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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 71

व्यास की अश्वमेध की अनुमति; युधिष्ठिर का कृष्ण से दीक्षा लेने का आग्रह

पाण्डव कृष्ण और वृष्णियों के साथ हस्तिनापुर में प्रवेश करते हैं और धृतराष्ट्र, गान्धारी, कुन्ती तथा विदुर का अभिवादन करते हैं; परीक्षित को जिलाने के कारण कृष्ण का सम्मान होता है। व्यास के आने पर युधिष्ठिर लाए हुए धन को अश्वमेध महायज्ञ में लगाने की अनुमति माँगते हैं, और व्यास अनुमति देकर उस यज्ञ को पापनाशक बताते हैं। फिर युधिष्ठिर कृष्ण से स्वयं दीक्षा लेने को कहते हैं, पर कृष्ण कहते हैं कि यह कार्य युधिष्ठिर को ही करना है, और पूरा सहयोग देने का वचन देते हैं।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (14.71.1)

तान्समीपगताञ्श्रुत्वा पाण्डवाञ्शत्रुकर्शनः । वासुदेवः सहामात्यः प्रययौ ससुहृद्गणः । ते समेत्य यथान्यायं प्रत्युद्याता दिदृक्षया ॥

tānsamīpagatāñśrutvā pāṇḍavāñśatrukarśanaḥ | vāsudevaḥ sahāmātyaḥ prayayau sasuhṛdgaṇaḥ | te sametya yathānyāyaṃ pratyudyātā didṛkṣayā

शत्रुओं का दमन करने वाले पाण्डवों को निकट आया सुनकर वासुदेव अपने मन्त्रियों और मित्रों के समूह के साथ चल पड़े। विधिपूर्वक मिलकर वे उन्हें देखने की उत्सुकता से आगे बढ़कर उनका स्वागत करने गए।

श्लोक 2 (14.71.2)

ते समेत्य तथाधर्मं पाण्डवा वृष्णिभिः सह । विविशुः सहिता राजन्पुरं वारणसाह्वयम् ॥

te sametya tathādharmaṃ pāṇḍavā vṛṣṇibhiḥ saha | viviśuḥ sahitā rājanpuraṃ vāraṇasāhvayam

हे राजन्, धर्म के अनुसार मिलकर पाण्डवों ने वृष्णियों के साथ एकत्र होकर वारणसाह्वय (हस्तिनापुर) नगर में प्रवेश किया।

श्लोक 3 (14.71.3)

विशतस्तस्य सैन्यस्य खुरनेमिस्वनेन ह । द्यावापृथिव्यौ खं चैव सर्वमासीत्समावृतम् ॥

viśatastasya sainyasya khuranemisvanena ha | dyāvāpṛthivyau khaṃ caiva sarvamāsītsamāvṛtam

उस सेना के प्रवेश करते समय खुरों और पहियों की नेमियों की ध्वनि से द्युलोक, पृथ्वी और सारा आकाश भर गया।

श्लोक 4 (14.71.4)

ते कोशानग्रतः कृत्वा विविशुः स्वं पुरं तदा । पाण्डवाः प्रीतमनसः सामात्याः ससुहृद्गणाः ॥

te kośānagrataḥ kṛtvā viviśuḥ svaṃ puraṃ tadā | pāṇḍavāḥ prītamanasaḥ sāmātyāḥ sasuhṛdgaṇāḥ

खजाने को आगे करके प्रसन्नचित्त पाण्डवों ने अपने मन्त्रियों और मित्रों के समूहों के साथ तब अपने नगर में प्रवेश किया।

श्लोक 5 (14.71.5)

ते समेत्य यथान्यायं धृतराष्ट्रं जनाधिपम् । कीर्तयन्तः स्वनामानि तस्य पादौ ववन्दिरे ॥

te sametya yathānyāyaṃ dhṛtarāṣṭraṃ janādhipam | kīrtayantaḥ svanāmāni tasya pādau vavandire

उचित रीति से राजा धृतराष्ट्र से मिलकर उन्होंने अपने-अपने नाम बताए और उनके चरणों में प्रणाम किया।

श्लोक 6 (14.71.6)

धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञाता गान्धारीं सुबलात्मजाम् । कुन्तीं च राजशार्दूल तदा भरतसत्तम ॥

dhṛtarāṣṭrābhyanujñātā gāndhārīṃ subalātmajām | kuntīṃ ca rājaśārdūla tadā bharatasattama

हे राजशार्दूल, हे भरतश्रेष्ठ, धृतराष्ट्र की अनुमति पाकर उन्होंने तब सुबलपुत्री गान्धारी और कुन्ती को प्रणाम किया।

श्लोक 7 (14.71.7)

विदुरं पूजयित्वा च वैश्यापुत्रं समेत्य च । पूज्यमानाः स्म ते वीरा व्यरोचन्त विशाम्पते ॥

viduraṃ pūjayitvā ca vaiśyāputraṃ sametya ca | pūjyamānāḥ sma te vīrā vyarocanta viśāmpate

विदुर का आदर करके और वैश्या-पुत्र (युयुत्सु) से मिलकर, स्वयं भी सम्मानित होते हुए वे वीर, हे प्रजापति, शोभित हुए।

श्लोक 8 (14.71.8)

ततस्तत्परमाश्चर्यं विचित्रं महदद्भुतम् । शुश्रुवुस्ते तदा वीराः पितुस्ते जन्म भारत ॥

tatastatparamāścaryaṃ vicitraṃ mahadadbhutam | śuśruvuste tadā vīrāḥ pituste janma bhārata

हे भारत, तब उन वीरों ने वह परम आश्चर्यजनक, विचित्र, महान् और अद्भुत वृत्तान्त सुना, जो तुम्हारे पिता के जन्म का था।

श्लोक 9 (14.71.9)

तदुपश्रुत्य तत्कर्म वासुदेवस्य धीमतः । पूजार्हं पूजयामासुः कृष्णं देवकीनन्दनम् ॥

tadupaśrutya tatkarma vāsudevasya dhīmataḥ | pūjārhaṃ pūjayāmāsuḥ kṛṣṇaṃ devakīnandanam

बुद्धिमान् वासुदेव का वह कर्म सुनकर उन्होंने पूजा के योग्य देवकीनन्दन कृष्ण का सम्मान किया।

श्लोक 10 (14.71.10)

ततः कतिपयाहस्य व्यासः सत्यवतीसुतः । आजगाम महातेजा नगरं नागसाह्वयम् ॥

tataḥ katipayāhasya vyāsaḥ satyavatīsutaḥ | ājagāma mahātejā nagaraṃ nāgasāhvayam

कुछ दिन बाद सत्यवती के पुत्र महातेजस्वी व्यास हस्तिनापुर नगर में आए।

श्लोक 11 (14.71.11)

तस्य सर्वे यथान्यायं पूजां चक्रुः कुरूद्वहाः । सह वृष्ण्यन्धकव्याघ्रैरुपासांचक्रिरे तदा ॥

tasya sarve yathānyāyaṃ pūjāṃ cakruḥ kurūdvahāḥ | saha vṛṣṇyandhakavyāghrairupāsāṃcakrire tadā

कुरुवंश के सब श्रेष्ठ पुरुषों ने उनका यथोचित सम्मान किया और वृष्णियों तथा अन्धकों के व्याघ्रों के साथ उनकी सेवा में बैठे।

श्लोक 12 (14.71.12)

तत्र नानाविधाकाराः कथाः समभिकीर्त्य वै । युधिष्ठिरो धर्मसुतो व्यासं वचनमब्रवीत् ॥

tatra nānāvidhākārāḥ kathāḥ samabhikīrtya vai | yudhiṣṭhiro dharmasuto vyāsaṃ vacanamabravīt

वहाँ अनेक प्रकार की कथाएँ कहने के बाद धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने व्यास से यह बात कही।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 13 (14.71.13)

भवत्प्रसादाद्भगवन्यदिदं रत्नमाहृतम् । उपयोक्तुं तदिच्छामि वाजिमेधे महाक्रतौ ॥

bhavatprasādādbhagavanyadidaṃ ratnamāhṛtam | upayoktuṃ tadicchāmi vājimedhe mahākratau

भगवन्, आपकी कृपा से यह धन लाया गया है। मैं इसे वाजिमेध नामक महायज्ञ में लगाना चाहता हूँ।

श्लोक 14 (14.71.14)

तमनुज्ञातुमिच्छामि भवता मुनिसत्तम । त्वदधीना वयं सर्वे कृष्णस्य च महात्मनः ॥

tamanujñātumicchāmi bhavatā munisattama | tvadadhīnā vayaṃ sarve kṛṣṇasya ca mahātmanaḥ

मुनिश्रेष्ठ, मैं इसके लिए आपकी अनुमति चाहता हूँ; हम सब आप पर और महात्मा कृष्ण पर निर्भर हैं।

व्यास उवाच

श्लोक 15 (14.71.15)

अनुजानामि राजंस्त्वां क्रियतां यदनन्तरम् । यजस्व वाजिमेधेन विधिवद्दक्षिणावता ॥

anujānāmi rājaṃstvāṃ kriyatāṃ yadanantaram | yajasva vājimedhena vidhivaddakṣiṇāvatā

राजन्, मैं तुम्हें अनुमति देता हूँ; अब जो आगे करना है वह किया जाए। विधिपूर्वक और उदार दक्षिणा के साथ अश्वमेध यज्ञ करो।

श्लोक 16 (14.71.16)

अश्वमेधो हि राजेन्द्र पावनः सर्वपाप्मनाम् । तेनेष्ट्वा त्वं विपाप्मा वै भविता नात्र संशयः ॥

aśvamedho hi rājendra pāvanaḥ sarvapāpmanām | teneṣṭvā tvaṃ vipāpmā vai bhavitā nātra saṃśayaḥ

हे राजेन्द्र, अश्वमेध सब पापों को शुद्ध करने वाला है। उसे करके तुम निष्पाप हो जाओगे, इसमें कोई सन्देह नहीं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 17 (14.71.17)

इत्युक्तः स तु धर्मात्मा कुरुराजो युधिष्ठिरः । अश्वमेधस्य कौरव्य चकाराहरणे मतिम् ॥

ityuktaḥ sa tu dharmātmā kururājo yudhiṣṭhiraḥ | aśvamedhasya kauravya cakārāharaṇe matim

इस प्रकार कहे जाने पर धर्मात्मा कुरुराज युधिष्ठिर ने, हे कुरुवंशी, अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया।

श्लोक 18 (14.71.18)

समनुज्ञाप्य तत्सर्वं कृष्णद्वैपायनं नृपः । वासुदेवमथाभ्येत्य वाग्मी वचनमब्रवीत् ॥

samanujñāpya tatsarvaṃ kṛṣṇadvaipāyanaṃ nṛpaḥ | vāsudevamathābhyetya vāgmī vacanamabravīt

यह सब कृष्णद्वैपायन से अनुमति लेकर वाक्पटु राजा वासुदेव के पास गए और उनसे बोले:

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 19 (14.71.19)

देवकी सुप्रजा देवी त्वया पुरुषसत्तम । यद्ब्रूयां त्वां महाबाहो तत्कृथास्त्वमिहाच्युत ॥

devakī suprajā devī tvayā puruṣasattama | yadbrūyāṃ tvāṃ mahābāho tatkṛthāstvamihācyuta

पुरुषोत्तम, देवकी तुम्हारे कारण उत्तम सन्तान वाली हैं। हे महाबाहु, हे अच्युत, मैं तुमसे जो कहूँ, वह तुम यहाँ करना।

श्लोक 20 (14.71.20)

त्वत्प्रभावार्जितान्भोगानश्नीम यदुनन्दन । पराक्रमेण बुद्ध्या च त्वयेयं निर्जिता मही ॥

tvatprabhāvārjitānbhogānaśnīma yadunandana | parākrameṇa buddhyā ca tvayeyaṃ nirjitā mahī

हे यदुनन्दन, हम तुम्हारे प्रभाव से प्राप्त भोगों को भोग रहे हैं; तुम्हारे पराक्रम और बुद्धि से ही यह पृथ्वी जीती गई है।

श्लोक 21 (14.71.21)

दीक्षयस्व त्वमात्मानं त्वं हि नः परमो गुरुः । त्वयीष्टवति दाशार्ह विपाप्मा भविता ह्यहम् ॥

dīkṣayasva tvamātmānaṃ tvaṃ hi naḥ paramo guruḥ | tvayīṣṭavati dāśārha vipāpmā bhavitā hyaham

तुम स्वयं दीक्षा ग्रहण करो, क्योंकि तुम हमारे परम गुरु हो। हे दाशार्ह, तुम्हारे यज्ञ कर लेने पर मैं निष्पाप हो जाऊँगा।

श्लोक 22 (14.71.22)

त्वं हि यज्ञो गुरुश्च त्वं धर्मज्ञस्त्वं प्रजापतिः । त्वं गतिः सर्वभूतानामिति मे निश्चिता मतिः ॥

tvaṃ hi yajño guruśca tvaṃ dharmajñastvaṃ prajāpatiḥ | tvaṃ gatiḥ sarvabhūtānāmiti me niścitā matiḥ

तुम ही यज्ञ हो, तुम ही गुरु हो, तुम धर्म के ज्ञाता हो, तुम प्रजापति हो। तुम सब प्राणियों की गति हो — ऐसा मेरा निश्चित मत है।

वासुदेव उवाच

श्लोक 23 (14.71.23)

त्वमेवैतन्महाबाहो कर्तुमर्हस्यरिंदम । त्वं गतिः सर्वभूतानामिति मे निश्चिता मतिः ॥

tvamevaitanmahābāho kartumarhasyariṃdama | tvaṃ gatiḥ sarvabhūtānāmiti me niścitā matiḥ

हे महाबाहु, शत्रुओं का दमन करने वाले, यह तुम्हीं को करना चाहिए। तुम सब प्राणियों की गति हो — ऐसा मेरा निश्चित मत है।

श्लोक 24 (14.71.24)

त्वं चाद्य कुरुवीराणां धर्मेण हि विराजसे । गुणीभूताः स्म ते राजंस्त्वं नो राजन्गुरुर्मतः । यजस्व मदनुज्ञातः प्राप्य एष क्रतुस्त्वया ॥

tvaṃ cādya kuruvīrāṇāṃ dharmeṇa hi virājase | guṇībhūtāḥ sma te rājaṃstvaṃ no rājangururmataḥ | yajasva madanujñātaḥ prāpya eṣa kratustvayā

आज तुम कुरुवीरों में अपने धर्म से सुशोभित हो। हे राजन्, हम तुम्हारे साधन मात्र हैं; तुम हमारे गुरु माने गए हो। मेरी अनुमति से यज्ञ करो; यह यज्ञ तुम्हारे ही द्वारा सम्पन्न होने योग्य है।

श्लोक 25 (14.71.25)

युनक्तु नो भवान्कार्ये यत्र वाञ्छसि भारत । सत्यं ते प्रतिजानामि सर्वं कर्तास्मि तेऽनघ ॥

yunaktu no bhavānkārye yatra vāñchasi bhārata | satyaṃ te pratijānāmi sarvaṃ kartāsmi te'nagha

हे भारत, आप जिस कार्य में चाहें हमें लगाइए। हे निष्पाप, मैं सच कहकर प्रतिज्ञा करता हूँ कि सब कुछ करूँगा।

श्लोक 26 (14.71.26)

भीमसेनार्जुनौ चैव तथा माद्रवतीसुतौ । इष्टवन्तो भविष्यन्ति त्वयीष्टवति पार्थिवे ॥

bhīmasenārjunau caiva tathā mādravatīsutau | iṣṭavanto bhaviṣyanti tvayīṣṭavati pārthive

भीमसेन, अर्जुन और माद्री के दोनों पुत्र भी, राजन्, आपके यज्ञ करने पर यज्ञ कर चुके माने जाएँगे।

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