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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 65

शिव को उपहार और धन का उत्खनन

ब्राह्मणों की प्रेरणा से युधिष्ठिर शिव, कुबेर और यक्षों तथा भूतों को उपहार चढ़ाते हैं और हज़ारों गौएँ दान करते हैं। फिर व्यास को आगे करके वे निधियों और उनके रक्षकों का पूजन करते हैं और गड़ा हुआ धन खुदवाते हैं: असंख्य पात्र और बर्तन निकलते हैं। हज़ारों ऊँटों, घोड़ों, हाथियों, गाड़ियों और रथों पर लादकर वह धन हस्तिनापुर की ओर ले जाया जाता है, और सेना हर गोरुत पर पड़ाव डालती है।

अध्याय 64अध्याय-सूचीअध्याय 66

ब्राह्मणा ऊचुः

श्लोक 1 (14.65.1)

क्रियतामुपहारोऽद्य त्र्यम्बकस्य महात्मनः । दत्त्वोपहारं नृपते ततः स्वार्थं यतामहे ॥

kriyatāmupahāro'dya tryambakasya mahātmanaḥ | dattvopahāraṃ nṛpate tataḥ svārthaṃ yatāmahe

"आज महात्मा त्र्यम्बक को उपहार चढ़ाया जाए। हे राजन्, उपहार चढ़ाकर फिर हम अपने प्रयोजन के लिए प्रयत्न करेंगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 2 (14.65.2)

श्रुत्वा तु वचनं तेषां ब्राह्मणानां युधिष्ठिरः । गिरीशस्य यथान्यायमुपहारमुपाहरत् ॥

śrutvā tu vacanaṃ teṣāṃ brāhmaṇānāṃ yudhiṣṭhiraḥ | girīśasya yathānyāyamupahāramupāharat

ब्राह्मणों की बात सुनकर युधिष्ठिर ने विधिपूर्वक गिरीश को उपहार अर्पित किया।

श्लोक 3 (14.65.3)

आज्येन तर्पयित्वाऽग्निं विधिवत्संस्कृतेन च । मन्त्रसिद्धं चरुं कृत्वा पुरोधाः स ययौ तदा ॥

ājyena tarpayitvā'gniṃ vidhivatsaṃskṛtena ca | mantrasiddhaṃ caruṃ kṛtvā purodhāḥ sa yayau tadā

विधि से संस्कार किए हुए घी से अग्नि को तृप्त करके और मन्त्रों से सिद्ध चरु तैयार करके पुरोहित तब आगे बढ़ा।

श्लोक 4 (14.65.4)

स गृहीत्वा सुमनसो मन्त्रपूता जनाधिप । मोदकैः पायसेनाथ मांसैश्चोपाहरद्बलिम् ॥

sa gṛhītvā sumanaso mantrapūtā janādhipa | modakaiḥ pāyasenātha māṃsaiścopāharadbalim

हे जनाधिप, मन्त्रों से पवित्र किए हुए पुष्प लेकर उसने मोदक, खीर और मांस के साथ बलि अर्पित की।

श्लोक 5 (14.65.5)

सुमनोभिश्च चित्राभिर्लाजैरुच्चावचैरपि । सर्वं स्विष्टकृतं हुत्वा विधिवद्वेदपारगः । किंकराणां ततः पश्चाच्चकार बलिमुत्तमम् ॥

sumanobhiśca citrābhirlājairuccāvacairapi | sarvaṃ sviṣṭakṛtaṃ hutvā vidhivadvedapāragaḥ | kiṃkarāṇāṃ tataḥ paścāccakāra balimuttamam

रंग-बिरंगे फूलों और तरह-तरह के लाजों के साथ वेदपारंगत उस पुरोहित ने सम्पूर्ण स्विष्टकृत् आहुति विधिपूर्वक देकर फिर अनुचरों के लिए उत्तम बलि अर्पित की।

श्लोक 6 (14.65.6)

यक्षेन्द्राय कुबेराय माणिभद्राय चैव ह । तथाऽन्येषां च यक्षाणां भूतानां पतयश्च ये ॥

yakṣendrāya kuberāya māṇibhadrāya caiva ha | tathā'nyeṣāṃ ca yakṣāṇāṃ bhūtānāṃ patayaśca ye

यक्षों के स्वामी कुबेर को, मणिभद्र को, अन्य यक्षों को और जो भूतों के अधिपति हैं उन्हें,

श्लोक 7 (14.65.7)

कृसरेण च मांसेन निवापैस्तिलसंयुतैः । ओदनं कुम्भशः कृत्वा पुरोधाः समुपाहरत् ॥

kṛsareṇa ca māṃsena nivāpaistilasaṃyutaiḥ | odanaṃ kumbhaśaḥ kṛtvā purodhāḥ samupāharat

खिचड़ी, मांस और तिल मिले नैवेद्यों के साथ पुरोहित ने घड़े-के-घड़े भात का भोग लगाया।

श्लोक 8 (14.65.8)

ब्राह्मणेभ्यः सहस्राणि गवां दत्त्वा तु भूमिपः । नक्तंचराणां भूतानां व्यादिदेश बलिं तदा ॥

brāhmaṇebhyaḥ sahasrāṇi gavāṃ dattvā tu bhūmipaḥ | naktaṃcarāṇāṃ bhūtānāṃ vyādideśa baliṃ tadā

और राजा ने ब्राह्मणों को हज़ारों गौएँ देकर रात में विचरने वाले भूतों के लिए बलि देने की आज्ञा दी।

श्लोक 9 (14.65.9)

धूपगन्धनिरुद्धं तत्सुमनोभिश्च संवृतम् । शुशुभे स्थानमत्यर्थं देवदेवस्य पार्थिव ॥

dhūpagandhaniruddhaṃ tatsumanobhiśca saṃvṛtam | śuśubhe sthānamatyarthaṃ devadevasya pārthiva

धूप की सुगन्ध से भरा और फूलों से ढका हुआ देवदेव का वह स्थान, हे राजन्, अत्यन्त शोभित हुआ।

श्लोक 10 (14.65.10)

कृत्वा पूजां तु रुद्रस्य गणानां चैव सर्वशः । ययौ व्यासं पुरस्कृत्य नृपो रत्ननिधिं प्रति ॥

kṛtvā pūjāṃ tu rudrasya gaṇānāṃ caiva sarvaśaḥ | yayau vyāsaṃ puraskṛtya nṛpo ratnanidhiṃ prati

रुद्र और सब गणों की पूजा करके राजा व्यास को आगे रखकर उस रत्न-निधि की ओर चले।

श्लोक 11 (14.65.11)

पूजयित्वा धनाध्यक्षं प्रणिपत्याभिवाद्य च । सुमनोभिर्विचित्राभिरपूपैः कृसरेण च ॥

pūjayitvā dhanādhyakṣaṃ praṇipatyābhivādya ca | sumanobhirvicitrābhirapūpaiḥ kṛsareṇa ca

धन के अधिपति की पूजा करके, उन्हें प्रणाम और अभिवादन करके, रंग-बिरंगे फूलों, पूओं और खिचड़ी से,

श्लोक 12 (14.65.12)

शङ्खादींश्च निधीन्सर्वान्निधिपालांश्च सर्वशः । अर्चयित्वा द्विजाग्र्यान्स्वस्ति वाच्य च वीर्यवान् ॥

śaṅkhādīṃśca nidhīnsarvānnidhipālāṃśca sarvaśaḥ | arcayitvā dvijāgryānsvasti vācya ca vīryavān

शंख आदि सब निधियों का और सब निधिपालों का पूजन करके, श्रेष्ठ ब्राह्मणों का सत्कार करके और उनसे स्वस्तिवाचन कराके वह पराक्रमी राजा

श्लोक 13 (14.65.13)

तेषां पुण्याहघोषेण तेजसा समवस्थितः । प्रीतिमान्स कुरुश्रेष्ठः खानयामास तं निधिम् ॥

teṣāṃ puṇyāhaghoṣeṇa tejasā samavasthitaḥ | prītimānsa kuruśreṣṭhaḥ khānayāmāsa taṃ nidhim

उनके पुण्याहवाचन के घोष और उनके तेज से दृढ़ होकर, प्रसन्न मन से उन कुरुश्रेष्ठ ने उस निधि को खुदवाया।

श्लोक 14 (14.65.14)

ततः पात्रीः सकरका बहुरूपा मनोरमाः । भृङ्गाराणि कटाहानि कलशान्वर्धमानकान् ॥

tataḥ pātrīḥ sakarakā bahurūpā manoramāḥ | bhṛṅgārāṇi kaṭāhāni kalaśānvardhamānakān

तब छोटे घड़ों सहित बड़े पात्र निकले, अनेक आकार के और मनोहर, तथा झारियाँ, कड़ाहे, कलश और सकोरे,

श्लोक 15 (14.65.15)

बहूनि च विचित्राणि भाजनानि सहस्रशः । उद्धारयामास तदा धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥

bahūni ca vicitrāṇi bhājanāni sahasraśaḥ | uddhārayāmāsa tadā dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ

और हज़ारों अन्य विचित्र बर्तन भी: इन सबको तब धर्मराज युधिष्ठिर ने निकलवाया।

श्लोक 16 (14.65.16)

तेषां रक्षणमप्यासीन्महान्करपुटस्तथा । नद्धं च भाजनं राजंस्तुलार्धमभवन्नृप ॥

teṣāṃ rakṣaṇamapyāsīnmahānkarapuṭastathā | naddhaṃ ca bhājanaṃ rājaṃstulārdhamabhavannṛpa

उनके लिए रक्षा का साधन भी था, एक बड़ा सम्पुट-सन्दूक, और, हे राजन्, एक बँधा हुआ पात्र जिसका वज़न आधा तुला था।

श्लोक 17 (14.65.17)

वाहनं पाण्डुपुत्रस्य तत्रासीत्तु विशांपते । षष्टिरुष्ट्रसहस्राणि शतानि द्विगुणा हयाः ॥

vāhanaṃ pāṇḍuputrasya tatrāsīttu viśāṃpate | ṣaṣṭiruṣṭrasahasrāṇi śatāni dviguṇā hayāḥ

हे प्रजापति, वहाँ पाण्डवपुत्र के वाहनों में साठ हज़ार ऊँट थे और उनसे दुगुने घोड़े थे।

श्लोक 18 (14.65.18)

वारणाश्च महाराज सहस्रशतसंमिताः । शकटानि रथाश्चैव तावदेव करेणवः । खराणां पुरुषाणां च परिसङ्ख्या न विद्यते ॥

vāraṇāśca mahārāja sahasraśatasaṃmitāḥ | śakaṭāni rathāścaiva tāvadeva kareṇavaḥ | kharāṇāṃ puruṣāṇāṃ ca parisaṅkhyā na vidyate

हे महाराज, एक लाख हाथी भी थे; गाड़ियाँ, रथ और हथिनियाँ उतनी ही थीं; और गधों तथा मनुष्यों की गिनती नहीं थी।

श्लोक 19 (14.65.19)

एतद्वित्तं तदभवद्यदुद्दध्रे युधिष्ठिरः । षोडशाष्टौ चतुर्विंशत्सहस्रं भारलक्षणम् ॥

etadvittaṃ tadabhavadyaduddadhre yudhiṣṭhiraḥ | ṣoḍaśāṣṭau caturviṃśatsahasraṃ bhāralakṣaṇam

युधिष्ठिर ने जो धन निकलवाया वह इतना था: बोझों के हिसाब से सोलह, आठ और चौबीस हज़ार।

श्लोक 20 (14.65.20)

एतेष्वादाय तद्द्रव्यं पुनरभ्यर्च्य पाण्डवः । महादेवं प्रति ययौ पुरं नागाह्वयं प्रति ॥

eteṣvādāya taddravyaṃ punarabhyarcya pāṇḍavaḥ | mahādevaṃ prati yayau puraṃ nāgāhvayaṃ prati

उस धन को इन पर लादकर और फिर पूजा करके पाण्डव महादेव की ओर मुख करके नागाह्वय नगर की ओर चल पड़े।

श्लोक 21 (14.65.21)

द्वैपायनाभ्यनुज्ञातः पुरस्कृत्य पुरोहितम् । गोरुते गोरुते चैव न्यवसत्पुरुषर्षभः ॥

dvaipāyanābhyanujñātaḥ puraskṛtya purohitam | gorute gorute caiva nyavasatpuruṣarṣabhaḥ

द्वैपायन की अनुमति से पुरोहित को आगे करके वह पुरुषश्रेष्ठ हर गोरुत (गाय की पुकार जहाँ तक सुनाई दे उतनी दूरी) पर ठहरता गया।

श्लोक 22 (14.65.22)

सा पुराऽभिमुखा राजन्नुवाह महती चमूः । कृच्छ्राद्द्रविणभारार्ता हर्षयन्ती कुरूद्वहान् ॥

sā purā'bhimukhā rājannuvāha mahatī camūḥ | kṛcchrāddraviṇabhārārtā harṣayantī kurūdvahān

नगर की ओर मुख किए वह विशाल सेना धन के बोझ से कष्ट पाती हुई भी कुरुवीरों को हर्षित करती हुई उसे आगे ले चली।

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