आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 72
यज्ञ के अश्व का मोचन और अर्जुन को उसकी रक्षा का भार
युधिष्ठिर व्यास से दीक्षा का समय निश्चित करने को कहते हैं। व्यास पैल और याज्ञवल्क्य को यज्ञ कराने वाला बताते हैं, चैत्र की पूर्णिमा को दीक्षा का दिन ठहराते हैं और योग्य अश्व को चुनकर छोड़ने को कहते हैं। स्वच्छन्द घूमते अश्व की रक्षा कौन करे, यह पूछने पर व्यास अर्जुन का नाम लेते हैं, और युधिष्ठिर अर्जुन को आदेश देते हैं कि सामने आने वाले राजाओं से युद्ध न करें और उन्हें इस यज्ञ की सूचना दें। भीम और नकुल को नगर की रक्षा तथा सहदेव को गृहस्थी के प्रबन्ध का भार सौंपा जाता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.72.1)
एवमुक्तस्तु कृष्णेन धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । व्यासमामन्त्र्य मेधावी ततो वचनमब्रवीत् ॥
evamuktastu kṛṣṇena dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | vyāsamāmantrya medhāvī tato vacanamabravīt
कृष्ण के ऐसा कहने पर बुद्धिमान् धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने व्यास को सम्बोधित करके फिर ये वचन कहे।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (14.72.2)
यदा कालं भवान्वेत्ति हयमेधस्य तत्त्वतः । दीक्षयस्व तदा मां त्वं त्वय्यायत्तो हि मे क्रतुः ॥
yadā kālaṃ bhavānvetti hayamedhasya tattvataḥ | dīkṣayasva tadā māṃ tvaṃ tvayyāyatto hi me kratuḥ
अश्वमेध का ठीक समय आप जब भी जानें, तभी मुझे दीक्षा दीजिए; मेरा यज्ञ आप पर ही निर्भर है।
व्यास उवाच
श्लोक 3 (14.72.3)
अयं पैलोऽथ कौन्तेय याज्ञवल्क्यस्तथैव च । विधानं यद्यथा कालं तत्कर्तारौ न संशयः ॥
ayaṃ pailo'tha kaunteya yājñavalkyastathaiva ca | vidhānaṃ yadyathā kālaṃ tatkartārau na saṃśayaḥ
हे कुन्तीपुत्र, ये पैल हैं और ये याज्ञवल्क्य भी; ये दोनों समय के अनुसार जो विधान है, उसे पूरा करेंगे, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 4 (14.72.4)
चैत्र्यां हि पौर्णमास्यां तु तव दीक्षा भविष्यति । सम्भाराः सम्भ्रियन्तां च यज्ञार्थं पुरुषर्षभ ॥
caitryāṃ hi paurṇamāsyāṃ tu tava dīkṣā bhaviṣyati | sambhārāḥ sambhriyantāṃ ca yajñārthaṃ puruṣarṣabha
चैत्र मास की पूर्णिमा को तुम्हारी दीक्षा होगी। हे पुरुषश्रेष्ठ, यज्ञ के लिए सामग्री जुटाई जाए।
श्लोक 5 (14.72.5)
अश्वविद्याविदश्चैव सूता विप्राश्च तद्विदः । मेध्यमश्वं परीक्षन्तां तव यज्ञार्थसिद्धये ॥
aśvavidyāvidaścaiva sūtā viprāśca tadvidaḥ | medhyamaśvaṃ parīkṣantāṃ tava yajñārthasiddhaye
अश्वविद्या के जानकार लोग, सूत और उस विद्या को जानने वाले ब्राह्मण तुम्हारे यज्ञ की सिद्धि के लिए यज्ञयोग्य अश्व की परीक्षा करें।
श्लोक 6 (14.72.6)
तमुत्सृज यथाशास्त्रं पृथिवीं सागराम्बराम् । सपर्येतु यशो नाम्ना तव पार्थिव वर्धयन् ॥
tamutsṛja yathāśāstraṃ pṛthivīṃ sāgarāmbarām | saparyetu yaśo nāmnā tava pārthiva vardhayan
शास्त्र के अनुसार उसे समुद्र रूपी वस्त्र वाली पृथ्वी पर छोड़ दो; हे राजन्, वह तुम्हारे नाम से तुम्हारा यश बढ़ाता हुआ उस पर विचरे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (14.72.7)
इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा पाण्डवः पृथिवीपतिः । चकार सर्वं राजेन्द्र यथोक्तं ब्रह्मवादिना ॥
ityuktaḥ sa tathetyuktvā pāṇḍavaḥ pṛthivīpatiḥ | cakāra sarvaṃ rājendra yathoktaṃ brahmavādinā
ऐसा कहे जाने पर पाण्डव पृथ्वीपति ने "ऐसा ही हो" कहकर, हे राजेन्द्र, वह सब वैसे ही किया जैसा उन ब्रह्मवादी ऋषि ने कहा था।
श्लोक 8 (14.72.8)
सम्भाराश्चैव राजेन्द्र सर्वे सङ्कल्पितास्तथा ॥
sambhārāścaiva rājendra sarve saṅkalpitāstathā
और हे राजेन्द्र, सारी सामग्री भी वैसे ही तैयार कर ली गई।
श्लोक 9 (14.72.9)
स सम्भारान्समाहृत्य नृपो धर्मसुतस्तदा । न्यवेदयदमेयात्मा कृष्णद्वैपायनाय वै ॥
sa sambhārānsamāhṛtya nṛpo dharmasutastadā | nyavedayadameyātmā kṛṣṇadvaipāyanāya vai
सामग्री एकत्र करके अपार आत्मबल वाले धर्मपुत्र राजा ने तब कृष्णद्वैपायन को इसकी सूचना दी।
व्यास उवाच
श्लोक 10 (14.72.10)
ततोऽब्रवीन्महातेजा व्यासो धर्मात्मजं नृपम् । यथाकालं यथायोगं सज्जाः स्म तव दीक्षणे ॥
tato'bravīnmahātejā vyāso dharmātmajaṃ nṛpam | yathākālaṃ yathāyogaṃ sajjāḥ sma tava dīkṣaṇe
तब महातेजस्वी व्यास ने धर्मपुत्र राजा से कहा: "समय और विधि के अनुसार हम तुम्हारी दीक्षा के लिए तैयार हैं।"
श्लोक 11 (14.72.11)
स्फ्यश्च कूर्चश्च सौवर्णो यच्चान्यदपि कौरव । यत्तु योग्यं भवेत्किञ्चिद्रौक्मं तत्क्रियतामिति ॥
sphyaśca kūrcaśca sauvarṇo yaccānyadapi kaurava | yattu yogyaṃ bhavetkiñcidraukmaṃ tatkriyatāmiti
"हे कौरव, स्फ्य और कूर्च सोने के हों, और जो कुछ और भी उपयुक्त हो, वह भी सोने का बनवाया जाए।"
श्लोक 12 (14.72.12)
अश्वश्चोत्सृज्यतामद्य पृथ्व्यामथ यथाक्रमम् । सुगुप्तं चरतां चापि यथाशास्त्रं यथाविधि ॥
aśvaścotsṛjyatāmadya pṛthvyāmatha yathākramam | suguptaṃ caratāṃ cāpi yathāśāstraṃ yathāvidhi
"और आज ही विधिपूर्वक क्रम से अश्व को पृथ्वी पर छोड़ दिया जाए; शास्त्र और विधि के अनुसार वह भली-भाँति सुरक्षित होकर विचरे।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 13 (14.72.13)
अयमश्वो यथा ब्रह्मन्नुत्सृष्टः पृथिवीमिमाम् । चरिष्यति यथाकामं तत्र वै संविधीयताम् ॥
ayamaśvo yathā brahmannutsṛṣṭaḥ pṛthivīmimām | cariṣyati yathākāmaṃ tatra vai saṃvidhīyatām
हे ब्रह्मन्, जब यह अश्व इस पृथ्वी पर छोड़ दिया जाएगा तो वह अपनी इच्छा से घूमेगा; उसके विषय में उचित व्यवस्था की जाए।
श्लोक 14 (14.72.14)
पृथिवीं पर्यटन्तं हि तुरगं कामचारिणम् । कः पालयेदिति मुने तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥
pṛthivīṃ paryaṭantaṃ hi turagaṃ kāmacāriṇam | kaḥ pālayediti mune tadbhavānvaktumarhati
हे मुने, पृथ्वी पर स्वच्छन्द घूमते हुए अश्व की रक्षा कौन करेगा? यह आप बताइए।
व्यास उवाच
श्लोक 15 (14.72.15)
इत्युक्तः स तु राजेन्द्र कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् । भीमसेनादवरजः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् । जिष्णुः सहिष्णुर्धृष्णुश्च स एनं पालयिष्यति ॥
ityuktaḥ sa tu rājendra kṛṣṇadvaipāyano'bravīt | bhīmasenādavarajaḥ śreṣṭhaḥ sarvadhanuṣmatām | jiṣṇuḥ sahiṣṇurdhṛṣṇuśca sa enaṃ pālayiṣyati
ऐसा कहे जाने पर, हे राजेन्द्र, कृष्णद्वैपायन बोले: "भीमसेन के छोटे भाई, सब धनुर्धारियों में श्रेष्ठ, सहनशील और निडर जिष्णु (अर्जुन) इसकी रक्षा करेंगे।"
श्लोक 16 (14.72.16)
शक्तः स हि महीं जेतुं निवातकवचान्तकः । तस्मिन्ह्यस्त्राणि दिव्यानि दिव्यं संहननं तथा । दिव्यं धनुश्चेषुधी च स एनमनुयास्यति ॥
śaktaḥ sa hi mahīṃ jetuṃ nivātakavacāntakaḥ | tasminhyastrāṇi divyāni divyaṃ saṃhananaṃ tathā | divyaṃ dhanuśceṣudhī ca sa enamanuyāsyati
"वह निवातकवचों का संहार करने वाला पृथ्वी को जीतने में समर्थ है। उसके पास दिव्य अस्त्र हैं, दिव्य शरीर-बल है, दिव्य धनुष और दो तरकश हैं; वही इसके पीछे-पीछे जाएगा।"
श्लोक 17 (14.72.17)
स हि धर्मार्थकुशलः सर्वविद्याविशारदः । यथाशास्त्रं नृपश्रेष्ठ चारयिष्यति ते हयम् ॥
sa hi dharmārthakuśalaḥ sarvavidyāviśāradaḥ | yathāśāstraṃ nṛpaśreṣṭha cārayiṣyati te hayam
"वह धर्म और अर्थ में निपुण और सब विद्याओं में प्रवीण है; हे नृपश्रेष्ठ, वह शास्त्र के अनुसार तुम्हारे अश्व को विचरण कराएगा।"
श्लोक 18 (14.72.18)
राजपुत्रो महाबाहुः श्यामो राजीवलोचनः । अभिमन्योः पिता वीरः स एनमनुयास्यति ॥
rājaputro mahābāhuḥ śyāmo rājīvalocanaḥ | abhimanyoḥ pitā vīraḥ sa enamanuyāsyati
"महाबाहु, श्यामवर्ण, कमलनयन, अभिमन्यु के वीर पिता वह राजकुमार उसके पीछे जाएगा।"
श्लोक 19 (14.72.19)
भीमसेनोऽपि तेजस्वी कौन्तेयोऽमितविक्रमः । समर्थो रक्षितुं राष्ट्रं नकुलश्च विशाम्पते ॥
bhīmaseno'pi tejasvī kaunteyo'mitavikramaḥ | samartho rakṣituṃ rāṣṭraṃ nakulaśca viśāmpate
"तेजस्वी, अपार पराक्रमी कुन्तीपुत्र भीमसेन भी राज्य की रक्षा करने में समर्थ हैं, और हे प्रजापति, नकुल भी।"
श्लोक 20 (14.72.20)
सहदेवस्तु कौरव्य समाधास्यति बुद्धिमान् । कुटुम्बतन्त्रं विधिवत्सर्वमेव महायशाः ॥
sahadevastu kauravya samādhāsyati buddhimān | kuṭumbatantraṃ vidhivatsarvameva mahāyaśāḥ
"और हे कौरव्य, बुद्धिमान् और यशस्वी सहदेव परिवार के सारे प्रबन्ध को विधिपूर्वक सँभालेंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (14.72.21)
स तु सर्वं यथान्यायमुक्तं कुरुकुलोद्वहः । चकार फल्गुनं चापि संदिदेश हयं प्रति ॥
sa tu sarvaṃ yathānyāyamuktaṃ kurukulodvahaḥ | cakāra phalgunaṃ cāpi saṃdideśa hayaṃ prati
कुरुकुल के उस श्रेष्ठ पुरुष ने जैसा विधिपूर्वक कहा गया था वह सब किया, और फल्गुन (अर्जुन) को अश्व के विषय में आदेश दिया।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 22 (14.72.22)
एह्यर्जुन त्वया वीर हयोऽयं परिपाल्यताम् । त्वमर्हो रक्षितुं ह्येनं नान्यः कश्चन मानवः ॥
ehyarjuna tvayā vīra hayo'yaṃ paripālyatām | tvamarho rakṣituṃ hyenaṃ nānyaḥ kaścana mānavaḥ
"आओ अर्जुन, वीर; इस अश्व की रक्षा तुम करो। इसकी रक्षा के योग्य तुम हो, दूसरा कोई मनुष्य नहीं।"
श्लोक 23 (14.72.23)
ये चापि त्वां महाबाहो प्रत्युद्यान्ति नराधिपाः । तैर्विग्रहो यथा न स्यात्तथा कार्यं त्वयाऽनघ ॥
ye cāpi tvāṃ mahābāho pratyudyānti narādhipāḥ | tairvigraho yathā na syāttathā kāryaṃ tvayā'nagha
"और हे महाबाहु, जो राजा तुम्हारे सामने आएँ, हे निष्पाप, तुम ऐसा करना कि उनसे युद्ध न हो।"
श्लोक 24 (14.72.24)
आख्यातव्यश्च भवता यज्ञोऽयं मम सर्वशः । पार्थिवेभ्यो महाबाहो समये गम्यतामिति ॥
ākhyātavyaśca bhavatā yajño'yaṃ mama sarvaśaḥ | pārthivebhyo mahābāho samaye gamyatāmiti
"तुम्हें मेरा यह यज्ञ सब ओर के राजाओं को बता देना है, हे महाबाहु; वे ठीक समय पर आएँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (14.72.25)
एवमुक्त्वा स धर्मात्मा भ्रातरं सव्यसाचिनम् । भीमं च नकुलं चैव पुरगुप्तौ समादधत् ॥
evamuktvā sa dharmātmā bhrātaraṃ savyasācinam | bhīmaṃ ca nakulaṃ caiva puraguptau samādadhat
अपने भाई सव्यसाची (अर्जुन) से इस प्रकार कहकर धर्मात्मा राजा ने भीम और नकुल को नगर की रक्षा में नियुक्त किया,
श्लोक 26 (14.72.26)
कुटुम्बतन्त्रे च तदा सहदेवं युधांपतिम् । अनुमान्य महीपालं धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरः ॥
kuṭumbatantre ca tadā sahadevaṃ yudhāṃpatim | anumānya mahīpālaṃ dhṛtarāṣṭraṃ yudhiṣṭhiraḥ
और योद्धाओं के स्वामी सहदेव को परिवार के प्रबन्ध में; और राजा धृतराष्ट्र की अनुमति लेकर युधिष्ठिर ने...