आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 64
पाण्डवों का पर्वत के पास पड़ाव और उपवास की रात
युधिष्ठिर की सेना वैभव के साथ उस पर्वत की ओर चलती है जहाँ धन गड़ा है, और वे समतल शुभ भूमि पर पड़ाव डालते हैं; आगे ब्राह्मण और पुरोहित रखे जाते हैं तथा शान्ति-कर्म किया जाता है। वे ब्राह्मणों से उचित समय निश्चित करने को कहते हैं, और ब्राह्मण उत्तर देते हैं कि दिन पवित्र है, पर पहले वे और राजा उपवास तथा तप करें। राजा कुश की शय्याओं पर ब्राह्मणों की बातें सुनते हुए रात बिताते हैं, और प्रभात में ब्राह्मण युधिष्ठिर से कहते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.64.1)
ततस्ते प्रययुर्हृष्टाः प्रहृष्टनरवाहनाः । रथघोषेण महता पूरयन्तो वसुन्धराम् ॥
tataste prayayurhṛṣṭāḥ prahṛṣṭanaravāhanāḥ | rathaghoṣeṇa mahatā pūrayanto vasundharām
तब वे प्रसन्न होकर चले; उनके मनुष्य और वाहन उल्लास से भरे थे, और रथों की गड़गड़ाहट से वे पृथ्वी को भर रहे थे।
श्लोक 2 (14.64.2)
संस्तूयमानाः स्तुतिभिः सूतमागधबन्दिभिः । स्वेन सैन्येन संवीता यथाऽऽदित्याः स्वरश्मिभिः ॥
saṃstūyamānāḥ stutibhiḥ sūtamāgadhabandibhiḥ | svena sainyena saṃvītā yathā''dityāḥ svaraśmibhiḥ
सूत, मागध और बन्दियों की स्तुतियों से प्रशंसित और अपनी सेना से घिरे हुए वे अपनी किरणों से घिरे आदित्यों के समान शोभित थे।
श्लोक 3 (14.64.3)
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि । बभौ युधिष्ठिरस्तत्र पौर्णमास्यामिवोडुराट् ॥
pāṇḍureṇātapatreṇa dhriyamāṇena mūrdhani | babhau yudhiṣṭhirastatra paurṇamāsyāmivoḍurāṭ
सिर पर श्वेत छत्र धारण किए हुए युधिष्ठिर वहाँ पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान शोभित हुए।
श्लोक 4 (14.64.4)
जयाशिषः प्रहृष्टानां नराणां पथि पाण्डवः । प्रत्यगृह्णाद्यथान्यायं यथावत्पुरुषर्षभः ॥
jayāśiṣaḥ prahṛṣṭānāṃ narāṇāṃ pathi pāṇḍavaḥ | pratyagṛhṇādyathānyāyaṃ yathāvatpuruṣarṣabhaḥ
मार्ग में पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव ने प्रसन्न जनों से मिले विजय के आशीर्वादों को विधिपूर्वक और यथोचित रूप से स्वीकार किया।
श्लोक 5 (14.64.5)
तथैव सैनिका राजन्राजानमनुयान्ति ये । तेषां हलहलाशब्दो दिवं स्तब्ध्वा व्यतिष्ठत ॥
tathaiva sainikā rājanrājānamanuyānti ye | teṣāṃ halahalāśabdo divaṃ stabdhvā vyatiṣṭhata
और हे राजन्, जो सैनिक राजा के पीछे चल रहे थे, उनका कोलाहल आकाश को भरकर खड़ा रहा।
श्लोक 6 (14.64.6)
सरांसि सरितश्चैव वनान्युपवनानि च । अत्यक्रामन्महाराजो गिरिं चाप्यन्वपद्यत ॥
sarāṃsi saritaścaiva vanānyupavanāni ca | atyakrāmanmahārājo giriṃ cāpyanvapadyata
महाराज ने सरोवर, नदियाँ, वन और उपवन पार किए और पर्वत के पास पहुँचे।
श्लोक 7 (14.64.7)
तस्मिन्देशे च राजेन्द्र यत्र तद्द्रव्यमुत्तमम् । चक्रे निवेशनं राजा पाण्डवः सहसैनिकैः । शिवे देशे समे चैव तदा भरतसत्तम ॥
tasmindeśe ca rājendra yatra taddravyamuttamam | cakre niveśanaṃ rājā pāṇḍavaḥ sahasainikaiḥ | śive deśe same caiva tadā bharatasattama
हे राजेन्द्र, जिस स्थान पर वह उत्तम धन था, वहाँ पाण्डव राजा ने अपने सैनिकों सहित शुभ और समतल भूमि पर पड़ाव डाला, हे भरतश्रेष्ठ।
श्लोक 8 (14.64.8)
अग्रतो ब्राह्मणान्कृत्वा तपोविद्यादमान्वितान् । पुरोहितं च कौरव्य वेदवेदाङ्गपारगम् ॥
agrato brāhmaṇānkṛtvā tapovidyādamānvitān | purohitaṃ ca kauravya vedavedāṅgapāragam
तप, विद्या और दम से सम्पन्न ब्राह्मणों को, और वेद-वेदाङ्गों के पारगामी पुरोहित को, हे कौरव्य, आगे रखकर,
श्लोक 9 (14.64.9)
आग्निवेश्यं च राजानो ब्राह्मणाः सपुरोधसः । कृत्वा शान्तिं यथान्यायं सर्वशः पर्यवारयन् ॥
āgniveśyaṃ ca rājāno brāhmaṇāḥ sapurodhasaḥ | kṛtvā śāntiṃ yathānyāyaṃ sarvaśaḥ paryavārayan
राजाओं और पुरोहित सहित ब्राह्मणों ने विधिपूर्वक शान्ति-कर्म करके आग्निवेश्य को सब ओर से घेर लिया।
श्लोक 10 (14.64.10)
कृत्वा तु मध्ये राजानममात्यांश्च यथाविधि । षट्पदं नवसङ्ख्यानं निवेशं चक्रिरे जनाः ॥
kṛtvā tu madhye rājānamamātyāṃśca yathāvidhi | ṣaṭpadaṃ navasaṅkhyānaṃ niveśaṃ cakrire janāḥ
राजा और मन्त्रियों को विधिपूर्वक बीच में रखकर लोगों ने छह अंगों और नौ विभागों वाला पड़ाव बनाया।
श्लोक 11 (14.64.11)
मत्तानां वारणेन्द्राणां निवेशं च यथाविधि । कारयित्वा स राजेन्द्रो ब्राह्मणानिदमब्रवीत् ॥
mattānāṃ vāraṇendrāṇāṃ niveśaṃ ca yathāvidhi | kārayitvā sa rājendro brāhmaṇānidamabravīt
मतवाले श्रेष्ठ हाथियों के लिए भी विधिपूर्वक स्थान बनवाकर उस राजा ने ब्राह्मणों से यह कहा:
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 12 (14.64.12)
अस्मिन्कार्ये द्विजश्रेष्ठा नक्षत्रे दिवसे शुभे । यथा भवन्तो मन्यन्ते कर्तुमर्हन्ति तत्तथा ॥
asminkārye dvijaśreṣṭhā nakṣatre divase śubhe | yathā bhavanto manyante kartumarhanti tattathā
"द्विजश्रेष्ठो, इस कार्य में शुभ दिन और शुभ नक्षत्र में आप जैसा उचित समझें, वैसा करें।
श्लोक 13 (14.64.13)
न नः कालात्ययो वै स्यादिहैव परिलम्बताम् । इति निश्चित्य विप्रेन्द्राः क्रियतां यदनन्तरम् ॥
na naḥ kālātyayo vai syādihaiva parilambatām | iti niścitya viprendrāḥ kriyatāṃ yadanantaram
यहीं ठहरे रहने से हमारा समय व्यर्थ न जाए। यह निश्चय करके, विप्रश्रेष्ठो, अब जो आगे करना है वह कीजिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 14 (14.64.14)
श्रुत्वैतद्वचनं राज्ञो ब्राह्मणाः सपुरोधसः । इदमूचुर्वचो हृष्टा धर्मराजप्रियेप्सवः ॥
śrutvaitadvacanaṃ rājño brāhmaṇāḥ sapurodhasaḥ | idamūcurvaco hṛṣṭā dharmarājapriyepsavaḥ
राजा के ये वचन सुनकर पुरोहित सहित ब्राह्मणों ने प्रसन्न होकर, धर्मराज का प्रिय करने की इच्छा से, यह वचन कहा:
ब्राह्मणा ऊचुः
श्लोक 15 (14.64.15)
अद्यैव नक्षत्रमहश्च पुण्यं । यतामहे श्रेष्ठतमक्रियासु । तपोभिरद्येह वसाम राज- । न्नुपोष्यतां चापि भवद्भिरद्य ॥
adyaiva nakṣatramahaśca puṇyaṃ | yatāmahe śreṣṭhatamakriyāsu | tapobhiradyeha vasāma rāja- | nnupoṣyatāṃ cāpi bhavadbhiradya
"आज का ही दिन और नक्षत्र पुण्य है; हम श्रेष्ठतम कर्मों में प्रयत्न करें। हे राजन्, आज हम यहाँ तप के साथ रहेंगे, और आप लोग भी आज उपवास करें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 16 (14.64.16)
श्रुत्वा तु तेषां द्विजसत्तमानां । कृतोपवासा रजनीं नरेन्द्राः ॥
śrutvā tu teṣāṃ dvijasattamānāṃ | kṛtopavāsā rajanīṃ narendrāḥ
उन द्विजश्रेष्ठों की बात सुनकर राजाओं ने उपवास करके
श्लोक 17 (14.64.17)
ऊषुः प्रतीताः कुशसंस्तरेषु । यथाऽध्वरे प्रज्वलिता हुताशाः ॥
ūṣuḥ pratītāḥ kuśasaṃstareṣu | yathā'dhvare prajvalitā hutāśāḥ
प्रसन्न मन से कुश की शय्याओं पर रात बिताई, जैसे यज्ञ में प्रज्वलित अग्नियाँ हों।
श्लोक 18 (14.64.18)
ततो निशा सा व्यगमन्महात्मनां । संशृण्वतां विप्रसमीरिता गिरः । ततः प्रभाते विमले द्विजर्षभा । वचोऽब्रुवन्धर्मसुतं नराधिपम् ॥
tato niśā sā vyagamanmahātmanāṃ | saṃśṛṇvatāṃ viprasamīritā giraḥ | tataḥ prabhāte vimale dvijarṣabhā | vaco'bruvandharmasutaṃ narādhipam
फिर ब्राह्मणों की कही बातें सुनते हुए उन महात्माओं की वह रात बीत गई; और निर्मल प्रभात होने पर श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने धर्मपुत्र नरेश से कहा: