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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 51

गुरु और शिष्य का संवाद: कृष्ण पिता से मिलने की इच्छा करते हैं

ब्रह्मा ऋषियों को अपना उपदेश पूरा करते हैं: मन इन्द्रियों के रथ को चलाता है, सब प्राणी भूतों से उत्पन्न होकर उन्हीं में लीन होते हैं, तप और ध्यान अव्यक्त तक पहुँचाते हैं, और पुरुष ज्ञान से जाना जाता है, कर्म से नहीं। कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि गुरु वे स्वयं थे और शिष्य मन था, उसे आचरण में उतारने का आग्रह करते हैं और अपने पिता को देखने की इच्छा बताते हैं। अर्जुन सहमत होकर हस्तिनापुर चलने और पहले युधिष्ठिर से अनुमति लेने का प्रस्ताव रखते हैं।

अध्याय 50अध्याय-सूचीअध्याय 52

ब्रह्मोवाच

श्लोक 1 (14.51.1)

भूतानामथ पञ्चानामथैषामीश्वरं मनः । नियमे च विसर्गे च भूतानां मन एव च ॥

bhūtānāmatha pañcānāmathaiṣāmīśvaraṃ manaḥ | niyame ca visarge ca bhūtānāṃ mana eva ca

मन इन पाँच भूतों का स्वामी है; भूतों को नियन्त्रित करने में और उन्हें छोड़ने में भी मन ही प्रधान है।

श्लोक 2 (14.51.2)

अधिष्ठातृमनो नित्यं भूतानां महतां तथा । बुद्धिरैश्वर्यमाचष्टे क्षेत्रज्ञश्च स उच्यते ॥

adhiṣṭhātṛmano nityaṃ bhūtānāṃ mahatāṃ tathā | buddhiraiśvaryamācaṣṭe kṣetrajñaśca sa ucyate

मन सदा महाभूतों का अधिष्ठाता है। बुद्धि ऐश्वर्य को प्रकट करती है, और उसे भी क्षेत्रज्ञ कहा जाता है।

श्लोक 3 (14.51.3)

इन्द्रियाणि मनो युङ्क्ते सदश्वानिव सारथिः । इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः क्षेत्रज्ञे युज्यते सदा ॥

indriyāṇi mano yuṅkte sadaśvāniva sārathiḥ | indriyāṇi mano buddhiḥ kṣetrajñe yujyate sadā

जैसे सारथि उत्तम घोड़ों को जोतता है, वैसे ही मन इन्द्रियों को जोतता है। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि सदा क्षेत्रज्ञ में जुड़े रहते हैं।

श्लोक 4 (14.51.4)

महदश्वसमायुक्तं बुद्धिसंयमनं रथम् । समारुह्य स भूतात्मा समन्तात्परिधावति ॥

mahadaśvasamāyuktaṃ buddhisaṃyamanaṃ ratham | samāruhya sa bhūtātmā samantātparidhāvati

महान् अश्वों से जुते और बुद्धि की लगाम वाले उस रथ पर चढ़कर प्राणियों का आत्मा चारों ओर दौड़ता है।

श्लोक 5 (14.51.5)

इन्द्रियग्रामसंयुक्तो मनःसारथिरेव च । बुद्धिसंयमनो नित्यं महान्ब्रह्ममयो रथः ॥

indriyagrāmasaṃyukto manaḥsārathireva ca | buddhisaṃyamano nityaṃ mahānbrahmamayo rathaḥ

इन्द्रियों के समूह से युक्त, मन को सारथि बनाए और बुद्धि को सदा संयम की लगाम बनाए हुए यह महान् रथ ब्रह्ममय है।

श्लोक 6 (14.51.6)

एवं यो वेत्ति विद्वान्वै सदा ब्रह्ममयं रथम् । स धीरः सर्वलोकेषु न मोहमधिगच्छति ॥

evaṃ yo vetti vidvānvai sadā brahmamayaṃ ratham | sa dhīraḥ sarvalokeṣu na mohamadhigacchati

जो विद्वान् इस ब्रह्ममय रथ को इस प्रकार जानता है, वह धीर पुरुष सब लोकों में कभी मोह को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 7 (14.51.7)

अव्यक्तादिविशेषान्तं सहस्थावरजङ्गमम् । सूर्यचन्द्रप्रभालोकं ग्रहनक्षत्रमण्डितम् ॥

avyaktādiviśeṣāntaṃ sahasthāvarajaṅgamam | sūryacandraprabhālokaṃ grahanakṣatramaṇḍitam

अव्यक्त से लेकर विशेष पदार्थों तक, स्थावर और जंगम सहित, सूर्य और चन्द्रमा की प्रभा से प्रकाशित, ग्रहों और नक्षत्रों से सुशोभित,

श्लोक 8 (14.51.8)

नदीपर्वतजालैश्च सर्वतः परिभूषितम् । विविधाभिस्तथा चाद्भिः सततं समलंकृतम् ॥

nadīparvatajālaiśca sarvataḥ paribhūṣitam | vividhābhistathā cādbhiḥ satataṃ samalaṃkṛtam

सब ओर नदियों और पर्वतों के जाल से अलंकृत, और अनेक प्रकार के जलों से सदा सुसज्जित,

श्लोक 9 (14.51.9)

अजितं सर्वभूतानां सर्वप्राणभृतां गतिः । एतद्ब्रह्मवनं नित्यं तस्मिंश्चरति क्षेत्रवित् ॥

ajitaṃ sarvabhūtānāṃ sarvaprāṇabhṛtāṃ gatiḥ | etadbrahmavanaṃ nityaṃ tasmiṃścarati kṣetravit

सब प्राणियों से अजेय और सब प्राणधारियों की गति: यही ब्रह्म का नित्य वन है, जिसमें क्षेत्रज्ञ विचरता है।

श्लोक 10 (14.51.10)

लोकेऽस्मिन्यानि सत्वानि त्रसानि स्थावराणि च । तान्येवाग्रे प्रलीयन्ते पश्चाद्भूतकृता गुणाः । गुणेभ्यः पञ्च भूतानि एष भूतसमुच्छ्रयः ॥

loke'sminyāni satvāni trasāni sthāvarāṇi ca | tānyevāgre pralīyante paścādbhūtakṛtā guṇāḥ | guṇebhyaḥ pañca bhūtāni eṣa bhūtasamucchrayaḥ

इस लोक में जो भी चर और अचर प्राणी हैं, वे पहले लीन होते हैं; उसके बाद भूतों से बने गुण लीन होते हैं; गुणों से पाँच भूत बनते हैं। यही प्राणियों का समुच्चय है।

श्लोक 11 (14.51.11)

देवा मनुष्या गन्धर्वाः पिशाचासुरराक्षसाः । सर्वे स्वभावतः सृष्टा न क्रियाभ्यो न कारणात् ॥

devā manuṣyā gandharvāḥ piśācāsurarākṣasāḥ | sarve svabhāvataḥ sṛṣṭā na kriyābhyo na kāraṇāt

देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पिशाच, असुर और राक्षस, ये सब अपने स्वभाव से रचे गए हैं, न कर्मों से और न किसी कारण से।

श्लोक 12 (14.51.12)

एते विश्वसृजो विप्रा जायन्तीह पुनः पुनः । तेभ्यः प्रसूतास्तेष्वेव महाभूतेषु पञ्चसु । प्रलीयन्ते यथाकालमूर्मयः सागरे यथा ॥

ete viśvasṛjo viprā jāyantīha punaḥ punaḥ | tebhyaḥ prasūtāsteṣveva mahābhūteṣu pañcasu | pralīyante yathākālamūrmayaḥ sāgare yathā

हे ब्राह्मणो, ये विश्व के रचयिता यहाँ बार-बार जन्म लेते हैं। उनसे उत्पन्न हुए प्राणी समय आने पर उन्हीं पाँच महाभूतों में लीन हो जाते हैं, जैसे समुद्र में लहरें।

श्लोक 13 (14.51.13)

विश्वसृग्भ्यस्तु भूतेभ्यो महाभूतास्तु सर्वशः । भूतेभ्यश्चापि पञ्चभ्यो मुक्तो गच्छेत्परां गतिम् ॥

viśvasṛgbhyastu bhūtebhyo mahābhūtāstu sarvaśaḥ | bhūtebhyaścāpi pañcabhyo mukto gacchetparāṃ gatim

विश्व के रचयिताओं से भूत उत्पन्न होते हैं और भूतों से सब प्रकार के महाभूत; और पाँचों भूतों से मुक्त हुआ मनुष्य परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 14 (14.51.14)

प्रजापतिरिदं सर्वं मनसैवासृजत्प्रभुः । तथैव देवानृषयस्तपसा प्रतिपेदिरे ॥

prajāpatiridaṃ sarvaṃ manasaivāsṛjatprabhuḥ | tathaiva devānṛṣayastapasā pratipedire

प्रभु प्रजापति ने यह सब मन से ही रचा; उसी प्रकार ऋषियों ने तप से देवताओं को प्राप्त किया।

श्लोक 15 (14.51.15)

तपसश्चानुपूर्व्येण फलमूलाशिनस्तथा । त्रैलोक्यं तपसा सिद्धाः पश्यन्तीह समाहिताः ॥

tapasaścānupūrvyeṇa phalamūlāśinastathā | trailokyaṃ tapasā siddhāḥ paśyantīha samāhitāḥ

और तप के क्रम से, फल-मूल खाने वाले सिद्ध पुरुष एकाग्र होकर तप के बल से यहाँ तीनों लोकों को देखते हैं।

श्लोक 16 (14.51.16)

औषधान्यगदादीनि नानाविद्याश्च सर्वशः । तपसैव प्रसिद्ध्यन्ति तपोमूलं हि साधनम् ॥

auṣadhānyagadādīni nānāvidyāśca sarvaśaḥ | tapasaiva prasiddhyanti tapomūlaṃ hi sādhanam

औषधियाँ, दवाएँ और अन्य सब प्रकार की विद्याएँ तप से ही सिद्ध होती हैं; क्योंकि तप ही मूल है और तप ही साधन है।

श्लोक 17 (14.51.17)

यद्दुरापं दुराम्नायं दुराधर्षं दुरन्वयम् । तत्सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥

yaddurāpaṃ durāmnāyaṃ durādharṣaṃ duranvayam | tatsarvaṃ tapasā sādhyaṃ tapo hi duratikramam

जो दुर्लभ है, जिसे पाना या सीखना कठिन है, जिसे जीतना कठिन है और जिसका अनुसरण कठिन है, वह सब तप से सिद्ध हो सकता है; क्योंकि तप को लाँघना कठिन है।

श्लोक 18 (14.51.18)

सुरापो ब्रह्महा स्तेनो भ्रूणहागुरुतल्पगः । तपसैव सुतप्तेन मुच्यते किल्बिषात्ततः ॥

surāpo brahmahā steno bhrūṇahāgurutalpagaḥ | tapasaiva sutaptena mucyate kilbiṣāttataḥ

मद्य पीने वाला, ब्राह्मण की हत्या करने वाला, चोर, भ्रूण की हत्या करने वाला और गुरु की शय्या को कलंकित करने वाला भी भलीभाँति तपे हुए तप से ही उस पाप से छूट जाता है।

श्लोक 19 (14.51.19)

मनुष्याः पितरो देवाः पशवो मृगपक्षिणः । यानि चान्यानि भूतानि चराणि स्थावराणि च ॥

manuṣyāḥ pitaro devāḥ paśavo mṛgapakṣiṇaḥ | yāni cānyāni bhūtāni carāṇi sthāvarāṇi ca

मनुष्य, पितर, देवता, पशु, मृग और पक्षी, तथा और जो भी चर-अचर प्राणी हैं,

श्लोक 20 (14.51.20)

तपःपरायणा नित्यं सिद्ध्यन्ते तपसा सदा । तथैव तपसा देवा महाभागा दिवं गताः ॥

tapaḥparāyaṇā nityaṃ siddhyante tapasā sadā | tathaiva tapasā devā mahābhāgā divaṃ gatāḥ

वे सदा तप में लगे रहकर तप से ही सिद्ध होते हैं; इसी प्रकार महाभाग देवता भी तप से स्वर्ग गए।

श्लोक 21 (14.51.21)

आशीर्युक्तानि कर्माणि कुर्वते ये त्वतन्द्रिताः । अहङ्कारसमायुक्तास्ते सकाशे प्रजापतेः ॥

āśīryuktāni karmāṇi kurvate ye tvatandritāḥ | ahaṅkārasamāyuktāste sakāśe prajāpateḥ

जो लोग आलस्य छोड़कर फल की कामना और अहंकार से युक्त कर्म करते हैं, वे प्रजापति के समीप पहुँचते हैं।

श्लोक 22 (14.51.22)

ध्यानयोगेन शुद्धेन निर्ममा निरहंकृताः । आप्नुवन्ति महात्मानो महान्तं लोकमुत्तमम् ॥

dhyānayogena śuddhena nirmamā nirahaṃkṛtāḥ | āpnuvanti mahātmāno mahāntaṃ lokamuttamam

शुद्ध ध्यानयोग से ममता और अहंकार से रहित महात्मा महान् और सर्वोत्तम लोक को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 23 (14.51.23)

ध्यानयोगमुपागम्य प्रसन्नमतयः सदा । सुखोपचयमव्यक्तं प्रविशन्त्यात्मवित्तमाः ॥

dhyānayogamupāgamya prasannamatayaḥ sadā | sukhopacayamavyaktaṃ praviśantyātmavittamāḥ

ध्यानयोग को पाकर सदा प्रसन्न मन वाले श्रेष्ठ आत्मज्ञानी सुख के भण्डार रूप अव्यक्त में प्रवेश करते हैं।

श्लोक 24 (14.51.24)

ध्यानयोगादुपागम्य निर्ममा निरहंकृताः । अव्यक्तं प्रविशन्तीह महतां लोकमुत्तमम् ॥

dhyānayogādupāgamya nirmamā nirahaṃkṛtāḥ | avyaktaṃ praviśantīha mahatāṃ lokamuttamam

ध्यानयोग को पाकर ममता और अहंकार से रहित होकर वे यहाँ अव्यक्त में, महान् पुरुषों के उत्तम लोक में प्रवेश करते हैं।

श्लोक 25 (14.51.25)

अव्यक्तादेव सम्भूताः समयज्ञा गताः पुनः । तमोरजोभ्यां निर्मुक्ताः सत्वमास्थाय केवलम् ॥

avyaktādeva sambhūtāḥ samayajñā gatāḥ punaḥ | tamorajobhyāṃ nirmuktāḥ satvamāsthāya kevalam

जो अव्यक्त से ही उत्पन्न हुए और उचित मार्ग को जानते हैं, वे तम और रज से मुक्त होकर केवल सत्त्व में स्थित हुए फिर उसी में लौट जाते हैं।

श्लोक 26 (14.51.26)

निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यः सर्वं त्यजति निष्कलः । क्षेत्रज्ञ इति तं विद्याद्यस्तं वेद स वेदवित् ॥

nirmuktaḥ sarvapāpebhyaḥ sarvaṃ tyajati niṣkalaḥ | kṣetrajña iti taṃ vidyādyastaṃ veda sa vedavit

सब पापों से मुक्त होकर वह सबको त्याग देता है और निष्कल हो जाता है। उसे क्षेत्रज्ञ जानो; जो उसे जानता है, वही वेद का ज्ञाता है।

श्लोक 27 (14.51.27)

चित्तं चित्तादुपागम्य मुनिरासीत संयतः । यच्चित्तस्तन्मना भूत्वा ग्राह्यमेतत्सनातनम् ॥

cittaṃ cittādupāgamya munirāsīta saṃyataḥ | yaccittastanmanā bhūtvā grāhyametatsanātanam

मन को मन के द्वारा खींचकर मुनि संयत होकर बैठे; जिस पर वह चित्त लगाता है, उसी में तन्मय होकर यह सनातन तत्त्व ग्रहण करने योग्य है।

श्लोक 28 (14.51.28)

अव्यक्तादिविशेषान्तमविद्यालक्षणं स्मृतम् । निबोधत तथा ज्ञानं गुणैर्लक्षणमित्युत ॥

avyaktādiviśeṣāntamavidyālakṣaṇaṃ smṛtam | nibodhata tathā jñānaṃ guṇairlakṣaṇamityuta

अव्यक्त से लेकर विशेष पदार्थों तक जो कुछ है, वह अविद्या का लक्षण माना गया है। अब गुणों द्वारा ज्ञान का लक्षण भी सुनो।

श्लोक 29 (14.51.29)

द्व्यक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं ब्रह्म शाश्वतम् । ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम् ॥

dvyakṣarastu bhavenmṛtyustryakṣaraṃ brahma śāśvatam | mameti ca bhavenmṛtyurna mameti ca śāśvatam

दो अक्षर का शब्द मृत्यु है और तीन अक्षर का ब्रह्म शाश्वत है। "मम" मृत्यु है और "न मम" शाश्वत है।

श्लोक 30 (14.51.30)

कर्म केचित्प्रशंसन्ति मन्दबुद्धितया नराः । ये तु वृद्धा महात्मानो न प्रशंसन्ति कर्म ते ॥

karma kecitpraśaṃsanti mandabuddhitayā narāḥ | ye tu vṛddhā mahātmāno na praśaṃsanti karma te

मन्दबुद्धि लोग कर्म की प्रशंसा करते हैं; किन्तु जो वृद्ध महात्मा हैं, वे कर्म की प्रशंसा नहीं करते।

श्लोक 31 (14.51.31)

कर्मणा जायते जन्तुर्मूर्तिमान्षोडशात्मकः । पुरुषं ग्रसते विद्या तद्ग्राह्यममृताशिनम् ॥

karmaṇā jāyate janturmūrtimānṣoḍaśātmakaḥ | puruṣaṃ grasate vidyā tadgrāhyamamṛtāśinam

कर्म से प्राणी उत्पन्न होता है, जो शरीरधारी और सोलह अंशों वाला है; विद्या पुरुष को निगल लेती है, और अमृत का भोग करने वाला वही ग्रहण करने योग्य है।

श्लोक 32 (14.51.32)

तस्मात्कर्मसु निःस्नेहा ये केचित्पारदर्शिनः । विद्यामयोऽयं पुरुषो न तु कर्ममयः स्मृतः ॥

tasmātkarmasu niḥsnehā ye kecitpāradarśinaḥ | vidyāmayo'yaṃ puruṣo na tu karmamayaḥ smṛtaḥ

इसलिए जो कर्मों में आसक्ति से रहित और पार पहुँचे हुए हैं, वे जानते हैं कि यह पुरुष विद्यामय है, कर्ममय नहीं।

श्लोक 33 (14.51.33)

य एवममृतं नित्यमग्राह्यं शश्वदक्षरम् । वश्यात्मानमसंश्लिष्टं यो वेद न मृतो भवेत् ॥

ya evamamṛtaṃ nityamagrāhyaṃ śaśvadakṣaram | vaśyātmānamasaṃśliṣṭaṃ yo veda na mṛto bhavet

जो इसे अमृत, नित्य, अग्राह्य, सदा अक्षर, आत्मसंयमी और असंग जानता है, वह नहीं मरता।

श्लोक 34 (14.51.34)

अपूर्वमकृतं नित्यं य एनमविचारिणम् । य एवं विन्देदात्मानमग्राह्यममृताशनम् । अग्राह्यो ह्यमृतो भवति स एभिः कारणैर्ध्रुवः ॥

apūrvamakṛtaṃ nityaṃ ya enamavicāriṇam | ya evaṃ vindedātmānamagrāhyamamṛtāśanam | agrāhyo hyamṛto bhavati sa ebhiḥ kāraṇairdhruvaḥ

जो इस आत्मा को अपूर्व, अकृत, नित्य, विचार से परे, अग्राह्य और अमृत का भोक्ता जान लेता है, वह स्वयं अग्राह्य और अमृत हो जाता है, इन कारणों से स्थिर होकर।

श्लोक 35 (14.51.35)

आयोज्य सर्वसंस्कारान्संयम्यात्मानमात्मनि । स तद्ब्रह्म शुभं वेत्ति यस्माद्भूयो न विद्यते ॥

āyojya sarvasaṃskārānsaṃyamyātmānamātmani | sa tadbrahma śubhaṃ vetti yasmādbhūyo na vidyate

सब साधनाओं को लगाकर और आत्मा को आत्मा में संयमित करके वह उस शुभ ब्रह्म को जानता है, जिससे आगे कुछ नहीं है।

श्लोक 36 (14.51.36)

प्रसादे चैव सत्वस्य प्रसादं समवाप्नुयात् । लक्षणं हि प्रसादस्य यथा स्यात्स्वप्नदर्शनम् ॥

prasāde caiva satvasya prasādaṃ samavāpnuyāt | lakṣaṇaṃ hi prasādasya yathā syātsvapnadarśanam

सत्त्व की प्रसन्नता से ही प्रसन्नता प्राप्त होती है; प्रसन्नता का लक्षण वैसा है जैसा स्वप्न का दर्शन।

श्लोक 37 (14.51.37)

गतिरेषा तु मुक्तानां ये ज्ञानपरिनिष्ठिताः । प्रवृत्तयश्च याः सर्वाः पश्यन्ति परिणामजाः ॥

gatireṣā tu muktānāṃ ye jñānapariniṣṭhitāḥ | pravṛttayaśca yāḥ sarvāḥ paśyanti pariṇāmajāḥ

यह उन मुक्त पुरुषों की गति है जो ज्ञान में पूर्णतः स्थित हैं; और जो भी प्रवृत्तियाँ हैं, उन सबको वे परिणाम से उत्पन्न हुआ देखते हैं।

श्लोक 38 (14.51.38)

एषा गतिर्विरक्तानामेष धर्मः सनातनः । एषा ज्ञानवतां प्राप्तिरेतद्वृत्तमनिन्दितम् ॥

eṣā gatirviraktānāmeṣa dharmaḥ sanātanaḥ | eṣā jñānavatāṃ prāptiretadvṛttamaninditam

यह विरक्तों की गति है, यही सनातन धर्म है; यही ज्ञानियों की प्राप्ति है और यही निर्दोष आचरण है।

श्लोक 39 (14.51.39)

समेन सर्वभूतेषु निस्पृहेण निराशिषा । शक्या गतिरियं गन्तुं सर्वत्र समदर्शिना ॥

samena sarvabhūteṣu nispṛheṇa nirāśiṣā | śakyā gatiriyaṃ gantuṃ sarvatra samadarśinā

सब प्राणियों के प्रति सम रहकर, निस्पृह और फल की कामना से रहित होकर, सर्वत्र समदर्शी पुरुष इस गति को पा सकता है।

श्लोक 40 (14.51.40)

एतद्वः सर्वमाख्यातं मया विप्रर्षिसत्तमाः । एवमाचरत क्षिप्रं ततः सिद्धिमवाप्स्यथ ॥

etadvaḥ sarvamākhyātaṃ mayā viprarṣisattamāḥ | evamācarata kṣipraṃ tataḥ siddhimavāpsyatha

हे श्रेष्ठ ब्रह्मर्षियो, यह सब मैंने आपसे कह दिया। शीघ्र ऐसा ही आचरण कीजिए; तब आपको सिद्धि प्राप्त होगी।

गुरुरुवाच

श्लोक 41 (14.51.41)

इत्युक्तास्ते तु मुनयो गुरुणा ब्रह्मणा तथा । कृतवन्तो महात्मानस्ततो लोकमवाप्नुवन् ॥

ityuktāste tu munayo guruṇā brahmaṇā tathā | kṛtavanto mahātmānastato lokamavāpnuvan

अपने गुरु ब्रह्मा के ऐसा कहने पर महात्मा मुनियों ने वैसा ही किया और तब उन्हें लोक प्राप्त हुए।

श्लोक 42 (14.51.42)

त्वमप्येतन्महाभाग मयोक्तं ब्रह्मणो वचः । सम्यगाचर शुद्धात्मंस्ततः सिद्धिमवाप्स्यसि ॥

tvamapyetanmahābhāga mayoktaṃ brahmaṇo vacaḥ | samyagācara śuddhātmaṃstataḥ siddhimavāpsyasi

हे महाभाग, तुम भी मेरे कहे हुए ब्रह्मा के इन वचनों का भलीभाँति आचरण करो, हे शुद्धात्मा; तब तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी।

वासुदेव उवाच

श्लोक 43 (14.51.43)

इत्युक्तः स तदा शिष्यो गुरुणा धर्ममुत्तमम् । चकार सर्वं कौन्तेय ततो मोक्षमवाप्तवान् ॥

ityuktaḥ sa tadā śiṣyo guruṇā dharmamuttamam | cakāra sarvaṃ kaunteya tato mokṣamavāptavān

गुरु के ऐसा कहने पर उस शिष्य ने, हे कुन्तीपुत्र, उत्तम धर्म का पूरा पालन किया और इस प्रकार मोक्ष पा लिया।

श्लोक 44 (14.51.44)

कृतकृत्यश्च स तदा शिष्यः कुरुकुलोद्वह । तत्पदं समनुप्राप्तो यत्र गत्वा न शोचति ॥

kṛtakṛtyaśca sa tadā śiṣyaḥ kurukulodvaha | tatpadaṃ samanuprāpto yatra gatvā na śocati

हे कुरुकुल के श्रेष्ठ, कृतकृत्य हुआ वह शिष्य उस पद को प्राप्त हुआ, जहाँ पहुँचकर मनुष्य शोक नहीं करता।

अर्जुन उवाच

श्लोक 45 (14.51.45)

को न्वसौ ब्राह्मणः कृष्ण कश्च शिष्यो जनार्दन । श्रोतव्यं चेन्मयैतद्वै तत्त्वमाचक्ष्व मे विभो ॥

ko nvasau brāhmaṇaḥ kṛṣṇa kaśca śiṣyo janārdana | śrotavyaṃ cenmayaitadvai tattvamācakṣva me vibho

हे कृष्ण, वह ब्राह्मण कौन था और हे जनार्दन, वह शिष्य कौन था? यदि मेरा यह सुनना उचित हो, तो हे विभो, मुझे इसका तत्त्व बताइए।

वासुदेव उवाच

श्लोक 46 (14.51.46)

अहं गुरुर्महाबाहो मनः शिष्यं च विद्धि मे । त्वत्प्रीत्या गुह्यमेतच्च कथितं ते धनंजय ॥

ahaṃ gururmahābāho manaḥ śiṣyaṃ ca viddhi me | tvatprītyā guhyametacca kathitaṃ te dhanaṃjaya

हे महाबाहो, जान लो कि मैं गुरु हूँ और मन मेरा शिष्य है। हे धनंजय, तुम्हारे प्रेम के कारण यह गुप्त बात मैंने तुम्हें बताई है।

श्लोक 47 (14.51.47)

मयि चेदस्ति ते प्रीतिर्नित्यं कुरुकुलोद्वह । अध्यात्ममेतच्छ्रुत्वा त्वं सम्यगाचर सुव्रत ॥

mayi cedasti te prītirnityaṃ kurukulodvaha | adhyātmametacchrutvā tvaṃ samyagācara suvrata

हे कुरुकुल के श्रेष्ठ, यदि तुम्हारा मुझमें सदा प्रेम है, तो हे सुव्रत, इस अध्यात्म को सुनकर इसका भलीभाँति आचरण करो।

श्लोक 48 (14.51.48)

ततस्त्वं सम्यगाचीर्णो धर्मेऽस्मिन्नरिकर्शन । सर्वपापविनिर्मुक्तो मोक्षं प्राप्स्यसि केवलम् ॥

tatastvaṃ samyagācīrṇo dharme'sminnarikarśana | sarvapāpavinirmukto mokṣaṃ prāpsyasi kevalam

हे शत्रुओं को तपाने वाले, तब इस धर्म का भलीभाँति पालन करके तुम सब पापों से मुक्त होकर केवल मोक्ष को प्राप्त करोगे।

श्लोक 49 (14.51.49)

पूर्वमप्येतदेवोक्तं युद्धकाल उपस्थिते । मया तव महाबाहो तस्मादत्र मनः कुरु ॥

pūrvamapyetadevoktaṃ yuddhakāla upasthite | mayā tava mahābāho tasmādatra manaḥ kuru

हे महाबाहो, यही बात पहले भी युद्ध का समय आने पर मैंने तुमसे कही थी; इसलिए इसमें मन लगाओ।

श्लोक 50 (14.51.50)

मया तु भरतश्रेष्ठ चिरदृष्टः पिता प्रभुः । तमहं द्रष्टुमिच्छामि सम्मते तव फल्गुन ॥

mayā tu bharataśreṣṭha ciradṛṣṭaḥ pitā prabhuḥ | tamahaṃ draṣṭumicchāmi sammate tava phalguna

हे भरतश्रेष्ठ, मैंने अपने पूज्य पिता को बहुत समय से नहीं देखा है; हे फल्गुन, यदि तुम सहमत हो तो मैं उन्हें देखना चाहता हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 51 (14.51.51)

इत्युक्तवचनं कृष्णं प्रत्युवाच धनंजयः । यदिष्टं कुरु सर्वेषामीश्वरोऽस्मान्प्रपालय ॥

ityuktavacanaṃ kṛṣṇaṃ pratyuvāca dhanaṃjayaḥ | yadiṣṭaṃ kuru sarveṣāmīśvaro'smānprapālaya

ऐसा कहने वाले कृष्ण को धनंजय ने उत्तर दिया: "जैसा आप चाहें कीजिए; आप सबके स्वामी हैं, हमारी रक्षा कीजिए।

अर्जुन उवाच

श्लोक 52 (14.51.52)

नमस्ते सर्वलोकात्मन्नारायण परात्पर । मनोमलात्तपोऽशक्यं कर्म चाविद्यया हतम् । दानमप्यर्थदोषेण नाम तस्मात्कलौ स्मरेत् ॥

namaste sarvalokātmannārāyaṇa parātpara | manomalāttapo'śakyaṃ karma cāvidyayā hatam | dānamapyarthadoṣeṇa nāma tasmātkalau smaret

"हे सर्वलोकात्मन्, परात्पर नारायण, आपको नमस्कार है। मन के मल के कारण तप असम्भव है; कर्म अविद्या से नष्ट हो जाता है; दान भी धन के दोष से बिगड़ जाता है; इसलिए कलियुग में आपके नाम का स्मरण करना चाहिए।

श्लोक 53 (14.51.53)

यदि गन्तुं कृता बुद्धिर्वासुदेव नमोस्तु ते । गच्छावो नगरं कृष्ण गजसाह्वयमद्य वै ॥

yadi gantuṃ kṛtā buddhirvāsudeva namostu te | gacchāvo nagaraṃ kṛṣṇa gajasāhvayamadya vai

हे वासुदेव, यदि आपने जाने का निश्चय कर लिया है तो आपको नमस्कार है। हे कृष्ण, आज ही हम हस्तिनापुर चलें।"

श्लोक 54 (14.51.54)

समेत्य तत्र राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । समनुज्ञाप्य राजानं स्वां पुरीं यातुमर्हसि ॥

sametya tatra rājānaṃ dharmātmānaṃ yudhiṣṭhiram | samanujñāpya rājānaṃ svāṃ purīṃ yātumarhasi

"वहाँ धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर से मिलकर और राजा की अनुमति लेकर आप अपनी नगरी को जा सकते हैं।"

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