहृतचक्षुषः । न्यपतंस्तानि बिल्वानि तस्मिन्नेवाजिने विभो ॥

atha pātayamānasya bilvāpahṛtacakṣuṣaḥ | nyapataṃstāni bilvāni tasminnevājine vibho

हे प्रभो, बेल के फलों में दृष्टि लगाए वे जब फल गिरा रहे थे, तब वे फल उसी चर्म पर आकर गिरे।

श्लोक 23 (14.58.23)

यस्मिंस्ते कुण्डले बद्धे तदा द्विजवरेण वै । बिल्वप्रहारैस्तस्याथ व्यशीर्यद्बन्धनं ततः ॥

yasmiṃste kuṇḍale baddhe tadā dvijavareṇa vai | bilvaprahāraistasyātha vyaśīryadbandhanaṃ tataḥ

जिस चर्म में उन द्विजश्रेष्ठ ने दोनों कुण्डल बाँधे थे, बेल के फलों की चोटों से उसका बन्धन टूटकर बिखर गया।

श्लोक 24 (14.58.24)

सकुण्डलं तदजिनं पपात सहसा तरोः । विशीर्णबन्धने तस्मिन्गते कृष्णाजिने महीम् ॥

sakuṇḍalaṃ tadajinaṃ papāta sahasā taroḥ | viśīrṇabandhane tasmingate kṛṣṇājine mahīm

कुण्डलों सहित वह चर्म अचानक वृक्ष से नीचे गिर पड़ा। बन्धन ढीला हो जाने पर जब वह कृष्णमृगचर्म धरती पर आ गया,

श्लोक 25 (14.58.25)

अपश्यद्भुजगः कश्चित्ते तत्र मणिकुण्डले । ऐरावतकुलोद्भूतः शीघ्रो भूत्वा तदा हि सः ॥

apaśyadbhujagaḥ kaścitte tatra maṇikuṇḍale | airāvatakulodbhūtaḥ śīghro bhūtvā tadā hi saḥ

तब ऐरावत के कुल में उत्पन्न किसी सर्प ने वहाँ पड़े उन दोनों मणिकुण्डलों को देखा और वह तुरन्त झपटा।

श्लोक 26 (14.58.26)

विदश्यास्येन वल्मीकं विवेशाथ स कुण्डले । ह्रियमाणे तु दृष्ट्वा स कुण्डले भुजगेन ह ॥

vidaśyāsyena valmīkaṃ viveśātha sa kuṇḍale | hriyamāṇe tu dṛṣṭvā sa kuṇḍale bhujagena ha

उसने दोनों कुण्डल मुख में दबाए और एक बाँबी में घुस गया। सर्प के द्वारा कुण्डलों को ले जाए जाते देखकर

श्लोक 27 (14.58.27)

पपात वृक्षात्सोद्वेगो दुःखात्परमकोपनः । स दण्डकाष्ठमादाय वल्मीकमखनत्तदा ॥

papāta vṛkṣātsodvego duḥkhātparamakopanaḥ | sa daṇḍakāṣṭhamādāya valmīkamakhanattadā

वे व्याकुल होकर वृक्ष से कूद पड़े; दुःख से अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन्होंने लकड़ी का एक डण्डा उठाया और उस बाँबी को खोदने लगे।

श्लोक 28 (14.58.28)

अहानि त्रिंशदव्यग्रः पञ्च चान्यानि भारत । क्रोधामर्षाभिसंतप्तस्तदा ब्राह्मणसत्तमः ॥

ahāni triṃśadavyagraḥ pañca cānyāni bhārata | krodhāmarṣābhisaṃtaptastadā brāhmaṇasattamaḥ

हे भारत, क्रोध और अमर्ष से तपे अंगों वाले वे ब्राह्मणश्रेष्ठ बिना रुके तीस दिन और पाँच दिन ऊपर से खोदते रहे।

श्लोक 29 (14.58.29)

तस्य वेगमसह्यं तमसहन्ती वसुन्धरा । दण्डकाष्ठाभिनुन्नाङ्गी चचाल भृशमाकुला । ततः खनत एवाथ विप्रर्षेर्धरणीतलम् । नागलोकस्य पन्थानं कर्तुकामस्य निश्चयात् ॥

tasya vegamasahyaṃ tamasahantī vasundharā | daṇḍakāṣṭhābhinunnāṅgī cacāla bhṛśamākulā | tataḥ khanata evātha viprarṣerdharaṇītalam | nāgalokasya panthānaṃ kartukāmasya niścayāt

उनके उस असह्य वेग को सहन न कर पाने वाली पृथ्वी, डण्डे की चोटों से पीड़ित अंगों के साथ, बहुत व्याकुल होकर काँप उठी; क्योंकि वे विप्रर्षि नागलोक का मार्ग बनाने का निश्चय किए हुए धरती की सतह को खोदते ही जा रहे थे।

श्लोक 30 (14.58.30)

रथेन हरियुक्तेन तं देशमुपजग्मिवान् । वज्रपाणिर्महातेजास्तं ददर्श द्विजोत्तमम् ॥

rathena hariyuktena taṃ deśamupajagmivān | vajrapāṇirmahātejāstaṃ dadarśa dvijottamam

हरे घोड़ों से जुते रथ पर वज्रधारी महातेजस्वी इन्द्र उस स्थान पर पहुँचे और उन्होंने उस द्विजश्रेष्ठ को देखा।

श्लोक 31 (14.58.31)

स तु तं ब्राह्मणो भूत्वा तस्य दुःखेन दुःखितः । उदङ्कमब्रवीद्वाक्यं नैतच्छक्यं त्वयेति वै ॥

sa tu taṃ brāhmaṇo bhūtvā tasya duḥkhena duḥkhitaḥ | udaṅkamabravīdvākyaṃ naitacchakyaṃ tvayeti vai

ब्राह्मण का रूप धरकर और उनके दुःख से दुःखी होकर इन्द्र ने उदङ्क से कहा, "तुमसे यह नहीं हो सकेगा।"

इन्द्र उवाच

श्लोक 32 (14.58.32)

इतो हि नागलोको वै योजनानि सहस्रशः । न दण्डकाष्ठसाध्यं च मन्ये कार्यमिदं तव ॥

ito hi nāgaloko vai yojanāni sahasraśaḥ | na daṇḍakāṣṭhasādhyaṃ ca manye kāryamidaṃ tava

"यहाँ से नागलोक हज़ारों योजन दूर है। मैं नहीं समझता कि तुम्हारा यह कार्य लकड़ी के डण्डे से सिद्ध हो सकेगा।"

उदङ्क उवाच

श्लोक 33 (14.58.33)

नागलोके यदि ब्रह्मन्न शक्ये कुण्डले मया । प्राप्तुं प्राणान्विमोक्ष्यामि पश्यतस्ते द्विजोत्तम ॥

nāgaloke yadi brahmanna śakye kuṇḍale mayā | prāptuṃ prāṇānvimokṣyāmi paśyataste dvijottama

"हे ब्रह्मन्, यदि मैं नागलोक में भी उन दोनों कुण्डलों को न पा सका, तो हे द्विजश्रेष्ठ, आपके देखते-देखते प्राण त्याग दूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 34 (14.58.34)

यदा स नाशकत्तस्य निश्चयं कर्तुमन्यथा । वज्रपाणिस्तदा दण्डं वज्रास्त्रेण युयोज ह ॥

yadā sa nāśakattasya niścayaṃ kartumanyathā | vajrapāṇistadā daṇḍaṃ vajrāstreṇa yuyoja ha

जब इन्द्र उनके निश्चय को किसी तरह बदल न सके, तब वज्रपाणि ने उस डण्डे में अपना वज्रास्त्र जोड़ दिया।

श्लोक 35 (14.58.35)

ततो वज्रप्रहारैस्तैर्दार्यमाणा वसुन्धरा । नागलोकस्य पन्थानमकरोज्जनमेजय ॥

tato vajraprahāraistairdāryamāṇā vasundharā | nāgalokasya panthānamakarojjanamejaya

हे जनमेजय, तब उन वज्र-प्रहारों से विदीर्ण होती हुई पृथ्वी ने नागलोक का मार्ग बना दिया।

श्लोक 36 (14.58.36)

स तेन मार्गेण तदा नागलोकं विवेश ह । ददर्श नागलोकं च योजनानि सहस्रशः ॥

sa tena mārgeṇa tadā nāgalokaṃ viveśa ha | dadarśa nāgalokaṃ ca yojanāni sahasraśaḥ

उस मार्ग से वे तब नागलोक में प्रविष्ट हुए और उन्होंने हज़ारों योजन तक फैला हुआ नागलोक देखा,

श्लोक 37 (14.58.37)

प्रकारनिचयैर्दिव्यैर्मणिमुक्तास्वलङ्कृतैः । उपपन्नं महाभाग शातकुम्भमयैस्तथा ॥

prakāranicayairdivyairmaṇimuktāsvalaṅkṛtaiḥ | upapannaṃ mahābhāga śātakumbhamayaistathā

जो मणियों और मोतियों से सजे दिव्य परकोटों से और हे महाभाग, सोने के बने परकोटों से भी युक्त था।

श्लोक 38 (14.58.38)

वापीः स्फटिकसोपाना नदीश्च विमलोदकाः । ददर्श वृक्षांश्च बहून्नानाद्विजगणायुतान् ॥

vāpīḥ sphaṭikasopānā nadīśca vimalodakāḥ | dadarśa vṛkṣāṃśca bahūnnānādvijagaṇāyutān

उन्होंने स्फटिक की सीढ़ियों वाली बावड़ियाँ, निर्मल जल की नदियाँ और भाँति-भाँति के पक्षिसमूहों से भरे अनेक वृक्ष देखे।

श्लोक 39 (14.58.39)

तस्य लोकस्य च द्वारं स ददर्श भृगूद्वहः । पञ्चयोजनविस्तारमायतं शतयोजनम् ॥

tasya lokasya ca dvāraṃ sa dadarśa bhṛgūdvahaḥ | pañcayojanavistāramāyataṃ śatayojanam

और उन भृगुवंशी ने उस लोक का द्वार देखा, जो पाँच योजन चौड़ा और सौ योजन लम्बा था।

श्लोक 40 (14.58.40)

नागलोकमुदङ्कस्तु प्रेक्ष्य दीनोऽभवत्तदा । निराशश्चाभवत्तत्र कुण्डलाहरणे पुनः ॥

nāgalokamudaṅkastu prekṣya dīno'bhavattadā | nirāśaścābhavattatra kuṇḍalāharaṇe punaḥ

नागलोक को देखकर उदङ्क उदास हो गए और कुण्डलों को फिर पाने की आशा फिर छोड़ बैठे।

श्लोक 41 (14.58.41)

तत्र प्रोवाच तुरगस्तं कृष्णश्वेतवालधिः । ताम्रास्यनेत्रः कौरव्यः प्रज्वलन्निव तेजसा ॥

tatra provāca turagastaṃ kṛṣṇaśvetavāladhiḥ | tāmrāsyanetraḥ kauravyaḥ prajvalanniva tejasā

हे कौरव्य, वहाँ काली-सफेद पूँछ वाला, ताँबे जैसे लाल मुख और नेत्रों वाला, तेज से मानो जलता हुआ एक घोड़ा उनसे बोला।

अश्व उवाच

श्लोक 42 (14.58.42)

धमस्वापानमेतन्मे ततस्त्वं विप्र लप्स्यसे । ऐरावतसुतेनेह तवानीते हि कुण्डले ॥

dhamasvāpānametanme tatastvaṃ vipra lapsyase | airāvatasuteneha tavānīte hi kuṇḍale

"हे विप्र, मेरे इस अपान-मार्ग में फूँको; तब तुम उन्हें पा लोगे, क्योंकि ऐरावत के पुत्र ने वे दोनों कुण्डल यहीं लाए हैं।"

श्लोक 43 (14.58.43)

मा जुगुप्सां कृथाः पुत्र त्वमत्रार्थे कथञ्चन । त्वयैतद्धि समाचीर्णं गौतमस्याश्रमे तदा ॥

mā jugupsāṃ kṛthāḥ putra tvamatrārthe kathañcana | tvayaitaddhi samācīrṇaṃ gautamasyāśrame tadā

"पुत्र, इस विषय में तुम किसी प्रकार घृणा मत करो। तुमने स्वयं पहले गौतम के आश्रम में यही किया है।"

उदङ्क उवाच

श्लोक 44 (14.58.44)

कथं भवन्तं जानीयामुपाध्यायाश्रमं प्रति । यन्मया चीर्णपूर्वं हि श्रोतुमिच्छामि तद्ध्यहम् ॥

kathaṃ bhavantaṃ jānīyāmupādhyāyāśramaṃ prati | yanmayā cīrṇapūrvaṃ hi śrotumicchāmi taddhyaham

"गुरु के आश्रम के प्रसंग में मैं आपको कैसे पहचानूँ? मैंने पहले जो किया था, उसे मैं सुनना चाहता हूँ।"

अश्व उवाच

श्लोक 45 (14.58.45)

गुरोर्गुरु मां जानीहि ज्वलन्तं जातवेदसम् । त्वया ह्यहं सदा विप्र गुरोरर्थेऽभिपूजितः ॥

gurorguru māṃ jānīhi jvalantaṃ jātavedasam | tvayā hyahaṃ sadā vipra gurorarthe'bhipūjitaḥ

"मुझे अपने गुरु का भी गुरु जानो, मैं प्रज्वलित अग्नि, जातवेदा हूँ। हे विप्र, तुमने गुरु के निमित्त सदा मेरी पूजा की है।"

श्लोक 46 (14.58.46)

विधिवत्सततं विप्र शुचिना भृगुनन्दन । तस्माच्छ्रेयो विधास्यामि तवैवं कुरु माचिरम् ॥

vidhivatsatataṃ vipra śucinā bhṛgunandana | tasmācchreyo vidhāsyāmi tavaivaṃ kuru māciram

"हे भृगुनन्दन, तुमने विधिपूर्वक और पवित्र होकर निरन्तर यह किया है। इसलिए मैं तुम्हारा भला करूँगा; जैसा मैं कहता हूँ वैसा करो, देर मत करो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 47 (14.58.47)

इत्युक्तस्तु तथाऽकार्षीदुदङ्कश्चित्रभानुना । ताम्रार्चिः प्रीतिमांश्चापि प्रजज्वाल दिधक्षया ॥

ityuktastu tathā'kārṣīdudaṅkaścitrabhānunā | tāmrārciḥ prītimāṃścāpi prajajvāla didhakṣayā

ऐसा कहे जाने पर उदङ्क ने चित्रभानु (अग्नि) के कथनानुसार ही किया; और ताँबे जैसी लपटों वाले अग्नि प्रसन्न होकर जलाने की इच्छा से प्रज्वलित हो उठे।

श्लोक 48 (14.58.48)

ततोऽस्य रोमकूपेभ्यो ध्मायमानस्य भारत । घनः प्रादुरभूद्धूमो नागलोकभयावहः ॥

tato'sya romakūpebhyo dhmāyamānasya bhārata | ghanaḥ prādurabhūddhūmo nāgalokabhayāvahaḥ

हे भारत, तब फूँकते हुए उनके रोमकूपों से घना धुआँ निकला, जो नागलोक के लिए भयंकर था।

श्लोक 49 (14.58.49)

तेन धूमेन महता वर्धमानेन भारत । नागलोके महाराज न प्राज्ञायत किञ्चन ॥

tena dhūmena mahatā vardhamānena bhārata | nāgaloke mahārāja na prājñāyata kiñcana

हे भारत, हे महाराज, उस बढ़ते हुए भारी धुएँ से नागलोक में कुछ भी दिखाई नहीं देता था।

श्लोक 50 (14.58.50)

हाहाकृतमभूत्सर्वमैरावतिनिवेशनम् । वासुकिप्रमुखानां च नागानां जनमेजय ॥

hāhākṛtamabhūtsarvamairāvatiniveśanam | vāsukipramukhānāṃ ca nāgānāṃ janamejaya

हे जनमेजय, ऐरावत का निवास तथा वासुकि आदि प्रमुख नागों के घर हाहाकार से भर उठे।

श्लोक 51 (14.58.51)

न प्राकाशन्त वेश्मानि धूमरुद्धानि भारत । नीहारसंवृतानीव वनानि गिरयस्तथा ॥

na prākāśanta veśmāni dhūmaruddhāni bhārata | nīhārasaṃvṛtānīva vanāni girayastathā

हे भारत, धुएँ से रुँधे घर दिखाई नहीं देते थे, जैसे कुहरे से ढके वन और पर्वत दिखाई नहीं देते।

श्लोक 52 (14.58.52)

ते धूमरक्तनयना वह्नितेजोभितापिताः । आजग्मुर्निश्चयं ज्ञातुं भार्गवस्य महात्मनः ॥

te dhūmaraktanayanā vahnitejobhitāpitāḥ | ājagmurniścayaṃ jñātuṃ bhārgavasya mahātmanaḥ

धुएँ से लाल आँखों वाले और अग्नि के ताप से झुलसे हुए वे सब महात्मा भार्गव का अभिप्राय जानने के लिए आए।

श्लोक 53 (14.58.53)

श्रुत्वा च निश्चयं तस्य महर्षेरतितेजसः । सम्भ्रान्तनयनाः सर्वे पूजां चक्रुर्यथाविधि ॥

śrutvā ca niścayaṃ tasya maharṣeratitejasaḥ | sambhrāntanayanāḥ sarve pūjāṃ cakruryathāvidhi

उन अत्यन्त तेजस्वी महर्षि का अभिप्राय सुनकर घबराई आँखों वाले उन सबने विधिपूर्वक उनका सत्कार किया।

श्लोक 54 (14.58.54)

सर्वे प्राञ्जलयो नागा वृद्धबालपुरोगमाः । शिरोभिः प्रणिपत्योचुः प्रसीद भगवन्निति ॥

sarve prāñjalayo nāgā vṛddhabālapurogamāḥ | śirobhiḥ praṇipatyocuḥ prasīda bhagavanniti

वृद्धों और बालकों को आगे करके सब नागों ने हाथ जोड़े और सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए कहा, "हे भगवन्, प्रसन्न हों।"

श्लोक 55 (14.58.55)

प्रसाद्य ब्राह्मणं ते तु पाद्यमर्घ्यं निवेद्य च । प्रायच्छन्कुण्डले दिव्ये पन्नगाः परमार्चिते ॥

prasādya brāhmaṇaṃ te tu pādyamarghyaṃ nivedya ca | prāyacchankuṇḍale divye pannagāḥ paramārcite

उन्होंने पैर धोने का जल और अर्घ्य अर्पित करके ब्राह्मण को प्रसन्न किया और उन सर्पों ने अत्यन्त सम्मानित वे दोनों दिव्य कुण्डल लौटा दिए।

श्लोक 56 (14.58.56)

ततः स पूजितो नागैस्तदोदङ्कः प्रतापवान् । अग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा जगाम गुरुसद्म तत् ॥

tataḥ sa pūjito nāgaistadodaṅkaḥ pratāpavān | agniṃ pradakṣiṇaṃ kṛtvā jagāma gurusadma tat

तब नागों से सम्मानित प्रतापी उदङ्क अग्नि की प्रदक्षिणा करके गुरु के घर चले गए।

श्लोक 57 (14.58.57)

स गत्वा त्वरितो राजन्गौतमस्य निवेशनम् । प्रायच्छत्कुण्डले दिव्ये गुरुपत्न्यास्तदाऽनघ ॥

sa gatvā tvarito rājangautamasya niveśanam | prāyacchatkuṇḍale divye gurupatnyāstadā'nagha

हे राजन्, वे शीघ्रता से गौतम के निवास पर पहुँचे और हे अनघ, उन्होंने दोनों दिव्य कुण्डल गुरुपत्नी को दे दिए।

श्लोक 58 (14.58.58)

वासुकिप्रमुखानां च नागानां जनमेजय । सर्वं शशंस गुरवे यथावद्द्विजसत्तमः ॥

vāsukipramukhānāṃ ca nāgānāṃ janamejaya | sarvaṃ śaśaṃsa gurave yathāvaddvijasattamaḥ

हे जनमेजय, उन द्विजश्रेष्ठ ने वासुकि आदि प्रमुख नागों की सारी बात गुरु को ज्यों-की-त्यों सुना दी।

श्लोक 59 (14.58.59)

एवं महात्मना तेन त्रींल्लोकाञ्जनमेजय । परिक्रम्याहृते दिव्ये ततस्ते मणिकुण्डले ॥

evaṃ mahātmanā tena trīṃllokāñjanamejaya | parikramyāhṛte divye tataste maṇikuṇḍale

हे जनमेजय, इस प्रकार उन महात्मा ने तीनों लोकों में घूमकर वे दोनों दिव्य मणिकुण्डल वापस लाए।

श्लोक 60 (14.58.60)

एवंप्रभावः स मुनिरुदङ्को भरतर्षभ । परेण तपसा युक्तो यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥

evaṃprabhāvaḥ sa munirudaṅko bharatarṣabha | pareṇa tapasā yukto yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi

हे भरतश्रेष्ठ, परम तप से युक्त मुनि उदङ्क का ऐसा प्रभाव था — जिसके विषय में आप मुझसे पूछ रहे हैं।

अध्याय 57अध्याय-सूचीअध्याय 59