Skip to main content

आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 55

कृष्ण का उदङ्क को विश्वरूप दिखाना और वरदान देना

उदङ्क कृष्ण का दिव्य रूप देखना चाहते हैं; कृष्ण उन्हें वह रूप दिखाते हैं और उदङ्क उनकी स्तुति करते हैं। वर माँगने को कहे जाने पर उदङ्क मरुभूमि में इच्छानुसार जल पाने का वर माँगते हैं। बाद में प्यास से व्याकुल उदङ्क को एक चाण्डाल जल देता है, जिसे वे क्रोध में ठुकरा देते हैं। तब कृष्ण बताते हैं कि वह इन्द्र था, जो अमृत उसी रूप में देना चाहता था, और वे वर देते हैं कि मरुभूमि में उदङ्क-मेघ बरसेंगे।

अध्याय 54अध्याय-सूचीअध्याय 56

उदङ्क उवाच

श्लोक 1 (14.55.1)

अभिजानामि जगतः कर्तारं त्वां जनार्दन । नूनं भवत्प्रसादोऽयमिति मे नास्ति संशयः ॥

abhijānāmi jagataḥ kartāraṃ tvāṃ janārdana | nūnaṃ bhavatprasādo'yamiti me nāsti saṃśayaḥ

जनार्दन, मैं आपको जगत् के रचयिता के रूप में जानता हूँ। निश्चय ही यह आपकी कृपा है; इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 2 (14.55.2)

चित्तं च सुप्रसन्नं मे त्वद्भावगतमच्युत । विनिवृत्तश्च मे कोप इति विद्धि परंतप ॥

cittaṃ ca suprasannaṃ me tvadbhāvagatamacyuta | vinivṛttaśca me kopa iti viddhi paraṃtapa

अच्युत, मेरा चित्त पूरी तरह प्रसन्न है और आप में लगा है, और मेरा क्रोध शान्त हो गया है। हे परंतप, इसे जान लीजिए।

श्लोक 3 (14.55.3)

यदि त्वनुग्रहं कञ्चित्त्वत्तोऽर्हामि जनार्दन । द्रष्टुमिच्छामि ते रूपं वैष्णवं तन्निदर्शय ॥

yadi tvanugrahaṃ kañcittvatto'rhāmi janārdana | draṣṭumicchāmi te rūpaṃ vaiṣṇavaṃ tannidarśaya

जनार्दन, यदि मैं आपसे किसी अनुग्रह के योग्य हूँ, तो मैं आपका वह वैष्णव रूप देखना चाहता हूँ; उसे दिखाइए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (14.55.4)

ततः स तस्मै प्रीतात्मा दर्शयामास तद्वपुः । शाश्वतं वैष्णवं धीमान्ददृशे यद्धनंजयः ॥

tataḥ sa tasmai prītātmā darśayāmāsa tadvapuḥ | śāśvataṃ vaiṣṇavaṃ dhīmāndadṛśe yaddhanaṃjayaḥ

तब प्रसन्न चित्त कृष्ण ने उसे अपना वह शाश्वत वैष्णव रूप दिखाया, जिसे बुद्धिमान धनंजय (अर्जुन) ने भी देखा था।

श्लोक 5 (14.55.5)

स ददर्श महात्मानं विश्वरूपं महाभुजम् । सहस्रसूर्यप्रतिमं दीप्तिमत्पावकोपमम् । सर्वमाकाशमावृत्य तिष्ठन्तं सर्वतोमुखम् ॥

sa dadarśa mahātmānaṃ viśvarūpaṃ mahābhujam | sahasrasūryapratimaṃ dīptimatpāvakopamam | sarvamākāśamāvṛtya tiṣṭhantaṃ sarvatomukham

उसने उन महात्मा को विश्वरूप में देखा: विशाल भुजाओं वाले, सहस्र सूर्यों के समान, अग्नि की तरह दीप्तिमान, समूचे आकाश को घेरकर सब ओर मुख किए खड़े हुए।

श्लोक 6 (14.55.6)

तद्दृष्ट्वा परमं रूपं विष्णोर्वैष्णवमद्भुतम् । विस्मयं च ययौ विप्रस्तं दृष्ट्वा परमेश्वरम् ॥

taddṛṣṭvā paramaṃ rūpaṃ viṣṇorvaiṣṇavamadbhutam | vismayaṃ ca yayau viprastaṃ dṛṣṭvā parameśvaram

विष्णु के उस परम और अद्भुत रूप को देखकर वह ब्राह्मण परमेश्वर को निहारता हुआ विस्मय से भर गया।

उदङ्क उवाच

श्लोक 7 (14.55.7)

नमोनमस्ते सर्वात्मन्नारायण परात्मक । परमात्मन्पद्मनाभ पुण्डरीकाक्ष माधव ॥

namonamaste sarvātmannārāyaṇa parātmaka | paramātmanpadmanābha puṇḍarīkākṣa mādhava

हे सर्वात्मा, पर से भी परे नारायण, आपको बार-बार नमस्कार है। हे परमात्मन्, पद्मनाभ, कमलनयन माधव!

श्लोक 8 (14.55.8)

हिरण्यगर्भरूपाय संसारोत्तारणाय च । पुरुषाय पुराणाय शान्तश्यामाय ते नमः ॥

hiraṇyagarbharūpāya saṃsārottāraṇāya ca | puruṣāya purāṇāya śāntaśyāmāya te namaḥ

हिरण्यगर्भ रूप वाले, संसार से पार उतारने वाले, पुराण पुरुष, शान्त और श्यामवर्ण आपको नमस्कार है।

श्लोक 9 (14.55.9)

अविद्यातिमिरादित्यं भवव्याधिमहौषधिम् । संसारार्णवसारं त्वां प्रणमामि गतिर्भव ॥

avidyātimirādityaṃ bhavavyādhimahauṣadhim | saṃsārārṇavasāraṃ tvāṃ praṇamāmi gatirbhava

आप अविद्या के अन्धकार के लिए सूर्य हैं, भव-रोग की श्रेष्ठ औषधि हैं और संसार-सागर के सार हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ; मेरी गति बनिए।

श्लोक 10 (14.55.10)

सर्ववेदैकवेद्याय सर्ववेदमयाय च । वासुदेवाय नित्याय नमो भक्तप्रियाय ते ॥

sarvavedaikavedyāya sarvavedamayāya ca | vāsudevāya nityāya namo bhaktapriyāya te

जो सब वेदों के द्वारा जानने योग्य एकमात्र तत्त्व हैं और सर्ववेदमय हैं, उन नित्य, भक्तप्रिय वासुदेव आपको नमस्कार है।

श्लोक 11 (14.55.11)

दयया दुःखमोहान्मां समुद्धर्तुमिहार्हसि । कर्मभिर्बहुभिः पापैर्बद्धं पाहि जनार्दन ॥

dayayā duḥkhamohānmāṃ samuddhartumihārhasi | karmabhirbahubhiḥ pāpairbaddhaṃ pāhi janārdana

अपनी दया से आप मुझे दुःख और मोह से उबारने के योग्य हैं। मैं बहुत-से कर्मों और पापों से बँधा हूँ; जनार्दन, मेरी रक्षा कीजिए।

श्लोक 12 (14.55.12)

विश्वकर्मन्नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन्विश्वसम्भव । पद्म्यां ते पृथिवी व्याप्ता शिरसा चावृतं नभः ॥

viśvakarmannamaste'stu viśvātmanviśvasambhava | padmyāṃ te pṛthivī vyāptā śirasā cāvṛtaṃ nabhaḥ

विश्वकर्मा, विश्वात्मा, विश्व के उद्गम आपको नमस्कार है! आपके चरणों से पृथ्वी व्याप्त है और आपके मस्तक से आकाश ढका हुआ है।

श्लोक 13 (14.55.13)

द्यावापृथिव्योर्यन्मध्यं जठरेण तवावृतम् । भुजाभ्यामावृताश्चाशास्त्वमिदं सर्वमच्युत ॥

dyāvāpṛthivyoryanmadhyaṃ jaṭhareṇa tavāvṛtam | bhujābhyāmāvṛtāścāśāstvamidaṃ sarvamacyuta

आकाश और पृथ्वी के बीच का जो अन्तराल है, वह आपके उदर से भरा है और दिशाएँ आपकी भुजाओं से घिरी हैं। अच्युत, यह सब आप ही हैं।

श्लोक 14 (14.55.14)

संहरस्व पुनर्देव रूपमक्षय्यमुत्तमम् । पुनस्त्वां स्वेन रूपेण द्रष्टुमिच्छामि शाश्वतम् ॥

saṃharasva punardeva rūpamakṣayyamuttamam | punastvāṃ svena rūpeṇa draṣṭumicchāmi śāśvatam

देव, अपने इस अक्षय परम रूप को फिर समेट लीजिए। मैं आपको पुनः आपके अपने शाश्वत रूप में देखना चाहता हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (14.55.15)

तमुवाच प्रसन्नात्मा गोविन्दो जनमेजय । वरं वृणीष्वेति तदा तमुदङ्कोऽब्रवीदिदम् ॥

tamuvāca prasannātmā govindo janamejaya | varaṃ vṛṇīṣveti tadā tamudaṅko'bravīdidam

जनमेजय, प्रसन्न चित्त गोविन्द ने उनसे कहा, "वर माँगो।" तब उदङ्क ने यह उत्तर दिया।

उदङ्क उवाच

श्लोक 16 (14.55.16)

पर्याप्त एष एवाद्य वरस्त्वत्तो महाद्युते । यत्ते रूपमिदं कृष्ण पश्यामि प्रभवाप्ययम् ॥

paryāpta eṣa evādya varastvatto mahādyute | yatte rūpamidaṃ kṛṣṇa paśyāmi prabhavāpyayam

"महाद्युति, आज आपसे यही वर मेरे लिए पर्याप्त है कि मैं आपके इस रूप को देख रहा हूँ, कृष्ण, जो सबकी उत्पत्ति और लय का स्थान है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 17 (14.55.17)

तमब्रवीत्पुनः कृष्णो मा त्वमत्र विचारय । अवश्यमेतत्कर्तव्यममोघं दर्शनं मम ॥

tamabravītpunaḥ kṛṣṇo mā tvamatra vicāraya | avaśyametatkartavyamamoghaṃ darśanaṃ mama

कृष्ण ने उनसे फिर कहा, "इस विषय में संकोच मत करो। यह अवश्य करना है; मेरा दर्शन कभी निष्फल नहीं होता।"

उदङ्क उवाच

श्लोक 18 (14.55.18)

अवश्यं करणीयं च यद्येतन्मन्यसे विभो । तोयमिच्छामि यत्रेष्टं मरुष्वेतद्धि दुर्लभम् ॥

avaśyaṃ karaṇīyaṃ ca yadyetanmanyase vibho | toyamicchāmi yatreṣṭaṃ maruṣvetaddhi durlabham

"प्रभो, यदि आप इसे अवश्य करने योग्य मानते हैं, तो मैं चाहता हूँ कि जहाँ मैं चाहूँ वहाँ मुझे जल मिले, क्योंकि मरुभूमि में वह दुर्लभ है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 19 (14.55.19)

ततः संहृत्य तत्तेजः प्रोवाचोदङ्कमीश्वरः । एष्टव्ये सति चिन्त्योऽहमित्युक्त्वा द्वारकां ययौ ॥

tataḥ saṃhṛtya tattejaḥ provācodaṅkamīśvaraḥ | eṣṭavye sati cintyo'hamityuktvā dvārakāṃ yayau

तब ईश्वर ने उस तेज को समेटकर उदङ्क से कहा, "जब तुम्हें आवश्यकता हो, मेरा स्मरण करना," और वे द्वारका चले गए।

श्लोक 20 (14.55.20)

ततः कदाचिद्भगवानुदङ्कस्तोयकाङ्क्षया । तृषितः परिचक्राम मरौ सस्मार चाच्युतम् ॥

tataḥ kadācidbhagavānudaṅkastoyakāṅkṣayā | tṛṣitaḥ paricakrāma marau sasmāra cācyutam

कुछ समय बाद पूज्य उदङ्क प्यास से व्याकुल होकर जल की इच्छा से मरुभूमि में भटकते रहे और उन्होंने अच्युत का स्मरण किया।

श्लोक 21 (14.55.21)

ततो दिग्वाससं धीमान्मातङ्गं मलपङ्किनम् । अपश्यत मरौ तस्मिञ्श्वयूथपरिवारितम् ॥

tato digvāsasaṃ dhīmānmātaṅgaṃ malapaṅkinam | apaśyata marau tasmiñśvayūthaparivāritam

तब उस बुद्धिमान ने उस मरुभूमि में एक नग्न, कीचड़ से सने मातंग (चाण्डाल) को कुत्तों के झुण्ड से घिरा देखा।

श्लोक 22 (14.55.22)

भीषणं बद्धनिस्त्रिंशं बाणकार्मुकधारिणम् । तस्याधःस्रोतसोऽपश्यद्वारि भूरि द्विजोत्तमः ॥

bhīṣaṇaṃ baddhanistriṃśaṃ bāṇakārmukadhāriṇam | tasyādhaḥsrotaso'paśyadvāri bhūri dvijottamaḥ

वह भयानक था, कमर में तलवार बाँधे और धनुष-बाण लिए था; और उसके नीचे की ओर से बहता हुआ बहुत-सा जल उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने देखा।

श्लोक 23 (14.55.23)

स्मरन्नेव च तं प्राह मातङ्गः प्रहसन्निव । एह्युदङ्क प्रतीच्छस्व मत्तो वारि भृगूद्वह । कृपा हि मे सुमहती त्वां दृष्ट्वा तृट्समाश्रितम् ॥

smaranneva ca taṃ prāha mātaṅgaḥ prahasanniva | ehyudaṅka pratīcchasva matto vāri bhṛgūdvaha | kṛpā hi me sumahatī tvāṃ dṛṣṭvā tṛṭsamāśritam

कृष्ण का स्मरण करते हुए उदङ्क से मातंग ने मानो हँसते हुए कहा, "आओ उदङ्क, भृगुवंशी, मुझसे जल ले लो। तुम्हें प्यास से पीड़ित देखकर मुझे बड़ी दया आती है।"

श्लोक 24 (14.55.24)

इत्युक्तस्तेन स मुनिस्तत्तोयं नाभ्यनन्दत । चिक्षेप च स तं धीमान्वाग्भिरुग्राभिरच्युतम् ॥

ityuktastena sa munistattoyaṃ nābhyanandata | cikṣepa ca sa taṃ dhīmānvāgbhirugrābhiracyutam

ऐसा कहे जाने पर मुनि ने उस जल का स्वागत नहीं किया, और उस बुद्धिमान ने अच्युत को कठोर वचनों से झिड़का।

श्लोक 25 (14.55.25)

पुनःपुनश्च मातङ्ग पिबस्वेति तमब्रवीत् । न चापिबत्स सक्रोधः क्षुभितेनान्तरात्मना ॥

punaḥpunaśca mātaṅga pibasveti tamabravīt | na cāpibatsa sakrodhaḥ kṣubhitenāntarātmanā

मातंग ने उनसे बार-बार कहा, "पियो।" परन्तु क्रोध से भरे और क्षुब्ध मन वाले उदङ्क ने नहीं पिया।

श्लोक 26 (14.55.26)

स तथा निश्चयात्तेन प्रत्याख्यातो महात्मना । श्वभिः सह महाराज तत्रैवान्तरधीयत ॥

sa tathā niścayāttena pratyākhyāto mahātmanā | śvabhiḥ saha mahārāja tatraivāntaradhīyata

महाराज, उन महात्मा के ऐसे दृढ़ निश्चय से ठुकराए जाने पर वह मातंग कुत्तों सहित वहीं अन्तर्धान हो गया।

श्लोक 27 (14.55.27)

उदङ्कस्तं तथा दृष्ट्वा ततो व्रीडितमानसः । मेने प्रलब्धमात्मानं कृष्णेनामित्रघातिना ॥

udaṅkastaṃ tathā dṛṣṭvā tato vrīḍitamānasaḥ | mene pralabdhamātmānaṃ kṛṣṇenāmitraghātinā

उसे इस प्रकार अदृश्य हुआ देखकर उदङ्क मन में लज्जित हुए और उन्होंने समझा कि शत्रुनाशक कृष्ण ने उन्हें छल लिया।

श्लोक 28 (14.55.28)

अथ तेनैव मार्गेण शङ्कचक्रगदाधरः । आजगाम महाबाहुरुदङ्कश्चैनमब्रवीत् ॥

atha tenaiva mārgeṇa śaṅkacakragadādharaḥ | ājagāma mahābāhurudaṅkaścainamabravīt

तब उसी मार्ग से शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले महाबाहु कृष्ण आए, और उदङ्क ने उनसे कहा:

उदङ्क उवाच

श्लोक 29 (14.55.29)

न युक्तं तादृशं दातुं त्वया पुरुषसत्तम । सलिलं विप्रमुख्येभ्यो मातङ्गस्रोतसा विभो ॥

na yuktaṃ tādṛśaṃ dātuṃ tvayā puruṣasattama | salilaṃ vipramukhyebhyo mātaṅgasrotasā vibho

"पुरुषोत्तम, आपके लिए यह उचित नहीं था कि आप श्रेष्ठ ब्राह्मण को मातंग की धारा का ऐसा जल दें, विभो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 30 (14.55.30)

इत्युक्तवचनं तं तु महाबुद्धिर्जनार्दनः । उदङ्कं श्लक्ष्णया वाचा सान्त्वयन्निदमब्रवीत् ॥

ityuktavacanaṃ taṃ tu mahābuddhirjanārdanaḥ | udaṅkaṃ ślakṣṇayā vācā sāntvayannidamabravīt

ये वचन सुनकर परम बुद्धिमान जनार्दन ने उदङ्क को मीठी वाणी से सान्त्वना देते हुए यह कहा:

वासुदेव उवाच

श्लोक 31 (14.55.31)

यादृशेनेह रूपेण योग्यं दातुं धृतेन वै । तादृशं खलु ते दत्तं यच्च त्वं नावबुध्यथाः ॥

yādṛśeneha rūpeṇa yogyaṃ dātuṃ dhṛtena vai | tādṛśaṃ khalu te dattaṃ yacca tvaṃ nāvabudhyathāḥ

"जिस रूप में देना उचित था, उसी रूप में वह तुम्हें दिया गया; पर तुमने उसे पहचाना नहीं।"

श्लोक 32 (14.55.32)

मया त्वदर्थमुक्तो वै वज्रपाणिः पुरंदरः । उदङ्कायामृतं देहि तोयरूपमिति प्रभुः ॥

mayā tvadarthamukto vai vajrapāṇiḥ puraṃdaraḥ | udaṅkāyāmṛtaṃ dehi toyarūpamiti prabhuḥ

"तुम्हारे लिए मैंने वज्रधारी पुरन्दर (इन्द्र) से कहा था कि उदङ्क को जल के रूप में अमृत दो।"

श्लोक 33 (14.55.33)

स मामुवाच देवेन्द्र न मर्त्योऽमर्त्यतां व्रजेत् । अन्यमस्मै वरं देहीत्यसकृद्भृगुनन्दन ॥

sa māmuvāca devendra na martyo'martyatāṃ vrajet | anyamasmai varaṃ dehītyasakṛdbhṛgunandana

"देवराज ने मुझसे कहा, "मनुष्य अमर नहीं हो सकता; इसे कोई और वर दो।" भृगुनन्दन, उसने बार-बार यही कहा।"

श्लोक 34 (14.55.34)

अमृतं देयमित्येव मयोक्तः स शचीपतिः । स मां प्रसाद्य देवेन्द्रः पुनरेवेदमब्रवीत् ॥

amṛtaṃ deyamityeva mayoktaḥ sa śacīpatiḥ | sa māṃ prasādya devendraḥ punarevedamabravīt

"किन्तु मैंने कहा कि अमृत ही देना है, और उस शचीपति देवेन्द्र को मनाया; तब उसने मुझसे फिर यह कहा:"

श्लोक 35 (14.55.35)

यदि देयमवश्यं वै मातङ्गोऽहं महामते । भूत्वाऽमृतं प्रदास्यामि भार्गवाय महात्मने ॥

yadi deyamavaśyaṃ vai mātaṅgo'haṃ mahāmate | bhūtvā'mṛtaṃ pradāsyāmi bhārgavāya mahātmane

"महामते, यदि देना ही अनिवार्य है तो मैं मातंग बनकर उन महात्मा भार्गव को अमृत दूँगा।"

श्लोक 36 (14.55.36)

यद्येवं प्रतिगृह्णाति भार्गवोऽमृतमद्य वै । प्रदातुमेष गच्छामि भार्गवस्यामृतं विभो । प्रत्याख्यातस्त्वहं तेन दास्यामि न कथञ्चन ॥

yadyevaṃ pratigṛhṇāti bhārgavo'mṛtamadya vai | pradātumeṣa gacchāmi bhārgavasyāmṛtaṃ vibho | pratyākhyātastvahaṃ tena dāsyāmi na kathañcana

"यदि भार्गव आज इस प्रकार अमृत स्वीकार करे, तो प्रभो, मैं उसे देने जाता हूँ। परन्तु यदि उसने मुझे लौटा दिया, तो मैं किसी प्रकार नहीं दूँगा।"

श्लोक 37 (14.55.37)

स तथा समयं कृत्वा तेन रूपेण वासवः । उपस्थितस्त्वया चापि प्रत्याख्यातोऽमृतं ददत् । चाण्डालरूपी भगवान्सुमहांस्ते व्यतिक्रमः ॥

sa tathā samayaṃ kṛtvā tena rūpeṇa vāsavaḥ | upasthitastvayā cāpi pratyākhyāto'mṛtaṃ dadat | cāṇḍālarūpī bhagavānsumahāṃste vyatikramaḥ

"इस प्रकार शर्त बाँधकर इन्द्र उसी रूप में अमृत देता हुआ तुम्हारे पास आया और तुमने उसे लौटा दिया। वह भगवान् चाण्डाल के रूप में आया था; तुमसे बहुत बड़ी चूक हुई है।"

श्लोक 38 (14.55.38)

यत्तु शक्यं मया कर्तुं भूय एव तवेप्सितम् । तोयेप्सां तव दुर्धर्षां करिष्ये सफलामहम् ॥

yattu śakyaṃ mayā kartuṃ bhūya eva tavepsitam | toyepsāṃ tava durdharṣāṃ kariṣye saphalāmaham

"फिर भी तुम्हारी इच्छा के लिए जो कुछ मैं कर सकता हूँ, वह करूँगा: तुम्हारी अदम्य जल-कामना को मैं सफल करूँगा।"

श्लोक 39 (14.55.39)

येष्वहःसु च ते ब्रह्मन्सलिलेप्सा भविष्यति । तदा मरौ भविष्यन्ति जलपूर्णाः पयोधराः ॥

yeṣvahaḥsu ca te brahmansalilepsā bhaviṣyati | tadā marau bhaviṣyanti jalapūrṇāḥ payodharāḥ

"ब्रह्मन्, जिन-जिन दिनों तुम्हें जल की इच्छा होगी, उन दिनों मरुभूमि में जल से भरे बादल छा जाएँगे।"

श्लोक 40 (14.55.40)

रसवच्च प्रदास्यन्ति तोयं ते भृगुनन्दन । उदङ्कमेघा इत्युक्ताः ख्यातिं यास्यन्ति चापि ते ॥

rasavacca pradāsyanti toyaṃ te bhṛgunandana | udaṅkameghā ityuktāḥ khyātiṃ yāsyanti cāpi te

"भृगुनन्दन, वे तुम्हें मधुर जल देंगे और उदङ्क-मेघ नाम से प्रसिद्ध होंगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 41 (14.55.41)

इत्युक्तः प्रीतिमान्विप्रः कृष्णेन स बभूव ह । अद्याप्युदङ्कमेघाश्च मरौ वर्षन्ति भारत ॥

ityuktaḥ prītimānvipraḥ kṛṣṇena sa babhūva ha | adyāpyudaṅkameghāśca marau varṣanti bhārata

कृष्ण के ऐसा कहने पर वह ब्राह्मण प्रसन्न हो गया; और भारत, आज भी उदङ्क-मेघ मरुभूमि में बरसते हैं।

अध्याय 54अध्याय-सूचीअध्याय 56