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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 52

अर्जुन द्वारा कृष्ण की स्तुति; कृष्ण का द्वारका-प्रस्थान

कृष्ण और अर्जुन साथ-साथ हस्तिनापुर के लिए चलते हैं। मार्ग में अर्जुन कृष्ण को विश्व का आत्मा कहकर उनकी स्तुति करते हैं और विजय के लिए उनका आभार मानते हैं। हस्तिनापुर पहुँचकर वे धृतराष्ट्र, गान्धारी, कुन्ती आदि को प्रणाम करते हैं; फिर अर्जुन युधिष्ठिर से कृष्ण को द्वारका जाने देने की प्रार्थना करते हैं। युधिष्ठिर अनुमति देते हैं और अश्वमेध में लौट आने को कहते हैं, और कृष्ण सुभद्रा और सात्यकि के साथ द्वारका के लिए प्रस्थान करते हैं।

अध्याय 51अध्याय-सूचीअध्याय 53

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (14.52.1)

ततोऽभ्यनोदयत्कृष्णो युज्यतामिति दारुकम् । मुहूर्तादिव चाचष्ट युक्तमित्येव दारुकः ॥

tato'bhyanodayatkṛṣṇo yujyatāmiti dārukam | muhūrtādiva cācaṣṭa yuktamityeva dārukaḥ

तब कृष्ण ने दारुक से कहा कि रथ जोता जाए, और दारुक ने थोड़ी ही देर में आकर निवेदन किया कि रथ तैयार है।

श्लोक 2 (14.52.2)

तथैव चानुयात्राणि चोदयामास पाण्डवः । सन्नह्यध्वं प्रयास्यामो नगरं गजसाह्वयम् ॥

tathaiva cānuyātrāṇi codayāmāsa pāṇḍavaḥ | sannahyadhvaṃ prayāsyāmo nagaraṃ gajasāhvayam

पाण्डुपुत्र अर्जुन ने साथ चलने वाले सेवकों को भी प्रेरित किया, "तैयार हो जाओ; हम हस्तिनापुर नगर को चलेंगे।"

श्लोक 3 (14.52.3)

इत्युक्ताः सैनिकास्ते तु सज्जीभूता विशाम्पते । आचख्युः सज्जमित्येवं पार्थायामिततेजसे ॥

ityuktāḥ sainikāste tu sajjībhūtā viśāmpate | ācakhyuḥ sajjamityevaṃ pārthāyāmitatejase

हे राजन्, ऐसा कहे जाने पर सैनिक तैयार हो गए और अपार तेज वाले पार्थ से बोले, "सब तैयार है।"

श्लोक 4 (14.52.4)

ततस्तौ रथमास्थाय प्रयातौ कृष्णपाण्डवौ । विकुर्वाणौ कथाश्चित्राः प्रीयमाणौ विशाम्पते ॥

tatastau rathamāsthāya prayātau kṛṣṇapāṇḍavau | vikurvāṇau kathāścitrāḥ prīyamāṇau viśāmpate

फिर कृष्ण और पाण्डव अर्जुन रथ पर चढ़कर चले; हे राजन्, वे एक-दूसरे को आनन्द देते हुए अनेक विचित्र कथाएँ कहते जा रहे थे।

श्लोक 5 (14.52.5)

रथस्थं तु महातेजा वासुदेवं धनञ्जयः । पुनरेवाब्रवीद्वाक्यमिदं भरतसत्तम ॥

rathasthaṃ tu mahātejā vāsudevaṃ dhanañjayaḥ | punarevābravīdvākyamidaṃ bharatasattama

हे भरतश्रेष्ठ, रथ में बैठे हुए वासुदेव से महातेजस्वी धनञ्जय ने फिर यह बात कही।

अर्जुन उवाच

श्लोक 6 (14.52.6)

त्वत्प्रसादाज्जयः प्राप्तो राज्ञा वृष्णिकुलोद्वह । निहताः शत्रवश्चापि प्राप्तं राज्यमकण्टकम् ॥

tvatprasādājjayaḥ prāpto rājñā vṛṣṇikulodvaha | nihatāḥ śatravaścāpi prāptaṃ rājyamakaṇṭakam

हे वृष्णिकुल के उद्धारक, आपकी कृपा से राजा को विजय मिली है; शत्रु मारे गए हैं और निष्कण्टक राज्य प्राप्त हुआ है।

श्लोक 7 (14.52.7)

नाथवन्तश्च भवता पाण्डवा मधुसूदन । भवन्तं प्लवमासाद्य तीर्णाः स्म कुरुसागरम् । भक्तांस्त्वमाश्रितानस्मान्पालयामुत्र चेह च ॥

nāthavantaśca bhavatā pāṇḍavā madhusūdana | bhavantaṃ plavamāsādya tīrṇāḥ sma kurusāgaram | bhaktāṃstvamāśritānasmānpālayāmutra ceha ca

हे मधुसूदन, आपके रहते पाण्डव सनाथ हैं; आपको नौका बनाकर हम कुरुओं के सागर को पार कर गए हैं। हम आपके भक्त और शरणागत हैं, इस लोक में और परलोक में हमारी रक्षा कीजिए।

श्लोक 8 (14.52.8)

विश्वकर्मन्नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन्विश्वसत्तम । तथा त्वामभिजानामि तथा चाहं भवान्मतः ॥

viśvakarmannamaste'stu viśvātmanviśvasattama | tathā tvāmabhijānāmi tathā cāhaṃ bhavānmataḥ

हे विश्वकर्मा, विश्वात्मा, सब प्राणियों में श्रेष्ठ, आपको नमस्कार है। जैसा मैं आपको जानता हूँ, वैसा ही आप भी मुझे मानते हैं।

श्लोक 9 (14.52.9)

त्वत्तेजःसम्भवो नित्यं हुताशो मधुसूदन । रतिः क्रीडामयी तुभ्यं माया ते रोदसी विभो ॥

tvattejaḥsambhavo nityaṃ hutāśo madhusūdana | ratiḥ krīḍāmayī tubhyaṃ māyā te rodasī vibho

हे मधुसूदन, अग्नि सदा आपके तेज से उत्पन्न होता है; क्रीड़ामयी रति आपकी है; हे विभो, आकाश और पृथ्वी आपकी माया हैं।

श्लोक 10 (14.52.10)

त्वयि सर्वमिदं विश्वं यदिदं स्थाणु जङ्गमम् । त्वं हि सर्वं विकुरुषे भूतग्रामं चतुर्विधम् ॥

tvayi sarvamidaṃ viśvaṃ yadidaṃ sthāṇu jaṅgamam | tvaṃ hi sarvaṃ vikuruṣe bhūtagrāmaṃ caturvidham

यह सारा विश्व, जो स्थावर है और जो जंगम है, आप में ही स्थित है; आप ही चारों प्रकार के प्राणिसमूह को रूपान्तरित करते हैं।

श्लोक 11 (14.52.11)

पृथिवीं चान्तरिक्षं च तथा स्थावरजङ्गमम् । हसितं तेऽमला ज्योत्स्ना ऋतवश्चेन्द्रियाणि ते ॥

pṛthivīṃ cāntarikṣaṃ ca tathā sthāvarajaṅgamam | hasitaṃ te'malā jyotsnā ṛtavaścendriyāṇi te

पृथ्वी और अन्तरिक्ष, तथा जो कुछ स्थावर-जंगम है, सब आप ही हैं; आपकी मुस्कान निर्मल चाँदनी है, और ऋतुएँ तथा इन्द्रियाँ आपकी ही हैं।

श्लोक 12 (14.52.12)

प्राणो वायुः सततगः क्रोधो मृत्युः सनातनः । प्रसादे चापि पद्मा श्रीर्नित्यं त्वयि महामते ॥

prāṇo vāyuḥ satatagaḥ krodho mṛtyuḥ sanātanaḥ | prasāde cāpi padmā śrīrnityaṃ tvayi mahāmate

प्राण, सदा चलने वाली वायु, क्रोध और सनातन मृत्यु आप ही हैं; और हे महामते, आपकी प्रसन्नता में कमलासना श्री सदा आप में निवास करती हैं।

श्लोक 13 (14.52.13)

रतिस्तुष्टिर्धृतिः क्षान्तिर्मतिः कान्तिश्चराचरम् । त्वमेवेह युगान्तेषु निधनं प्रोच्यसेऽनध ॥

ratistuṣṭirdhṛtiḥ kṣāntirmatiḥ kāntiścarācaram | tvameveha yugānteṣu nidhanaṃ procyase'nadha

रति, तुष्टि, धृति, क्षमा, बुद्धि, कान्ति और समस्त चराचर आप ही हैं; और हे निष्पाप, युगों के अन्त में आप ही प्रलय कहलाते हैं।

श्लोक 14 (14.52.14)

सुदीर्घेणापि कालेन न ते शक्या गुणा मया । आत्मा च परमो वक्तुं नमस्ते नलिनेक्षण ॥

sudīrgheṇāpi kālena na te śakyā guṇā mayā | ātmā ca paramo vaktuṃ namaste nalinekṣaṇa

बहुत लम्बे समय में भी मैं आपके गुणों का, और आपके परम आत्मस्वरूप का वर्णन नहीं कर सकता। हे कमलनयन, आपको नमस्कार है।

श्लोक 15 (14.52.15)

विदितो मे सुदुर्धर्ष नारदाद्देवलात्तथा । कृष्णद्वैपायनाच्चेव तथा कुरुपितामहात् ॥

vidito me sudurdharṣa nāradāddevalāttathā | kṛṣṇadvaipāyanācceva tathā kurupitāmahāt

हे दुर्धर्ष, मैंने आपको नारद और देवल से, कृष्ण द्वैपायन से तथा कुरुओं के पितामह भीष्म से जाना है।

श्लोक 16 (14.52.16)

त्वयि सर्वं समासक्तं त्वमेवैको जनेश्वरः । यच्चानुग्रहसंयुक्तमेतदुक्तं त्वयाऽनघ ॥

tvayi sarvaṃ samāsaktaṃ tvamevaiko janeśvaraḥ | yaccānugrahasaṃyuktametaduktaṃ tvayā'nagha

सब कुछ आप पर ही टिका है; आप ही एकमात्र जनों के ईश्वर हैं। और हे निष्पाप, कृपा से भरी जो बातें आपने मुझसे कही हैं,

श्लोक 17 (14.52.17)

एतत्सर्वमहं सम्यगाचरिष्ये जनार्दन । इदं चाद्भुतमत्यन्तं कृतमस्मत्प्रियेप्सया ॥

etatsarvamahaṃ samyagācariṣye janārdana | idaṃ cādbhutamatyantaṃ kṛtamasmatpriyepsayā

वह सब मैं भली-भाँति पूरा करूँगा, हे जनार्दन। और आपने हमारा प्रिय करने की इच्छा से यह अत्यन्त अद्भुत कार्य किया है:

श्लोक 18 (14.52.18)

यत्पापो निहतः सङ्ख्ये कौरव्यो धृतराष्ट्रजः । त्वया दग्धं हि तत्सैन्यं मया विजितमाहवे ॥

yatpāpo nihataḥ saṅkhye kauravyo dhṛtarāṣṭrajaḥ | tvayā dagdhaṃ hi tatsainyaṃ mayā vijitamāhave

कि पापी कौरव, धृतराष्ट्र का पुत्र, युद्ध में मारा गया; क्योंकि उसकी सेना को आपने जलाया और फिर मैंने रण में जीता।

श्लोक 19 (14.52.19)

भवता तत्कृतं कर्म येनावाप्तो जयो मया । दुर्योधनस्य सङ्ग्रामे तव बुद्धिपराक्रमैः ॥

bhavatā tatkṛtaṃ karma yenāvāpto jayo mayā | duryodhanasya saṅgrāme tava buddhiparākramaiḥ

वह कर्म आपने ही किया, जिससे आपकी बुद्धि और पराक्रम के बल पर मुझे युद्ध में दुर्योधन पर विजय मिली।

श्लोक 20 (14.52.20)

कर्णस्य च वधोपायो यथावत्सम्प्रदर्शितः । सैन्धवस्य च पापस्य भूरिश्रवस एव च ॥

karṇasya ca vadhopāyo yathāvatsampradarśitaḥ | saindhavasya ca pāpasya bhūriśravasa eva ca

कर्ण के वध का उपाय आपने ठीक-ठीक दिखाया, और इसी प्रकार पापी सैन्धव तथा भूरिश्रवा के वध का भी।

श्लोक 21 (14.52.21)

तस्मात्त्वमेव सञ्चिन्त्य हितं कुरु यथा तथा । अहं च प्रीयमाणेन त्वया देवकिनन्दन । यदुक्तस्तत्करिष्यामि न हि मेऽत्र विचारणा ॥

tasmāttvameva sañcintya hitaṃ kuru yathā tathā | ahaṃ ca prīyamāṇena tvayā devakinandana | yaduktastatkariṣyāmi na hi me'tra vicāraṇā

इसलिए आप स्वयं सोचकर जैसा उचित हो वैसा हित कीजिए। और हे देवकीनन्दन, आपसे प्रसन्न होकर आप जो कहेंगे, मैं वही करूँगा; इसमें मुझे कोई विचार नहीं है।

श्लोक 22 (14.52.22)

राजानं च समासाद्य धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । चोदयिष्यामि धर्मज्ञ गमनार्थं तवानघ ॥

rājānaṃ ca samāsādya dharmātmānaṃ yudhiṣṭhiram | codayiṣyāmi dharmajña gamanārthaṃ tavānagha

और धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर के पास जाकर, हे धर्मज्ञ, मैं उन्हें आपके जाने के लिए प्रेरित करूँगा, हे निष्पाप।

श्लोक 23 (14.52.23)

आहृतं हि ममैतत्ते द्वारकागमनं प्रभो । अचिरादेव द्रष्टा त्वं मातुलं मे जनार्दन । बलदेवं च दुर्धर्षं तथाऽन्यान्वृष्णिपुङ्गवान् ॥

āhṛtaṃ hi mamaitatte dvārakāgamanaṃ prabho | acirādeva draṣṭā tvaṃ mātulaṃ me janārdana | baladevaṃ ca durdharṣaṃ tathā'nyānvṛṣṇipuṅgavān

हे प्रभु, द्वारका को आपका यह जाना मुझे स्वीकार है। हे जनार्दन, शीघ्र ही आप मेरे मामा को, दुर्धर्ष बलदेव को और अन्य वृष्णिश्रेष्ठों को देखेंगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 24 (14.52.24)

एवं सम्भाषमाणौ तौ प्राप्तौ वारणसाह्वयम् । तथा विविशतुश्चोभौ सम्प्रहृष्टनराकुलम् ॥

evaṃ sambhāṣamāṇau tau prāptau vāraṇasāhvayam | tathā viviśatuścobhau samprahṛṣṭanarākulam

इस प्रकार बातें करते हुए वे दोनों वारणसाह्वय (हस्तिनापुर) पहुँचे और हर्ष से भरे लोगों से भरे उस नगर में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 25 (14.52.25)

तौ गत्वा धृतराष्ट्रस्य गृहं शक्रगृहोपमम् । ददृशाते महाराज धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ॥

tau gatvā dhṛtarāṣṭrasya gṛhaṃ śakragṛhopamam | dadṛśāte mahārāja dhṛtarāṣṭraṃ janeśvaram

वे दोनों इन्द्र के भवन के समान धृतराष्ट्र के घर गए और हे महाराज, वहाँ उन्होंने नरेश धृतराष्ट्र को देखा,

श्लोक 26 (14.52.26)

विदुरं च महाबुद्धिं राजानं च युधिष्ठिरम् । भीमसेनं च दुर्धर्षं माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥

viduraṃ ca mahābuddhiṃ rājānaṃ ca yudhiṣṭhiram | bhīmasenaṃ ca durdharṣaṃ mādrīputrau ca pāṇḍavau

और महाबुद्धिमान् विदुर को, राजा युधिष्ठिर को, दुर्धर्ष भीमसेन को और माद्री के दोनों पुत्र पाण्डवों को,

श्लोक 27 (14.52.27)

धृतराष्ट्रमुपासीनं युयुत्सुं चापराजितम् । गान्धारीं च महाप्रज्ञां पृथां कृष्णां च भामिनीम् ॥

dhṛtarāṣṭramupāsīnaṃ yuyutsuṃ cāparājitam | gāndhārīṃ ca mahāprajñāṃ pṛthāṃ kṛṣṇāṃ ca bhāminīm

और धृतराष्ट्र के पास बैठे अपराजित युयुत्सु को; तथा महाप्रज्ञा गान्धारी, पृथा और सुन्दरी कृष्णा (द्रौपदी) को;

श्लोक 28 (14.52.28)

सुभद्राद्याश्च ताः सर्वा भरतानां स्त्रियस्तथा । ददृशाते स्त्रियः सर्वा गान्धारीपरिचारिकाः ॥

subhadrādyāśca tāḥ sarvā bharatānāṃ striyastathā | dadṛśāte striyaḥ sarvā gāndhārīparicārikāḥ

और सुभद्रा आदि भरतवंश की सब स्त्रियों को; उन्होंने गान्धारी की सब परिचारिकाओं को भी देखा।

श्लोक 29 (14.52.29)

ततः समेत्य राजानं धृतराष्ट्रमरिंदमौ । निवेद्य नामधेये स्वे तस्य पादावगृह्णताम् ॥

tataḥ sametya rājānaṃ dhṛtarāṣṭramariṃdamau | nivedya nāmadheye sve tasya pādāvagṛhṇatām

फिर राजा धृतराष्ट्र के पास पहुँचकर उन दोनों शत्रुदमनों ने अपने नाम बताए और उनके चरण पकड़े।

श्लोक 30 (14.52.30)

गान्धार्याश्च पृथायाश्च धर्मराजस्य चैव हि । भीमस्य च महात्मानौ तथा पादावगृह्णताम् ॥

gāndhāryāśca pṛthāyāśca dharmarājasya caiva hi | bhīmasya ca mahātmānau tathā pādāvagṛhṇatām

इसी प्रकार उन दोनों महात्माओं ने गान्धारी, पृथा, धर्मराज और भीम के भी चरण छुए।

श्लोक 31 (14.52.31)

क्षत्तारं चापि सङ्गृह्य पृष्ट्वा कुशलमव्ययम् । परिष्वज्य महात्मानं वेश्यापुत्रं महारथम् । तैः सार्धं नृपतिं वृद्धं ततस्तौ पर्युपासताम् ॥

kṣattāraṃ cāpi saṅgṛhya pṛṣṭvā kuśalamavyayam | pariṣvajya mahātmānaṃ veśyāputraṃ mahāratham | taiḥ sārdhaṃ nṛpatiṃ vṛddhaṃ tatastau paryupāsatām

फिर मन्त्री विदुर को गले लगाकर उनकी अक्षय कुशल पूछी, और उस महात्मा, महारथी, वैश्यापुत्र का आलिंगन करके वे दोनों उन सबके साथ वृद्ध राजा की सेवा में बैठे।

श्लोक 32 (14.52.32)

ततो निशि महाराजो धृतराष्ट्रः कुरूद्वहान् । जनार्दनं च मेधावी व्यसर्जयत वै गृहान् ॥

tato niśi mahārājo dhṛtarāṣṭraḥ kurūdvahān | janārdanaṃ ca medhāvī vyasarjayata vai gṛhān

फिर रात्रि में बुद्धिमान् महाराज धृतराष्ट्र ने कुरुश्रेष्ठों को और जनार्दन को भी उनके घरों को विदा किया।

श्लोक 33 (14.52.33)

तेऽनुज्ञाता नृपतिना ययुः स्वं स्वं निवेशनम् । धनंजयगृहानेव ययौ कृष्णस्तु वीर्यवान् ॥

te'nujñātā nṛpatinā yayuḥ svaṃ svaṃ niveśanam | dhanaṃjayagṛhāneva yayau kṛṣṇastu vīryavān

राजा की आज्ञा पाकर वे सब अपने-अपने निवास को गए; पर पराक्रमी कृष्ण धनञ्जय के घर ही गए।

श्लोक 34 (14.52.34)

तत्रार्चितो यथान्यायं सर्वकामैरुपस्थितः । कृष्णः सुष्वाप मेधावी धनंजयसहायवान् ॥

tatrārcito yathānyāyaṃ sarvakāmairupasthitaḥ | kṛṣṇaḥ suṣvāpa medhāvī dhanaṃjayasahāyavān

वहाँ यथोचित सत्कार पाकर और सब इच्छित वस्तुएँ पाकर बुद्धिमान् कृष्ण धनञ्जय को साथ लेकर सोए।

श्लोक 35 (14.52.35)

प्रभातायां तु शर्वर्यां कृत्वा पौर्वाह्णिकीं क्रियाम् । धर्मराजस्य भवनं जग्मतुः परमार्चितौ । यत्रास्ते स सहामात्यो धर्मराजो महाबलः ॥

prabhātāyāṃ tu śarvaryāṃ kṛtvā paurvāhṇikīṃ kriyām | dharmarājasya bhavanaṃ jagmatuḥ paramārcitau | yatrāste sa sahāmātyo dharmarājo mahābalaḥ

रात बीतकर प्रभात होने पर प्रातःकाल की क्रिया करके वे दोनों, अत्यन्त सम्मानित होकर, धर्मराज के भवन को गए, जहाँ महाबली धर्मराज अपने मन्त्रियों सहित बैठे थे।

श्लोक 36 (14.52.36)

तौ प्रविश्य महात्मानौ तद्गृहं परमार्चितम् । धर्मराजं ददृशतुर्देवराजमिवाश्विनौ ॥

tau praviśya mahātmānau tadgṛhaṃ paramārcitam | dharmarājaṃ dadṛśaturdevarājamivāśvinau

उस अत्यन्त सम्मानित भवन में प्रवेश करके उन दोनों महात्माओं ने धर्मराज को वैसे ही देखा जैसे दोनों अश्विनीकुमार देवराज इन्द्र को देखते हैं।

श्लोक 37 (14.52.37)

समासाद्य तु राजानं वार्ष्णेयकुरुपुङ्गवौ । निषीदतुरनुज्ञातौ प्रीयमाणेन तेन तौ ॥

samāsādya tu rājānaṃ vārṣṇeyakurupuṅgavau | niṣīdaturanujñātau prīyamāṇena tena tau

राजा के पास पहुँचकर वृष्णिवंशी कृष्ण और कुरुश्रेष्ठ अर्जुन, प्रसन्न राजा की आज्ञा से बैठ गए।

श्लोक 38 (14.52.38)

ततः स राजा मेधावी विवक्षू प्रेक्ष्य तावुभौ । प्रोवाच वदतां श्रेष्ठो वचनं राजसत्तमः ॥

tataḥ sa rājā medhāvī vivakṣū prekṣya tāvubhau | provāca vadatāṃ śreṣṭho vacanaṃ rājasattamaḥ

तब वक्ताओं में श्रेष्ठ, बुद्धिमान् राजश्रेष्ठ युधिष्ठिर ने उन दोनों को कुछ कहने का इच्छुक देखकर कहा:

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 39 (14.52.39)

विवक्षू हि युवां मन्ये वीरौ यदुकुरूद्वहौ । ब्रूतं कर्तास्मि सर्वं वां नचिरान्मा विचार्यताम् ॥

vivakṣū hi yuvāṃ manye vīrau yadukurūdvahau | brūtaṃ kartāsmi sarvaṃ vāṃ nacirānmā vicāryatām

"हे यदुकुल और कुरुकुल के वीरो, मुझे लगता है कि तुम दोनों कुछ कहना चाहते हो। कहो, मैं तुम्हारा सब कुछ करूँगा; देर मत करो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 40 (14.52.40)

इत्युक्तः फल्गुनस्तत्र धर्मराजानमब्रवीत् । विनीतवदुपागम्य वाक्यं वाक्यविशारदः ॥

ityuktaḥ phalgunastatra dharmarājānamabravīt | vinītavadupāgamya vākyaṃ vākyaviśāradaḥ

ऐसा कहे जाने पर वाक्यकुशल फाल्गुन ने विनीत की भाँति धर्मराज के पास जाकर कहा:

अर्जुन उवाच

श्लोक 41 (14.52.41)

अयं चिरोषितो राजन्वासुदेवः प्रतापवान् । भवन्तं समनुज्ञाप्य पितरं द्रष्टुमिच्छति ॥

ayaṃ ciroṣito rājanvāsudevaḥ pratāpavān | bhavantaṃ samanujñāpya pitaraṃ draṣṭumicchati

"हे राजन्, ये प्रतापी वासुदेव बहुत समय से यहाँ ठहरे हैं। अब वे आपकी अनुमति लेकर अपने पिता को देखना चाहते हैं।

श्लोक 42 (14.52.42)

स गच्छेदभ्यनुज्ञातो भवता यदि मन्यसे । आनर्तनगरीं वीरस्तदनुज्ञातुमर्हसि ॥

sa gacchedabhyanujñāto bhavatā yadi manyase | ānartanagarīṃ vīrastadanujñātumarhasi

यदि आप उचित समझें तो आपकी अनुमति पाकर ये जाएँ; इन वीर को आनर्त नगरी जाने की अनुमति देना आपको उचित है।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 43 (14.52.43)

पुण्डरीकाक्ष भद्रं ते गच्छ त्वं मधुसूदन । पुरीं द्वारवतीमद्य द्रष्टुं शूरसुतं प्रभो ॥

puṇḍarīkākṣa bhadraṃ te gaccha tvaṃ madhusūdana | purīṃ dvāravatīmadya draṣṭuṃ śūrasutaṃ prabho

"हे कमलनयन, तुम्हारा कल्याण हो। हे मधुसूदन, आज ही द्वारावती नगरी जाओ और शूरपुत्र (अपने पिता) को देखो, हे प्रभो।

श्लोक 44 (14.52.44)

रोचते मे महाबाहो गमनं तव केशव । मातुलश्चिरदृष्टो मे त्वया देवी च देवकी ॥

rocate me mahābāho gamanaṃ tava keśava | mātulaściradṛṣṭo me tvayā devī ca devakī

हे महाबाहु केशव, तुम्हारा जाना मुझे अच्छा लगता है। तुमने मेरे मामा को और देवी देवकी को बहुत समय से नहीं देखा है।

श्लोक 45 (14.52.45)

समेत्य मातुलं गत्वा बलदेवं च मानद । पूजयेथा महाप्राज्ञ मद्वाक्येन यथाऽर्हतः ॥

sametya mātulaṃ gatvā baladevaṃ ca mānada | pūjayethā mahāprājña madvākyena yathā'rhataḥ

मेरे मामा और बलदेव से मिलकर, हे मानद, हे महाप्राज्ञ, मेरी ओर से यथायोग्य उनकी पूजा करना।

श्लोक 46 (14.52.46)

स्मरेथाश्चापि मां नित्यं भीमं च बलिनां वरम् । फाल्गुनं सहदेवं च नकुलं चैव मानद ॥

smarethāścāpi māṃ nityaṃ bhīmaṃ ca balināṃ varam | phālgunaṃ sahadevaṃ ca nakulaṃ caiva mānada

और मुझे सदा याद रखना, तथा बलवानों में श्रेष्ठ भीम, फाल्गुन, सहदेव और नकुल को भी, हे मानद।

श्लोक 47 (14.52.47)

आनर्तानवलोक्य त्वं पितरं च महाभुजः । वृष्णींश्च पुनरागच्छेर्हयमेधे ममानघ ॥

ānartānavalokya tvaṃ pitaraṃ ca mahābhujaḥ | vṛṣṇīṃśca punarāgaccherhayamedhe mamānagha

आनर्त देश को और अपने पिता को देखकर, हे महाबाहु, और वृष्णियों से मिलकर, हे निष्पाप, मेरे अश्वमेध में फिर आना।

श्लोक 48 (14.52.48)

स गच्छ रत्नान्यादाय विविधानि वसूनि च । यच्चाप्यन्यन्मनोज्ञं ते तदप्यादत्स्व सात्वत ॥

sa gaccha ratnānyādāya vividhāni vasūni ca | yaccāpyanyanmanojñaṃ te tadapyādatsva sātvata

तुम अनेक प्रकार के रत्न और धन लेकर जाओ, और जो कुछ और तुम्हें प्रिय लगे, हे सात्वत, वह भी ले लो।

श्लोक 49 (14.52.49)

इयं च वसुधा कृत्स्ना प्रसादात्तव केशव । अस्मानुपागता वीर निहताश्चापि शत्रवः ॥

iyaṃ ca vasudhā kṛtsnā prasādāttava keśava | asmānupāgatā vīra nihatāścāpi śatravaḥ

हे केशव, यह सारी पृथ्वी तुम्हारी कृपा से हमें प्राप्त हुई है, और हे वीर, शत्रु भी मारे गए हैं।

श्लोक 50 (14.52.50)

स्वर्गापवर्गविषयं त्वद्भक्तानां न दुर्लभम् । संसारगहने चेद्धपापाग्निप्रशमाम्बुद ॥

svargāpavargaviṣayaṃ tvadbhaktānāṃ na durlabham | saṃsāragahane ceddhapāpāgnipraśamāmbuda

तुम्हारे भक्तों के लिए स्वर्ग और मोक्ष दुर्लभ नहीं हैं; और संसाररूपी गहन वन में, हे प्रज्वलित पाप की अग्नि को शान्त करने वाले मेघ!

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 51 (14.52.51)

एवं ब्रुवति कौरव्ये धर्मराजे युधिष्ठिरे । वासुदेवो वरः पुंसामिदं वचनमब्रवीत् ॥

evaṃ bruvati kauravye dharmarāje yudhiṣṭhire | vāsudevo varaḥ puṃsāmidaṃ vacanamabravīt

कुरुवंशी धर्मराज युधिष्ठिर के इस प्रकार कहने पर पुरुषश्रेष्ठ वासुदेव ने यह वचन कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 52 (14.52.52)

तवैव रत्नानि धनं च केवलं । धरा तु कृत्स्ना तु महाभुजाद्य वै । यदस्ति चान्यद्द्रविणं गृहे मम । त्वमेव तस्येश्वर नित्यमीश्वरः ॥

tavaiva ratnāni dhanaṃ ca kevalaṃ | dharā tu kṛtsnā tu mahābhujādya vai | yadasti cānyaddraviṇaṃ gṛhe mama | tvameva tasyeśvara nityamīśvaraḥ

"रत्न और धन केवल तुम्हारे ही हैं, और हे महाबाहु, आज सारी पृथ्वी भी तुम्हारी है; और मेरे घर में जो अन्य धन है, उसके भी तुम्हीं स्वामी हो, सदा के स्वामी।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 53 (14.52.53)

तथेत्यथोक्तः प्रतिपूजितस्तदा । गदाग्रजो धर्मसुतेन वीर्यवान् । पितृष्वसारं त्ववदद्यथाविधि । सम्पूजितश्चाप्यगमत्प्रदक्षिणम् ॥

tathetyathoktaḥ pratipūjitastadā | gadāgrajo dharmasutena vīryavān | pitṛṣvasāraṃ tvavadadyathāvidhi | sampūjitaścāpyagamatpradakṣiṇam

"ऐसा ही हो" कहकर, धर्मपुत्र से बदले में सम्मानित होकर, गद के अग्रज पराक्रमी कृष्ण ने विधिपूर्वक अपनी बुआ को प्रणाम किया, और उनसे पूजित होकर प्रदक्षिणा की।

श्लोक 54 (14.52.54)

तया स सम्यक् प्रतिनन्दितस्तत- । स्तथैव सर्वैर्विदुरादिभिस्तथा । विनिर्ययौ नागपुराद्गदाग्रजो । रथेन दिव्येन चतुर्भुजः स्वयम् ॥

tayā sa samyak pratinanditastata- | stathaiva sarvairvidurādibhistathā | viniryayau nāgapurādgadāgrajo | rathena divyena caturbhujaḥ svayam

उनसे और विदुर आदि सब से भली-भाँति आशीर्वाद पाकर गद के अग्रज, साक्षात् चतुर्भुज, दिव्य रथ में बैठकर नागपुर (हस्तिनापुर) से चले।

श्लोक 55 (14.52.55)

रथे सुभद्रामधिरोप्य भामिनीं । युधिष्ठिरस्यानुमते जनार्दनः । पितृष्वसुश्चापि तथा महाभुजो । विनिर्ययौ पौरजनाभिसंवृतः ॥

rathe subhadrāmadhiropya bhāminīṃ | yudhiṣṭhirasyānumate janārdanaḥ | pitṛṣvasuścāpi tathā mahābhujo | viniryayau paurajanābhisaṃvṛtaḥ

युधिष्ठिर की और बुआ की भी अनुमति से, सुन्दरी सुभद्रा को रथ पर बैठाकर, महाबाहु जनार्दन नगरवासियों से घिरे हुए निकले।

श्लोक 56 (14.52.56)

तमन्वयाद्वानरवर्यकेतनः । ससात्यकिर्माद्रवतीसुतावपि । अगाधबुद्धिर्विदुरश्च माधवं । स्वयं च भीमो गजराजविक्रमः ॥

tamanvayādvānaravaryaketanaḥ | sasātyakirmādravatīsutāvapi | agādhabuddhirviduraśca mādhavaṃ | svayaṃ ca bhīmo gajarājavikramaḥ

वानरश्रेष्ठ की ध्वजा वाले अर्जुन उनके पीछे चले, सात्यकि और माद्री के दोनों पुत्र भी; अथाह बुद्धि वाले विदुर और गजराज की चाल वाले भीम भी स्वयं माधव के पीछे गए।

श्लोक 57 (14.52.57)

निवर्तयित्वा कुरुराष्ट्रवर्धनां- । स्ततः स सर्वान्विदुरं च वीर्यवान् । जनार्दनो दारुकमाह सत्वरः । प्रचोदयाश्वानिति सात्यकिं तथा ॥

nivartayitvā kururāṣṭravardhanāṃ- | stataḥ sa sarvānviduraṃ ca vīryavān | janārdano dārukamāha satvaraḥ | pracodayāśvāniti sātyakiṃ tathā

कुरुराष्ट्र को बढ़ाने वाले उन सब को और विदुर को लौटाकर पराक्रमी जनार्दन ने शीघ्रता से दारुक से, और सात्यकि से भी, कहा, "घोड़ों को हाँको।"

श्लोक 58 (14.52.58)

ततो ययौ शत्रुगणप्रमर्दनः । शिनिप्रवीरानुगतो जनार्दनः । यथा निहत्यारिगणं शतकतु- । र्दिवं तथाऽऽनर्तपुरीं प्रतापवान् ॥

tato yayau śatrugaṇapramardanaḥ | śinipravīrānugato janārdanaḥ | yathā nihatyārigaṇaṃ śatakatu- | rdivaṃ tathā''nartapurīṃ pratāpavān

फिर शत्रुसमूहों का मर्दन करने वाले, शिनिवंश के वीर सात्यकि के साथ चलते हुए प्रतापी जनार्दन आनर्तपुरी को उसी प्रकार चले, जैसे शत्रुगणों को मारकर शतक्रतु इन्द्र स्वर्ग को जाते हैं।

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