आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 74
अर्जुन द्वारा त्रिगर्तों की पराजय
जिन योद्धाओं को अर्जुन ने मारा था, उनके पुत्र-पौत्र त्रिगर्त अपने देश की सीमा पर यज्ञ के अश्व को घेर लेते हैं। जिन राजाओं के बन्धु मारे जा चुके हैं, उन्हें न मारने के युधिष्ठिर के आदेश से बँधे अर्जुन उन्हें लौट जाने को कहते हैं, पर सूर्यवर्मा, केतुवर्मा और धृतवर्मा के नेतृत्व में वे आक्रमण करते हैं। अर्जुन केतुवर्मा को मारते हैं और बालक धृतवर्मा को छोड़ देते हैं, जिसके बाण से उनके हाथ पर चोट लगती है और गाण्डीव गिर पड़ता है; क्रुद्ध अर्जुन उनकी सेना को तोड़ देते हैं, और बचे हुए योद्धा हार मानकर उनकी सेवा का प्रस्ताव रखते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.74.1)
त्रिगर्तैरभवद्युद्धं कृतवैरैः किरीटिनः । महारथसमाज्ञातैर्हतानां पुत्रनप्तृभिः ॥
trigartairabhavadyuddhaṃ kṛtavairaiḥ kirīṭinaḥ | mahārathasamājñātairhatānāṃ putranaptṛbhiḥ
किरीटी (अर्जुन) का त्रिगर्तों से युद्ध हुआ, जो उनसे वैर रखते थे; वे महारथी माने जाते थे और उनके मारे हुए योद्धाओं के पुत्र-पौत्र थे।
श्लोक 2 (14.74.2)
ते समाज्ञाय सम्प्राप्तं यज्ञियं तुरगोत्तमम् । विषयान्तं ततो वीरा दंशिताः पर्यवारयन् ॥
te samājñāya samprāptaṃ yajñiyaṃ turagottamam | viṣayāntaṃ tato vīrā daṃśitāḥ paryavārayan
यह जानकर कि यज्ञ का उत्तम अश्व उनके देश की सीमा पर आ पहुँचा है, उन वीरों ने कवच धारण करके उसे घेर लिया।
श्लोक 3 (14.74.3)
रथिनो बद्धतूणीराः सदश्वैः समलङ्कृतैः । परिवार्य हयं राजन्ग्रहीतुं सम्प्रचक्रमुः ॥
rathino baddhatūṇīrāḥ sadaśvaiḥ samalaṅkṛtaiḥ | parivārya hayaṃ rājangrahītuṃ sampracakramuḥ
हे राजन्, तरकश बाँधे रथी, सजे हुए उत्तम घोड़ों के साथ, उस अश्व को घेरकर उसे पकड़ने में लग गए।
श्लोक 4 (14.74.4)
ततः किरीटी सञ्चिन्त्य तेषां तत्र चिकीर्षितम् । वारयामास तान्वीरान्सान्त्वपूर्वमरिंदमः ॥
tataḥ kirīṭī sañcintya teṣāṃ tatra cikīrṣitam | vārayāmāsa tānvīrānsāntvapūrvamariṃdamaḥ
तब शत्रुदमन किरीटी ने उनके वहाँ के इरादे को समझकर पहले मीठे वचनों से उन वीरों को रोकना चाहा।
श्लोक 5 (14.74.5)
तदनादृत्य ते सर्वे शरैरभ्यहनंस्तदा । तमोरजोभ्यां संछन्नांस्तान्किरीटी न्यवारयत् ॥
tadanādṛtya te sarve śarairabhyahanaṃstadā | tamorajobhyāṃ saṃchannāṃstānkirīṭī nyavārayat
उसकी बात की उपेक्षा करके उन सबने तब उन पर बाण चलाए; और अन्धकार तथा धूल से ढके हुए उन योद्धाओं को किरीटी ने रोका।
श्लोक 6 (14.74.6)
तानव्रवीत्ततो जिष्णुः प्रहसन्निव भारत । निवर्तध्वमधर्मज्ञाः श्रेयो जीवितमेव च ॥
tānavravīttato jiṣṇuḥ prahasanniva bhārata | nivartadhvamadharmajñāḥ śreyo jīvitameva ca
तब जिष्णु ने, हे भारत, मानो हँसते हुए उनसे कहा: "लौट जाओ, तुम धर्म नहीं जानते; तुम्हारे लिए जीवन ही श्रेयस्कर है।"
श्लोक 7 (14.74.7)
स हि वीरः प्रयास्यन्वै धर्मराजेन वारितः । हतबान्धवा न ते पार्थ हन्तव्याः पार्थिवा इति ॥
sa hi vīraḥ prayāsyanvai dharmarājena vāritaḥ | hatabāndhavā na te pārtha hantavyāḥ pārthivā iti
क्योंकि प्रस्थान करते समय उन वीर को धर्मराज ने रोक दिया था: "हे पार्थ, जिन राजाओं के बन्धु मारे जा चुके हैं, उन्हें तुम्हें नहीं मारना है।"
श्लोक 8 (14.74.8)
स तदा तद्वचः श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमतः । तान्निवर्तध्वमित्याह न न्यवर्तन्ति चापि ते ॥
sa tadā tadvacaḥ śrutvā dharmarājasya dhīmataḥ | tānnivartadhvamityāha na nyavartanti cāpi te
धर्मराज के उन बुद्धिमत्तापूर्ण वचनों को सुनकर उन्होंने उनसे कहा, "लौट जाओ"; पर वे नहीं लौटे।
श्लोक 9 (14.74.9)
ततस्त्रिगर्तराजानं सूर्यवर्माणमाहवे । विनद्य शरजालेन प्रजहास धनंजयः ॥
tatastrigartarājānaṃ sūryavarmāṇamāhave | vinadya śarajālena prajahāsa dhanaṃjayaḥ
तब धनञ्जय ने युद्ध में गर्जना करके बाणों के जाल से त्रिगर्तराज सूर्यवर्मा पर जोर से हँसी की।
श्लोक 10 (14.74.10)
ततस्ते रथघोषेण रथनेमिस्वनेन च । पूरयन्तो दिशः सर्वा धनंजयमुपाद्रवन् ॥
tataste rathaghoṣeṇa rathanemisvanena ca | pūrayanto diśaḥ sarvā dhanaṃjayamupādravan
तब रथों की घरघराहट और पहियों की नेमियों की ध्वनि से सब दिशाओं को भरते हुए वे धनञ्जय पर टूट पड़े।
श्लोक 11 (14.74.11)
सूर्यवर्मा ततः पार्थे शराणां नतपर्वणाम् । शतान्यमुञ्चद्राजेन्द्र लघ्वस्त्रमभिदर्शयन् ॥
sūryavarmā tataḥ pārthe śarāṇāṃ nataparvaṇām | śatānyamuñcadrājendra laghvastramabhidarśayan
तब, हे राजेन्द्र, सूर्यवर्मा ने अस्त्र-चालन की फुर्ती दिखाते हुए पार्थ पर सैकड़ों सीधी गाँठ वाले बाण छोड़े।
श्लोक 12 (14.74.12)
तथैवान्ये महेष्वासा ये च तस्यानुयायिनः । मुमुचुः शरवर्षाणि धनंजयवधैषिणः ॥
tathaivānye maheṣvāsā ye ca tasyānuyāyinaḥ | mumucuḥ śaravarṣāṇi dhanaṃjayavadhaiṣiṇaḥ
इसी प्रकार उसके अनुयायी अन्य महाधनुर्धरों ने भी धनञ्जय को मारने की इच्छा से बाणों की वर्षा की।
श्लोक 13 (14.74.13)
स ताञ्ज्यामुखनिर्मुक्तैर्बहुभिः सुबहूञ्शरान् । चिच्छेद पाण्डवो राजंस्ते भूमौ न्यपतंस्तदा ॥
sa tāñjyāmukhanirmuktairbahubhiḥ subahūñśarān | ciccheda pāṇḍavo rājaṃste bhūmau nyapataṃstadā
धनुष की डोरी के सिरे से छोड़े हुए अपने बहुत-से बाणों से पाण्डव ने उनके अनेक बाणों को काट डाला, हे राजन्, और वे तब धरती पर गिर पड़े।
श्लोक 14 (14.74.14)
केतुवर्मा तु तेजस्वी तस्यैवावरजो युवा । युयुधे भ्रातुरर्थाय पाण्डवेन यशस्विना ॥
ketuvarmā tu tejasvī tasyaivāvarajo yuvā | yuyudhe bhrāturarthāya pāṇḍavena yaśasvinā
परन्तु उसी (सूर्यवर्मा) का तेजस्वी युवा छोटा भाई केतुवर्मा अपने भाई के लिए यशस्वी पाण्डव से लड़ा।
श्लोक 15 (14.74.15)
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य केतुवर्माणमाहवे । अभ्यघ्नन्निशितैर्बाणैर्बीभत्सुः परवीरहा ॥
tamāpatantaṃ samprekṣya ketuvarmāṇamāhave | abhyaghnanniśitairbāṇairbībhatsuḥ paravīrahā
युद्ध में केतुवर्मा को अपनी ओर आते देखकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले बीभत्सु ने तीखे बाणों से उसे मार डाला।
श्लोक 16 (14.74.16)
केतुवर्मण्यभिहते धृतवर्मा महारथः । रथेनाशु समुत्पत्य शरैर्जिष्णुमवाकिरत् ॥
ketuvarmaṇyabhihate dhṛtavarmā mahārathaḥ | rathenāśu samutpatya śarairjiṣṇumavākirat
केतुवर्मा के मारे जाने पर महारथी धृतवर्मा रथ पर तेज़ी से आगे कूदकर जिष्णु पर बाणों की वर्षा करने लगा।
श्लोक 17 (14.74.17)
तस्य तां शीघ्रतामीक्ष्य तुतोषातीव वीर्यवान् । गुडाकेशो महातेजा बालस्य धृतवर्मणः ॥
tasya tāṃ śīghratāmīkṣya tutoṣātīva vīryavān | guḍākeśo mahātejā bālasya dhṛtavarmaṇaḥ
बालक धृतवर्मा की उस फुर्ती को देखकर पराक्रमी, महातेजस्वी गुडाकेश (अर्जुन) बहुत प्रसन्न हुए।
श्लोक 18 (14.74.18)
न संदधानं ददृशे नाददानं च तं तदा । किरन्तमेवं स शरान्ददृशे पाकशासनिः ॥
na saṃdadhānaṃ dadṛśe nādadānaṃ ca taṃ tadā | kirantamevaṃ sa śarāndadṛśe pākaśāsaniḥ
उन्होंने उसे न बाण चढ़ाते देखा, न खींचते; केवल बाण बरसाते ही देखा, इन्द्र के पुत्र (अर्जुन) ने उसे ऐसा देखा।
श्लोक 19 (14.74.19)
स तु तं पूजयामास धृतवर्माणमाहवे । मनसा तु मुहूर्तं वै रणे समभिहर्षयन् ॥
sa tu taṃ pūjayāmāsa dhṛtavarmāṇamāhave | manasā tu muhūrtaṃ vai raṇe samabhiharṣayan
उन्होंने युद्ध में धृतवर्मा का सम्मान किया और क्षणभर मन ही मन रण में उसकी प्रशंसा से हर्षित हुए।
श्लोक 20 (14.74.20)
न विव्याध रणे क्रुद्धः कुन्तीपुत्रो हसन्निव । सौभद्रस्येव तत्कर्म दृष्ट्वा बालस्य विस्मितः ॥
na vivyādha raṇe kruddhaḥ kuntīputro hasanniva | saubhadrasyeva tatkarma dṛṣṭvā bālasya vismitaḥ
क्रुद्ध होते हुए भी कुन्तीपुत्र ने युद्ध में उसे घायल नहीं किया, मानो हँसते रहे; सौभद्र (अभिमन्यु) के समान उस बालक का पराक्रम देखकर वे विस्मित थे।
श्लोक 21 (14.74.21)
तं पन्नगमिव क्रुद्धं कुरुवीरः स्मयन्निव । प्रीतिपूर्वं महाबाहुः प्राणैर्न व्यपरोपयत् ॥
taṃ pannagamiva kruddhaṃ kuruvīraḥ smayanniva | prītipūrvaṃ mahābāhuḥ prāṇairna vyaparopayat
क्रुद्ध सर्प के समान होने पर भी कुरुवीर महाबाहु अर्जुन ने मानो मुसकराते हुए, स्नेहवश उसके प्राण नहीं लिए।
श्लोक 22 (14.74.22)
स तथा रक्ष्यमाणो वै पार्थेनामिततेजसा । धृतवर्मा शरं दीप्तं मुमोच विजये तदा ॥
sa tathā rakṣyamāṇo vai pārthenāmitatejasā | dhṛtavarmā śaraṃ dīptaṃ mumoca vijaye tadā
इस प्रकार अपार तेज वाले पार्थ से बचाया जाता हुआ धृतवर्मा उस समय विजय (अर्जुन) पर एक दहकता बाण छोड़ बैठा।
श्लोक 23 (14.74.23)
स तेन विजयस्तूर्णमासीद्विद्धः करे भृशम् । मुमोच गाण्डिवं मोहात्तत्पपाताथ भूतले ॥
sa tena vijayastūrṇamāsīdviddhaḥ kare bhṛśam | mumoca gāṇḍivaṃ mohāttatpapātātha bhūtale
उस बाण से हाथ में गहरी चोट खाकर विजय ने मूर्च्छा-सी में तुरन्त गाण्डीव छोड़ दिया और वह धरती पर गिर पड़ा।
श्लोक 24 (14.74.24)
धनुषः पततस्तस्य सव्यसाचिकराद्विभो । बभूव सदृशं रूपं शक्रचापस्य भारत ॥
dhanuṣaḥ patatastasya savyasācikarādvibho | babhūva sadṛśaṃ rūpaṃ śakracāpasya bhārata
हे विभो, सव्यसाची के हाथ से गिरते हुए उस धनुष का रूप, हे भारत, इन्द्रधनुष के समान हो गया।
श्लोक 25 (14.74.25)
तस्मिन्निपतिते दिव्ये महाधनुषि पार्थिवः । चकार सस्वनं हासं धृतवर्मा महाहवे ॥
tasminnipatite divye mahādhanuṣi pārthivaḥ | cakāra sasvanaṃ hāsaṃ dhṛtavarmā mahāhave
उस दिव्य महाधनुष के गिरने पर राजा धृतवर्मा ने उस महायुद्ध में ज़ोर का अट्टहास किया।
श्लोक 26 (14.74.26)
ततो रोषार्दितो जिष्णुः प्रमृज्य रुधिरं करात् । धनुरादत्त तद्दिव्यं शरवर्षैर्ववर्ष च ॥
tato roṣārdito jiṣṇuḥ pramṛjya rudhiraṃ karāt | dhanurādatta taddivyaṃ śaravarṣairvavarṣa ca
तब रोष से पीड़ित जिष्णु ने हाथ का रक्त पोंछकर वह दिव्य धनुष उठा लिया और बाणों की वर्षा की।
श्लोक 27 (14.74.27)
ततो हलहलाशब्दो दिवस्पृगभवत्तदा । नानाविधानां भूतानां तत्कर्माणि प्रशंसताम् ॥
tato halahalāśabdo divaspṛgabhavattadā | nānāvidhānāṃ bhūtānāṃ tatkarmāṇi praśaṃsatām
तब नाना प्रकार के प्राणियों के उस कर्म की प्रशंसा करने से आकाश को छूने वाला कोलाहल उठा।
श्लोक 28 (14.74.28)
ततः सम्प्रेक्ष्य संक्रुद्धं कालान्तकयमोपमम् । जिष्णुं त्रैगर्तका योधाः परीताः पर्यवारयन् ॥
tataḥ samprekṣya saṃkruddhaṃ kālāntakayamopamam | jiṣṇuṃ traigartakā yodhāḥ parītāḥ paryavārayan
तब काल, अन्तक और यम के समान क्रुद्ध जिष्णु को देखकर त्रिगर्त योद्धाओं ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 29 (14.74.29)
अभिसृत्य परीप्सार्थं ततस्ते धृतवर्मणः । परिवव्रुर्गुडाकेशं तत्राक्रुद्ध्यद्धनंजयः ॥
abhisṛtya parīpsārthaṃ tataste dhṛtavarmaṇaḥ | parivavrurguḍākeśaṃ tatrākruddhyaddhanaṃjayaḥ
धृतवर्मा की रक्षा के लिए आगे बढ़कर उन्होंने गुडाकेश को घेर लिया, और इस पर धनञ्जय क्रोधित हो उठे।
श्लोक 30 (14.74.30)
ततो योधाञ्जघानाशु तेषां स दश चाष्ट च । महेन्द्रवज्रप्रतिमैरायसैर्बहुभिः शरैः ॥
tato yodhāñjaghānāśu teṣāṃ sa daśa cāṣṭa ca | mahendravajrapratimairāyasairbahubhiḥ śaraiḥ
फिर उन्होंने महेन्द्र के वज्र के समान बहुत-से लोहे के बाणों से उन योद्धाओं में से अठारह को शीघ्र मार डाला।
श्लोक 31 (14.74.31)
तान्सम्प्रभग्नान्सम्प्रेक्ष्य त्वरमाणो धनंजयः । शरैराशीविषाकारैर्जघान स्वनवद्धसन् ॥
tānsamprabhagnānsamprekṣya tvaramāṇo dhanaṃjayaḥ | śarairāśīviṣākārairjaghāna svanavaddhasan
उन्हें टूटा हुआ देखकर धनञ्जय ने जल्दी करते हुए ज़ोर से हँसकर विषैले साँपों जैसे बाणों से उन पर प्रहार किया।
श्लोक 32 (14.74.32)
ते भग्नमनसः सर्वे त्रैगर्तकमहारथाः । दिशोऽभिदुद्रुवुः राजन्धनंजयशरार्दिताः ॥
te bhagnamanasaḥ sarve traigartakamahārathāḥ | diśo'bhidudruvuḥ rājandhanaṃjayaśarārditāḥ
हे राजन्, धनञ्जय के बाणों से पीड़ित वे सब त्रिगर्त महारथी टूटे मन से सब दिशाओं में भाग खड़े हुए।
श्लोक 33 (14.74.33)
हतावशिष्टा हि पराः पार्थं दृष्टपराक्रमाः । तमूचुः पुरुषव्याघ्रं संशप्तकनिषूदनम् ॥
hatāvaśiṣṭā hi parāḥ pārthaṃ dṛṣṭaparākramāḥ | tamūcuḥ puruṣavyāghraṃ saṃśaptakaniṣūdanam
मरने से बचे हुए जिन योद्धाओं ने पार्थ का पराक्रम देख लिया था, वे संशप्तकों का संहार करने वाले उन पुरुषव्याघ्र से बोले:
त्रैगर्ता ऊचुः
श्लोक 34 (14.74.34)
तवास्म किंकराः सर्वे सर्वे वै वशगास्तव । आज्ञापयस्व नः पार्थ प्रह्वान्प्रेष्यानवस्थितान् । करिष्यामः प्रियं सर्वं तव कौरवनन्दन ॥
tavāsma kiṃkarāḥ sarve sarve vai vaśagāstava | ājñāpayasva naḥ pārtha prahvānpreṣyānavasthitān | kariṣyāmaḥ priyaṃ sarvaṃ tava kauravanandana
"हम सब तुम्हारे सेवक हैं, हम सब तुम्हारे वश में हैं। हे पार्थ, हम विनम्र सेवक तुम्हारे सामने खड़े हैं, हमें आज्ञा दो। हे कौरवनन्दन, हम तुम्हारा सब प्रिय कार्य करेंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 35 (14.74.35)
एतदाज्ञाय वचनं सर्वांस्तानब्रवीत्तदा । जीवितं रक्षत नृपाः शासनं प्रतिगृह्यताम् ॥
etadājñāya vacanaṃ sarvāṃstānabravīttadā | jīvitaṃ rakṣata nṛpāḥ śāsanaṃ pratigṛhyatām
उनकी बात समझकर उन्होंने तब उन सबसे कहा: "हे राजाओ, अपने प्राण बचाओ; मेरा आदेश स्वीकार करो।"