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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 50

ब्रह्मा का उपदेश: सत्त्व, क्षेत्रज्ञ और पंचमहाभूत

ब्रह्मा ऋषियों को वह उपदेश सुनाते हैं जो एक गुरु ने अपने शिष्य को दिया था: अहिंसा और शुद्ध ज्ञान मनुष्य को पाप से छुड़ाते हैं, और ज्ञानी फल की इच्छा के बिना कर्म करते हैं। वे बताते हैं कि विषय रूप सत्त्व और विषयी पुरुष में क्या भेद है और पुरुष उससे कभी लिप्त नहीं होता; दीपक, रथ और नाव के दृष्टान्तों से दिखाते हैं कि ज्ञानी प्रत्येक साधन को आगे चलकर छोड़ देता है। फिर प्रधान, अव्यक्त, महान् और अहंकार का वर्णन करके पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश के गुण गिनाते हैं।

अध्याय 49अध्याय-सूचीअध्याय 51

ब्रह्मोवाच

श्लोक 1 (14.50.1)

हन्त वः सम्प्रवक्ष्यामि यन्मां पृच्छथ सत्तमाः । गुरुणा शिष्यमासाद्य यदुक्तं तन्निबोधत ॥

hanta vaḥ sampravakṣyāmi yanmāṃ pṛcchatha sattamāḥ | guruṇā śiṣyamāsādya yaduktaṃ tannibodhata

उत्तम जनो! आप जो मुझसे पूछ रहे हैं, उसे अब मैं पूरी तरह कहूँगा। एक गुरु ने अपने पास आए शिष्य से जो कहा था, उसे सुनिए।

श्लोक 2 (14.50.2)

समस्तमिह तच्छ्रुत्वा सम्यगेवावधार्यताम् । अहिंसा सर्वभूतानामेतत्कृत्यतमं मतम् ॥

samastamiha tacchrutvā samyagevāvadhāryatām | ahiṃsā sarvabhūtānāmetatkṛtyatamaṃ matam

यह सब यहाँ सुनकर ठीक प्रकार से हृदय में धारण कीजिए: समस्त प्राणियों के प्रति अहिंसा ही सबसे अधिक करने योग्य कर्तव्य माना गया है।

श्लोक 3 (14.50.3)

एतत्पदमनुद्विग्नं वरिष्ठं धर्मलक्षणम् । ज्ञानं निःश्रेय इत्याहुर्वृद्धा निश्चितदर्शिनः । तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥

etatpadamanudvignaṃ variṣṭhaṃ dharmalakṣaṇam | jñānaṃ niḥśreya ityāhurvṛddhā niścitadarśinaḥ | tasmājjñānena śuddhena mucyate sarvakilbiṣaiḥ

यही भयरहित, सर्वश्रेष्ठ पद है और यही धर्म का लक्षण है। निश्चय को देखने वाले वृद्ध जन ज्ञान को परम कल्याण कहते हैं; इसलिए शुद्ध ज्ञान से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है।

श्लोक 4 (14.50.4)

हिंसापराश्च ये केचिद्ये च नास्तिकवृत्तयः । लोभमोहसमायुक्तास्ते वै निरयगामिनः ॥

hiṃsāparāśca ye kecidye ca nāstikavṛttayaḥ | lobhamohasamāyuktāste vai nirayagāminaḥ

जो लोग हिंसा में लगे रहते हैं और जिनका आचरण नास्तिकों जैसा है, जो लोभ और मोह से भरे हैं, वे ही नरक में जाने वाले हैं।

श्लोक 5 (14.50.5)

आशीर्युक्तानि कर्माणि कुर्वते ये त्वतन्द्रिताः । तेऽस्मिन्लोके प्रमोदन्ते जायमानाः पुनः पुनः ॥

āśīryuktāni karmāṇi kurvate ye tvatandritāḥ | te'sminloke pramodante jāyamānāḥ punaḥ punaḥ

जो लोग आलस्य छोड़कर फल की कामना से युक्त कर्म करते हैं, वे बार-बार जन्म लेते हुए इसी लोक में आनन्द मनाते हैं।

श्लोक 6 (14.50.6)

कुर्वते ये तु कर्माणि श्रद्धधाना विपश्चितः । अनाशीर्योगसंयुक्तास्ते धीराः साधुदर्शिनः ॥

kurvate ye tu karmāṇi śraddhadhānā vipaścitaḥ | anāśīryogasaṃyuktāste dhīrāḥ sādhudarśinaḥ

किन्तु जो विवेकी लोग श्रद्धापूर्वक, फल की कामना से रहित होकर कर्म करते हैं, वे धीर हैं और सही दृष्टि वाले हैं।

श्लोक 7 (14.50.7)

अतः परं प्रवक्ष्यामि सत्वक्षेत्रज्ञयोर्यथा । संयोगो विप्रयोगश्च तन्निबोधत सत्तमाः ॥

ataḥ paraṃ pravakṣyāmi satvakṣetrajñayoryathā | saṃyogo viprayogaśca tannibodhata sattamāḥ

अब मैं बताऊँगा कि सत्त्व और क्षेत्रज्ञ का संयोग और वियोग कैसे होता है; हे उत्तम जनो, उसे सुनिए।

श्लोक 8 (14.50.8)

विषयो विषयित्वं च सम्बन्धोऽयमिहोच्यते । विषयी पुरुषो नित्यं सत्वं च विषयः स्मृतः ॥

viṣayo viṣayitvaṃ ca sambandho'yamihocyate | viṣayī puruṣo nityaṃ satvaṃ ca viṣayaḥ smṛtaḥ

यहाँ इनका सम्बन्ध विषय और विषयी का कहा जाता है: पुरुष सदा विषयी है और सत्त्व को विषय कहा गया है।

श्लोक 9 (14.50.9)

व्याख्यातं पूर्वकल्पेन मशकोदुम्बरं यथा । भुज्यमानं न जानीते नित्यं सत्वमचेतनम् । यस्त्वेवं तं विजानीते यो भुङ्क्ते यश्च भुज्यते ॥

vyākhyātaṃ pūrvakalpena maśakodumbaraṃ yathā | bhujyamānaṃ na jānīte nityaṃ satvamacetanam | yastvevaṃ taṃ vijānīte yo bhuṅkte yaśca bhujyate

इसे पहले मच्छर और गूलर के उदाहरण से समझाया जा चुका है: भोगा जाता हुआ सत्त्व, जो सदा अचेतन है, अपने भोगे जाने को नहीं जानता। किन्तु जो इसे इस प्रकार समझता है, वह जानता है कि भोगने वाला कौन है और भोगा जाने वाला कौन।

श्लोक 10 (14.50.10)

अनित्यं द्वन्द्वसंयुक्तं सत्वमाहुर्मनीषिणः । निर्द्वन्द्वो निष्कलो नित्यः क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मकः ॥

anityaṃ dvandvasaṃyuktaṃ satvamāhurmanīṣiṇaḥ | nirdvandvo niṣkalo nityaḥ kṣetrajño nirguṇātmakaḥ

मनीषी लोग सत्त्व को अनित्य और द्वन्द्वों से युक्त कहते हैं; जबकि क्षेत्रज्ञ द्वन्द्वों से रहित, अंशरहित, नित्य और गुणों से परे है।

श्लोक 11 (14.50.11)

समः संज्ञानुगश्चैव स सर्वत्र व्यवस्थितः । न सज्जते सदा सत्वमापः पुष्करपर्णवत् ॥

samaḥ saṃjñānugaścaiva sa sarvatra vyavasthitaḥ | na sajjate sadā satvamāpaḥ puṣkaraparṇavat

वह सबमें सम है, चेतना का अनुगामी है और सर्वत्र स्थित है; सत्त्व उससे कभी वैसे नहीं चिपकता, जैसे कमल के पत्ते से जल नहीं चिपकता।

श्लोक 12 (14.50.12)

सर्वैरपि गुणैर्विद्वान्व्यतिषक्तो न लिप्यते । जलबिन्दुर्यथा लोलः पद्मिनीपत्रसंस्थितः ॥

sarvairapi guṇairvidvānvyatiṣakto na lipyate | jalabinduryathā lolaḥ padminīpatrasaṃsthitaḥ

विद्वान् सब गुणों से सम्बद्ध रहकर भी उनसे लिप्त नहीं होता, जैसे कमलिनी के पत्ते पर टिकी हुई चंचल जल की बूँद।

श्लोक 13 (14.50.13)

एवमेवाप्यसंयुक्तः पुरुषः स्यान्न संशयः । द्रव्यमात्रमभूत्सत्वं पुरुषस्येति निश्चयः ॥

evamevāpyasaṃyuktaḥ puruṣaḥ syānna saṃśayaḥ | dravyamātramabhūtsatvaṃ puruṣasyeti niścayaḥ

इसी प्रकार पुरुष भी निस्संदेह असंग रहता है। यह निश्चय है कि सत्त्व पुरुष के लिए केवल साधन-रूप द्रव्य मात्र है।

श्लोक 14 (14.50.14)

यथा द्रव्यं च कर्ता च संयोगोऽप्यनयोस्तथा । यथा प्रदीपमादाय कश्चित्तमसि गच्छति । तथा सत्त्वप्रदीपेन गच्छन्ति परमर्षयः ॥

yathā dravyaṃ ca kartā ca saṃyogo'pyanayostathā | yathā pradīpamādāya kaścittamasi gacchati | tathā sattvapradīpena gacchanti paramarṣayaḥ

जैसे द्रव्य और कर्ता हैं, वैसे ही इन दोनों का संयोग भी जानना चाहिए। जैसे कोई मनुष्य दीपक लेकर अँधेरे में चलता है, वैसे ही महर्षि सत्त्व के दीपक से चलते हैं।

श्लोक 15 (14.50.15)

यावद्द्रव्यं गुणस्तावत्प्रदीपः सम्प्रकाशते । क्षीणे द्रव्ये गुणे ज्योतिरन्तर्धानाय गच्छति ॥

yāvaddravyaṃ guṇastāvatpradīpaḥ samprakāśate | kṣīṇe dravye guṇe jyotirantardhānāya gacchati

जब तक द्रव्य और उसका गुण रहता है, तब तक दीपक प्रकाशित होता है; द्रव्य और गुण के क्षीण हो जाने पर ज्योति लुप्त हो जाती है।

श्लोक 16 (14.50.16)

व्यक्तः सत्वगुणस्त्वेवं पुरुषो द्रव्यमुच्यते । एतद्विप्रा विजानीत हन्त भूयो ब्रवीमि वः ॥

vyaktaḥ satvaguṇastvevaṃ puruṣo dravyamucyate | etadviprā vijānīta hanta bhūyo bravīmi vaḥ

इस प्रकार सत्त्वगुण व्यक्त है और पुरुष को द्रव्य कहा जाता है। हे विप्रो, इसे समझ लो; अब मैं तुमसे और भी कहता हूँ।

श्लोक 17 (14.50.17)

सहस्रेणापि दुर्मेधा न बुद्धिमधिगच्छति । चतुर्थेनाप्यथांशेन बुद्धिमान्सुखमेधते ॥

sahasreṇāpi durmedhā na buddhimadhigacchati | caturthenāpyathāṃśena buddhimānsukhamedhate

मन्दबुद्धि मनुष्य हजार अंशों से भी बुद्धि नहीं पाता, जबकि बुद्धिमान् चौथे अंश से भी सुख पाकर बढ़ता है।

श्लोक 18 (14.50.18)

एवं धर्मस्य विज्ञेयं संसाधनमुपायतः । उपायज्ञो हि मेधावी सुखमत्यन्तमश्नुते ॥

evaṃ dharmasya vijñeyaṃ saṃsādhanamupāyataḥ | upāyajño hi medhāvī sukhamatyantamaśnute

इसी प्रकार धर्म की सिद्धि का साधन उचित उपाय से जानना चाहिए; उपाय जानने वाला मेधावी मनुष्य अत्यन्त सुख पाता है।

श्लोक 19 (14.50.19)

यथाऽध्वानमपाथेयः प्रपन्नो मनुजः क्वचित् । क्लेशेन याति महता विनश्यत्यन्तराऽपि च ॥

yathā'dhvānamapātheyaḥ prapanno manujaḥ kvacit | kleśena yāti mahatā vinaśyatyantarā'pi ca

जैसे कोई मनुष्य बिना पाथेय के कहीं मार्ग पर चल पड़े, तो वह बड़े कष्ट से चलता है या बीच में ही नष्ट हो जाता है,

श्लोक 20 (14.50.20)

तथा कर्मसु विज्ञेयं फलं भवति वा न वा । पुरुषस्यात्मनिःश्रेयः शुभाशुभनिदर्शनम् ॥

tathā karmasu vijñeyaṃ phalaṃ bhavati vā na vā | puruṣasyātmaniḥśreyaḥ śubhāśubhanidarśanam

वैसे ही कर्मों के विषय में जानना चाहिए कि फल मिलता भी है और नहीं भी मिलता; पुरुष के आत्मकल्याण का संकेत शुभ और अशुभ चिह्नों से मिलता है।

श्लोक 21 (14.50.21)

यथा च दीर्घमध्वानं पद्म्यामेव प्रपद्यते । अदृष्टपूर्वं सहसा तत्त्वदर्शनवर्जितः ॥

yathā ca dīrghamadhvānaṃ padmyāmeva prapadyate | adṛṣṭapūrvaṃ sahasā tattvadarśanavarjitaḥ

और जैसे कोई तत्त्व को देखे बिना अचानक एक ऐसे लम्बे मार्ग पर पैदल चल पड़े, जिसे पहले कभी देखा न हो,

श्लोक 22 (14.50.22)

तमेव च यथाऽध्वानं रथेनेहाशुगामिना । गच्छत्यश्वप्रयुक्तेन तथा बुद्धिमतां गतिः ॥

tameva ca yathā'dhvānaṃ rathenehāśugāminā | gacchatyaśvaprayuktena tathā buddhimatāṃ gatiḥ

और वही मार्ग घोड़े जुते तीव्रगामी रथ से तय किया जाए, वैसी ही बुद्धिमानों की गति है।

श्लोक 23 (14.50.23)

ऊर्ध्वं पर्वतमारुह्य नान्ववेक्षेत भूतलम् । रथेन रथिनं पश्येत्क्लिश्यमानमचेतनम् ॥

ūrdhvaṃ parvatamāruhya nānvavekṣeta bhūtalam | rathena rathinaṃ paśyetkliśyamānamacetanam

ऊँचे पर्वत पर चढ़कर मनुष्य नीचे भूमि की ओर नहीं देखता; वहाँ से वह रथ वाले को कष्ट पाते और अचेत देखता है।

श्लोक 24 (14.50.24)

यावद्रथपथस्तावद्रथेन स तु गच्छति । क्षीणे रथपदे विद्वान्रथमुत्सृज्य गच्छति ॥

yāvadrathapathastāvadrathena sa tu gacchati | kṣīṇe rathapade vidvānrathamutsṛjya gacchati

जहाँ तक रथ का मार्ग है, वहाँ तक वह रथ से जाता है; रथ का मार्ग समाप्त होने पर ज्ञानी रथ छोड़कर आगे चल पड़ता है।

श्लोक 25 (14.50.25)

एवं गच्छति मेधावी तत्त्वयोगविधानवित् । परिज्ञाय गुणज्ञश्च उत्तरादुत्तरोत्तरम् ॥

evaṃ gacchati medhāvī tattvayogavidhānavit | parijñāya guṇajñaśca uttarāduttarottaram

इसी प्रकार तत्त्व और योग की विधि को जानने वाला मेधावी पुरुष गुणों को समझता हुआ एक के बाद अगले ऊँचे स्तर की ओर बढ़ता है।

श्लोक 26 (14.50.26)

यथाऽर्णवं महाघोरमप्लवः सम्प्रगाहते । बाहुभ्यामेव सम्मोहाद्वधं वाञ्छत्यसंशयम् ॥

yathā'rṇavaṃ mahāghoramaplavaḥ sampragāhate | bāhubhyāmeva sammohādvadhaṃ vāñchatyasaṃśayam

जैसे नौका-रहित मनुष्य भयंकर महासागर में केवल भुजाओं के सहारे उतर पड़े, तो मोह के कारण वह निश्चय ही अपना विनाश चाहता है,

श्लोक 27 (14.50.27)

नावा चापि यथा प्राज्ञो विभागज्ञः स्वरित्रया । अश्रान्तः सलिलं गहाच्छीघ्रं संतरते ह्रदम् ॥

nāvā cāpi yathā prājño vibhāgajñaḥ svaritrayā | aśrāntaḥ salilaṃ gahācchīghraṃ saṃtarate hradam

और जैसे विभागों को जानने वाला समझदार मनुष्य अच्छे डाँड़ों वाली नाव से बिना थके गहरे जल वाले सरोवर को शीघ्र पार कर लेता है,

श्लोक 28 (14.50.28)

तीर्णो गच्छेत्परं पारं नावमुत्सृज्य निर्ममः । व्याख्यातं पूर्वकल्पेन यथा रथपदातिनोः ॥

tīrṇo gacchetparaṃ pāraṃ nāvamutsṛjya nirmamaḥ | vyākhyātaṃ pūrvakalpena yathā rathapadātinoḥ

वैसे ही पार उतरकर वह ममता छोड़कर नाव को त्याग देता है और परले किनारे जाता है। रथ पर चलने वाले और पैदल चलने वाले के विषय में यह पहले समझाया जा चुका है।

श्लोक 29 (14.50.29)

स्नेहात्सम्मोहमापन्नो नावि दाशो यथा तथा । ममत्वेनाभिभूतः संस्तत्रैव परिवर्तते ॥

snehātsammohamāpanno nāvi dāśo yathā tathā | mamatvenābhibhūtaḥ saṃstatraiva parivartate

जैसे नाव में स्नेह से मोहित हुआ मल्लाह, वैसे ही ममता से अभिभूत मनुष्य उसी स्थान पर चक्कर काटता रहता है।

श्लोक 30 (14.50.30)

नावं न शक्यमारुह्य स्थले विपरिवर्तितुम् । तथैव रथमारुह्य नाप्सु चर्या विधीयते ॥

nāvaṃ na śakyamāruhya sthale viparivartitum | tathaiva rathamāruhya nāpsu caryā vidhīyate

नाव पर चढ़कर स्थल पर नहीं घूमा जा सकता; वैसे ही रथ पर चढ़कर जल में चलना उचित नहीं है।

श्लोक 31 (14.50.31)

एवं कर्म कृतं वित्त विषयस्थं पृथक्पृथक् । यथा कर्म कृतं लोके तथा तदुपपद्यते ॥

evaṃ karma kṛtaṃ vitta viṣayasthaṃ pṛthakpṛthak | yathā karma kṛtaṃ loke tathā tadupapadyate

इसी प्रकार किए हुए कर्मों को अलग-अलग अपने-अपने क्षेत्र में स्थित जानो; संसार में जैसा कर्म किया जाता है, वैसा ही उसका फल होता है।

श्लोक 32 (14.50.32)

यन्नैव गन्धि नो रस्यं न रूपस्पर्शशब्दवत् । मन्यते न मनो बुद्ध्या तत्प्रधानं प्रचक्षते ॥

yannaiva gandhi no rasyaṃ na rūpasparśaśabdavat | manyate na mano buddhyā tatpradhānaṃ pracakṣate

जो न गन्ध वाला है, न रस वाला, और जिसमें रूप, स्पर्श तथा शब्द नहीं हैं, तथा जिसे मन बुद्धि से नहीं पकड़ पाता, उसे प्रधान कहते हैं।

श्लोक 33 (14.50.33)

तत्र प्रधानमव्यक्तमव्यक्तस्य गुणो महान् । महतः प्रधानभूतस्य गुणोऽहङ्कार एव च ॥

tatra pradhānamavyaktamavyaktasya guṇo mahān | mahataḥ pradhānabhūtasya guṇo'haṅkāra eva ca

उसमें प्रधान अव्यक्त है; अव्यक्त का गुण महान् है; और प्रधानरूप हुए महान् का गुण अहंकार है।

श्लोक 34 (14.50.34)

अहङ्कारात्तु सम्भूतो महाभूतकृतो गुणः । पृथक्त्वेन हि भूतानां विषया वै गुणाः स्मृताः ॥

ahaṅkārāttu sambhūto mahābhūtakṛto guṇaḥ | pṛthaktvena hi bhūtānāṃ viṣayā vai guṇāḥ smṛtāḥ

अहंकार से महाभूतों से बना हुआ गुण उत्पन्न होता है; और भूतों के अलग-अलग विषय उनके गुण माने गए हैं।

श्लोक 35 (14.50.35)

बीजधर्मं यथाऽव्यक्तं तथैव प्रसवात्मकम् । बीजधर्मा महानात्मा प्रसवश्चेति नः श्रुतम् ॥

bījadharmaṃ yathā'vyaktaṃ tathaiva prasavātmakam | bījadharmā mahānātmā prasavaśceti naḥ śrutam

जैसे अव्यक्त बीज के स्वभाव वाला है, वैसे ही वह उत्पन्न करने के स्वभाव वाला भी है; हमने सुना है कि महान् आत्मा बीजधर्मा है और सृजन भी करता है।

श्लोक 36 (14.50.36)

बीजधर्मात्साहङ्कारात्प्रसवश्च पुनःपुनः । बीजप्रसवधर्माणि महाभूतानि पञ्च वै ॥

bījadharmātsāhaṅkārātprasavaśca punaḥpunaḥ | bījaprasavadharmāṇi mahābhūtāni pañca vai

बीजधर्मा अहंकार से बार-बार सृष्टि होती है; पाँचों महाभूत बीज और सृजन दोनों के स्वभाव वाले हैं।

श्लोक 37 (14.50.37)

बीजधर्मिण इत्याहुः प्रसवं च प्रकुर्वते । विशेषाः पञ्चभूतानां तेषां वित्त विशेषणम् ॥

bījadharmiṇa ityāhuḥ prasavaṃ ca prakurvate | viśeṣāḥ pañcabhūtānāṃ teṣāṃ vitta viśeṣaṇam

उन्हें बीजधर्मी कहा जाता है और वे सृजन भी करते हैं। पाँचों भूतों के विशेष रूप जानो, उनकी विशेषताएँ जानो।

श्लोक 38 (14.50.38)

तत्रैकगुणमाकाशं द्विगुणो वायुरुच्यते । त्रिगुणं ज्योतिरित्याहुरापश्चापि चतुर्गुणाः ॥

tatraikaguṇamākāśaṃ dviguṇo vāyurucyate | triguṇaṃ jyotirityāhurāpaścāpi caturguṇāḥ

उनमें आकाश एक गुण वाला है, वायु दो गुण वाला कहा जाता है, तेज को तीन गुण वाला कहते हैं और जल चार गुण वाला है।

श्लोक 39 (14.50.39)

पृथ्वी पञ्चगुणा ज्ञेया चरस्थावरसङ्कुला । सर्वभूतकरी देवी शुभाशुभनिदर्शिनी ॥

pṛthvī pañcaguṇā jñeyā carasthāvarasaṅkulā | sarvabhūtakarī devī śubhāśubhanidarśinī

पृथ्वी को पाँच गुणों वाली जानना चाहिए; वह चर और अचर प्राणियों से भरी है, सब भूतों को रचने वाली देवी है और शुभ-अशुभ को प्रकट करती है।

श्लोक 40 (14.50.40)

शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः । एते पञ्चगुणा भूमेर्विज्ञेया द्विजसत्तमाः ॥

śabdaḥ sparśastathā rūpaṃ raso gandhaśca pañcamaḥ | ete pañcaguṇā bhūmervijñeyā dvijasattamāḥ

शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध: हे श्रेष्ठ द्विजो, ये पाँच गुण पृथ्वी के जानने योग्य हैं।

श्लोक 41 (14.50.41)

पार्थिवश्च सदा गन्धो गन्धश्च बहुधा स्मृतः । तस्य गन्धस्य वक्ष्यामि विस्तरेण बहून्गुणान् ॥

pārthivaśca sadā gandho gandhaśca bahudhā smṛtaḥ | tasya gandhasya vakṣyāmi vistareṇa bahūnguṇān

पृथ्वी का गुण सदा गन्ध है, और गन्ध अनेक प्रकार की मानी गई है। उस गन्ध के बहुत-से भेद मैं विस्तार से कहूँगा।

श्लोक 42 (14.50.42)

इष्टश्चानिष्टगन्धश्च मधुरोऽम्लः कटुस्तथा । निर्हारी संहतः स्निग्धो रूक्षो विशद एव च ॥

iṣṭaścāniṣṭagandhaśca madhuro'mlaḥ kaṭustathā | nirhārī saṃhataḥ snigdho rūkṣo viśada eva ca

इष्ट और अनिष्ट गन्ध, मधुर, खट्टी, कटु, दूर तक फैलने वाली, सघन, चिकनी, रूखी और विशद।

श्लोक 43 (14.50.43)

एवं दशविधो ज्ञेयः पार्थिवो गन्ध इत्युत । शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं द्रवश्चापां गुणाः स्मृताः ॥

evaṃ daśavidho jñeyaḥ pārthivo gandha ityuta | śabdaḥ sparśastathā rūpaṃ dravaścāpāṃ guṇāḥ smṛtāḥ

इस प्रकार पार्थिव गन्ध दस प्रकार की जाननी चाहिए। शब्द, स्पर्श, रूप और द्रवत्व जल के गुण माने गए हैं।

श्लोक 44 (14.50.44)

रसज्ञानं तु वक्ष्यामि रसस्तु बहुधा स्मृतः । मधुरोऽम्लः कटुस्तिक्तः कषायो लवणस्तथा ॥

rasajñānaṃ tu vakṣyāmi rasastu bahudhā smṛtaḥ | madhuro'mlaḥ kaṭustiktaḥ kaṣāyo lavaṇastathā

अब मैं रस का ज्ञान कहूँगा; रस अनेक प्रकार का माना गया है: मधुर, खट्टा, कटु, तिक्त, कषाय और लवण।

श्लोक 45 (14.50.45)

एवं षड्विधविस्तारो रसो वारिमयः स्मृतः । शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं त्रिगुणं ज्योतिरुच्यते ॥

evaṃ ṣaḍvidhavistāro raso vārimayaḥ smṛtaḥ | śabdaḥ sparśastathā rūpaṃ triguṇaṃ jyotirucyate

इस प्रकार जलमय रस छह प्रकार के विस्तार वाला है। शब्द, स्पर्श और रूप: तेज को तीन गुण वाला कहा जाता है।

श्लोक 46 (14.50.46)

ज्योतिषश्च गुणो रूपं रूपं च बहुधा स्मृतम् । शुक्लं कृष्णं तथा रक्तं नीलं पीतारुणं तथा ॥

jyotiṣaśca guṇo rūpaṃ rūpaṃ ca bahudhā smṛtam | śuklaṃ kṛṣṇaṃ tathā raktaṃ nīlaṃ pītāruṇaṃ tathā

तेज का गुण रूप है और रूप अनेक प्रकार का माना गया है: श्वेत, काला, लाल, नीला और पीला-अरुण;

श्लोक 47 (14.50.47)

ह्रस्वं दीर्घं कृशं स्थूलं चतुरश्राणुवृत्तकम् । एवं द्वादशविस्तारं तेजसो रूपमुच्यते ॥

hrasvaṃ dīrghaṃ kṛśaṃ sthūlaṃ caturaśrāṇuvṛttakam | evaṃ dvādaśavistāraṃ tejaso rūpamucyate

छोटा, लम्बा, पतला, मोटा, चौकोर, अणु और गोल। इस प्रकार तेज का रूप बारह प्रकार का कहा जाता है।

श्लोक 48 (14.50.48)

विज्ञेयं ब्राह्मणैर्वृद्धैर्धर्मज्ञैः सत्यवादिभिः । शब्दस्पर्शौ च विज्ञेयौ द्विगुणो वायुरुच्यते ॥

vijñeyaṃ brāhmaṇairvṛddhairdharmajñaiḥ satyavādibhiḥ | śabdasparśau ca vijñeyau dviguṇo vāyurucyate

इसे वृद्ध, धर्म के ज्ञाता और सत्यवादी ब्राह्मणों से जानना चाहिए। शब्द और स्पर्श भी जानने योग्य हैं; वायु दो गुण वाला कहा जाता है।

श्लोक 49 (14.50.49)

वायोश्चापि गुणः स्पर्शः स्पर्शश्च बहुधा स्मृतः । उष्णः शीतः सुखो दुःखः स्निग्धो विशद एव च ॥

vāyoścāpi guṇaḥ sparśaḥ sparśaśca bahudhā smṛtaḥ | uṣṇaḥ śītaḥ sukho duḥkhaḥ snigdho viśada eva ca

स्पर्श भी वायु का गुण है और स्पर्श अनेक प्रकार का माना गया है: गरम, ठंडा, सुखद, दुःखद, चिकना और विशद;

श्लोक 50 (14.50.50)

कठिनश्चिक्वणः श्लक्ष्णः पिच्छिलो दारुणो मृदुः । एवं द्वादशविस्तारो वायव्यो गुण उच्यते ॥

kaṭhinaścikvaṇaḥ ślakṣṇaḥ picchilo dāruṇo mṛduḥ | evaṃ dvādaśavistāro vāyavyo guṇa ucyate

कठोर, फिसलन भरा, मुलायम, चिपचिपा, कर्कश और कोमल। इस प्रकार वायु का गुण बारह प्रकार का कहा जाता है।

श्लोक 51 (14.50.51)

विधिवद्ब्राह्मणैः सिद्धैर्मन्त्रज्ञैस्तत्त्वदार्शिभिः ॥

vidhivadbrāhmaṇaiḥ siddhairmantrajñaistattvadārśibhiḥ

ऐसा विधिपूर्वक ब्राह्मणों ने कहा है, जो सिद्ध, मन्त्रों के ज्ञाता और तत्त्व के द्रष्टा हैं।

श्लोक 52 (14.50.52)

तत्रैकगुणमाकाशं शब्द इत्येव च स्मृतः । तस्य शब्दस्य वक्ष्यामि विस्तरेण बहून्गुणान् ॥

tatraikaguṇamākāśaṃ śabda ityeva ca smṛtaḥ | tasya śabdasya vakṣyāmi vistareṇa bahūnguṇān

उनमें आकाश एक गुण वाला है, जो शब्द ही कहा गया है। उस शब्द के अनेक भेद मैं विस्तार से कहूँगा।

श्लोक 53 (14.50.53)

षड्जर्षभः सगान्धारो मध्यमः पञ्चमस्तथा । अतः परं तु विज्ञेयो निषादो धैवतस्तथा । इष्टश्चानिष्टशब्दश्च संहतः प्रतिभानवान् ॥

ṣaḍjarṣabhaḥ sagāndhāro madhyamaḥ pañcamastathā | ataḥ paraṃ tu vijñeyo niṣādo dhaivatastathā | iṣṭaścāniṣṭaśabdaśca saṃhataḥ pratibhānavān

षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम और पंचम, और इनके बाद निषाद तथा धैवत; शब्द इष्ट भी होता है और अनिष्ट भी, संहत और भावों को प्रकट करने वाला।

श्लोक 54 (14.50.54)

एवं बहुविधो ज्ञेयः शब्द आकाशसम्भवः । आकाशमुत्तमं भूतमहङ्कारस्ततः परः ॥

evaṃ bahuvidho jñeyaḥ śabda ākāśasambhavaḥ | ākāśamuttamaṃ bhūtamahaṅkārastataḥ paraḥ

इस प्रकार आकाश से उत्पन्न शब्द अनेक प्रकार का जानना चाहिए। आकाश श्रेष्ठ भूत है; उससे आगे अहंकार है।

श्लोक 55 (14.50.55)

अहङ्कारात्परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा ततः परः । तस्मात्तु परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः ॥

ahaṅkārātparā buddhirbuddherātmā tataḥ paraḥ | tasmāttu paramavyaktamavyaktātpuruṣaḥ paraḥ

अहंकार से परे बुद्धि है, बुद्धि से परे आत्मा है; उससे परे अव्यक्त है और अव्यक्त से परे पुरुष है।

श्लोक 56 (14.50.56)

परावरज्ञो भूतानां विधिज्ञः सर्वकर्मणाम् । सर्वभूतात्मभूतात्मा यं प्राप्यानन्त्यमश्नुते ॥

parāvarajño bhūtānāṃ vidhijñaḥ sarvakarmaṇām | sarvabhūtātmabhūtātmā yaṃ prāpyānantyamaśnute

वह भूतों के पर और अपर को जानने वाला है, सब कर्मों की विधि को जानने वाला है, सब भूतों का आत्मभूत आत्मा है; उसे पाकर मनुष्य अनन्त को प्राप्त होता है।

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