आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 73
युधिष्ठिर की दीक्षा और अश्व के पीछे अर्जुन का प्रस्थान
निश्चित समय पर ऋत्विज् युधिष्ठिर को अश्वमेध की दीक्षा देते हैं और व्यास अश्व को छोड़ते हैं। अर्जुन उसके पीछे चलते हैं; याज्ञवल्क्य का एक शिष्य तथा अनेक ब्राह्मण और क्षत्रिय उनके साथ जाते हैं, और नगर की भीड़ उन्हें देखने उमड़ती है तथा उनकी यात्रा के लिए मंगलकामना करती है। वैशम्पायन बताते हैं कि अश्व के मार्ग में मिले राजाओं से अर्जुन के जो अनेक युद्ध हुए, उन्हें वे कहेंगे, उत्तर दिशा से आरम्भ करके।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.73.1)
दीक्षाकाले तु सम्प्राप्ते ततस्ते सुमहर्त्विजः । विधिवद्दीक्षयामासुरश्वमेधाय पार्थिवम् ॥
dīkṣākāle tu samprāpte tataste sumahartvijaḥ | vidhivaddīkṣayāmāsuraśvamedhāya pārthivam
दीक्षा का समय आने पर उन श्रेष्ठ ऋत्विजों ने अश्वमेध के लिए राजा को विधिपूर्वक दीक्षा दी।
श्लोक 2 (14.73.2)
कृत्वा स पशुमेधांश्च दीक्षितः पाण्डुनन्दनः । धर्मराजो महातेजाः सहर्त्विग्भिर्व्यरोचत ॥
kṛtvā sa paśumedhāṃśca dīkṣitaḥ pāṇḍunandanaḥ | dharmarājo mahātejāḥ sahartvigbhirvyarocata
पशु-यज्ञ सम्पन्न करके दीक्षित हुए पाण्डुनन्दन महातेजस्वी धर्मराज अपने ऋत्विजों के बीच शोभित हुए।
श्लोक 3 (14.73.3)
हयश्च हयमेधार्थं स्वयं स ब्रह्मवादिना । उत्सृष्टः शास्त्रविधिना व्यासेनामिततेजसा ॥
hayaśca hayamedhārthaṃ svayaṃ sa brahmavādinā | utsṛṣṭaḥ śāstravidhinā vyāsenāmitatejasā
और अश्वमेध के लिए उस अश्व को शास्त्र की विधि से अपरिमित तेज वाले वेदवादी व्यास ने स्वयं छोड़ा।
श्लोक 4 (14.73.4)
स राजा राजधर्मेण दीक्षितो विबभौ तदा । हेममाली रुक्मकण्ठः प्रदीप्त इव पावकः ॥
sa rājā rājadharmeṇa dīkṣito vibabhau tadā | hemamālī rukmakaṇṭhaḥ pradīpta iva pāvakaḥ
राजधर्म के अनुसार दीक्षित हुए वे राजा तब सोने की माला और स्वर्णहार पहने, अग्नि के समान दमकते हुए शोभित हुए।
श्लोक 5 (14.73.5)
कृष्णाजिनी दण्डपाणिः क्षौमवासाः स धर्मजः । विबभौ द्युतिमान्भूयः प्रजापतिरिवाध्वरे ॥
kṛṣṇājinī daṇḍapāṇiḥ kṣaumavāsāḥ sa dharmajaḥ | vibabhau dyutimānbhūyaḥ prajāpatirivādhvare
कृष्ण मृगचर्म धारण किए, हाथ में दण्ड लिए और क्षौम वस्त्र पहने हुए वह धर्मपुत्र यज्ञ में प्रजापति के समान तेजस्वी होकर शोभित हुआ।
श्लोक 6 (14.73.6)
तथैवास्यर्त्विजः सर्वे तुल्यवेषा विशांपते । बभूवुरर्जुनश्चापि प्रदीप्त इव पावकः ॥
tathaivāsyartvijaḥ sarve tulyaveṣā viśāṃpate | babhūvurarjunaścāpi pradīpta iva pāvakaḥ
हे प्रजापति, उसी प्रकार उनके सब ऋत्विज् एक-से वेष में थे, और अर्जुन भी अग्नि के समान दीप्त हो रहे थे।
श्लोक 7 (14.73.7)
श्वेताश्वः कपिकेतुश्च ससाराश्वं धनञ्जयः । विधिवत्पृथिवीपाल धर्मराजस्य शासनात् ॥
śvetāśvaḥ kapiketuśca sasārāśvaṃ dhanañjayaḥ | vidhivatpṛthivīpāla dharmarājasya śāsanāt
श्वेत अश्वों वाले, कपिध्वज धनञ्जय धर्मराज की आज्ञा से विधिपूर्वक अश्व के पीछे चले।
श्लोक 8 (14.73.8)
क्षिपन्गाण्डिवं राजन्बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् । तमश्वं पृथिवीपाल मुदा युक्तः ससार च ॥
kṣipangāṇḍivaṃ rājanbaddhagodhāṅgulitravān | tamaśvaṃ pṛthivīpāla mudā yuktaḥ sasāra ca
हे राजन्, गोधा-चर्म का अँगुलित्र बाँधे, गाण्डीव को झंकारते हुए वे पृथ्वीपाल, उस अश्व के पीछे आनन्द से भरे हुए चले।
श्लोक 9 (14.73.9)
अनुमार्गं तदा राजन्नागमत्तत्पुरं विभो । द्रष्टुकामं कुरुश्रेष्ठं प्रयास्यन्तं धनञ्जयम् ॥
anumārgaṃ tadā rājannāgamattatpuraṃ vibho | draṣṭukāmaṃ kuruśreṣṭhaṃ prayāsyantaṃ dhanañjayam
तब, हे राजन्, वह नगर उनके मार्ग के साथ-साथ उमड़ पड़ा, प्रस्थान करते हुए कुरुश्रेष्ठ धनञ्जय को देखने की इच्छा से।
श्लोक 10 (14.73.10)
तेषामन्योन्यसम्मर्दादूष्मेव समाजायत । दिदृक्षूणां हयं तं च तं चैव हयसारिणम् ॥
teṣāmanyonyasammardādūṣmeva samājāyata | didṛkṣūṇāṃ hayaṃ taṃ ca taṃ caiva hayasāriṇam
उस अश्व, उन्हें और अश्व के पीछे चलने वाले को देखने की इच्छा करने वालों की परस्पर धक्का-मुक्की से मानो गरमी-सी उठ आई।
श्लोक 11 (14.73.11)
ततः शब्दो महाराज दिशः खं प्रतिपूरयन् । बभूव प्रेक्षतां नॄणां कुन्तीपुत्रं धनंजयम् ॥
tataḥ śabdo mahārāja diśaḥ khaṃ pratipūrayan | babhūva prekṣatāṃ nṝṇāṃ kuntīputraṃ dhanaṃjayam
तब, हे महाराज, कुन्तीपुत्र धनञ्जय को देखने वाले लोगों से दिशाओं और आकाश को भर देने वाला शोर उठा।
जना ऊचुः
श्लोक 12 (14.73.12)
एष गच्छति कौन्तेयस्तुरगश्चैव दीप्तिमान् । समन्वेति महाबाहुः संस्पृशन्धनुरुत्तमम् ॥
eṣa gacchati kaunteyasturagaścaiva dīptimān | samanveti mahābāhuḥ saṃspṛśandhanuruttamam
"यह कुन्तीपुत्र जा रहे हैं, और यह दीप्तिमान् अश्व भी! महाबाहु अपने उत्तम धनुष को छूते हुए उसके पीछे चल रहे हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 13 (14.73.13)
एवं शुश्राव वदतां गिरो जिष्णुरुदारधीः । स्वस्ति तेऽस्तु व्रजारिष्टं पुनश्चैहीति भारत ॥
evaṃ śuśrāva vadatāṃ giro jiṣṇurudāradhīḥ | svasti te'stu vrajāriṣṭaṃ punaścaihīti bhārata
बोलने वालों के ऐसे वचन उदार बुद्धि वाले जिष्णु ने सुने: "तुम्हारा कल्याण हो; सकुशल जाओ और, हे भारत, फिर लौट आओ!"
श्लोक 14 (14.73.14)
अथापरे मनुष्येन्द्र पुरुषा वाक्यमब्रुवन् । नैनं पश्याम सम्मर्दे धनुरेतत्प्रदृश्यते ॥
athāpare manuṣyendra puruṣā vākyamabruvan | nainaṃ paśyāma sammarde dhanuretatpradṛśyate
तब, हे नरेन्द्र, कुछ और लोगों ने कहा: "इस भीड़ में हम उन्हें नहीं देख पाते, पर यह धनुष दिखाई देता है।"
जना ऊचुः
श्लोक 15 (14.73.15)
एतद्धि भीमनिर्ह्रादं विश्रुतं गाण्डिवं धनुः । स्वस्ति गच्छत्वरिष्टो वै पन्थानमकुतोभयम् । निवृत्तमेनं द्रक्ष्यामः पुनरेष्यति च ध्रुवम् ॥
etaddhi bhīmanirhrādaṃ viśrutaṃ gāṇḍivaṃ dhanuḥ | svasti gacchatvariṣṭo vai panthānamakutobhayam | nivṛttamenaṃ drakṣyāmaḥ punareṣyati ca dhruvam
"यह भयंकर टंकार वाला प्रसिद्ध गाण्डीव धनुष है। वे सकुशल, निर्विघ्न और निर्भय मार्ग से जाएँ। हम उन्हें लौटा हुआ देखेंगे; वे अवश्य फिर आएँगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 16 (14.73.16)
एवमाद्या मनुष्याणां स्त्रीणां च भरतर्षभ । शुश्राव मधुरा वाचः पुनःपुनरुदारधीः ॥
evamādyā manuṣyāṇāṃ strīṇāṃ ca bharatarṣabha | śuśrāva madhurā vācaḥ punaḥpunarudāradhīḥ
हे भरतश्रेष्ठ, स्त्री-पुरुषों के ऐसे मधुर वचन उस उदार बुद्धि वाले ने बार-बार सुने।
श्लोक 17 (14.73.17)
याज्ञवल्क्यस्य शिष्यश्च कुशलो यज्ञकर्मणि । प्रायात्पार्थेन सहितः शान्त्यर्थं वेदपारगः ॥
yājñavalkyasya śiṣyaśca kuśalo yajñakarmaṇi | prāyātpārthena sahitaḥ śāntyarthaṃ vedapāragaḥ
याज्ञवल्क्य का एक शिष्य, जो यज्ञ-कर्म में कुशल और वेद का पारंगत था, शान्ति-कर्म के लिए पार्थ के साथ गया।
श्लोक 18 (14.73.18)
ब्राह्मणाश्च महीपाल बहवो वेदपारगाः । अनुजग्मुर्महात्मानं क्षत्रियाश्च विशाम्पते । विधिवत्पृथिवीपाल धर्मराजस्य शासनात् ॥
brāhmaṇāśca mahīpāla bahavo vedapāragāḥ | anujagmurmahātmānaṃ kṣatriyāśca viśāmpate | vidhivatpṛthivīpāla dharmarājasya śāsanāt
हे पृथ्वीपाल, वेदों के पारंगत बहुत-से ब्राह्मण और, हे प्रजापति, क्षत्रिय भी उस महात्मा के पीछे गए; हे पृथ्वीपाल, धर्मराज की आज्ञा से विधिपूर्वक।
श्लोक 19 (14.73.19)
पाण्डवैः पृथिवीमश्वो निर्जितामस्त्रतेजसा । चचार स महाराज यथादेशं च सत्तम ॥
pāṇḍavaiḥ pṛthivīmaśvo nirjitāmastratejasā | cacāra sa mahārāja yathādeśaṃ ca sattama
अस्त्र-तेज से पाण्डवों द्वारा जीती हुई पृथ्वी पर वह अश्व, हे महाराज, हे श्रेष्ठ पुरुष, जहाँ जैसा निर्देश था वैसे विचरता रहा।
श्लोक 20 (14.73.20)
तत्र युद्धानि वृत्तानि यान्यासन्पाण्डवस्य ह । तानि वक्ष्यामि ते वीर विचित्राणि महान्ति च ॥
tatra yuddhāni vṛttāni yānyāsanpāṇḍavasya ha | tāni vakṣyāmi te vīra vicitrāṇi mahānti ca
हे वीर, वहाँ पाण्डुपुत्र के जो विचित्र और बड़े युद्ध हुए, उन्हें मैं तुम्हें सुनाऊँगा।
श्लोक 21 (14.73.21)
स हयः पृथिवीं राजन्प्रदक्षिणमवर्तत । ससारोत्तरतः पूर्वं तन्निबोध महीपते ॥
sa hayaḥ pṛthivīṃ rājanpradakṣiṇamavartata | sasārottarataḥ pūrvaṃ tannibodha mahīpate
हे राजन्, वह अश्व पृथ्वी की प्रदक्षिणा करता हुआ चला; वह पहले उत्तर की ओर गया। हे महीपति, उसे सुनो।
श्लोक 22 (14.73.22)
अवमृद्नन्स राष्ट्राणि पार्थिवानां हयोत्तमः । शनैस्तदा परिययौ श्वेताश्वश्च महारथः ॥
avamṛdnansa rāṣṭrāṇi pārthivānāṃ hayottamaḥ | śanaistadā pariyayau śvetāśvaśca mahārathaḥ
राजाओं के राष्ट्रों को रौंदता हुआ वह उत्तम अश्व धीरे-धीरे चला, और श्वेत अश्वों वाले महारथी अर्जुन उसके पीछे थे।
श्लोक 23 (14.73.23)
तत्र सङ्गणना नास्ति राज्ञामयुतशस्तदा । येऽयुध्यन्त महाराज क्षत्रिया हतबान्धवाः ॥
tatra saṅgaṇanā nāsti rājñāmayutaśastadā | ye'yudhyanta mahārāja kṣatriyā hatabāndhavāḥ
हे महाराज, उस समय जिन राजाओं ने युद्ध किया, वे दसियों हज़ार थे और गिने नहीं जा सकते थे; वे ऐसे क्षत्रिय थे जिनके बन्धु मारे जा चुके थे।
श्लोक 24 (14.73.24)
किराता यवना राजन्बहवोऽसिधनुर्धराः । म्लेच्छाश्चान्ये बहुविधाः पूर्वं ये निकृता रणे ॥
kirātā yavanā rājanbahavo'sidhanurdharāḥ | mlecchāścānye bahuvidhāḥ pūrvaṃ ye nikṛtā raṇe
हे राजन्, वहाँ किरात और यवन थे, जिनमें बहुत-से तलवार और धनुष धारण करने वाले थे, और अनेक प्रकार के अन्य म्लेच्छ भी थे जो पहले युद्ध में हराए जा चुके थे।
श्लोक 25 (14.73.25)
आर्याश्च पृथिवीपालाः प्रहृष्टनरवाहनाः । समीयुः पाण्डुपुत्रेण बहवो युद्धदुर्मदाः ॥
āryāśca pṛthivīpālāḥ prahṛṣṭanaravāhanāḥ | samīyuḥ pāṇḍuputreṇa bahavo yuddhadurmadāḥ
आर्य राजा भी, जिनके सैनिक और वाहन उल्लसित थे और जिनमें बहुत-से युद्ध के मद में चूर थे, पाण्डुपुत्र के सामने आ जुटे।
श्लोक 26 (14.73.26)
एवं वृत्तानि युद्धानि तत्रतत्र महीपते । अर्जुनस्य महीपालैर्नानादेशसमागतैः ॥
evaṃ vṛttāni yuddhāni tatratatra mahīpate | arjunasya mahīpālairnānādeśasamāgataiḥ
हे महीपते, इस प्रकार जगह-जगह अर्जुन के और अनेक देशों से आए राजाओं के बीच युद्ध हुए।
श्लोक 27 (14.73.27)
यान्यत्र हयतो राजन्प्रवृत्तानि महान्ति च । तानि युद्धानि वक्ष्यामि कौन्तेयस्य तवानघ ॥
yānyatra hayato rājanpravṛttāni mahānti ca | tāni yuddhāni vakṣyāmi kaunteyasya tavānagha
हे राजन्, अश्व के कारण वहाँ जो बड़े युद्ध हुए, कुन्तीपुत्र के उन युद्धों को, हे निष्पाप, मैं तुम्हें सुनाऊँगा।