आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 54
कृष्ण द्वारा उदङ्क को आत्मतत्त्व का उपदेश
उदङ्क शाप देने से पहले कृष्ण से आत्मतत्त्व का उपदेश माँगते हैं। कृष्ण कहते हैं कि तीनों गुण, देवता, सब प्राणी तथा समस्त कर्म और धर्म उन्हीं के स्वरूप हैं, और धर्म की स्थापना के लिए वे देव, गन्धर्व, नाग, यक्ष, राक्षस और मनुष्यों की योनियों में प्रवेश करते हैं। मनुष्य-रूप में उन्होंने कौरवों से विनती की और उन्हें चेताया, पर उन्होंने नहीं सुना; अधर्म से बँधे वे मारे गए और स्वर्ग गए, और पाण्डवों को यश मिला।
उदङ्क उवाच
श्लोक 1 (14.54.1)
ब्रूहि केशव तत्त्वेन त्वमध्यात्ममनिन्दितम् । श्रुत्वा श्रेयोऽभिधास्यामि शापं वा ते जनार्दन ॥
brūhi keśava tattvena tvamadhyātmamaninditam | śrutvā śreyo'bhidhāsyāmi śāpaṃ vā te janārdana
"हे केशव, मुझे तत्त्व से वह निर्दोष अध्यात्म-उपदेश कहिए। उसे सुनकर मैं या तो आपके लिए जो श्रेयस्कर है वह कहूँगा, या हे जनार्दन, आपको शाप दूँगा।"
वासुदेव उवाच
श्लोक 2 (14.54.2)
तमो रजश्च सत्वं च विद्धि भावान्मदाश्रयान् । स्थितिसृष्टिलयाध्यक्षो विष्णुब्रह्मेशसंज्ञितः ॥
tamo rajaśca satvaṃ ca viddhi bhāvānmadāśrayān | sthitisṛṣṭilayādhyakṣo viṣṇubrahmeśasaṃjñitaḥ
"जान लो कि तमस्, रजस् और सत्त्व मेरे ही आश्रित भाव हैं: स्थिति, सृष्टि और लय का अधिष्ठाता, जो विष्णु, ब्रह्मा और ईश कहलाता है।
श्लोक 3 (14.54.3)
कदाचित्तमसा रुद्रो विष्णुः सत्त्वगुणे स्थितः । रजस्यपि तथा ब्रह्मा स्वगुणान्यगुणानुगौ ॥
kadācittamasā rudro viṣṇuḥ sattvaguṇe sthitaḥ | rajasyapi tathā brahmā svaguṇānyaguṇānugau
कभी रुद्र तमस् में स्थित होते हैं, विष्णु सत्त्वगुण में, और ब्रह्मा रजस् में, प्रत्येक अपने या दूसरे गुण का अनुसरण करता हुआ।
श्लोक 4 (14.54.4)
प्रणवात्मा च शब्दादींस्त्रिगुणात्मा चराचरम् । तथा रुद्रान्वसून्वाऽपि विद्धि मत्प्रभवान्द्विज ॥
praṇavātmā ca śabdādīṃstriguṇātmā carācaram | tathā rudrānvasūnvā'pi viddhi matprabhavāndvija
वह प्रणवस्वरूप है, और त्रिगुणात्मक रूप में शब्द आदि विषय तथा समस्त चराचर है। हे द्विज, रुद्रों और वसुओं को भी मुझसे उत्पन्न जानो।
श्लोक 5 (14.54.5)
मयि सर्वाणि भूतानि सर्वभूतेषु चाप्यहम् । स्थित इत्यभिजानीहि मा ते भूदत्र संशयः ॥
mayi sarvāṇi bhūtāni sarvabhūteṣu cāpyaham | sthita ityabhijānīhi mā te bhūdatra saṃśayaḥ
सब प्राणी मुझ में हैं और मैं सब प्राणियों में स्थित हूँ; यह जानो, इसमें तुम्हें कोई सन्देह न हो।
श्लोक 6 (14.54.6)
तथा दैत्यगणान्सर्वान्यक्षगन्धर्वराक्षसान् । नागानप्सरसश्चैव विद्धि मत्प्रभवान्द्विज ॥
tathā daityagaṇānsarvānyakṣagandharvarākṣasān | nāgānapsarasaścaiva viddhi matprabhavāndvija
इसी प्रकार दैत्यों के सब समूहों, तथा यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, नाग और अप्सराओं को भी, हे द्विज, मुझसे उत्पन्न जानो।
श्लोक 7 (14.54.7)
सदसच्चैव यत्प्राहुरव्यक्तं व्यक्तमेव च । अक्षरं च क्षरं चैव सर्वमेतन्मदात्मकम् ॥
sadasaccaiva yatprāhuravyaktaṃ vyaktameva ca | akṣaraṃ ca kṣaraṃ caiva sarvametanmadātmakam
जिसे सत् और असत् कहते हैं, अव्यक्त और व्यक्त, अक्षर और क्षर, वह सब मेरा ही स्वरूप है।
श्लोक 8 (14.54.8)
ये चाश्रमेषु वै धर्माश्चतुर्षु विहिता मुने । वैदिकानि च कर्माणि विद्धि सर्वं मदात्मकम् ॥
ye cāśrameṣu vai dharmāścaturṣu vihitā mune | vaidikāni ca karmāṇi viddhi sarvaṃ madātmakam
हे मुनि, चारों आश्रमों में जो धर्म विहित हैं और जो वैदिक कर्म हैं, उन सबको मेरा ही स्वरूप जानो।
श्लोक 9 (14.54.9)
असच्च सच्चैव च यद्विश्वं सदसतः परम् । ततः परतरं नास्ति देवदेवात्सनातनात् ॥
asacca saccaiva ca yadviśvaṃ sadasataḥ param | tataḥ parataraṃ nāsti devadevātsanātanāt
जो असत् है और सत् है, और जो विश्व सत् तथा असत् से परे है, उससे परे कुछ नहीं है; सनातन देवों के देव से बढ़कर कुछ नहीं है।
श्लोक 10 (14.54.10)
ओंकारप्रभवान्वेदान्विद्धि मां त्वं भृगूद्वह । यूपं सोमं चरुं होमं त्रिदशाप्यायनं मखे ॥
oṃkāraprabhavānvedānviddhi māṃ tvaṃ bhṛgūdvaha | yūpaṃ somaṃ caruṃ homaṃ tridaśāpyāyanaṃ makhe
हे भृगुवंशी, मुझे ओंकार से उत्पन्न वेद जानो; और यज्ञ में यूप, सोम, चरु, होम और देवताओं को तृप्त करने वाला भाग भी मुझे ही जानो।
श्लोक 11 (14.54.11)
होतारमपि हव्यं च विद्धि मां भृगुनन्दन । अध्वर्युः कल्पकृच्चापि हविः परमसंस्कृतम् ॥
hotāramapi havyaṃ ca viddhi māṃ bhṛgunandana | adhvaryuḥ kalpakṛccāpi haviḥ paramasaṃskṛtam
हे भृगुनन्दन, मुझे होता और हव्य भी जानो; अध्वर्यु और विधि का सम्पादक, तथा भली-भाँति संस्कार किया हुआ हविष्य भी मैं ही हूँ।
श्लोक 12 (14.54.12)
उद्गाता चापि मां स्तौति गीतघोषैर्महाध्वरे । प्रायश्चित्तेषु मां ब्रह्मञ्शान्तिमङ्गलवाचकाः ॥
udgātā cāpi māṃ stauti gītaghoṣairmahādhvare | prāyaścitteṣu māṃ brahmañśāntimaṅgalavācakāḥ
महायज्ञ में उद्गाता भी गीतों के घोष से मेरी स्तुति करता है; और प्रायश्चित्त-कर्मों में, हे ब्राह्मण, शान्ति और मंगल के वचन कहने वाले
श्लोक 13 (14.54.13)
स्तुवन्ति विश्वकर्माणं सततं द्विजसत्तम । मम विद्धि सुतं धर्ममग्रजं द्विजसत्तम ॥
stuvanti viśvakarmāṇaṃ satataṃ dvijasattama | mama viddhi sutaṃ dharmamagrajaṃ dvijasattama
सदा विश्वकर्मा की स्तुति करते हैं, हे द्विजश्रेष्ठ। हे द्विजश्रेष्ठ, मेरे ज्येष्ठ पुत्र धर्म को जानो,
श्लोक 14 (14.54.14)
मानसं दयितं विप्र सर्वभूतदयात्मकम् । तत्राहं वर्तमानैश्च निवृत्तैश्चैव मानवैः ॥
mānasaṃ dayitaṃ vipra sarvabhūtadayātmakam | tatrāhaṃ vartamānaiśca nivṛttaiścaiva mānavaiḥ
जो मन से उत्पन्न, प्रिय और सब प्राणियों के प्रति दया-स्वरूप है। वहाँ मैं उन मनुष्यों में रहता हूँ जो संसार में प्रवृत्त हैं और जो उससे निवृत्त हैं,
श्लोक 15 (14.54.15)
बह्वीः संसरमाणो वै योनीर्वर्तामि सत्तम । लोकसंरक्षणार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ॥
bahvīḥ saṃsaramāṇo vai yonīrvartāmi sattama | lokasaṃrakṣaṇārthāya dharmasaṃsthāpanāya ca
अनेक योनियों में संसरण करता हुआ मैं वहाँ रहता हूँ, हे सत्तम, लोक की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए,
श्लोक 16 (14.54.16)
तैस्तैर्वेषैश्च रूपैश्च त्रिषु लोकेषु भार्गव । अहं विष्णुरहं ब्रह्मा शक्रोऽथ प्रभवाप्ययः ॥
taistairveṣaiśca rūpaiśca triṣu lokeṣu bhārgava | ahaṃ viṣṇurahaṃ brahmā śakro'tha prabhavāpyayaḥ
उन-उन वेशों और रूपों में तीनों लोकों में, हे भार्गव। मैं विष्णु हूँ, मैं ब्रह्मा हूँ, मैं शक्र हूँ, मैं ही उत्पत्ति और प्रलय हूँ,
श्लोक 17 (14.54.17)
भूतग्रामस्य सर्वस्य स्रष्टा संहार एव च । अधर्मे वर्तमानानां सर्वेषामहमच्युतः ॥
bhūtagrāmasya sarvasya sraṣṭā saṃhāra eva ca | adharme vartamānānāṃ sarveṣāmahamacyutaḥ
सब प्राणिसमूह का सृष्टिकर्ता और संहारकर्ता भी मैं ही हूँ। और जो सब अधर्म में रहते हैं, उनके लिए मैं अच्युत
श्लोक 18 (14.54.18)
धर्मस्य सेतुं बध्नामि चलिते चलिते युगे । तास्ता योनीः प्रविश्याहं प्रजानां हितकाम्यया ॥
dharmasya setuṃ badhnāmi calite calite yuge | tāstā yonīḥ praviśyāhaṃ prajānāṃ hitakāmyayā
जब-जब कोई युग डगमगाता है, तब धर्म का सेतु बाँधता हूँ, प्रजाओं के हित की इच्छा से उन-उन योनियों में प्रवेश करके।
श्लोक 19 (14.54.19)
यदा त्वहं देवयोनौ वर्तामि भृगुनन्दन । तदाऽहं देववत्सर्वमाचरामि न संशयः ॥
yadā tvahaṃ devayonau vartāmi bhṛgunandana | tadā'haṃ devavatsarvamācarāmi na saṃśayaḥ
हे भृगुनन्दन, जब मैं देवयोनि में रहता हूँ, तब मैं सब कुछ देवता की भाँति करता हूँ; इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 20 (14.54.20)
यदा गन्धर्वयोनौ तु वर्तामि भृगुनन्दन । तदा गन्धर्ववच्चेष्टा सर्वाश्चेष्टामि भार्गव ॥
yadā gandharvayonau tu vartāmi bhṛgunandana | tadā gandharvavacceṣṭā sarvāśceṣṭāmi bhārgava
हे भृगुनन्दन, जब मैं गन्धर्वयोनि में रहता हूँ, तब हे भार्गव, सब चेष्टाएँ गन्धर्व की भाँति करता हूँ।
श्लोक 21 (14.54.21)
नागयोनौ यदा चैव तदा वर्तामि नागवत् । यक्षराक्षसयोन्योस्तु यथावद्विचराम्यहम् ॥
nāgayonau yadā caiva tadā vartāmi nāgavat | yakṣarākṣasayonyostu yathāvadvicarāmyaham
जब मैं नागयोनि में होता हूँ, तब नाग की भाँति रहता हूँ; और यक्ष तथा राक्षस योनियों में उन्हीं की रीति से विचरता हूँ।
श्लोक 22 (14.54.22)
मानुष्ये वर्तमाने तु कृपणं याचिता मया । न च ते जातसम्मोहा वचोऽगृह्णन्त मोहिताः ॥
mānuṣye vartamāne tu kṛpaṇaṃ yācitā mayā | na ca te jātasammohā vaco'gṛhṇanta mohitāḥ
जब मैं मनुष्य-योनि में था, तब मैंने दीन होकर उनसे याचना की; पर मोह में पड़े हुए वे मोहित लोग मेरे हितकारी वचन को नहीं माने।
श्लोक 23 (14.54.23)
भयं च महदुद्दिश्य त्रासिताः कुरवो मया । क्रुद्धेन भूत्वा तु पुनर्यथावदनुदर्शिताः ॥
bhayaṃ ca mahaduddiśya trāsitāḥ kuravo mayā | kruddhena bhūtvā tu punaryathāvadanudarśitāḥ
बड़े भय का संकेत करके मैंने कौरवों को डराया; और क्रोधित होकर मैंने उन्हें फिर यथार्थ स्थिति दिखाई।
श्लोक 24 (14.54.24)
तेऽधर्मेणेह संयुक्ताः परीताः कालधर्मणा । धर्मेण निहता युद्धे गताः स्वर्गं न संशयः ॥
te'dharmeṇeha saṃyuktāḥ parītāḥ kāladharmaṇā | dharmeṇa nihatā yuddhe gatāḥ svargaṃ na saṃśayaḥ
वे यहाँ अधर्म से युक्त थे और काल के नियम से घिरे हुए थे; धर्म के अनुसार युद्ध में मारे जाकर वे स्वर्ग को गए हैं, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 25 (14.54.25)
लोकेषु पाण्डवाश्चैव गताः ख्यातिं द्विजोत्तम । एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥
lokeṣu pāṇḍavāścaiva gatāḥ khyātiṃ dvijottama | etatte sarvamākhyātaṃ yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi
और हे द्विजोत्तम, पाण्डव लोकों में यश को प्राप्त हुए हैं। आपने मुझसे जो पूछा था, वह सब मैंने आपको बता दिया।"