आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 68
कृष्ण का जन्मगृह में प्रवेश और उत्तरा का विलाप
कृष्ण स्त्रियों की प्रार्थना पर सान्त्वना का वचन देकर परीक्षित के जन्मगृह में प्रवेश करते हैं, जो सब प्रचलित रक्षा-साधनों से सुरक्षित है। द्रौपदी उत्तरा को उनके आने की सूचना देती हैं; उत्तरा रोती हुई उनके सामने आकर द्रोणपुत्र के अस्त्र से जले अपने पुत्र को जिलाने की प्रार्थना करती हैं, कहती हैं कि बालक न जिया तो वे प्राण त्याग देंगी, और अभिमन्यु के पीछे जाने की अपनी प्रतिज्ञा याद करती हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.68.1)
एवमुक्तस्तु राजेन्द्र केशिहा दुःखमूर्च्छितः । तथेति व्याजहारोच्चैर्ह्लादयन्निव तं जनम् ॥
evamuktastu rājendra keśihā duḥkhamūrcchitaḥ | tatheti vyājahāroccairhlādayanniva taṃ janam
हे राजेन्द्र, इस प्रकार कहे जाने पर केशिहन्ता कृष्ण ने दुःख से मूर्छित-से होकर उच्च स्वर से "ऐसा ही हो" कहा, मानो उन लोगों को आह्लादित कर रहे हों।
श्लोक 2 (14.68.2)
वाक्येनैतेन हि तदा तं जनं पुरुषर्षभः । ह्लादयामास स विभुर्घर्मार्तं सलिलैरिव ॥
vākyenaitena hi tadā taṃ janaṃ puruṣarṣabhaḥ | hlādayāmāsa sa vibhurgharmārtaṃ salilairiva
उस वाक्य से उन पुरुषश्रेष्ठ प्रभु ने उस समय लोगों को वैसे ही आह्लादित किया, जैसे जल गर्मी से पीड़ित को करता है।
श्लोक 3 (14.68.3)
ततः स प्राविशत्तूर्णं जन्मवेश्म पितुस्तव । अर्चितं पुरुषव्याघ्र सितैर्माल्यैर्यथाविधि ॥
tataḥ sa prāviśattūrṇaṃ janmaveśma pitustava | arcitaṃ puruṣavyāghra sitairmālyairyathāvidhi
तब वे शीघ्र ही तुम्हारे पिता के जन्मगृह में गए, हे पुरुषव्याघ्र, जो विधिपूर्वक श्वेत मालाओं से सजाया गया था,
श्लोक 4 (14.68.4)
अपां कुम्भैः सुपूर्णैश्च विन्यस्तैः सर्वतोदिशम् । घृतेन तिन्दुकालातैः सर्षपैश्च महाभुज ॥
apāṃ kumbhaiḥ supūrṇaiśca vinyastaiḥ sarvatodiśam | ghṛtena tindukālātaiḥ sarṣapaiśca mahābhuja
जिसमें चारों ओर जल से भरे हुए घड़े रखे थे, और हे महाबाहो, घी से सींचे तिन्दुक की लकड़ी के अंगारे तथा सरसों रखी थी,
श्लोक 5 (14.68.5)
अस्त्रैश्च विमलैर्न्यस्तैः पावकैश्च समन्ततः । वृद्धाभिश्चापि रामाभिः परिवारार्थमावृतः । दक्षैश्च परितो धीर भिषग्भिः कुशलैस्तथा ॥
astraiśca vimalairnyastaiḥ pāvakaiśca samantataḥ | vṛddhābhiścāpi rāmābhiḥ parivārārthamāvṛtaḥ | dakṣaiśca parito dhīra bhiṣagbhiḥ kuśalaistathā
जहाँ निर्मल शस्त्र रखे थे और चारों ओर अग्नियाँ जल रही थीं, जो सेवा के लिए नियुक्त वृद्ध स्त्रियों से घिरा था, और हे धीर, चारों ओर कुशल वैद्य खड़े थे।
श्लोक 6 (14.68.6)
ददर्श च स तेजस्वी रक्षोघ्रान्यपि सर्वशः । द्रव्याणि स्थापितानि स्म विधिवत्कुशलैर्जनैः ॥
dadarśa ca sa tejasvī rakṣoghrānyapi sarvaśaḥ | dravyāṇi sthāpitāni sma vidhivatkuśalairjanaiḥ
उन तेजस्वी ने सब ओर राक्षसों को दूर रखने वाली वस्तुएँ भी देखीं, वे सामग्रियाँ, जिन्हें कुशल लोगों ने विधिपूर्वक रखा था।
श्लोक 7 (14.68.7)
तथायुक्तं च तद्दृष्ट्वा जन्मवेश्म पितुस्तव । हृष्टोऽभवद्धृषीकेशः साधुसाध्विति चाब्रवीत् ॥
tathāyuktaṃ ca taddṛṣṭvā janmaveśma pitustava | hṛṣṭo'bhavaddhṛṣīkeśaḥ sādhusādhviti cābravīt
तुम्हारे पिता के जन्मगृह को इस प्रकार सुसज्जित देखकर हृषीकेश प्रसन्न हुए और बोले, "बहुत अच्छा, बहुत अच्छा!"
श्लोक 8 (14.68.8)
तथा ब्रुवति वार्ष्णेये प्रहृष्टवदने तदा । द्रौपदी त्वरिता गत्वा वैराटीं वाक्यमब्रवीत् ॥
tathā bruvati vārṣṇeye prahṛṣṭavadane tadā | draupadī tvaritā gatvā vairāṭīṃ vākyamabravīt
जब वार्ष्णेय हर्षित मुख से यह कह रहे थे, तब द्रौपदी शीघ्र जाकर विराट की पुत्री से यह वचन बोलीं।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 9 (14.68.9)
अयमायाति ते भर्तुर्मातुलो मधुसूदनः । पुराणर्षिरचिन्त्यात्मा समीपमपराजितः ॥
ayamāyāti te bharturmātulo madhusūdanaḥ | purāṇarṣiracintyātmā samīpamaparājitaḥ
"तुम्हारे पति के मामा मधुसूदन, पुराने ऋषि, अचिन्त्य स्वरूप वाले अपराजित, तुम्हारे समीप आ रहे हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (14.68.10)
साऽपि बाष्पकलां वाचं निगृह्याश्रूणि चैव ह । असंवीताऽभवद्देवी देववत्कृष्णमीयुषी ॥
sā'pi bāṣpakalāṃ vācaṃ nigṛhyāśrūṇi caiva ha | asaṃvītā'bhavaddevī devavatkṛṣṇamīyuṣī
उसने भी आँसुओं से भरी वाणी और आँसुओं को रोका; वह रानी बिना घूँघट के, जैसे देवता के पास जाते हैं वैसे ही कृष्ण के पास आई।
श्लोक 11 (14.68.11)
सा तथा दूयमानेन हृदयेन तपस्विनी । दृष्ट्वा गोविन्दमायान्तं कृपणं पर्यदेवयत् ॥
sā tathā dūyamānena hṛdayena tapasvinī | dṛṣṭvā govindamāyāntaṃ kṛpaṇaṃ paryadevayat
वह दुखिया, व्यथित हृदय से, गोविन्द को आते देखकर करुण विलाप करने लगी।
उत्तरोवाच
श्लोक 12 (14.68.12)
पुण्डरीकाक्ष पश्यावां बालेन हि विनाकृतौ । अभिमन्युं च मां चैव हठात्तुल्यं जनार्दन ॥
puṇḍarīkākṣa paśyāvāṃ bālena hi vinākṛtau | abhimanyuṃ ca māṃ caiva haṭhāttulyaṃ janārdana
"कमलनयन, देखो, हम दोनों बालक से रहित हो गए हैं, अभिमन्यु और मैं, समान रूप से और बलपूर्वक, जनार्दन।
श्लोक 13 (14.68.13)
वार्ष्णेयमधुहन्वीर शिरसा त्वां प्रसादये । द्रोणपुत्रास्त्रनिर्दग्धं जीवयैनं ममात्मजम् ॥
vārṣṇeyamadhuhanvīra śirasā tvāṃ prasādaye | droṇaputrāstranirdagdhaṃ jīvayainaṃ mamātmajam
"वार्ष्णेय, मधुसूदन, वीर, मैं सिर झुकाकर तुमसे प्रार्थना करती हूँ: द्रोणपुत्र के अस्त्र से जले हुए मेरे इस पुत्र को जिला दो।
श्लोक 14 (14.68.14)
यदि स्म धर्मराज्ञा वा भीमसेनेन वा पुनः । त्वया वा पुण्डरीकाक्ष वाक्यमुक्तमिदं भवेत् ॥
yadi sma dharmarājñā vā bhīmasenena vā punaḥ | tvayā vā puṇḍarīkākṣa vākyamuktamidaṃ bhavet
"यदि धर्मराज, या भीमसेन, या हे कमलनयन, तुमने ही यह वचन कहा होता:
श्लोक 15 (14.68.15)
अजानतीमिषीकेयं जनित्रीं हन्त्विति प्रभो । अहमेव विनष्टा स्यां नायमेवं गतो भवेत् ॥
ajānatīmiṣīkeyaṃ janitrīṃ hantviti prabho | ahameva vinaṣṭā syāṃ nāyamevaṃ gato bhavet
"'यह ईषीका अस्त्र अनजान जननी को मारे', प्रभो, तो मैं ही नष्ट होती, और यह बालक इस दशा को न पहुँचता।
श्लोक 16 (14.68.16)
गर्भस्थस्यास्य बालस्य ब्रह्मास्त्रेण निपातनम् । कृत्वा नृशंसं दुर्बुद्धिर्द्रौणिः किं फलमश्नुते ॥
garbhasthasyāsya bālasya brahmāstreṇa nipātanam | kṛtvā nṛśaṃsaṃ durbuddhirdrauṇiḥ kiṃ phalamaśnute
"गर्भ में स्थित इस बालक को ब्रह्मास्त्र से गिराने का यह क्रूर कर्म करके दुष्टबुद्धि द्रौणि को कौन-सा फल मिलता है?
श्लोक 17 (14.68.17)
सा त्वां प्रसाद्य शिरसा याचे शत्रुनिबर्हण । प्राणांस्त्यक्ष्यामि गोविन्द नायं संजीवते यदि ॥
sā tvāṃ prasādya śirasā yāce śatrunibarhaṇa | prāṇāṃstyakṣyāmi govinda nāyaṃ saṃjīvate yadi
"इसलिए शत्रुनाशक, मैं सिर झुकाकर तुमसे याचना करती हूँ: गोविन्द, यदि यह जीवित नहीं होता तो मैं प्राण त्याग दूँगी।
श्लोक 18 (14.68.18)
अस्मिन्हि बहवः साधो ये ममासन्मनोरथाः । ते द्रोणपुत्रेण हताः किंनु जीवामि केशव ॥
asminhi bahavaḥ sādho ye mamāsanmanorathāḥ | te droṇaputreṇa hatāḥ kiṃnu jīvāmi keśava
"साधो, मेरी बहुत-सी आशाएँ इसी में थीं, और उन्हें द्रोणपुत्र ने नष्ट कर दिया। केशव, अब मैं क्यों जीऊँ?
श्लोक 19 (14.68.19)
आसीन्मम मतिः कृष्ण पूर्णोत्सङ्गा जनार्दन । अभिवादयिष्ये हृष्टेति तदिदं वितथीकृतम् ॥
āsīnmama matiḥ kṛṣṇa pūrṇotsaṅgā janārdana | abhivādayiṣye hṛṣṭeti tadidaṃ vitathīkṛtam
"कृष्ण, मेरे मन में था, 'जनार्दन, गोद भरी हुई लेकर मैं हर्ष से उन्हें प्रणाम करूँगी।' वह आशा व्यर्थ कर दी गई।
श्लोक 20 (14.68.20)
चपलाक्षस्य दायादे मृतेऽस्मिन्पुरुषर्षभ । विफला मे कृताः कृष्ण हृदि सर्वे मनोरथाः ॥
capalākṣasya dāyāde mṛte'sminpuruṣarṣabha | viphalā me kṛtāḥ kṛṣṇa hṛdi sarve manorathāḥ
"पुरुषश्रेष्ठ, चंचल नेत्रों वाले अभिमन्यु का वारिस मर गया, कृष्ण, इसलिए मेरे हृदय की सब आशाएँ निष्फल हो गईं।
श्लोक 21 (14.68.21)
चपलाक्षः किलातीव प्रियस्ते मधुसूदन । सुतं पश्य त्वमस्यैनं ब्रह्मास्त्रेण निपातितम् ॥
capalākṣaḥ kilātīva priyaste madhusūdana | sutaṃ paśya tvamasyainaṃ brahmāstreṇa nipātitam
"मधुसूदन, चंचल नेत्रों वाला अभिमन्यु तुम्हें अत्यन्त प्रिय था। तो उसके इस पुत्र को देखो, जिसे ब्रह्मास्त्र ने गिरा दिया।
श्लोक 22 (14.68.22)
कृतघ्नोऽयं नृशंसोऽयं यथाऽस्य जनकस्तथा । यः पाण्डवीं श्रियं त्यक्त्वा गतोऽद्य यमसादनं ॥
kṛtaghno'yaṃ nṛśaṃso'yaṃ yathā'sya janakastathā | yaḥ pāṇḍavīṃ śriyaṃ tyaktvā gato'dya yamasādanaṃ
"यह कृतघ्न है, यह निर्दय है, जैसा इसका पिता था, जो पाण्डवों की लक्ष्मी को छोड़कर आज यमलोक चला गया।
श्लोक 23 (14.68.23)
मया चैतत्प्रतिज्ञातं रणमूर्धनि केशव । अभिमन्यौ हते वीर त्वामेष्याम्यचिरादिति ॥
mayā caitatpratijñātaṃ raṇamūrdhani keśava | abhimanyau hate vīra tvāmeṣyāmyacirāditi
"और केशव, मैंने रणभूमि के सिरे पर यह प्रतिज्ञा की थी: 'वीर, अभिमन्यु के मारे जाने पर मैं शीघ्र ही तुम्हारे पास आऊँगी।'
श्लोक 24 (14.68.24)
तच्च नाकरवं कृष्ण नृशंसा जीवितप्रिया । इदानीं मां गतां तत्र किंनु वक्ष्यति फाल्गुनिः ॥
tacca nākaravaṃ kṛṣṇa nṛśaṃsā jīvitapriyā | idānīṃ māṃ gatāṃ tatra kiṃnu vakṣyati phālguniḥ
"कृष्ण, निर्दय और जीवन की प्रेमी होने के कारण मैंने वह नहीं किया। अब जब मैं वहाँ जाऊँगी, तो फाल्गुनि (अभिमन्यु) मुझसे क्या कहेगा?"