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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 53

कृष्ण की उदङ्क से भेंट और शाप की धमकी

द्वारका की ओर जाते हुए कृष्ण के मार्ग में शुभ शकुन होते हैं। मरुभूमि में उनकी भेंट मुनि उदङ्क से होती है, जो पूछते हैं कि क्या उन्होंने कौरवों और पाण्डवों में सन्धि करा दी। कृष्ण कहते हैं कि कौरवों ने उनकी, भीष्म और विदुर की सलाह नहीं मानी और इसी से नष्ट हुए। उदङ्क क्रोधित होकर कहते हैं कि कृष्ण ने उन्हें बचाया क्यों नहीं, और शाप देने को उद्यत होते हैं; कृष्ण उनसे पहले अध्यात्म का उपदेश सुनने को कहते हैं और कहते हैं कि वे उदङ्क के कठिनाई से कमाए तप का नाश नहीं चाहते।

अध्याय 52अध्याय-सूचीअध्याय 54

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (14.53.1)

तथा प्रयान्तं वार्ष्णेयं द्वारकां भरतर्षभाः । परिष्वज्य न्यवर्तन्त सानुयात्राः परंतपाः ॥

tathā prayāntaṃ vārṣṇeyaṃ dvārakāṃ bharatarṣabhāḥ | pariṣvajya nyavartanta sānuyātrāḥ paraṃtapāḥ

इस प्रकार वृष्णिवंशी कृष्ण के द्वारका की ओर जाने पर, भरतश्रेष्ठ उन शत्रुसन्तापकों ने उनका आलिंगन किया और अपने अनुचरों सहित लौट आए।

श्लोक 2 (14.53.2)

पुनःपुनश्च वार्ष्णेयं पर्यष्वजत फल्गुनः । आचक्षुर्विषयाच्चैनं स ददर्श पुनःपुनः ॥

punaḥpunaśca vārṣṇeyaṃ paryaṣvajata phalgunaḥ | ācakṣurviṣayāccainaṃ sa dadarśa punaḥpunaḥ

फाल्गुन ने बार-बार वृष्णिवंशी कृष्ण का आलिंगन किया, और जहाँ तक दृष्टि जा सकती थी, वे उन्हें बार-बार देखते रहे।

श्लोक 3 (14.53.3)

कृच्छ्रेणैव तु तां पार्थो गोविन्दे विनिवेशिताम् । संजहार ततो दृष्टिं कृष्णश्चाप्यपराजितः ॥

kṛcchreṇaiva tu tāṃ pārtho govinde viniveśitām | saṃjahāra tato dṛṣṭiṃ kṛṣṇaścāpyaparājitaḥ

गोविन्द में लगी अपनी दृष्टि को पार्थ ने बड़ी कठिनाई से हटाया; और अपराजित कृष्ण ने भी अपनी दृष्टि फेर ली।

श्लोक 4 (14.53.4)

तस्य प्रयाणे यान्यासन्निमित्तानि महात्मनः । बहून्यद्भुतरूपाणि तानि मे गदतः शृणु ॥

tasya prayāṇe yānyāsannimittāni mahātmanaḥ | bahūnyadbhutarūpāṇi tāni me gadataḥ śṛṇu

उन महात्मा के प्रस्थान के समय जो अनेक अद्भुत शकुन हुए, उन्हें मैं कहता हूँ, सुनिए।

श्लोक 5 (14.53.5)

वायुर्वेगेन महता रथस्य पुरतो ववौ । कुर्वन्निःशर्करं मार्गं विरजस्कमकण्टकम् ॥

vāyurvegena mahatā rathasya purato vavau | kurvanniḥśarkaraṃ mārgaṃ virajaskamakaṇṭakam

रथ के आगे बड़े वेग से वायु चली और उसने मार्ग को कंकड़, धूल और काँटों से रहित कर दिया।

श्लोक 6 (14.53.6)

ववर्ष वासवश्चैव तोयं शुचि सुगन्धि च । दिव्यानि चैव पुष्पाणि पुरतः शाङ्गधन्वनः ॥

vavarṣa vāsavaścaiva toyaṃ śuci sugandhi ca | divyāni caiva puṣpāṇi purataḥ śāṅgadhanvanaḥ

इन्द्र ने स्वच्छ और सुगन्धित जल बरसाया, और शार्ङ्गधन्वा कृष्ण के आगे दिव्य पुष्प गिरे।

श्लोक 7 (14.53.7)

स प्रयातो महाबाहुः समेषु मरुधन्वसु । ददर्शाथ मुनिश्रेष्ठमुदङ्कममितौजसम् ॥

sa prayāto mahābāhuḥ sameṣu marudhanvasu | dadarśātha muniśreṣṭhamudaṅkamamitaujasam

वे महाबाहु मरुभूमि के समतल प्रदेशों में आगे बढ़े और तब उन्होंने अपार तेज वाले मुनिश्रेष्ठ उदङ्क को देखा।

श्लोक 8 (14.53.8)

महर्षिं सिद्धतपसं सर्वलोकान्तविश्रुतम् । स तं सम्पूज्य तेजस्वी मुनिं पृथुललोचनः । पूजितस्तेन च तदा पर्यपृच्छदनामयम् ॥

maharṣiṃ siddhatapasaṃ sarvalokāntaviśrutam | sa taṃ sampūjya tejasvī muniṃ pṛthulalocanaḥ | pūjitastena ca tadā paryapṛcchadanāmayam

उन्होंने उन महर्षि को देखा, जो तप से सिद्ध थे और सब लोकों के छोर तक प्रसिद्ध थे। तेजस्वी, विशाल नेत्रों वाले कृष्ण ने उन मुनि का सत्कार किया, उनसे स्वयं भी सत्कृत हुए और उनका कुशल पूछा।

श्लोक 9 (14.53.9)

स पृष्टः कुशलं तेन सम्पूज्य मधुसूदनम् । उदङ्को ब्राह्मणश्रेष्ठस्ततः पप्रच्छ माधवम् ॥

sa pṛṣṭaḥ kuśalaṃ tena sampūjya madhusūdanam | udaṅko brāhmaṇaśreṣṭhastataḥ papraccha mādhavam

कृष्ण से कुशल पूछे जाने पर और मधुसूदन का सत्कार करके, ब्राह्मणश्रेष्ठ उदङ्क ने तब माधव से पूछा।

उदङ्क उवाच

श्लोक 10 (14.53.10)

कच्चिच्छौरे त्वया गत्वा कुरुपाण्डवसद्म तत् । कृतं सौभ्रात्रमचलं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥

kaccicchaure tvayā gatvā kurupāṇḍavasadma tat | kṛtaṃ saubhrātramacalaṃ tanme vyākhyātumarhasi

"हे शौरि, क्या आपने कुरु-पाण्डवों के घर जाकर उनमें अटूट भ्रातृभाव स्थापित किया? कृपया मुझे यह बताइए।

श्लोक 11 (14.53.11)

अपि सन्धाय तान्वीरानुपावृत्तोऽसि केशव । सम्बन्धिनः स्वदयितान्सततं वृष्णिपुङ्गव ॥

api sandhāya tānvīrānupāvṛtto'si keśava | sambandhinaḥ svadayitānsatataṃ vṛṣṇipuṅgava

हे केशव, हे वृष्णिश्रेष्ठ, क्या आप अपने उन प्रिय सम्बन्धी वीरों में मेल कराकर लौटे हैं?

श्लोक 12 (14.53.12)

कच्चित्पाण्डुसुताः पञ्च धृतराष्ट्रस्य चात्मजाः । लोकेषु विहरिष्यन्ति त्वया सह परंतप ॥

kaccitpāṇḍusutāḥ pañca dhṛtarāṣṭrasya cātmajāḥ | lokeṣu vihariṣyanti tvayā saha paraṃtapa

हे परंतप, क्या पाण्डु के पाँचों पुत्र और धृतराष्ट्र के पुत्र आपके साथ संसार में सुखपूर्वक विचरेंगे?

श्लोक 13 (14.53.13)

स्वराष्ट्रे ते च राजानः कच्चित्प्राप्स्यन्ति वै सुखम् । कौरवेषु प्रशान्तेषु त्वया नाथेन केशव ॥

svarāṣṭre te ca rājānaḥ kaccitprāpsyanti vai sukham | kauraveṣu praśānteṣu tvayā nāthena keśava

हे केशव, कौरवों के शान्त हो जाने पर और आपके नाथ रहते, क्या वे राजा अपने-अपने राज्यों में सुख पाएँगे?

श्लोक 14 (14.53.14)

या मे सम्भावना तात त्वयि नित्यमवर्तत । अपि सा सफला तात कृता ते भरतान्प्रति ॥

yā me sambhāvanā tāta tvayi nityamavartata | api sā saphalā tāta kṛtā te bharatānprati

हे तात, आप में मैंने जो आशा सदा रखी थी, क्या भरतवंशियों के प्रति आपके कार्य से वह सफल हुई?"

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 15 (14.53.15)

कृतो यत्नो मया पूर्वं सौशाम्ये कौरवान्प्रति । नाशक्यन्त यदा साम्ये ते स्थापयितुमञ्जसा ॥

kṛto yatno mayā pūrvaṃ sauśāmye kauravānprati | nāśakyanta yadā sāmye te sthāpayitumañjasā

"मैंने पहले कौरवों के साथ सुमेल कराने का प्रयत्न किया था; किन्तु जब वे सरल उपाय से समता पर टिकाए न जा सके,

श्लोक 16 (14.53.16)

न दिष्टमप्यतिक्रान्तुं शक्यं बुद्ध्या बलेन वा । महर्षे विदितं भूयः सर्वमेतत्तवानघ ॥

na diṣṭamapyatikrāntuṃ śakyaṃ buddhyā balena vā | maharṣe viditaṃ bhūyaḥ sarvametattavānagha

तब भाग्य को बुद्धि या बल से लाँघा नहीं जा सकता। हे महर्षि, हे निष्पाप, यह सब आपको ज्ञात ही है।

श्लोक 17 (14.53.17)

तेऽत्यक्रामन्मतिं मह्यं भीष्मस्य विदुरस्य च । ततो यमक्षयं जग्मुः समासाद्येतरेतरम् ॥

te'tyakrāmanmatiṃ mahyaṃ bhīṣmasya vidurasya ca | tato yamakṣayaṃ jagmuḥ samāsādyetaretaram

उन्होंने मेरी, भीष्म की और विदुर की सलाह को लाँघ दिया; इसीलिए वे परस्पर मिलकर यमलोक को चले गए।

श्लोक 18 (14.53.18)

पञ्चैव पाण्डवाः शिष्टा इतमित्रा हतात्मजाः । धार्तराष्ट्राश्च निहताः सर्वे ससुतबान्धवाः ॥

pañcaiva pāṇḍavāḥ śiṣṭā itamitrā hatātmajāḥ | dhārtarāṣṭrāśca nihatāḥ sarve sasutabāndhavāḥ

केवल पाँच पाण्डव बचे हैं, जिनके मित्र और पुत्र मारे जा चुके हैं; और धृतराष्ट्र के पुत्र पुत्रों और बन्धुओं सहित सब मारे गए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 19 (14.53.19)

इत्युक्तवचने कृष्णे भृशं क्रोधसमन्वितः । उदङ्क इत्युवाचैनं रोषादुत्फुल्ललोचनः ॥

ityuktavacane kṛṣṇe bhṛśaṃ krodhasamanvitaḥ | udaṅka ityuvācainaṃ roṣādutphullalocanaḥ

कृष्ण के ऐसा कहने पर उदङ्क बहुत क्रोध से भर गए और रोष से आँखें फैलाकर उनसे बोले।

उदङ्क उवाच

श्लोक 20 (14.53.20)

यस्माच्छक्तेन ते कृष्ण न त्राताः कुरुपुङ्गवाः । सम्बन्धिनः प्रियास्तस्माच्छप्स्येऽहं त्वामसंशयम् ॥

yasmācchaktena te kṛṣṇa na trātāḥ kurupuṅgavāḥ | sambandhinaḥ priyāstasmācchapsye'haṃ tvāmasaṃśayam

"हे कृष्ण, क्योंकि समर्थ होते हुए भी आपने अपने प्रिय सम्बन्धी कुरुश्रेष्ठों की रक्षा नहीं की, इसलिए मैं आपको निश्चय ही शाप दूँगा।

श्लोक 21 (14.53.21)

न च ते प्रसभं यस्मात्ते निगृह्य निवारिताः । तस्मान्मन्युपरीतस्त्वां शप्स्यामि मधुसूदन ॥

na ca te prasabhaṃ yasmātte nigṛhya nivāritāḥ | tasmānmanyuparītastvāṃ śapsyāmi madhusūdana

और क्योंकि आपने बलपूर्वक उन्हें पकड़कर नहीं रोका, इसलिए, हे मधुसूदन, क्रोध से भरकर मैं आपको शाप दूँगा।

श्लोक 22 (14.53.22)

त्वया शक्तेन हि सता मिथ्याचारेण माधव । ते परीताः कुरुश्रेष्ठा नश्यन्तः स्म ह्युपेक्षिताः ॥

tvayā śaktena hi satā mithyācāreṇa mādhava | te parītāḥ kuruśreṣṭhā naśyantaḥ sma hyupekṣitāḥ

हे माधव, आप समर्थ थे, फिर भी आपने कपट का आचरण किया; काल से घिरे वे कुरुश्रेष्ठ नष्ट होते रहे और आपने उनकी उपेक्षा की।"

वासुदेव उवाच

श्लोक 23 (14.53.23)

शृणु मे विस्तरेणेदं यद्वक्ष्ये भृगुनन्दन । गृहाणानुनयं चापि तपस्वी ह्यसि भार्गव ॥

śṛṇu me vistareṇedaṃ yadvakṣye bhṛgunandana | gṛhāṇānunayaṃ cāpi tapasvī hyasi bhārgava

"हे भृगुनन्दन, मैं जो विस्तार से कहूँगा उसे सुनिए और मेरी विनती स्वीकार कीजिए, क्योंकि हे भार्गव, आप तपस्वी हैं।

श्लोक 24 (14.53.24)

श्रुत्वा च मे तदध्यात्मं मुञ्चेथाः शापमद्य वै । न च मां तपसाऽल्पेन शक्तोऽभिभवितुं पुमान् ॥

śrutvā ca me tadadhyātmaṃ muñcethāḥ śāpamadya vai | na ca māṃ tapasā'lpena śakto'bhibhavituṃ pumān

मुझसे उस अध्यात्म-उपदेश को सुनकर आज अपना शाप छोड़ दीजिए। थोड़े तप से कोई पुरुष मुझे नहीं जीत सकता।

श्लोक 25 (14.53.25)

न च ते तपसो नाशमिच्छामि तपतां वर । तपस्ते सुमहद्दीप्तं गुरवश्चापि तोषिताः ॥

na ca te tapaso nāśamicchāmi tapatāṃ vara | tapaste sumahaddīptaṃ guravaścāpi toṣitāḥ

हे तपस्वियों में श्रेष्ठ, मैं आपके तप का नाश नहीं चाहता। आपका तप अत्यन्त प्रदीप्त है और आपके गुरु भी आप से सन्तुष्ट हैं।

श्लोक 26 (14.53.26)

कौमारं ब्रह्मचर्यं ते जानामि द्विजसत्तम । दुःखार्जितस्य तपसस्तस्मान्नेच्छामि ते व्ययम् ॥

kaumāraṃ brahmacaryaṃ te jānāmi dvijasattama | duḥkhārjitasya tapasastasmānnecchāmi te vyayam

हे द्विजश्रेष्ठ, मैं आपके बाल्यकाल से पाले ब्रह्मचर्य को जानता हूँ; इसलिए दुःख से अर्जित आपके तप का व्यर्थ जाना मैं नहीं चाहता।"

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