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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 69

कृष्ण द्वारा बालक परीक्षित को जीवनदान

उत्तरा मूर्छित होती हैं, फिर उठकर अपने मृत पुत्र और कृष्ण से शोकभरे वचन कहती हैं और प्राण त्यागने की बात करती हैं। कृष्ण ब्रह्मास्त्र को लौटा लेते हैं और अपनी सत्यनिष्ठा, धर्म तथा कर्मों की शपथ लेकर चरण-स्पर्श से बालक को जीवन देते हैं। शिशु धीरे-धीरे हिलने लगता है।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (14.69.1)

सैवं विलप्य करुणं सोन्मादेव तपस्विनी । उत्तरा न्यपतद्भूमौ कृपणा पुत्रगृद्धिनी ॥

saivaṃ vilapya karuṇaṃ sonmādeva tapasvinī | uttarā nyapatadbhūmau kṛpaṇā putragṛddhinī

इस प्रकार करुण विलाप करके, उन्मत्त-सी, पुत्र के लिए तरसती हुई वह दीन उत्तरा भूमि पर गिर पड़ी।

श्लोक 2 (14.69.2)

तां तु दृष्ट्वा निपतितां हतपुत्रपरिच्छदाम् । चुक्रोश कुन्ती दुःखार्ता सर्वाश्च भरतस्त्रियः ॥

tāṃ tu dṛṣṭvā nipatitāṃ hataputraparicchadām | cukrośa kuntī duḥkhārtā sarvāśca bharatastriyaḥ

पुत्र रूपी अपने सर्वस्व के मारे जाने पर उसे गिरी देखकर कुन्ती दुःख से चीख उठीं, और सब भरतवंश की स्त्रियाँ भी।

श्लोक 3 (14.69.3)

मुहूर्तमिव राजेन्द्र पाण्डवानां निवेशनम् । अप्रेक्षणीयमभवदार्तस्वनविनादितम् ॥

muhūrtamiva rājendra pāṇḍavānāṃ niveśanam | aprekṣaṇīyamabhavadārtasvanavināditam

हे राजेन्द्र, क्षण भर के लिए पाण्डवों का वह भवन आर्तनाद से गूँजता हुआ देखने योग्य न रहा।

श्लोक 4 (14.69.4)

सा मुहूर्तं च राजेन्द्र पुत्रशोकाभिपीडिता । कश्मलाभिहता वीर वैराटी त्वभवत्तदा ॥

sā muhūrtaṃ ca rājendra putraśokābhipīḍitā | kaśmalābhihatā vīra vairāṭī tvabhavattadā

हे राजेन्द्र, पुत्रशोक से पीड़ित विराटपुत्री उस समय क्षण भर के लिए, हे वीर, मूर्छा से अभिभूत हो गई।

श्लोक 5 (14.69.5)

प्रतिलभ्य तु सा संज्ञामुत्तरा भरतर्षभ । अङ्कमारोप्य तं पुत्रमिदं वचनमब्रवीत् ॥

pratilabhya tu sā saṃjñāmuttarā bharatarṣabha | aṅkamāropya taṃ putramidaṃ vacanamabravīt

हे भरतश्रेष्ठ, फिर होश में आकर उत्तरा ने उस पुत्र को गोद में लिया और यह वचन कहा।

उत्तरोवाच

श्लोक 6 (14.69.6)

धर्मज्ञस्य सुतः संस्त्वं न धर्ममवबुध्यसे । यस्त्वं वृष्णिप्रवीरस्य कुरुषे नाभिवादनम् ॥

dharmajñasya sutaḥ saṃstvaṃ na dharmamavabudhyase | yastvaṃ vṛṣṇipravīrasya kuruṣe nābhivādanam

"तू धर्म जानने वाले का पुत्र होकर भी धर्म को नहीं समझता, क्योंकि तू वृष्णियों के प्रमुख वीर को प्रणाम नहीं करता।

श्लोक 7 (14.69.7)

पुत्र गत्वा मम वचो ब्रूयास्त्वं पितरं त्विदम् । दुर्मरं प्राणिनां वीर काले प्राप्ते कथञ्चन ॥

putra gatvā mama vaco brūyāstvaṃ pitaraṃ tvidam | durmaraṃ prāṇināṃ vīra kāle prāpte kathañcana

"पुत्र, जाकर अपने पिता से मेरा यह सन्देश कहना: वीर, प्राणियों के लिए काल आ जाने पर भी मरना कठिन होता है।

श्लोक 8 (14.69.8)

याऽहं त्वया विनाऽद्येह पत्या पुत्रेण चैव ह । मरणं नाभिगच्छामि हतस्वस्तिरकिञ्चना ॥

yā'haṃ tvayā vinā'dyeha patyā putreṇa caiva ha | maraṇaṃ nābhigacchāmi hatasvastirakiñcanā

"मैं, जो आज यहाँ तुम्हारे बिना, पति और पुत्र के बिना हूँ, फिर भी मृत्यु को नहीं प्राप्त होती; मेरा कल्याण नष्ट हो गया है और मेरे पास कुछ नहीं रहा।

श्लोक 9 (14.69.9)

अथवा धर्मराज्ञाऽहमनुज्ञाता महाभुज । भक्षयिष्ये विषं घोरं प्रवेक्ष्ये वा हुताशनम् ॥

athavā dharmarājñā'hamanujñātā mahābhuja | bhakṣayiṣye viṣaṃ ghoraṃ pravekṣye vā hutāśanam

"अथवा, महाबाहो, धर्मराज की आज्ञा पाकर मैं घोर विष खा लूँगी या अग्नि में प्रवेश करूँगी।

श्लोक 10 (14.69.10)

अथवा दुर्भरं तात यदिदं मे सहस्रधा । पतिपुत्रविहीनाया हृदयं न विदीर्यते ॥

athavā durbharaṃ tāta yadidaṃ me sahasradhā | patiputravihīnāyā hṛdayaṃ na vidīryate

"अथवा, बेटा, यह भी एक कठिन भार है कि पति और पुत्र से रहित मेरा हृदय हज़ार टुकड़े होकर नहीं फटता।

श्लोक 11 (14.69.11)

उत्तिष्ठ पुत्र पश्येमां दुःखितां प्रपितामहीम् । आर्तामुपप्लुतां दीनां निमग्नां शोकसागरे ॥

uttiṣṭha putra paśyemāṃ duḥkhitāṃ prapitāmahīm | ārtāmupaplutāṃ dīnāṃ nimagnāṃ śokasāgare

"उठ, मेरे पुत्र, अपनी इस दुःखिनी परदादी को देख, जो पीड़ित, व्याकुल, दीन और शोक-सागर में डूबी हुई है।

श्लोक 12 (14.69.12)

आर्यां च पश्य पाञ्चालीं सात्वतीं च तपस्विनीम् । मां च पश्य सुदुःखार्तां व्याधविद्धां मृगीमिव ॥

āryāṃ ca paśya pāñcālīṃ sātvatīṃ ca tapasvinīm | māṃ ca paśya suduḥkhārtāṃ vyādhaviddhāṃ mṛgīmiva

"आर्या पाञ्चाली और तपस्विनी सात्वती को भी देख; और मुझे भी देख, जो अत्यन्त दुःख से व्याकुल हूँ, व्याध से बिंधी हुई हरिणी के समान।

श्लोक 13 (14.69.13)

उत्तिष्ठ पश्य वदनं लोकनाथस्य धीमतः । पुण्डरीकपलाशाक्षं पुरेव चपलेक्षणम् ॥

uttiṣṭha paśya vadanaṃ lokanāthasya dhīmataḥ | puṇḍarīkapalāśākṣaṃ pureva capalekṣaṇam

"उठ, बुद्धिमान् लोकनाथ का मुख देख, कमलदल के समान नेत्रों वाला, पहले जैसे चंचल दृष्टि वाला।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (14.69.14)

एवं विप्रलपन्तीं तु दृष्ट्वा निपतितां पुनः । उत्तरां तां स्त्रियः सर्वाः पुनरुत्थापयन्त्युत ॥

evaṃ vipralapantīṃ tu dṛṣṭvā nipatitāṃ punaḥ | uttarāṃ tāṃ striyaḥ sarvāḥ punarutthāpayantyuta

उसे इस प्रकार विलाप करते और फिर गिरते देखकर सब स्त्रियों ने उत्तरा को फिर उठाया।

श्लोक 15 (14.69.15)

उत्थाय च पुनर्धैर्यात्तदा मत्स्यपतेः सुता । प्राञ्जलिः पुण्डरीकाक्षं भूमावेवाभ्यवादयत् ॥

utthāya ca punardhairyāttadā matsyapateḥ sutā | prāñjaliḥ puṇḍarīkākṣaṃ bhūmāvevābhyavādayat

और फिर धैर्य के साथ उठकर मत्स्यराज की पुत्री ने हाथ जोड़कर वहीं भूमि पर कमलनयन को प्रणाम किया।

श्लोक 16 (14.69.16)

श्रुत्वा स तस्या विपुलं विलापं पुरुषर्षभः । उपस्पृश्य ततः कृष्णो ब्रह्मास्त्रं प्रत्यसंहरत् ॥

śrutvā sa tasyā vipulaṃ vilāpaṃ puruṣarṣabhaḥ | upaspṛśya tataḥ kṛṣṇo brahmāstraṃ pratyasaṃharat

उसका बहुत बड़ा विलाप सुनकर पुरुषश्रेष्ठ कृष्ण ने आचमन किया और उस ब्रह्मास्त्र को लौटा लिया।

श्लोक 17 (14.69.17)

प्रतिजज्ञे च दाशार्हस्तस्य जीवितमच्युतः । अब्रवीच्च विशुद्धात्मा सर्वं विश्रावयज्जगत् ॥

pratijajñe ca dāśārhastasya jīvitamacyutaḥ | abravīcca viśuddhātmā sarvaṃ viśrāvayajjagat

और अच्युत दाशार्ह ने उस बालक के जीवन की प्रतिज्ञा की, और शुद्धात्मा ने सारे जगत् को सुनाते हुए कहा:

वासुदेव उवाच

श्लोक 18 (14.69.18)

न ब्रवीम्युत्तरे मिथ्या सत्यमेतद्भविष्यति । एष संजीवयाम्येनं पश्यतां सर्वदेहिनाम् ॥

na bravīmyuttare mithyā satyametadbhaviṣyati | eṣa saṃjīvayāmyenaṃ paśyatāṃ sarvadehinām

"उत्तरा, मैं झूठ नहीं कहता; यह सत्य होगा। देखो, मैं सब प्राणियों के देखते हुए इसे जिलाता हूँ।

श्लोक 19 (14.69.19)

नोक्तपूर्वं मया मिथ्या स्वैरेष्वपि कदाचन । न च युद्धात्परावृत्तस्तथा संजीवतामयम् ॥

noktapūrvaṃ mayā mithyā svaireṣvapi kadācana | na ca yuddhātparāvṛttastathā saṃjīvatāmayam

"मैंने पहले कभी विनोद में भी झूठ नहीं कहा, और न युद्ध से पीछे हटा; इसलिए यह बालक जीवित हो।

श्लोक 20 (14.69.20)

यथा मे दयितो धर्मो ब्राह्मणश्च विशेषतः । अभिमन्योः सुतो जातो मृतो जीवत्वयं तथा ॥

yathā me dayito dharmo brāhmaṇaśca viśeṣataḥ | abhimanyoḥ suto jāto mṛto jīvatvayaṃ tathā

"जैसे धर्म मुझे प्रिय है, और विशेष रूप से ब्राह्मण प्रिय हैं, वैसे ही अभिमन्यु का यह मृत उत्पन्न पुत्र जीवित हो।

श्लोक 21 (14.69.21)

यथाऽहं नाभिजानामि विजये तु कदाचन । विरोधं तेन सत्येन मृतो जीवत्वयं शिशुः ॥

yathā'haṃ nābhijānāmi vijaye tu kadācana | virodhaṃ tena satyena mṛto jīvatvayaṃ śiśuḥ

"जैसे मुझे विजय (अर्जुन) के साथ कभी कोई विरोध याद नहीं आता, उस सत्य के बल से यह मृत शिशु जीवित हो।

श्लोक 22 (14.69.22)

यथा सत्यं च धर्मश्च मयि नित्यं प्रतिष्ठितौ । तथा मृतः शिशुरयं जीवतादभिमन्युजः ॥

yathā satyaṃ ca dharmaśca mayi nityaṃ pratiṣṭhitau | tathā mṛtaḥ śiśurayaṃ jīvatādabhimanyujaḥ

"जैसे सत्य और धर्म सदा मुझमें प्रतिष्ठित हैं, वैसे ही अभिमन्यु का यह मृत शिशु जीवित हो।

श्लोक 23 (14.69.23)

यथा कंसश्च केशी च धर्मेण निहतौ मया । तेन सत्येन बालोऽयं पुनः संजीवतामिह ॥

yathā kaṃsaśca keśī ca dharmeṇa nihatau mayā | tena satyena bālo'yaṃ punaḥ saṃjīvatāmiha

"जैसे कंस और केशी मेरे द्वारा धर्मपूर्वक मारे गए, उस सत्य के बल से यह बालक यहाँ फिर जीवित हो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 24 (14.69.24)

इत्युक्त्वा वासुदेवोऽथ तं बालं भरतर्षभ । पादेन कमलाभेन ब्रह्मरुद्रार्चितेन च । पस्पर्श पुण्डरीकाक्ष आपादतलमस्तकम् ॥

ityuktvā vāsudevo'tha taṃ bālaṃ bharatarṣabha | pādena kamalābhena brahmarudrārcitena ca | pasparśa puṇḍarīkākṣa āpādatalamastakam

हे भरतश्रेष्ठ, यह कहकर कमलनयन वासुदेव ने अपने कमल-सदृश चरण से, जो ब्रह्मा और रुद्र द्वारा पूजित है, उस बालक का पैरों के तलवे से मस्तक तक स्पर्श किया।

श्लोक 25 (14.69.25)

स्पृष्टमात्रस्तु कृष्णेन स बालो भरतर्षभ । शनैःशनैर्महाराज प्रापद्यत स चेतनाम् ॥

spṛṣṭamātrastu kṛṣṇena sa bālo bharatarṣabha | śanaiḥśanairmahārāja prāpadyata sa cetanām

हे भरतश्रेष्ठ, कृष्ण के स्पर्श मात्र से वह बालक धीरे-धीरे, हे महाराज, चेतना को प्राप्त हुआ।

श्लोक 26 (14.69.26)

शनैःशनैर्महाराज प्रास्पन्दत सचेतनः ॥

śanaiḥśanairmahārāja prāspandata sacetanaḥ

धीरे-धीरे, हे महाराज, वह सचेत होकर हिलने-डुलने लगा।

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