आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 57
उदङ्क की राजा सौदास से भेंट और मदयन्ती का चिह्न माँगना
वन में उदङ्क की भेंट राजा सौदास से होती है, जो नरभक्षी हो गया है और उन्हें खाना चाहता है। उदङ्क कहते हैं कि वे गुरु के कार्य से निकले हैं और उसे पूरा करके लौट आने की शपथ लेते हैं, फिर रानी के मणिमय कुण्डल माँगते हैं। राजा उन्हें अपनी पत्नी मदयन्ती के पास भेजता है। वह बताती है कि कितने देवता, यक्ष और नाग इन कुण्डलों के लोभी हैं और इनमें क्या शक्तियाँ हैं, और उदङ्क से राजा का कोई पहचान-चिह्न लाने को कहती है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.57.1)
स तं दृष्ट्वा तथाभूतं राजानं घोरदर्शनम् । दीर्घश्मश्रुधरं नॄणां शोणितेन समुक्षितम् ॥
sa taṃ dṛṣṭvā tathābhūtaṃ rājānaṃ ghoradarśanam | dīrghaśmaśrudharaṃ nṝṇāṃ śoṇitena samukṣitam
उस राजा को ऐसी दशा में देखकर, जो देखने में भयंकर था, लम्बी दाढ़ी वाला और मनुष्यों के रक्त से लथपथ था,
श्लोक 2 (14.57.2)
चकार न व्यथां विप्रो राजा त्वेनमथाब्रवीत् । प्रत्युत्थाय महातेजा भयकर्ता यमोपमः ॥
cakāra na vyathāṃ vipro rājā tvenamathābravīt | pratyutthāya mahātejā bhayakartā yamopamaḥ
ब्राह्मण तनिक भी विचलित नहीं हुआ। तब यम के समान भयकारी और महातेजस्वी राजा ने उठकर उससे कहा:
सौदास उवाच
श्लोक 3 (14.57.3)
दिष्ट्या त्वमसि कल्याण षष्ठे काले ममान्तिकम् । भक्ष्यं मृगयमाणस्य सम्प्राप्तो द्विजसत्तम ॥
diṣṭyā tvamasi kalyāṇa ṣaṣṭhe kāle mamāntikam | bhakṣyaṃ mṛgayamāṇasya samprāpto dvijasattama
"सौभाग्य से, कल्याणमय ब्राह्मण, तुम मेरे छठे काल में मेरे पास आ पहुँचे हो, जब मैं भोजन खोज रहा था।"
उदङ्क उवाच
श्लोक 4 (14.57.4)
राजन्गुर्वर्थिनं विद्धि चरन्तं मामिहागतम् । न च गुर्वर्थमुद्युक्तं हिंस्यमाहुर्मनीषिणः ॥
rājangurvarthinaṃ viddhi carantaṃ māmihāgatam | na ca gurvarthamudyuktaṃ hiṃsyamāhurmanīṣiṇaḥ
"राजन्, जान लो कि मैं गुरु के प्रयोजन से चलता हुआ यहाँ आया हूँ। विद्वान् कहते हैं कि गुरु के कार्य में लगे व्यक्ति को मारना नहीं चाहिए।"
राजोवाच
श्लोक 5 (14.57.5)
षष्ठे काले ममाहारो विहितो द्विजसत्तम । न शक्यस्त्वं समुत्स्रष्टुं क्षुधितेन मयाऽद्य वै ॥
ṣaṣṭhe kāle mamāhāro vihito dvijasattama | na śakyastvaṃ samutsraṣṭuṃ kṣudhitena mayā'dya vai
"द्विजश्रेष्ठ, छठा काल मेरे आहार के लिए नियत है। आज भूखा होने के कारण मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता।"
उदङ्क उवाच
श्लोक 6 (14.57.6)
एवमस्तु महाराज समयः क्रियतां तु मे । गुर्वर्थमभिनिर्वर्त्य पुनरेष्यामि ते वशम् ॥
evamastu mahārāja samayaḥ kriyatāṃ tu me | gurvarthamabhinirvartya punareṣyāmi te vaśam
"महाराज, ऐसा ही हो; पर मेरे साथ एक समय (शर्त) तय कर लिया जाए। गुरु का कार्य पूरा करके मैं फिर आपके वश में आ जाऊँगा।"
श्लोक 7 (14.57.7)
संश्रुतश्च मया योऽर्थो गुरवे राजसत्तम । त्वदधीनः स राजेन्द्र तं त्वां भिक्षे नरेश्वर ॥
saṃśrutaśca mayā yo'rtho gurave rājasattama | tvadadhīnaḥ sa rājendra taṃ tvāṃ bhikṣe nareśvara
"राजश्रेष्ठ, गुरु के लिए मैंने जो कार्य स्वीकार किया है, वह आप पर निर्भर है, राजेन्द्र; इसलिए नरेश्वर, मैं आपसे उसकी याचना करता हूँ।"
श्लोक 8 (14.57.8)
ददासि विप्रमुख्येभ्यस्त्वं हि रत्नानि नित्यदा । दाता च त्वं नरव्याघ्र पात्रभूतः क्षिताविह । पात्रं प्रतिग्रहे चापि विद्धि मां नृपसत्तम ॥
dadāsi vipramukhyebhyastvaṃ hi ratnāni nityadā | dātā ca tvaṃ naravyāghra pātrabhūtaḥ kṣitāviha | pātraṃ pratigrahe cāpi viddhi māṃ nṛpasattama
"आप श्रेष्ठ ब्राह्मणों को सदा रत्न देते हैं। नरव्याघ्र, आप दाता हैं और पृथ्वी पर पात्र भी हैं। नृपश्रेष्ठ, मुझे भी दान लेने के योग्य पात्र जानिए।"
श्लोक 9 (14.57.9)
उपाहृत्य गुरोरर्थं त्वदायत्तमरिंदम । समयेनेह राजेन्द्र पुनरेष्यामि ते वशम् ॥
upāhṛtya gurorarthaṃ tvadāyattamariṃdama | samayeneha rājendra punareṣyāmi te vaśam
"शत्रुदमन, आप पर निर्भर गुरु के उस कार्य को पूरा करके, राजेन्द्र, मैं निश्चित शर्त के अनुसार फिर आपके वश में आ जाऊँगा।"
श्लोक 10 (14.57.10)
सत्यं ते प्रतिजानामि नात्र मिथ्या कथञ्चन । अनृतं नोक्तपूर्वं मे स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ॥
satyaṃ te pratijānāmi nātra mithyā kathañcana | anṛtaṃ noktapūrvaṃ me svaireṣvapi kuto'nyathā
"मैं आपको सच्चा वचन देता हूँ; इसमें कोई असत्य नहीं। मैंने पहले कभी हँसी-ठिठोली में भी झूठ नहीं बोला; अब कैसे बोलूँगा?"
सौदास उवाच
श्लोक 11 (14.57.11)
यदि मत्तस्तवायत्तो गुर्वर्थः कृत एव सः । यदि चास्ति प्रतिग्राह्यं साम्प्रतं तद्वदस्व मे ॥
yadi mattastavāyatto gurvarthaḥ kṛta eva saḥ | yadi cāsti pratigrāhyaṃ sāmprataṃ tadvadasva me
"यदि गुरु का कार्य मुझ पर निर्भर है तो वह हुआ ही समझो। और यदि तुम्हें कुछ स्वीकार करना है तो अभी मुझे बताओ।"
उदङ्क उवाच
श्लोक 12 (14.57.12)
प्रतिग्राह्यो मतो मे त्वं सदैव पुरुषर्षभ । सोहं त्वामनुसम्प्राप्तो भिक्षितुं मणिकुण्डले ॥
pratigrāhyo mato me tvaṃ sadaiva puruṣarṣabha | sohaṃ tvāmanusamprāpto bhikṣituṃ maṇikuṇḍale
"पुरुषश्रेष्ठ, मैं आपको सदा से दान लेने योग्य मानता हूँ। इसलिए मैं आपके पास दोनों मणिमय कुण्डल माँगने आया हूँ।"
सौदास उवाच
श्लोक 13 (14.57.13)
पत्न्यास्ते मम विप्रर्षे उचिते मणिकुण्डले । वरयार्थं त्वमन्यं वै तं ते दास्यामि सुव्रत ॥
patnyāste mama viprarṣe ucite maṇikuṇḍale | varayārthaṃ tvamanyaṃ vai taṃ te dāsyāmi suvrata
"विप्रर्षि, वे दोनों उत्तम मणिमय कुण्डल तो मेरी पत्नी के हैं। सुव्रत, कोई और वस्तु माँग लो, मैं वह दे दूँगा।"
उदङ्क उवाच
श्लोक 14 (14.57.14)
अलं ते व्यपदेशेन प्रमाणं यदि ते वयम् । प्रयच्छ कुण्डले मह्यं सत्यवाग्भव पार्थिव ॥
alaṃ te vyapadeśena pramāṇaṃ yadi te vayam | prayaccha kuṇḍale mahyaṃ satyavāgbhava pārthiva
"ऐसे बहानों से बस कीजिए। यदि आप हमारी बात को प्रमाण मानते हैं, तो राजन्, मुझे कुण्डल दीजिए और अपने वचन के सच्चे बनिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 15 (14.57.15)
इत्युक्तस्त्वब्रवीद्राजा तमुदङ्कं पुनर्वचः । गच्छ मद्वचनाद्देवीं ब्रूहि देहीति सत्तम ॥
ityuktastvabravīdrājā tamudaṅkaṃ punarvacaḥ | gaccha madvacanāddevīṃ brūhi dehīti sattama
ऐसा कहे जाने पर राजा ने उदङ्क से फिर कहा, "मेरे कहने से रानी के पास जाओ और कहो, 'दे दो।'"
सौदास उवाच
श्लोक 16 (14.57.16)
सैवमुक्ता त्वया नूनं मद्वाक्येन शुचिव्रता । प्रदास्यति द्विजश्रेष्ठ कुण्डले ते न संशयः ॥
saivamuktā tvayā nūnaṃ madvākyena śucivratā | pradāsyati dvijaśreṣṭha kuṇḍale te na saṃśayaḥ
"द्विजश्रेष्ठ, तुम्हारे द्वारा मेरे नाम से इस प्रकार कहे जाने पर वह शुद्ध आचरण वाली देवी निश्चय ही तुम्हें कुण्डल दे देगी; इसमें सन्देह नहीं।"
उदङ्क उवाच
श्लोक 17 (14.57.17)
क्व पत्नी भवतः शक्या मया द्रष्टुं नरेश्वर । स्वयं वाऽपि भवान्पत्नीं किमर्थं नोपसर्पति ॥
kva patnī bhavataḥ śakyā mayā draṣṭuṃ nareśvara | svayaṃ vā'pi bhavānpatnīṃ kimarthaṃ nopasarpati
"नरेश्वर, मैं आपकी पत्नी को कहाँ देख सकता हूँ? और आप स्वयं उसके पास क्यों नहीं जाते?"
सौदास उवाच
श्लोक 18 (14.57.18)
तां द्रक्ष्यति भवानद्य कास्मिंश्चिद्वननिर्झरे । षष्ठे काले न हि मया सा शक्या द्रष्टुमद्य वै ॥
tāṃ drakṣyati bhavānadya kāsmiṃścidvananirjhare | ṣaṣṭhe kāle na hi mayā sā śakyā draṣṭumadya vai
"आज तुम उसे किसी वन-झरने पर देखोगे। छठे काल में मैं आज उसे नहीं देख सकता।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (14.57.19)
उदङ्कस्तु तथोक्तः स जगाम भरतर्षभ । मदयन्तीं च दृष्ट्वा स ज्ञापयत्स्वप्रयोजनम् ॥
udaṅkastu tathoktaḥ sa jagāma bharatarṣabha | madayantīṃ ca dṛṣṭvā sa jñāpayatsvaprayojanam
भरतश्रेष्ठ, ऐसा कहे जाने पर उदङ्क चल दिए, और मदयन्ती को देखकर उन्होंने अपना प्रयोजन बताया।
श्लोक 20 (14.57.20)
सौदासवचनं श्रुत्वा ततः सा पृथुलोचना । प्रत्युवाच महाबुद्धिमुदङ्कं जनमेजय ॥
saudāsavacanaṃ śrutvā tataḥ sā pṛthulocanā | pratyuvāca mahābuddhimudaṅkaṃ janamejaya
सौदास का सन्देश सुनकर विशाल नेत्रों वाली उस रानी ने, जनमेजय, परम बुद्धिमान उदङ्क को उत्तर दिया:
मदयन्त्युवाच
श्लोक 21 (14.57.21)
एवमेतन्महाब्रह्मन्नानृतं वदसेऽनघ । अभिज्ञानं तु किञ्चित्त्वं समानयितुमर्हसि ॥
evametanmahābrahmannānṛtaṃ vadase'nagha | abhijñānaṃ tu kiñcittvaṃ samānayitumarhasi
"महाब्रह्मन्, बात ऐसी ही है; निष्पाप, तुम झूठ नहीं बोल रहे। परन्तु तुम्हें कोई पहचान-चिह्न ले आना होगा।"
श्लोक 22 (14.57.22)
इमे हि दिव्ये मणिकुण्डले मे । देवाश्च यक्षाश्च महर्षयश्च । तैस्तैरुपायैरपहर्तुकामा- । श्छिद्रेषु नित्यं परितर्कयन्ति ॥
ime hi divye maṇikuṇḍale me | devāśca yakṣāśca maharṣayaśca | taistairupāyairapahartukāmā- | śchidreṣu nityaṃ paritarkayanti
"ये मेरे दो दिव्य मणिमय कुण्डल हैं; देवता, यक्ष और महर्षि अपने-अपने उपायों से इन्हें हर लेने की इच्छा रखकर सदा चूक के अवसर की ताक में रहते हैं।"
श्लोक 23 (14.57.23)
निक्षिप्तमेतद्भुवि पन्नगास्तु । रत्नं समासाद्य परामृशेयुः । यक्षास्तथोच्छिष्टधृतं सुराश्च । निद्रावशाद्वा परिधर्षयेयुः ॥
nikṣiptametadbhuvi pannagāstu | ratnaṃ samāsādya parāmṛśeyuḥ | yakṣāstathocchiṣṭadhṛtaṃ surāśca | nidrāvaśādvā paridharṣayeyuḥ
"यदि यह रत्न भूमि पर रख दिया जाए तो नाग इसे पाकर छू लेंगे; अपवित्र अवस्था में पहना हो तो यक्ष इसका अपहरण करेंगे; और नींद के वश होने पर देवता इसे छीन लेंगे।"
श्लोक 24 (14.57.24)
छिद्रेष्वेतेष्विमे नित्यं ह्रियते द्विजसत्तम । देवराक्षसनागानामप्रमत्तेन धार्यते ॥
chidreṣveteṣvime nityaṃ hriyate dvijasattama | devarākṣasanāgānāmapramattena dhāryate
"द्विजश्रेष्ठ, चूक के इन अवसरों पर ये सदा हर लिए जाते हैं; देवताओं, राक्षसों और नागों से इन्हें वही बचा सकता है जो निरन्तर सावधान रहे।"
श्लोक 25 (14.57.25)
एते दिवापि भासेते रात्रौ च द्विजसत्तम । नक्तं नक्षत्रताराणां प्रभामाक्षिप्य वर्तते ॥
ete divāpi bhāsete rātrau ca dvijasattama | naktaṃ nakṣatratārāṇāṃ prabhāmākṣipya vartate
"द्विजश्रेष्ठ, ये दिन में भी चमकते हैं और रात में भी; रात को ये नक्षत्रों और तारों की आभा को मात करके दमकते रहते हैं।"
श्लोक 26 (14.57.26)
एते ह्यामुच्य भगवन्क्षुत्पिपासाभयं कुतः । विषाग्निश्वापदेभ्यश्च भयं जातु न विद्यते ॥
ete hyāmucya bhagavankṣutpipāsābhayaṃ kutaḥ | viṣāgniśvāpadebhyaśca bhayaṃ jātu na vidyate
"भगवन्, इन्हें पहनने वाले को भूख-प्यास का भय कहाँ? विष, अग्नि और हिंसक पशुओं से उसे कभी भय नहीं होता।"
श्लोक 27 (14.57.27)
ह्रस्वेन चैते आमुक्ते भवतो ह्रस्वके तदा । अनुरूपेण चामुक्ते जायेते तत्प्रमाणके ॥
hrasvena caite āmukte bhavato hrasvake tadā | anurūpeṇa cāmukte jāyete tatpramāṇake
"छोटे शरीर वाले के पहनने पर ये छोटे हो जाते हैं, और जिस माप के व्यक्ति के पहने जाएँ, उसी माप के हो जाते हैं।"
श्लोक 28 (14.57.28)
एवंविधे ममैते वै कुण्डले परमार्चिते । त्रिषु लोकेषु विज्ञाते तदभिज्ञानमानय ॥
evaṃvidhe mamaite vai kuṇḍale paramārcite | triṣu lokeṣu vijñāte tadabhijñānamānaya
"मेरे ये परम पूजित कुण्डल ऐसे ही हैं, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं। इनके लिए कोई पहचान-चिह्न ले आओ।"