आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 56
उदङ्क की गुरुसेवा और कुण्डलों की खोज
जनमेजय उदङ्क के तप के विषय में पूछते हैं, और वैशम्पायन बताते हैं कि उदङ्क अपने गुरु गौतम की सेवा करते रहे और उन्हें पता ही न चला कि बुढ़ापा आ गया। लकड़ी के बोझ में अपनी श्वेत जटा देखकर वे रो पड़ते हैं; गौतम उन्हें जाने की अनुमति देते हैं और फिर से युवा होने पर अपनी कन्या उन्हें पत्नी रूप में देते हैं। गुरु-दक्षिणा के लिए गुरुपत्नी अहल्या सौदास की रानी के मणिमय कुण्डल माँगती हैं। उदङ्क चल पड़ते हैं, और गौतम को आशंका होती है कि राजा उन्हें खा जाएगा।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (14.56.1)
उदङ्कः केन तपसा संयुक्तो वै महामनाः । यः शापं दातुकामोऽभूद्विष्णवे प्रभविष्णवे ॥
udaṅkaḥ kena tapasā saṃyukto vai mahāmanāḥ | yaḥ śāpaṃ dātukāmo'bhūdviṣṇave prabhaviṣṇave
वे महामना उदङ्क किस तप से सम्पन्न थे, जो सर्वसमर्थ विष्णु को शाप देना चाहते थे?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 2 (14.56.2)
उदङ्को महता युक्तस्तपसा जनमेजय । गुरुभक्तः स तेजस्वी नान्यत्किञ्चिदपूजयत् ॥
udaṅko mahatā yuktastapasā janamejaya | gurubhaktaḥ sa tejasvī nānyatkiñcidapūjayat
जनमेजय, उदङ्क महान् तप से युक्त थे। वे गुरुभक्त और तेजस्वी थे और उन्होंने अपने गुरु के सिवा और किसी की पूजा नहीं की।
श्लोक 3 (14.56.3)
सर्वेषामृषिपुत्राणामेष आसीन्मनोरथः । औदङ्कीं गुरुवृत्तिं वै प्राप्नुयामेति भारत ॥
sarveṣāmṛṣiputrāṇāmeṣa āsīnmanorathaḥ | audaṅkīṃ guruvṛttiṃ vai prāpnuyāmeti bhārata
सब ऋषिपुत्रों की यही अभिलाषा थी, भारत: "हमें भी उदङ्क जैसी गुरुसेवा प्राप्त हो।"
श्लोक 4 (14.56.4)
गौतमस्य तु शिष्याणां बहूनां जनमेजय । उदङ्केऽभ्यधिका प्रीतिः स्नेहश्चैवाभवत्तदा ॥
gautamasya tu śiṣyāṇāṃ bahūnāṃ janamejaya | udaṅke'bhyadhikā prītiḥ snehaścaivābhavattadā
जनमेजय, गौतम के अनेक शिष्यों में उस समय उदङ्क पर ही उनकी सबसे अधिक प्रीति और स्नेह था।
श्लोक 5 (14.56.5)
स तस्य दमशौचाभ्यां विक्रान्तेन च कर्मणा । सम्यक्चैवोपचारेण गौतमः प्रीतिमानभूत् ॥
sa tasya damaśaucābhyāṃ vikrāntena ca karmaṇā | samyakcaivopacāreṇa gautamaḥ prītimānabhūt
उदङ्क के संयम और पवित्रता, पराक्रमपूर्ण कर्म और भली-भाँति की गई सेवा से गौतम प्रसन्न थे।
श्लोक 6 (14.56.6)
अथ शिष्यसहस्राणि समनुज्ञाय गौतमः । उदङ्कं परया प्रीत्या नाभ्यनुज्ञातुमैच्छत ॥
atha śiṣyasahasrāṇi samanujñāya gautamaḥ | udaṅkaṃ parayā prītyā nābhyanujñātumaicchata
फिर गौतम ने हज़ारों शिष्यों को जाने की अनुमति दे दी, परन्तु बड़ी प्रीति के कारण वे उदङ्क को जाने की अनुमति देना नहीं चाहते थे।
श्लोक 7 (14.56.7)
तं क्रमेण जरा तात प्रतिपेदे महामुनिम् । न चान्वबुध्यत तदा स मुनिर्गुरुवत्सलः ॥
taṃ krameṇa jarā tāta pratipede mahāmunim | na cānvabudhyata tadā sa munirguruvatsalaḥ
तात, धीरे-धीरे उन महामुनि को बुढ़ापे ने घेर लिया, और गुरु-वत्सल उन मुनि को उसका पता ही न चला।
श्लोक 8 (14.56.8)
ततः कदाचिद्राजेन्द्र काष्ठान्यानयितुं ययौ । उदङ्कः काष्ठभारं च महान्तं समुपानयत् ॥
tataḥ kadācidrājendra kāṣṭhānyānayituṃ yayau | udaṅkaḥ kāṣṭhabhāraṃ ca mahāntaṃ samupānayat
राजेन्द्र, तब एक बार उदङ्क लकड़ी लाने गए और लकड़ियों का एक बहुत बड़ा बोझ ले आए।
श्लोक 9 (14.56.9)
स तद्भाराभिभूतात्मा काष्ठभारमरिंदम । निचिक्षेप क्षितौ राजन्परिश्रान्तो बुभुक्षितः ॥
sa tadbhārābhibhūtātmā kāṣṭhabhāramariṃdama | nicikṣepa kṣitau rājanpariśrānto bubhukṣitaḥ
अरिंदम राजन्, बोझ से दबे, थके और भूखे उदङ्क ने उस लकड़ी के गट्ठर को धरती पर पटक दिया।
श्लोक 10 (14.56.10)
तस्य काष्ठे विलग्नाऽभूज्जटा रूप्यसमप्रभा । ततः काष्ठैः सह तदा पपात धरणीतलम् ॥
tasya kāṣṭhe vilagnā'bhūjjaṭā rūpyasamaprabhā | tataḥ kāṣṭhaiḥ saha tadā papāta dharaṇītalam
उनकी चाँदी-सी चमकती एक जटा लकड़ी में उलझ गई थी, और वह लकड़ियों के साथ ही भूमि पर गिर पड़ी।
श्लोक 11 (14.56.11)
ततः स भारनिष्पिष्टः क्षुधाविष्टश्च भारत । दृष्ट्वा तां वयसोऽवस्थां रुरोदार्तस्वरं तदा ॥
tataḥ sa bhāraniṣpiṣṭaḥ kṣudhāviṣṭaśca bhārata | dṛṣṭvā tāṃ vayaso'vasthāṃ rurodārtasvaraṃ tadā
भारत, तब बोझ से कुचले और भूख से व्याकुल उदङ्क अपनी वृद्धावस्था का वह चिह्न देखकर पीड़ा भरे स्वर में रो पड़े।
श्लोक 12 (14.56.12)
ततो गुरुसुता तस्य पद्मपत्रनिभानना । जग्राहाश्रूणि सुश्रोणी करेण पृथुलोचना । पितुर्नियोगाद्भावज्ञा शिरसाऽवनता तदा ॥
tato gurusutā tasya padmapatranibhānanā | jagrāhāśrūṇi suśroṇī kareṇa pṛthulocanā | piturniyogādbhāvajñā śirasā'vanatā tadā
तब कमलदल के समान मुख वाली, सुन्दर कटि और विशाल नेत्रों वाली गुरुपुत्री ने उनके भाव को समझकर, पिता की आज्ञा से सिर झुकाए, उनके आँसू अपनी हथेली में थाम लिए।
श्लोक 13 (14.56.13)
तस्या निपेततुर्दग्धौ करौ तैरश्रुबिन्दुभिः । न हि तानश्रुपातांस्तु शक्ता धारयितुं मही । गौतमस्त्वब्रवीद्विप्रमुदङ्कं प्रीतमानसः ॥
tasyā nipetaturdagdhau karau tairaśrubindubhiḥ | na hi tānaśrupātāṃstu śaktā dhārayituṃ mahī | gautamastvabravīdvipramudaṅkaṃ prītamānasaḥ
गिरती उन आँसुओं की बूँदों से उसके दोनों हाथ जल गए, क्योंकि पृथ्वी भी उन गिरते आँसुओं को धारण करने में समर्थ नहीं थी। तब प्रसन्न मन वाले गौतम ने ब्राह्मण उदङ्क से कहा:
गौतम उवाच
श्लोक 14 (14.56.14)
कस्मात्तात तवाद्येह शोकोत्तरमिदं मनः । स स्वैरं ब्रूहि विप्रर्षे श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
kasmāttāta tavādyeha śokottaramidaṃ manaḥ | sa svairaṃ brūhi viprarṣe śrotumicchāmi tattvataḥ
"तात, आज तुम्हारा मन इतना शोक से भरा क्यों है? विप्रर्षि, निःसंकोच बताओ; मैं तुमसे सच्ची बात सुनना चाहता हूँ।"
उदङ्क उवाच
श्लोक 15 (14.56.15)
भवद्गतेन मनसा भवत्प्रियचिकीर्षया । भवद्भक्तिगतेनेह भवद्भावानुगेन च ॥
bhavadgatena manasā bhavatpriyacikīrṣayā | bhavadbhaktigateneha bhavadbhāvānugena ca
"आप में लगे मन से, आपका प्रिय करने की इच्छा से, आपकी भक्ति में रमे हुए और आपके भावों का अनुसरण करते हुए,"
श्लोक 16 (14.56.16)
जरेयं नावबुद्धा मे नाभिज्ञातं सुखं च मे । शतवर्षोषितं मां हि न त्वमभ्यनुजानिथाः ॥
jareyaṃ nāvabuddhā me nābhijñātaṃ sukhaṃ ca me | śatavarṣoṣitaṃ māṃ hi na tvamabhyanujānithāḥ
"मुझे इस बुढ़ापे का पता ही नहीं चला, न ही मैंने सुख को जाना; और सौ वर्ष आपके पास रहने पर भी आपने मुझे जाने की अनुमति नहीं दी।"
श्लोक 17 (14.56.17)
भवता त्वभ्यनुज्ञाताः शिष्याः प्रत्यवरा मम । उपपन्ना द्विजश्रेष्ठ शतशोऽथ सहस्रशः ॥
bhavatā tvabhyanujñātāḥ śiṣyāḥ pratyavarā mama | upapannā dvijaśreṣṭha śataśo'tha sahasraśaḥ
"द्विजश्रेष्ठ, मुझसे छोटे जिन शिष्यों को आपने अनुमति दी, वे सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में जा चुके हैं।"
गौतम उवाच
श्लोक 18 (14.56.18)
त्वत्प्रीतियुक्तेन मया गुरुशुश्रूषया तव । व्यतिक्रामन्महाकालो नावबुद्धो द्विजर्षभ ॥
tvatprītiyuktena mayā guruśuśrūṣayā tava | vyatikrāmanmahākālo nāvabuddho dvijarṣabha
"तुम्हारे प्रति प्रीति से बँधे मुझे और गुरुसेवा में लगे तुम्हें इतना लम्बा समय बीतने का ध्यान ही नहीं रहा, द्विजश्रेष्ठ।"
श्लोक 19 (14.56.19)
किं त्वद्य यदि ते श्रद्धा गमनं प्रति भार्गव । अनुज्ञां प्रतिगृह्य त्वं स्वगृहान्गच्छ माचिरम् ॥
kiṃ tvadya yadi te śraddhā gamanaṃ prati bhārgava | anujñāṃ pratigṛhya tvaṃ svagṛhāngaccha māciram
"भार्गव, अब यदि तुम्हारी जाने की इच्छा है तो मुझसे अनुमति लेकर बिना देर किए अपने घर चले जाओ।"
उदङ्क उवाच
श्लोक 20 (14.56.20)
गुर्वर्थं कं प्रयच्छामि ब्रूहि त्वं द्विजसत्तम । तमुपाहृत्य गच्छेयमनुज्ञातस्त्वया विभो ॥
gurvarthaṃ kaṃ prayacchāmi brūhi tvaṃ dvijasattama | tamupāhṛtya gaccheyamanujñātastvayā vibho
"द्विजश्रेष्ठ, गुरुदक्षिणा में मैं क्या दूँ? आप ही बताइए। प्रभो, उसे लाकर आपकी आज्ञा से मैं जाऊँगा।"
गौतम उवाच
श्लोक 21 (14.56.21)
दक्षिणापरितोषो वै गुरूणां सद्भिरुच्यते । तव ह्याचरतो धर्मं तुष्टोऽहं वै न संशयः । इत्थं च परितुष्टं मां विजानीहि भृगूद्वह ॥
dakṣiṇāparitoṣo vai gurūṇāṃ sadbhirucyate | tava hyācarato dharmaṃ tuṣṭo'haṃ vai na saṃśayaḥ | itthaṃ ca parituṣṭaṃ māṃ vijānīhi bhṛgūdvaha
"सज्जन कहते हैं कि गुरुओं की दक्षिणा उनका सन्तोष ही है। धर्म का आचरण करते हुए तुमसे मैं सन्तुष्ट हूँ, इसमें कोई सन्देह नहीं। भृगुवंशी, मुझे इस प्रकार सन्तुष्ट जानो।"
श्लोक 22 (14.56.22)
युवा षोडशवर्षो हि यद्यद्य भविता भवान् । ददानि पत्नीं कन्यां च स्वां ते दुहितरं द्विज । एतामृतेऽङ्गना नान्या त्वत्तेजोऽर्हति सेवितुम् ॥
yuvā ṣoḍaśavarṣo hi yadyadya bhavitā bhavān | dadāni patnīṃ kanyāṃ ca svāṃ te duhitaraṃ dvija | etāmṛte'ṅganā nānyā tvattejo'rhati sevitum
"यदि तुम आज सोलह वर्ष के युवा हो जाओ, तो द्विज, मैं तुम्हें पत्नी के रूप में अपनी ही कन्या दे दूँगा। उसके सिवा कोई और स्त्री तुम्हारे तेज की सेवा नहीं सह सकती।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (14.56.23)
ततस्तां प्रतिजग्राह युवा भूत्वा यशस्विनीम् । गुरुणा चाभ्यनुज्ञातो गुरुपत्नीमथाब्रवीत् ॥
tatastāṃ pratijagrāha yuvā bhūtvā yaśasvinīm | guruṇā cābhyanujñāto gurupatnīmathābravīt
तब उदङ्क ने युवा होकर उस यशस्विनी कन्या को ग्रहण किया, और गुरु की अनुमति पाकर गुरुपत्नी से कहा:
उदङ्क उवाच
श्लोक 24 (14.56.24)
किं भवत्यै प्रयच्छामि गुर्वर्थं विनियुङ्क्ष माम् । प्रियं हितं च काङ्क्षामि प्राणैरपि धनैरपि ॥
kiṃ bhavatyai prayacchāmi gurvarthaṃ viniyuṅkṣa mām | priyaṃ hitaṃ ca kāṅkṣāmi prāṇairapi dhanairapi
"मैं आपको क्या दूँ? गुरु के प्रयोजन के लिए मुझे कोई कार्य सौंपिए। मैं प्राण और धन देकर भी आपका प्रिय और हित करना चाहता हूँ।"
श्लोक 25 (14.56.25)
यद्दुर्लभं हि लोकेऽस्मिन्रत्नमत्यद्भुतं महत् । तदानयेयं तपसा न हि मेऽत्रास्ति संशयः ॥
yaddurlabhaṃ hi loke'sminratnamatyadbhutaṃ mahat | tadānayeyaṃ tapasā na hi me'trāsti saṃśayaḥ
"इस लोक में जो भी रत्न दुर्लभ, अद्भुत और महान् हो, उसे मैं अपने तप के बल से ले आऊँगा; इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं।"
अहल्योवाच
श्लोक 26 (14.56.26)
परितुष्टाऽस्मि ते विप्र नित्यं भक्त्या तवानघ । पर्याप्तमेतद्भद्रं ते गच्छ तात यथेप्सितम् ॥
parituṣṭā'smi te vipra nityaṃ bhaktyā tavānagha | paryāptametadbhadraṃ te gaccha tāta yathepsitam
"निष्पाप ब्राह्मण, तुम्हारी निरन्तर भक्ति से मैं सन्तुष्ट हूँ। यही पर्याप्त है। तात, जहाँ चाहो जाओ; तुम्हारा कल्याण हो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 27 (14.56.27)
उदङ्कस्तु महाराज पुनरेवाब्रवीद्वचः । आज्ञापयस्व मां मातः कर्तव्यं च तव प्रियम् ॥
udaṅkastu mahārāja punarevābravīdvacaḥ | ājñāpayasva māṃ mātaḥ kartavyaṃ ca tava priyam
महाराज, किन्तु उदङ्क ने फिर कहा: "माता, मुझे आज्ञा दीजिए; मुझे आपका प्रिय कार्य करना ही है।"
अहल्योवाच
श्लोक 28 (14.56.28)
सौदासपत्न्या विधृते दिव्ये ये मणिकुण्डले । ते समानय भद्रं ते गुर्वर्थः सुकृतो भवेत् ॥
saudāsapatnyā vidhṛte divye ye maṇikuṇḍale | te samānaya bhadraṃ te gurvarthaḥ sukṛto bhavet
"सौदास की रानी ने जो दो दिव्य मणिमय कुण्डल धारण कर रखे हैं, उन्हें ले आओ; तुम्हारा कल्याण हो। तब गुरुदक्षिणा भली-भाँति पूरी होगी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 29 (14.56.29)
स तथेति प्रतिश्रुत्य जगाम जनमेजय । गुरुपत्नीप्रियार्थं वै ते समानयितुं तदा ॥
sa tatheti pratiśrutya jagāma janamejaya | gurupatnīpriyārthaṃ vai te samānayituṃ tadā
जनमेजय, "ऐसा ही हो" कहकर उदङ्क गुरुपत्नी का प्रिय करने के लिए उन कुण्डलों को लाने चल पड़े।
श्लोक 30 (14.56.30)
स जगाम ततः शीघ्रमुदङ्को ब्राह्मणर्षभः । सौदासं पुरुषादं वै भिक्षितुं मणिकुण्डले ॥
sa jagāma tataḥ śīghramudaṅko brāhmaṇarṣabhaḥ | saudāsaṃ puruṣādaṃ vai bhikṣituṃ maṇikuṇḍale
तब ब्राह्मणश्रेष्ठ उदङ्क शीघ्र ही नरभक्षी सौदास के पास उन मणिमय कुण्डलों को माँगने चले गए।
श्लोक 31 (14.56.31)
गौतमस्त्वब्रवीत्पत्नीमुदङ्को नात्र दृश्यते । इति पृष्टा तमाचष्ट कुण्डलार्थे गतं च सा ॥
gautamastvabravītpatnīmudaṅko nātra dṛśyate | iti pṛṣṭā tamācaṣṭa kuṇḍalārthe gataṃ ca sā
गौतम ने पत्नी से कहा, "उदङ्क दिखाई नहीं देता।" इस प्रकार पूछे जाने पर उसने बताया कि वह कुण्डलों के लिए गया है।
श्लोक 32 (14.56.32)
ततः प्रोवाच पत्नीं स न ते सम्यगिदं कृतम् । शप्तः स पार्थिवो नूनं ब्राह्मणं तं वधिष्यति ॥
tataḥ provāca patnīṃ sa na te samyagidaṃ kṛtam | śaptaḥ sa pārthivo nūnaṃ brāhmaṇaṃ taṃ vadhiṣyati
तब उन्होंने पत्नी से कहा, "तुमने यह ठीक नहीं किया। वह राजा निश्चय ही शापग्रस्त है; वह उस ब्राह्मण को मार डालेगा।"
अहल्योवाच
श्लोक 33 (14.56.33)
अजानन्त्या नियुक्तः स भगवन्ब्राह्मणो मया । भवत्प्रसादान्न भयं किञ्चित्तस्य भविष्यति ॥
ajānantyā niyuktaḥ sa bhagavanbrāhmaṇo mayā | bhavatprasādānna bhayaṃ kiñcittasya bhaviṣyati
"भगवन्, मैंने अनजाने में उस ब्राह्मण को भेज दिया था। आपकी कृपा से उसे कोई भय नहीं होगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 34 (14.56.34)
इत्युक्तः प्राह तां पत्नीमेवमस्त्विति गौतमः । उदङ्कोऽपि वने शून्ये राजानं तं ददर्श ह ॥
ityuktaḥ prāha tāṃ patnīmevamastviti gautamaḥ | udaṅko'pi vane śūnye rājānaṃ taṃ dadarśa ha
ऐसा कहे जाने पर गौतम ने अपनी पत्नी से कहा, "ऐसा ही हो।" और उदङ्क ने सूने वन में उस राजा को देखा।